शादीलाल की शादी
कालेज से थोड़ी दूरी पर ही एक गांव था। वह मोपेड घसीटते हुए वहां पहुंचा। गांव के छोर पर ही जो पहला घर दिखा, एक बुजुर्ग व्यक्ति ने पूछ लिया, 'क्या हो गया भाई, गाड़ी पंचर हो गयी क्या?'
'नहीं दादा, पेट्रोल समाप्त हो गया है। थोड़ा मिटटी का तेल मिल जायेगा? मुझे मौजपुर शीघ्र से शीघ्र पहुंचना है।'
'रुको, देखता हूँ। ' और जाकर एक बोतल ले आया 'बस इतना ही है।'
'चलो, शायद इतने में काम बन जाय।'
शादीलाल मिट्टी का तेल भरकर, मोपेड से अपनी यात्रा पर आगे बढ़ा। एक बार फिर उसे मुसीबत ने घेरा। लड़की वालों के यहाँ पहुँचने से पहले ही मिट्टी का तेल भी ख़त्म हो गया। उस ज़माने में मोबाइल फ़ोन भी नहीं था कि सूचित करके कोई अन्य साधन मंगवा ले। यह तो शुक्र था जहां तेल ख़त्म हुआ, उसी गांव में उसकी फुआ का घर था। वह झटपट वहां जाकर, गाड़ी खड़ी कर दिया। फूफा आदि पहले ही बारात के लिए जा चुके थे, घर में बस फुआ की बहू थी। मोटर साइकिल भी सुभाष लेकर चला गया था। घर पर बस एक पुरानी साइकिल पड़ी थी। शादीलाल ने बिलम्ब किये बिना, साईकिल उठाया और आगे चल दिया।
उधर लड़की वालों के यहाँ हड़कम मचा हुआ था। बारात द्वार पर, दूल्हे का पता ही नहीं। रात के बारह बज चुके थे। लड़की वाले अत्यंत चिंतित थे। बारातियों को खिला पिला दिया गया था। अब विवाह का मुहुर्त रात साढ़े बारह बजे तक ही था। अब ये हुआ कि बाकी कार्यक्रम किये जायँ, हो सकता है तब तक शादीलाल आ जाय, उसे जलपान करके तुरंत विवाह के मण्डप में ले जाया जाय। हर जगह कुछ शरारती तत्व तो होते ही हैं। किसी ने तंज कस दिया, 'बारातियों को खिलाना पिलाना कहीं दण्ड न हो जाय। लगता है, लड़का किसी के प्यार में फंसा होगा, और भाग गया।'
शादीलाल का शादी का जोड़ा जामा रखा ही रह गया, उसे पहन पाने का अवसर नहीं मिल पाया और उसके साधारण कपड़ों में ही शादी हो गयी। मंडप में सजी धजी दुल्हन और अन्य सभी लोग, साफ-सुन्दर वस्त्रों में, बस शादीलाल साधारण कपड़े में सबसे अलग सर्कस का जोकर लग रहा था। दामाद को इस रूप में देखकर, जगप्रवेश को बहुत शर्म आ रही थी। जगप्रवेश ने कहा, 'सिंदूर दान के बाद शादीलाल जाकर कपड़े बदल लें। दस मिनट लगेगा, इसमें कुछ नहीं बिगड़ेगा। फोटोग्राफर को कह दिया फोटो वगैरह तभी लेना। शादीलाल को कपड़ों की तनिक भी म्लानि नहीं थी, आज उसके दोनों हाथ में लड्डू थे; एक तो वकालत की पढ़ाई पूरी हो गयी और दूसरे दुल्हन का हाथ उसके हाथ में। फिर भी ससुर का आग्रह मान कर वह कपड़े बदलने मंडप से बाहर निकला, जब बनवारी लाल से कपड़े माँगा तो पता चला वह तो घर पर ही छूट गया। बेचारे शादीलाल, फिर उसी परिधान में मंडप में विराजे।
अगले दिन दुल्हन विदा कराके शादीलाल बड़े शान से ससुराल से चल दिया। राह में एक जगह गाड़ी रुकी तो किसी ने छेड़ दिया, 'भैया, किसकी नई नवेली दुल्हन लिए जा रहे हो?'
'अरे मेरी ही है, और किसकी !'
खैर, लिवास में क्या रखा है। शादीलाल के घर में नई दुल्हन आई। पास पड़ोस की स्त्रियां गीत गाने के साथ स्वागत में जुट गयीं। घर में रौनक लग गयी। शादी लाल की माँ के तो लग रहा था, पांव जमीं पर ही नहीं थे। माँ के कहने पर, शादीलाल अब थोड़ा बन ठन कर, दूल्हा जैसा दिखने लगा।
पढ़ लिख कर खेती करें, यह शादीलाल को गवारा नहीं था। ग्रेजुएशन करने के बाद वे नौकरी ढूंढने लगे। पहले तो प्रशासनिक परीक्षा का भूत सवार हुआ, पर सफलता नहीं मिली तो सहायक की परीक्षा में बैठे। दो तीन बार प्रयास करने के बाद वहां भी हताशा ही हाथ लगी। अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं में भी सफल नहीं हुए तो सोचे बी० एड० करके अध्यापक बन जाएँ, मगर गांव में पहले ही कई लोग अध्यापक थे, वे कुछ अलग बनना चाहते थे। धीरे धीरे तीन वर्ष बीत गए। नौकरी नहीं मिलने के कारण शादी भी नहीं कर रहे थे। माँ बार बार कहती पच्चीस का हो गया, शादी कर ले, अब क्या बूढा होकर करेगा।
शादीलाल महत्वाकांक्षी थे, वे कुछ बनना चाहते थे। अब उन्होंने एल.एल.बी. करने की ठानी, अभी तक, गांव में कोई वकील नहीं था। सोचे वकालत करके थोड़ी नेतागिरी भी चमक जाएगी।
देर किस बात की, जुगाड़ लगाया और एल.एल.बी. में प्रवेश मिल गया। कॉलेज गांव से काफी दूर था। मगर वे घर से ही आते जाते थे। आने जाने के लिए उन्हें कई तरह के साधन का प्रयोग करना पड़ता। कभी साईकिल तो कभी बस से, कभी किसी से लिफ्ट ले लिया, कभी पापा की पुरानी मोपेड से। खिंच खाँच कर वे अंतिम सत्र तक पहुँच गए थे। शादीलाल के माता पिता सोच रहे थे उनकी जल्दी शादी करके बहू लाया जाय, वे अपनी जिम्मेदारी से भी मुक्त हों और घर में थोड़ी चहल पहल हो। परन्तु उसकी शादी में दोहरा व्यवधान था, एक ओर तो शादीलाल का विवाह से पहले कुछ बनने का जनून, और दूसरा वकालत की पढ़ाई करने के कारण शादी के लिए अच्छे रिश्ते नहीं आ रहे थे। वकीलों की कमाई पर किसी को भरोसा नहीं था, चल गयी तो चल गयी नहीं तो बस ... कचहरी में धक्के खाओ।
एक बार शादीलाल को देखने वाले आये। बातचीत चली तो लगा कि इस बार शादी पक्की हो जाएगी। मगर उनके वापस जाते समय गांव के किसी ने कह दिया, 'बनवारी लाल तो बड़े अच्छे व्यक्ति हैं पर उनका लड़का अवारा है। वह यूँ ही नाम के लिए वकालत कर कर रहा है कि शादी हो जाय। इतने अच्छे परिवार का होकर, अगर ठीक होता तो अब तक कुंवारा थोड़े ही बैठा होता।' वह पार्टी लौट कर दुबारा नहीं आयी।
एक दिन बनवारी लाल चकबंदी के सिलसिले में कचहरी गए थे, वहां उनके पुराने मित्र जगप्रवेश मिल गए। बात चीत में शादीलाल की बात चली। जगप्रवेश की पुत्री संध्या अब सयानी हो चुकी थी, उसने सोचा बनवारी लाल से जान पहचान है ही, क्यों न शादीलाल से विवाह का प्रस्ताव रखा जाय। बात आगे बढ़ी और बनवारी लाल ने संध्या से शादी पक्की कर दी। थोड़ी ना नुकुर करने के बाद शादी लाल भी मान गया और शादी तय हो गयी। शादीलाल के एल०एल०बी० का अंतिम वर्ष था। वह चाहता था कि विवाह के लिए, परीक्षा के बाद की कोई तिथि निश्चित कर दी जाय। परन्तु उसकी परीक्षा के बाद की लग्न का कोई शुभ मुहुर्त नहीं था। अब शादी के लिए, शादीलाल या तो एक वर्ष और प्रतीक्षा करे या परीक्षा से पहले की ही कोई तिथि देख ली जाय। शादी के लिए पहले ही बहुत देर हो रही थी, बनवारी लाल चाहते थे कि अब और देर न किया जाय और इसी वर्ष के मुहूर्त में शादी कर दी जाय।
पण्डित जी से परीक्षा का ध्यान रखते हुए, शादी का मुहुर्त निकालने के लिए कहा गया। बड़ा सोच विचार करके शादी की तिथि निश्चित की गयी और लग्न पत्रिका बन गयी। परीक्षा की विगत वर्षों की समय सारिणी देख कर, परीक्षा की संभावित अंतिम तिथि के बाद की तिथि निश्चित की गयी और शादीलाल के विवाह की तैयारी शुरू हो गयी। घर में शादीलाल के शादी का उत्साह देखते ही बनता था। विवाह के लिए अभी दो महीने का समय था, परन्तु शादीलाल की माँ का जोश देखकर लगता था कि कल परसों ही है। बहू के लिये कपड़े लत्ते खरीदे जाने लगे, उसे देने के लिए गहनों का आर्डर हो गया, शादीलाल के विवाह में पहनने के लिए सूट का आर्डर हो गया। जैसे जैसे समय समीप आता गया, शादीलाल के माँ की व्यग्रता बढ़ती जा रही थी। अब तो शादी के एक पखवाड़ा ही रह गया था और कई काम शेष रह गए थे।
इधर शादीलाल की परीक्षा की वास्तविक समय सारिणी आई तो पता चला कि अंतिम परीक्षा की तिथि भी वही है जो शादी का दिन। अब तो विकट समस्या हो गयी, क्योंकि परीक्षा का समय अपरान्ह तीन से छः बजे तक था। शादी लाल पढ़ाई के लिए पूर्ण रूप से समर्पित था और किसी भी तरह का समझौता नहीं करना चाहता था। वह परीक्षा की तैयारी में पहले ही जुटा था, उसकी माँ चाहती कि शादी की तैयारी में वह भी कुछ हाथ बँटाये, पर शादीलाल परीक्षा में किसी प्रकार का व्यवधान नहीं चाहता था। यह अंतिम सत्र की परीक्षा थी। वह इसी सत्र में सफल होकर, वकील बनना चाहता था। परीक्षा के बीच में शादी की तिथि आ जाने के कारण, शादीलाल के समक्ष बहुत बड़ी चुनौती आ खड़ी हुई थी। शादीलाल ने भी संकल्प ले रखा था कि वह दोनों ही दायित्वों का निर्वहन करेगा।
धीरे धीरे शादी की तिथि आ गयी। शादी पर जाने से पहले नहाने की रस्म, परछन आदि कई परम्पराओं का निर्वहन होना था और शादीलाल को परीक्षा के लिए भी जाना आवश्यक था। अब ये हुआ की परीक्षा देकर आने पर तो रात के आठ बज जायेंगे फिर कब ये सब होगा, कब बारात निकलेगी। अतः नहान परछन आदि पहले ही हो जाय और शादीलाल परीक्षा देकर सीधे मौजपुर, लड़की वालों के यहाँ पहुंचे। शादी के वस्त्र पहन कर परीक्षा के लिए जाना, शादीलाल को अटपटा लग रहा था इसलिए वह साधारण कपडे पहनकर ही जाना उचित समझा। शादी की लिए बना सूट और पगड़ी आदि बारात के साथ चली जाएगी, वह वहीँ पहन लेगा।
शादीलाल, पापा की मोपेड उठाया और परीक्षा स्थल पहुंच गया। उसे घर पर ही देर हो गयी थी इसलिए परीक्षा में कुछ बिलंब से ही बैठ पाया। उसकी शेष परीक्षा तो ठीक हो गयी, पर अंतिम परीक्षा में कई प्रकार के विघ्न का सामना करना पड़ा। ठीक से तैयारी नहीं होने के बावजूद भी शादी की उमंग में शादीलाल ने खूब लिखा और संतुष्ट होकर परीक्षा कक्ष से बाहर निकला। देर से आने के कारण, निरीक्षक ने उसकी कापी सबसे बाद में लिया। बाहर निकलते ही उस पर मौजपुर जाने की धुन सवार थी। अन्य परीक्षार्थी पूछते रहे, 'शादीलाल, पेपर कैसा हुआ?' पर उसके पास उनका उत्तर देने का समय तक नहीं था। शीघ्रता से जाकर मोपेड पे किक मारा। पर, यह क्या? मोपेड बीस पच्चीस मीटर चलकर बंद हो गयी। पता चला मोपेड में तेल गायब। घर से बिलम्ब से निकलने और परीक्षा की हड़बड़ी में पेट्रोल भरवाने का ध्यान नहीं रहा था। पास में कोई पेट्रोल पंप भी नहीं था। अब तो बड़ी समस्या हो गयी। क्या किया जाय ? मौजपुर कैसे पहुंचा जाय ?
'नहीं दादा, पेट्रोल समाप्त हो गया है। थोड़ा मिटटी का तेल मिल जायेगा? मुझे मौजपुर शीघ्र से शीघ्र पहुंचना है।'
'रुको, देखता हूँ। ' और जाकर एक बोतल ले आया 'बस इतना ही है।'
'चलो, शायद इतने में काम बन जाय।'
शादीलाल मिट्टी का तेल भरकर, मोपेड से अपनी यात्रा पर आगे बढ़ा। एक बार फिर उसे मुसीबत ने घेरा। लड़की वालों के यहाँ पहुँचने से पहले ही मिट्टी का तेल भी ख़त्म हो गया। उस ज़माने में मोबाइल फ़ोन भी नहीं था कि सूचित करके कोई अन्य साधन मंगवा ले। यह तो शुक्र था जहां तेल ख़त्म हुआ, उसी गांव में उसकी फुआ का घर था। वह झटपट वहां जाकर, गाड़ी खड़ी कर दिया। फूफा आदि पहले ही बारात के लिए जा चुके थे, घर में बस फुआ की बहू थी। मोटर साइकिल भी सुभाष लेकर चला गया था। घर पर बस एक पुरानी साइकिल पड़ी थी। शादीलाल ने बिलम्ब किये बिना, साईकिल उठाया और आगे चल दिया।
उधर लड़की वालों के यहाँ हड़कम मचा हुआ था। बारात द्वार पर, दूल्हे का पता ही नहीं। रात के बारह बज चुके थे। लड़की वाले अत्यंत चिंतित थे। बारातियों को खिला पिला दिया गया था। अब विवाह का मुहुर्त रात साढ़े बारह बजे तक ही था। अब ये हुआ कि बाकी कार्यक्रम किये जायँ, हो सकता है तब तक शादीलाल आ जाय, उसे जलपान करके तुरंत विवाह के मण्डप में ले जाया जाय। हर जगह कुछ शरारती तत्व तो होते ही हैं। किसी ने तंज कस दिया, 'बारातियों को खिलाना पिलाना कहीं दण्ड न हो जाय। लगता है, लड़का किसी के प्यार में फंसा होगा, और भाग गया।'
एक समझदार व्यक्ति ने कहा, 'बातें बनाने से अच्छा है; एक, दो आदमी मोटर साइकिल से परीक्षा केंद्र तक चले जाओ और पता कर आओ कि क्या बात है। हो सकता है कोई अड़चन आ गयी हो, गाड़ी ख़राब हो गयी हो, कोई दुर्घटना हो गयी हो। '
दो लोग अभी मोटर साइकिल स्टार्ट ही कर रहे थे कि शादीलाल साइकिल से आते दिख गया। पूरे खेमे में ख़ुशी की लहर दौड़ गयी। 'शादीलाल आ गया, शादीलाल आ गया।' मौजपुर के एकाध बच्चे अभी तक जगे थे, हंस कर कह रहे थे, 'हा, हा साईकिल पर दूल्हा।'
शादीलाल को दोपहर से घर से निकला था, उसे बहुत भूख लगी थी किन्तु उसे इस बात का एहसास था कि उसके कारण लोग कितना परेशान हो रहे हैं। बोला, 'पहले सिंदूरदान कर लूँ , बाद में खा पी लूंगा।' पर लोगों ने शादीलाल की दयनीय हालत देखकर, पहले कुछ खा पी लेने के लिए आग्रह किया। उसके बाद शादी के मंडप में बिठाया गया।
शादीलाल के लिए झटपट मिठाई आयी और उससे कहा गया, ये लो पानी पीओ और सीधे मंडप में चलो। अब तक विवाह मंडप में कार्यक्रम शुरू हो चुका था। वस्त्र आदि बदलने में और समय व्यर्थ करने की बजाय शादीलाल को सीधे मण्डप में ही चलने के लिए कहा गया। जयमाल के कार्यक्रमों को रद्द कर दिया गया था। द्वारपूजा के नाम पर, द्वारपूजा के लिए बने चौक में दूल्हे को खड़ा करके बस दो मिनट का मंत्रोच्चार हुआ। और पंडित जी ने बोल दिया, 'लड़के को कुछ खिला पिला कर सीधे मंडप में ले चलो, फेरे और सिंदूर दान का समय हो चुका है। अधिक बिलम्ब करने से मुहुर्त निकल जायेगा।'
शादीलाल का शादी का जोड़ा जामा रखा ही रह गया, उसे पहन पाने का अवसर नहीं मिल पाया और उसके साधारण कपड़ों में ही शादी हो गयी। मंडप में सजी धजी दुल्हन और अन्य सभी लोग, साफ-सुन्दर वस्त्रों में, बस शादीलाल साधारण कपड़े में सबसे अलग सर्कस का जोकर लग रहा था। दामाद को इस रूप में देखकर, जगप्रवेश को बहुत शर्म आ रही थी। जगप्रवेश ने कहा, 'सिंदूर दान के बाद शादीलाल जाकर कपड़े बदल लें। दस मिनट लगेगा, इसमें कुछ नहीं बिगड़ेगा। फोटोग्राफर को कह दिया फोटो वगैरह तभी लेना। शादीलाल को कपड़ों की तनिक भी म्लानि नहीं थी, आज उसके दोनों हाथ में लड्डू थे; एक तो वकालत की पढ़ाई पूरी हो गयी और दूसरे दुल्हन का हाथ उसके हाथ में। फिर भी ससुर का आग्रह मान कर वह कपड़े बदलने मंडप से बाहर निकला, जब बनवारी लाल से कपड़े माँगा तो पता चला वह तो घर पर ही छूट गया। बेचारे शादीलाल, फिर उसी परिधान में मंडप में विराजे।
अगले दिन दुल्हन विदा कराके शादीलाल बड़े शान से ससुराल से चल दिया। राह में एक जगह गाड़ी रुकी तो किसी ने छेड़ दिया, 'भैया, किसकी नई नवेली दुल्हन लिए जा रहे हो?'
'अरे मेरी ही है, और किसकी !'
खैर, लिवास में क्या रखा है। शादीलाल के घर में नई दुल्हन आई। पास पड़ोस की स्त्रियां गीत गाने के साथ स्वागत में जुट गयीं। घर में रौनक लग गयी। शादी लाल की माँ के तो लग रहा था, पांव जमीं पर ही नहीं थे। माँ के कहने पर, शादीलाल अब थोड़ा बन ठन कर, दूल्हा जैसा दिखने लगा।
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