दो बीबी का शौहर
रसिक लाल की शादी के पांच साल से भी अधिक हो गए थे। अभी तक गोद सूनी रहने से सीमा और वे दोनों ही हताश थे, और उपर से रोज ही लोग पूछते रहते, अभी कुछ है तो नहीं ?
शीला ताई ने अभी कल ही पूछा था, आज फिर -
'अरे रसिक बहू के कुछ है तो नहीं ?'
'ताई एक दिन का जांचने की अभी कोई मशीन भी ना आई। '
तब तक उनके साथ बैठी शकुंतला भाभी बोल बैठीं, 'किसी बड़े डाक्टर को दिखा लो। ना हो तो दोनों बाला जी मंदिर जाकर, झाड़ फूंक करवा लो। सुलेखा को वहीँ जाकर लाभ मिला था।'
रसिक लाल की जहां तक पहुँच थी, जाँच कराया, पर कोई लाभ नहीं मिला। अब तो लोगों की सलाह ताने का रूप ले चुकी थी। रसिक लाल की संतान पाने की प्रबल इच्छा थी। इसी चाह में वे दूसरी शादी के लिए मन बना बैठा।
रसिक लाल की शादी का जामा जोड़ा, अभी तक रखा था, उसके भाग्य जगे और ड्राई क्लीनिंग के लिए भेज दिया गया। रसिक लाल उन भाग्यशाली लोगों में से निकले जिन्हें अपनी शादी का जामा जोड़ा एक बार फिर पहनने का अवसर मिला, वरना शादी के जोड़े का तो बस यही हस्र होता है, कि या तो रखा रह जाय या किसी को दे दिया जाय। स्त्रियों को तो फिर भी कभी कभार उत्सव आदि में अपनी शादी का लहंगा पहनने का मौका मिल जाता है। अधिक समय नहीं बीता, रेशमा नई दुल्हन बनकर आ गयी।
रेशमा के आ जाने पर रसिक लाल के दोनों हाथ में लड्डू थे। सीमा और रेशमा दोनों में रसिक लाल की सेवा करने और उसे प्रसन्न रखने के प्रतियोगी भाव होते। दोनों पत्नियां चाहतीं कि उसे सिर पर बिठा कर रखें। एक पकौड़ी बनाकर रसोई से हटती तो दूसरी हलवा बनाने लगती। दोनों अपनी तरह के बढ़िया से बढ़िया पकवान बनाकर खिलाने का प्रयत्न करतीं। कभी कभी शादी लाल को अपनी इच्छा से अधिक खाना पड़ जाता।
दोनों कुछ न कुछ विशेष पकवान बनाना जानती थीं। सीमा छोले बटूरे अच्छा बनाती तो रेशमा सांभर डोसा और चाउमिन। वे अपना कच्चा मॉल चुपके से तैयार करतीं कि कहीं दूसरी न सीख जाय। उनके हाथ के बने पकवान के स्वाद की चर्चा रसिक के मित्रों में भी होती। कभी कोई मित्र किसी चीज की प्रशंसा करता तो रसिक जी उसे छुट्टी के दिन निमंत्रित कर लेते। उनकी पत्नियां भी प्रशंसा से फूले न समातीं।
एक बार सीमा ने रसिक लाल की पसंद, चोखा बाटी बनाया और साथ धनिया टमाटर की चटनी, तो उन्होंने छक कर खा लिया। रेशमा को चोखा बाटी इतना पसंद नहीं था, वह चुपके से बेसन का चीला बना लाई। रसिक लाल के पेट में बिल्कुल भी जगह नहीं थी पर नई बीबी का तिरस्कार कैसे कर सकते थे। जब उसने आग्रह किया तो उन्होंने खा लिया। अब तो भरा पेट बहुत भारी हो गया, और पानी पाकर पेट में बाटी और फूल गयी। वे अपच के मारे परेशान हो गए। डाइजीन की गोली भी खाई पर स्थिति नियंत्रण में नहीं हुई। रात में कई बार उठ कर टहलना पड़ा और पूरी रात यूँ जाग कर ही बितानी पड़ी ।
सोने की समस्या बड़ी थी। दो बेड रूम का फ्लैट था। दोनों बीबियों ने एक एक कमरा हथिया लिया था। रसिक लाल को यह तय करना बड़ा कठिन होता कि किसके कमरे में सोयें। उनका किसी एक के कमरे में सोने का मन होता तो शाम से ही उसी के कमरे में अड्डा जमा लेते। वहीँ पर शाम की चाय, वहीँ खाना और जल्दी नींद आने का बहाना। कभी रेशमा के कमरे में लेटे होते तो सीमा अवसर पाकर जाती और बोल देती, 'यहाँ क्यों सोये हो? जाकर उधर सो जाओ, आज ही चद्दर बदली हूँ।
पहले रसिक लाल की सीमा से कभी कभी नोक झोंक हो जाया करती थी, अब वे बड़ी शांति की बंशी बजा रहे थे। उनका जीवन अच्छे से बीत रहा था। उनकी दोनों पत्नियां परस्पर लड़ झगड़ कर अपनी शक्ति का संतुलन बनाये रखतीं तथा अपनी जिह्वा की खाज मिटा लेती थीं। जब दोनों में तकरार होती तो रसिकलाल स्वयं को किसी काम में व्यस्त कर लेते या बाजार से कोई सामान लाने के बहाने बाहर चले जाते।
टेलीविज़न पर सीमा को फिल्में और पुराने गाने देखना अधिक पसंद था और रेशमा को टी वी धारावाहिक। इस बात पर दोनों मेँ खिंचाव रहता था। जब एक अपनी पसंद का कार्यक्रम देखती और दूसरी चैनेल बदल देती तो वह झल्ला जाती। रेशमा अपनी धारावाहिक छोड़ने को कत्तई तैयार नहीं होती। एक दिन उसके धारावाहिक के बीच में ही सीमा ने आकर, चैनेल बदल दिया, वह क्रोध में वहां से उठकर चली गयी और कैकेयी की भांति कोपभवन में पुहंच गयी। शाम को जब राजा दशरथ आये तो अगले ही दिन, उसके लिए अलग नया टेलीविज़न लाने का वर दे दिए। नया टेलीविज़न आ गया और रेशमा उसे अपने कमरे में लगाकर अपना धारावाहिक देखती। अब तो धारावाहिक देखने में कभी सब्जी जलती तो कभी दूध उफन कर गिर जाता। सीमा को ही सब ध्यान रखना पड़ता।
रसिक लाल तुष्टिकरण की नीति भली भांति जानते थे। दोनों में से कोई नाराज न हो जाय कपड़े गहने आदि जोड़े से ही खरीदते थे। शादी की वर्षगांठ पर दोनों को एक सी सौगात देते और तो और दोनों में से किसी का जन्मदिन आता तो दूसरी का जन्मदिन भी उन्हें ख्याल रखना पड़ता, जो सौगात एक को दिया दूसरी को उससे अधिक सस्ता या मंहगा न हो जाय। कितने की सौगात लाये थे रसिक लाल को याद रहे या न रहे, उनकी पत्नियों को अवश्य रहता था।
दूसरी होने के कारण रसिक लाल का लगाव तो रेशमा से ही अधिक था परंतु उन्हें कुछ विशेष खाने पीने का मन होता तो सीमा को ही याद करते, क्योंकि खाने पकाने में सीमा के आगे रेशमा बहुत पीछे थी। एक दिन रसिक लाल अरबी के पत्ते ले आये और सीमा को अपनी फरमाइश बता दिए। सीमा ने उसमें बेसन लपेट कर पकौड़ी बना लिया। रेशमा को भी खिलाया रेशमा को वह बहुत पसंद आया। रसिक लाल के लिए सीमा ने फ्रिज में रख दिया। शाम को रसिक लाल के आते ही, सीमा प्रफुल्ल होकर बोली 'आज आपके लिए अरबी के विशेष पकौड़े बनाई हूँ' फ्रेश हो जाओ गरम करके अभी लाती हूँ। वह गयी तो फ्रिज में पकौड़े नादारद। मुंह बना कर वापस आई। ' वो तो फ्रिज में है ही नहीं, सीमा ... फ्रीज में पकौड़े पड़े थे..... । '
'हाँ, गौरव आया था न, वह खा गया। बड़ी तारीफ कर रहा था।' दोपहर को रेशमा का भाई, गौरव आ गया और रेशमा ने सीमा को बिना बताये ही उसे खिला दिया।
सीमा मन मसोस कर रह गयी। अब उसे रसिक के कान भरने का अवसर मिल गया। पर रेशमा के विरुद्ध कुछ कहने पर उनके कान पर जूं कहाँ रेंगने वाली थी। बोले 'जाने दो, जिसके नसीब की थी, खा गया। '
एक दिन रसिक को अपने किसी सहकर्मी की पार्टी में जाना था। वह सीमा को एक दिन पहले ही बता दिया। सीमा ने पूछ लिया, ' क्या पहनोगे?
'ब्राउन वाला सूट'
'सीमा ने उनके आने से पहले ही अलमारी में से सूट निकाल कर ब्रश मार दी थी। '
रसिक लाल ऑफिस से आया। चाय वगैरह पीकर पार्टी में जाने के लिए तैयार होने लगा, 'सीमा, जरा अलमारी से सूट निकाल देना। '
'वो तो मैंने पहले ही ब्रश मार कर रखा है' कहते लेने चली गयी। देखी तो वहां से सूट गायब।
'अरे मैंने तो यहीं रखी थी, घर में से कौन ले जायेगा?'
रेशमा ने सीमा को परेशान देखकर पूछ लिया, क्या ढूंढ रही हो दीदी ?'
'सूट'
'वो तो मैंने ड्राई क्लीनिंग के लिए दे दिया। यहाँ पड़ा था मैं समझी धुलवाना है, मुझे भी अपनी साड़ी देनी थी साथ में सूट भी दे आई। '
रसिक लाल चाहते थे इस बार बदल कर पहनें, हर बार एक ही सूट पहन कर ऑफिस वालों की पार्टी में जाते थे। फिर वही मत्थे पड़ा।
सीमा की उससे एक बड़ी बहन थी जो अपनी गृहस्थी में व्यस्त होने के कारण बहुत कम ही उसके घर आ पाती। हाँ, उसका बेटा सोमेश मौसी से मिलने कभी कभी आ जाया करता था। सीमा सोमेश को बहुत प्यार करती थी। उधर रेशमा का भाई गौरव भी अक्सर आता जाता था। रेशमा का भाई आता तो वह चाहती कि उसे क्या क्या खिला पिला दें। कई बार सीमा की सम्हाल कर रखी चीज भी गायब हो जाती, सीमा जब रेशमा से पूछती तो पता चलता गौरव आया था, खा गया।
'क्या रे ! उसे अपने घर कुछ नहीं मिलता क्या ! इस पर रेशमा तिलमिला जाती और बाद में रसिक लाल का सिर नोचती। धीरे धीरे दोनों में विवाद बढ़ता गया। रसिक लाल सीमा को ही शांत रहने के लिए समझाता, 'देखो रेशमा तुम्हारी छोटी बहन सी है, प्यार से रखोगी तो तुम्हारी भी सेवा करेगी। '
'कर ली, सेवा! सौत भी बहन हो सकती है क्या ?'
'सुनते हो जी! परसों हमारी शादी की साल गिरह है, थोड़ी अच्छी सी पार्टी वार्टी कर लेते हैं। ' रेशमा ने रसिक लाल से कहा।
'अभी इसी महीने तो पार्टी किया था। हम तीनों चलकर किसी अच्छे रेस्तरां में खा पी लेंगे। क्यों फालतू खर्च करना ?'
'हम तीनों क्यों ? गौरव और मम्मी पापा को भी बुला लेंगे। '
'खामोख़ाह खर्च बढ़ा रही हो, तुम्हारे लिए गिफ्ट भी तो लाना है। '
'वाह! दीदी की शादी की साल गिरह में उनके मम्मी पापा को बुलाया, हमारी साल गिरह में मेरे मम्मी पापा को नहीं बुलाओगे तो, क्या सोचेंगे। '
'अच्छा चलो, जैसा चाहोगी, हो जायेगा। '
एक दिन रसिक लाल को दफ्तर से आते ही, बन्दर बनकर, दो बिल्लियों का झगड़ा निबटाना पड़ा। दोनों आपस में लड़ झगड़ कर रूठी बैठी थीं, आपस की बोल चाल बंद। रसिक जी को चाय स्वयं ही बनानी पड़ी और बनाकर उन दोनों को भी पिलाये। भोजन का भी कोई ठिकाना नहीं था। पहले तो सोचा ब्रेड खा कर काम चला लें मगर बीबियों का भी ख्याल था इसलिए होटल से मंगा लिया। चूकि खाना होटल से आया था और भोजन से उनका कोई झगड़ा नहीं था, सीमा और रेशमा दोनों ही अपने अपने हिस्से का खाना लेकर अपने कमरे में चली गयीं। रसिक लाल के लिए उन्होंने जो छोड़ा, खा लिया। जब सोने के लिए सीमा के कक्ष में घुसे तो साफ बोली यहां क्या करने आये हो? जाओ उसी के कमरे में। रेशमा के कमरे में गए तो वहां भी यही सुनने को मिला। रसिक लाल को डॉइंग रूम में ही सोना पड़ा। रेशमा आई थी तो जहाँ शुरू में शांति हुआ करती थी अब तो बात बात पर कचाईन।
रसिक लाल को तीन तीन ठिकानों की खबर रखनी पड़ती। अपना घर तो था ही दोनों ससुराल का भी। सीमा जब कभी भी अपने माता पिता के तबियत ख़राब होने की बात सुनती तो रसिक लाल को तुरंत भेजती। इधर रेशमा का झुकाव मायके की तरफ अधिक था, रसिक लाल को भी उसे खुश रखने के लिए नयी ससुराल का अधिक ध्यान रखना पड़ता। अपना जन्म दिन उन्हें याद रहे या न रहे, सोमेश का अवश्य याद रखना पड़ता। सोमेश अभी कमाता तो था नहीं, उसके जन्म दिन की पार्टी भी रसिक को ही देनी पड़ती।
सबसे राहत की बात थी कि रसिक लाल के पास कोई कार नहीं थी। वे मोटर साइकिल से ही कहीं आते जाते थे। चुकि मोटरसाइकिल पर दोनों को एक साथ बिठा नहीं सकते थे, कहीं जाना होता तो बारी बारी से ही लेकर जा पाते। यह उनके लिए सुनहरा क्षण होता क्योंकि पत्नी से अकेले में प्यार भरी दो बातें करने अवसर मिल जाता। घर में एक से बात करते तो दूसरी निरीक्षक की भांति सिर पर खड़ी हो जाती। रसिक लाल कभी भी दोनों बीबियों को साथ लेकर नहीं जा पाते। कभी एकाध बार साथ ले जाने का मौका मिला तो दोस्त मित्र छेड़ने से बाज नहीं आये। वाह भाई मजे हैं तो बस रसिक लाल के, 'हम लोगों की किस्मत कहाँ कि जुडवा बीबी के साथ घूमें'।
पहले सीमा कभी मायके चली जाती तो रसिक लाल खाने पीने की परेशानी के कारण, जल्दी से जल्दी ले आते थे। अब तो वे चाहते हैं, दोनों नहीं तो कम से कम एक मायके चली जाय ताकि कुछ शांति मिले। मगर दोनो में से कोई मायके जाने को तैयार नहीं होती। दोनों को डर था कि उसकी अनुपस्थिति में रसिक लाल दूसरे को अधिक प्यार न करने लगे।
समय बीता रेशमा गर्भवती हो गयी। गर्भ धारण करने के कारण सीमा रसिकलाल को छोड़ उसका ध्यान रखने लगी। एक सुन्दर सा पुत्र उत्पन्न हो गया। पुत्र पाने से रेशमा से अधिक सीमा प्रसन्न हुई। उसने शिशु का नाम सौम्य रख दिया पर बुलाती सोम कहकर ही। अब दोनों का ध्यान शिशु पर केंद्रित हो गया । बच्चे को दोनों माँ का भरपूर प्यार मिलता। बच्चे में व्यस्त रहने के कारण अब दोनों में झगड़ा बहुत कम हो गया था। अब तो लगता था कि मैदान में दोनों टीमों का एक ही गोल है। रसिक लाल की तो रेफरी की भी भूमिका जाती रही। अब सीमा कभी रेशमा से नाराज होती तो बच्चे को माध्यम बनाकर मन की कह डालती, 'देख तेरी छोटी मम्मी ने ऐसा कर दिया, वैसा कर दिया। मैं न रहूँ तो तेरा ख्याल भी कोई न करे।' और रेशमा भी जब उसकी देख भाल से थक जाती, 'तू तो बड़ी माँ का बेटा है, जा, उन्हीं के पास जा। '
बच्चे के लिए कुछ कम ज्यादा होता तो रसिक की शामत आ जाती। उसके लिए दूध, टॉनिक, खिलौने, कपड़ा आदि की शीघ्र और समुचित व्यवस्था करनी पड़ती। बच्चे के प्यार ने दोनों माताओं को एक कर दिया था। दोनों की प्रतियोगिता अब एक संगठन में बदल चुकी थी। रसिक लाल का काम बहुत बढ़ गया था, पर बालक की ख़ुशी में कोई भी बोझ उन्हें थोड़ा ही लगता।
एक कुछ सामान मंगाती तो थोड़ी देर में दूसरी की फरमाइश आ जाती। 'अरे, बच्चे की नैपी ख़त्म हो गयी है।' परेशान होकर रसिक लाल कहते, 'दोनों एक बार में क्यों नहीं बता देती, तुम दोनों के लिए अलग अलग चक्कर लगाना पड़ता है।' फिर झख मारकर बाजार जाते। कभी कभार बीबी को साथ लेकर शॉपिंग करने के लिए चलने को टाल देते। अब बच्चे के साथ सभी व्यस्त हो गए थे, और रसिक लाल शकुन की जिंदगी बिताने लगे थे।
कपड़ा पजामा छोटा
रसिक लाल की शादी के पांच साल से भी अधिक हो गए थे। अभी तक गोद सूनी रहने से सीमा और वे दोनों ही हताश थे, और उपर से रोज ही लोग पूछते रहते, अभी कुछ है तो नहीं ?
शीला ताई ने अभी कल ही पूछा था, आज फिर -
'अरे रसिक बहू के कुछ है तो नहीं ?'
'ताई एक दिन का जांचने की अभी कोई मशीन भी ना आई। '
तब तक उनके साथ बैठी शकुंतला भाभी बोल बैठीं, 'किसी बड़े डाक्टर को दिखा लो। ना हो तो दोनों बाला जी मंदिर जाकर, झाड़ फूंक करवा लो। सुलेखा को वहीँ जाकर लाभ मिला था।'
रसिक लाल की जहां तक पहुँच थी, जाँच कराया, पर कोई लाभ नहीं मिला। अब तो लोगों की सलाह ताने का रूप ले चुकी थी। रसिक लाल की संतान पाने की प्रबल इच्छा थी। इसी चाह में वे दूसरी शादी के लिए मन बना बैठा।
रसिक लाल की शादी का जामा जोड़ा, अभी तक रखा था, उसके भाग्य जगे और ड्राई क्लीनिंग के लिए भेज दिया गया। रसिक लाल उन भाग्यशाली लोगों में से निकले जिन्हें अपनी शादी का जामा जोड़ा एक बार फिर पहनने का अवसर मिला, वरना शादी के जोड़े का तो बस यही हस्र होता है, कि या तो रखा रह जाय या किसी को दे दिया जाय। स्त्रियों को तो फिर भी कभी कभार उत्सव आदि में अपनी शादी का लहंगा पहनने का मौका मिल जाता है। अधिक समय नहीं बीता, रेशमा नई दुल्हन बनकर आ गयी।
रेशमा के आ जाने पर रसिक लाल के दोनों हाथ में लड्डू थे। सीमा और रेशमा दोनों में रसिक लाल की सेवा करने और उसे प्रसन्न रखने के प्रतियोगी भाव होते। दोनों पत्नियां चाहतीं कि उसे सिर पर बिठा कर रखें। एक पकौड़ी बनाकर रसोई से हटती तो दूसरी हलवा बनाने लगती। दोनों अपनी तरह के बढ़िया से बढ़िया पकवान बनाकर खिलाने का प्रयत्न करतीं। कभी कभी शादी लाल को अपनी इच्छा से अधिक खाना पड़ जाता।
दोनों कुछ न कुछ विशेष पकवान बनाना जानती थीं। सीमा छोले बटूरे अच्छा बनाती तो रेशमा सांभर डोसा और चाउमिन। वे अपना कच्चा मॉल चुपके से तैयार करतीं कि कहीं दूसरी न सीख जाय। उनके हाथ के बने पकवान के स्वाद की चर्चा रसिक के मित्रों में भी होती। कभी कोई मित्र किसी चीज की प्रशंसा करता तो रसिक जी उसे छुट्टी के दिन निमंत्रित कर लेते। उनकी पत्नियां भी प्रशंसा से फूले न समातीं।
एक बार सीमा ने रसिक लाल की पसंद, चोखा बाटी बनाया और साथ धनिया टमाटर की चटनी, तो उन्होंने छक कर खा लिया। रेशमा को चोखा बाटी इतना पसंद नहीं था, वह चुपके से बेसन का चीला बना लाई। रसिक लाल के पेट में बिल्कुल भी जगह नहीं थी पर नई बीबी का तिरस्कार कैसे कर सकते थे। जब उसने आग्रह किया तो उन्होंने खा लिया। अब तो भरा पेट बहुत भारी हो गया, और पानी पाकर पेट में बाटी और फूल गयी। वे अपच के मारे परेशान हो गए। डाइजीन की गोली भी खाई पर स्थिति नियंत्रण में नहीं हुई। रात में कई बार उठ कर टहलना पड़ा और पूरी रात यूँ जाग कर ही बितानी पड़ी ।
सोने की समस्या बड़ी थी। दो बेड रूम का फ्लैट था। दोनों बीबियों ने एक एक कमरा हथिया लिया था। रसिक लाल को यह तय करना बड़ा कठिन होता कि किसके कमरे में सोयें। उनका किसी एक के कमरे में सोने का मन होता तो शाम से ही उसी के कमरे में अड्डा जमा लेते। वहीँ पर शाम की चाय, वहीँ खाना और जल्दी नींद आने का बहाना। कभी रेशमा के कमरे में लेटे होते तो सीमा अवसर पाकर जाती और बोल देती, 'यहाँ क्यों सोये हो? जाकर उधर सो जाओ, आज ही चद्दर बदली हूँ।
पहले रसिक लाल की सीमा से कभी कभी नोक झोंक हो जाया करती थी, अब वे बड़ी शांति की बंशी बजा रहे थे। उनका जीवन अच्छे से बीत रहा था। उनकी दोनों पत्नियां परस्पर लड़ झगड़ कर अपनी शक्ति का संतुलन बनाये रखतीं तथा अपनी जिह्वा की खाज मिटा लेती थीं। जब दोनों में तकरार होती तो रसिकलाल स्वयं को किसी काम में व्यस्त कर लेते या बाजार से कोई सामान लाने के बहाने बाहर चले जाते।
टेलीविज़न पर सीमा को फिल्में और पुराने गाने देखना अधिक पसंद था और रेशमा को टी वी धारावाहिक। इस बात पर दोनों मेँ खिंचाव रहता था। जब एक अपनी पसंद का कार्यक्रम देखती और दूसरी चैनेल बदल देती तो वह झल्ला जाती। रेशमा अपनी धारावाहिक छोड़ने को कत्तई तैयार नहीं होती। एक दिन उसके धारावाहिक के बीच में ही सीमा ने आकर, चैनेल बदल दिया, वह क्रोध में वहां से उठकर चली गयी और कैकेयी की भांति कोपभवन में पुहंच गयी। शाम को जब राजा दशरथ आये तो अगले ही दिन, उसके लिए अलग नया टेलीविज़न लाने का वर दे दिए। नया टेलीविज़न आ गया और रेशमा उसे अपने कमरे में लगाकर अपना धारावाहिक देखती। अब तो धारावाहिक देखने में कभी सब्जी जलती तो कभी दूध उफन कर गिर जाता। सीमा को ही सब ध्यान रखना पड़ता।
रसिक लाल तुष्टिकरण की नीति भली भांति जानते थे। दोनों में से कोई नाराज न हो जाय कपड़े गहने आदि जोड़े से ही खरीदते थे। शादी की वर्षगांठ पर दोनों को एक सी सौगात देते और तो और दोनों में से किसी का जन्मदिन आता तो दूसरी का जन्मदिन भी उन्हें ख्याल रखना पड़ता, जो सौगात एक को दिया दूसरी को उससे अधिक सस्ता या मंहगा न हो जाय। कितने की सौगात लाये थे रसिक लाल को याद रहे या न रहे, उनकी पत्नियों को अवश्य रहता था।
दूसरी होने के कारण रसिक लाल का लगाव तो रेशमा से ही अधिक था परंतु उन्हें कुछ विशेष खाने पीने का मन होता तो सीमा को ही याद करते, क्योंकि खाने पकाने में सीमा के आगे रेशमा बहुत पीछे थी। एक दिन रसिक लाल अरबी के पत्ते ले आये और सीमा को अपनी फरमाइश बता दिए। सीमा ने उसमें बेसन लपेट कर पकौड़ी बना लिया। रेशमा को भी खिलाया रेशमा को वह बहुत पसंद आया। रसिक लाल के लिए सीमा ने फ्रिज में रख दिया। शाम को रसिक लाल के आते ही, सीमा प्रफुल्ल होकर बोली 'आज आपके लिए अरबी के विशेष पकौड़े बनाई हूँ' फ्रेश हो जाओ गरम करके अभी लाती हूँ। वह गयी तो फ्रिज में पकौड़े नादारद। मुंह बना कर वापस आई। ' वो तो फ्रिज में है ही नहीं, सीमा ... फ्रीज में पकौड़े पड़े थे..... । '
'हाँ, गौरव आया था न, वह खा गया। बड़ी तारीफ कर रहा था।' दोपहर को रेशमा का भाई, गौरव आ गया और रेशमा ने सीमा को बिना बताये ही उसे खिला दिया।
सीमा मन मसोस कर रह गयी। अब उसे रसिक के कान भरने का अवसर मिल गया। पर रेशमा के विरुद्ध कुछ कहने पर उनके कान पर जूं कहाँ रेंगने वाली थी। बोले 'जाने दो, जिसके नसीब की थी, खा गया। '
एक दिन रसिक को अपने किसी सहकर्मी की पार्टी में जाना था। वह सीमा को एक दिन पहले ही बता दिया। सीमा ने पूछ लिया, ' क्या पहनोगे?
'ब्राउन वाला सूट'
'सीमा ने उनके आने से पहले ही अलमारी में से सूट निकाल कर ब्रश मार दी थी। '
रसिक लाल ऑफिस से आया। चाय वगैरह पीकर पार्टी में जाने के लिए तैयार होने लगा, 'सीमा, जरा अलमारी से सूट निकाल देना। '
'वो तो मैंने पहले ही ब्रश मार कर रखा है' कहते लेने चली गयी। देखी तो वहां से सूट गायब।
'अरे मैंने तो यहीं रखी थी, घर में से कौन ले जायेगा?'
रेशमा ने सीमा को परेशान देखकर पूछ लिया, क्या ढूंढ रही हो दीदी ?'
'सूट'
'वो तो मैंने ड्राई क्लीनिंग के लिए दे दिया। यहाँ पड़ा था मैं समझी धुलवाना है, मुझे भी अपनी साड़ी देनी थी साथ में सूट भी दे आई। '
रसिक लाल चाहते थे इस बार बदल कर पहनें, हर बार एक ही सूट पहन कर ऑफिस वालों की पार्टी में जाते थे। फिर वही मत्थे पड़ा।
सीमा की उससे एक बड़ी बहन थी जो अपनी गृहस्थी में व्यस्त होने के कारण बहुत कम ही उसके घर आ पाती। हाँ, उसका बेटा सोमेश मौसी से मिलने कभी कभी आ जाया करता था। सीमा सोमेश को बहुत प्यार करती थी। उधर रेशमा का भाई गौरव भी अक्सर आता जाता था। रेशमा का भाई आता तो वह चाहती कि उसे क्या क्या खिला पिला दें। कई बार सीमा की सम्हाल कर रखी चीज भी गायब हो जाती, सीमा जब रेशमा से पूछती तो पता चलता गौरव आया था, खा गया।
'क्या रे ! उसे अपने घर कुछ नहीं मिलता क्या ! इस पर रेशमा तिलमिला जाती और बाद में रसिक लाल का सिर नोचती। धीरे धीरे दोनों में विवाद बढ़ता गया। रसिक लाल सीमा को ही शांत रहने के लिए समझाता, 'देखो रेशमा तुम्हारी छोटी बहन सी है, प्यार से रखोगी तो तुम्हारी भी सेवा करेगी। '
'कर ली, सेवा! सौत भी बहन हो सकती है क्या ?'
'सुनते हो जी! परसों हमारी शादी की साल गिरह है, थोड़ी अच्छी सी पार्टी वार्टी कर लेते हैं। ' रेशमा ने रसिक लाल से कहा।
'अभी इसी महीने तो पार्टी किया था। हम तीनों चलकर किसी अच्छे रेस्तरां में खा पी लेंगे। क्यों फालतू खर्च करना ?'
'हम तीनों क्यों ? गौरव और मम्मी पापा को भी बुला लेंगे। '
'खामोख़ाह खर्च बढ़ा रही हो, तुम्हारे लिए गिफ्ट भी तो लाना है। '
'वाह! दीदी की शादी की साल गिरह में उनके मम्मी पापा को बुलाया, हमारी साल गिरह में मेरे मम्मी पापा को नहीं बुलाओगे तो, क्या सोचेंगे। '
'अच्छा चलो, जैसा चाहोगी, हो जायेगा। '
एक दिन रसिक लाल को दफ्तर से आते ही, बन्दर बनकर, दो बिल्लियों का झगड़ा निबटाना पड़ा। दोनों आपस में लड़ झगड़ कर रूठी बैठी थीं, आपस की बोल चाल बंद। रसिक जी को चाय स्वयं ही बनानी पड़ी और बनाकर उन दोनों को भी पिलाये। भोजन का भी कोई ठिकाना नहीं था। पहले तो सोचा ब्रेड खा कर काम चला लें मगर बीबियों का भी ख्याल था इसलिए होटल से मंगा लिया। चूकि खाना होटल से आया था और भोजन से उनका कोई झगड़ा नहीं था, सीमा और रेशमा दोनों ही अपने अपने हिस्से का खाना लेकर अपने कमरे में चली गयीं। रसिक लाल के लिए उन्होंने जो छोड़ा, खा लिया। जब सोने के लिए सीमा के कक्ष में घुसे तो साफ बोली यहां क्या करने आये हो? जाओ उसी के कमरे में। रेशमा के कमरे में गए तो वहां भी यही सुनने को मिला। रसिक लाल को डॉइंग रूम में ही सोना पड़ा। रेशमा आई थी तो जहाँ शुरू में शांति हुआ करती थी अब तो बात बात पर कचाईन।
एक बार रसिक ने सोचा कि दोनों को बाहर की सैर करा दें। सीमा से पूछे, ' बाहर खाने चलना है।' सीमा बोली 'सिर में दर्द है, रेशमा को ले जाओ।' रसिक लाल की इतनी हिम्मत कहाँ थी। ले तो जांय, अगले दिन का कलह कौन झेले। पिछली बार की बात उन्हें याद थी, जब सीमा मायके गयी थी तो रेशमा को सिनेमा दिखाने ले गए। आते ही घर में कचाईन, ' तुम्हारे लिए तो बस वही प्यारी है, मैं रहूंगी तब थोड़े ही सिनेमा जाओगे। ' पिछली बात याद करके रसिक लाल ठिठके और बिलंब होते देख, सीमा ने खिचड़ी बना डाली। 'क्या हुआ, नहीं गए। ये लो खिचड़ी खाओ। तुम लोग बाहर जाओगे यह सोच कर मैं अपने लिए खिचड़ी रख दी थी, इसी में तुम भी खा लो।'
रसिक लाल को तीन तीन ठिकानों की खबर रखनी पड़ती। अपना घर तो था ही दोनों ससुराल का भी। सीमा जब कभी भी अपने माता पिता के तबियत ख़राब होने की बात सुनती तो रसिक लाल को तुरंत भेजती। इधर रेशमा का झुकाव मायके की तरफ अधिक था, रसिक लाल को भी उसे खुश रखने के लिए नयी ससुराल का अधिक ध्यान रखना पड़ता। अपना जन्म दिन उन्हें याद रहे या न रहे, सोमेश का अवश्य याद रखना पड़ता। सोमेश अभी कमाता तो था नहीं, उसके जन्म दिन की पार्टी भी रसिक को ही देनी पड़ती।
सबसे राहत की बात थी कि रसिक लाल के पास कोई कार नहीं थी। वे मोटर साइकिल से ही कहीं आते जाते थे। चुकि मोटरसाइकिल पर दोनों को एक साथ बिठा नहीं सकते थे, कहीं जाना होता तो बारी बारी से ही लेकर जा पाते। यह उनके लिए सुनहरा क्षण होता क्योंकि पत्नी से अकेले में प्यार भरी दो बातें करने अवसर मिल जाता। घर में एक से बात करते तो दूसरी निरीक्षक की भांति सिर पर खड़ी हो जाती। रसिक लाल कभी भी दोनों बीबियों को साथ लेकर नहीं जा पाते। कभी एकाध बार साथ ले जाने का मौका मिला तो दोस्त मित्र छेड़ने से बाज नहीं आये। वाह भाई मजे हैं तो बस रसिक लाल के, 'हम लोगों की किस्मत कहाँ कि जुडवा बीबी के साथ घूमें'।
बच्चे के लिए कुछ कम ज्यादा होता तो रसिक की शामत आ जाती। उसके लिए दूध, टॉनिक, खिलौने, कपड़ा आदि की शीघ्र और समुचित व्यवस्था करनी पड़ती। बच्चे के प्यार ने दोनों माताओं को एक कर दिया था। दोनों की प्रतियोगिता अब एक संगठन में बदल चुकी थी। रसिक लाल का काम बहुत बढ़ गया था, पर बालक की ख़ुशी में कोई भी बोझ उन्हें थोड़ा ही लगता।
एक कुछ सामान मंगाती तो थोड़ी देर में दूसरी की फरमाइश आ जाती। 'अरे, बच्चे की नैपी ख़त्म हो गयी है।' परेशान होकर रसिक लाल कहते, 'दोनों एक बार में क्यों नहीं बता देती, तुम दोनों के लिए अलग अलग चक्कर लगाना पड़ता है।' फिर झख मारकर बाजार जाते। कभी कभार बीबी को साथ लेकर शॉपिंग करने के लिए चलने को टाल देते। अब बच्चे के साथ सभी व्यस्त हो गए थे, और रसिक लाल शकुन की जिंदगी बिताने लगे थे।
कपड़ा पजामा छोटा
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