Friday, 2 January 2015

Hawksbari ki picnic

हॉक्सबरी की  पिकनिक

पूरे ही ऑस्ट्रेलिया में, सप्ताह में दो दिन, यानी शनिवार व रविवार को, लगभग सभी कार्यालयों में छुट्टी होती है।  गोरे तो धूप सेंकने या सर्फिंग के लिए, समुद्र तट पर चले जाते हैं, लेकिंन भारतीयों का सप्ताह के अंत में, कम से कम एक दिन, अपने अपने समूहों में परस्पर मिलने जुलने का सिलसिला रहता है। सप्ताह की दो छुट्टियों में से एक दिन, घर के सब काम निबटा लेते हैं, तथा एक दिन परस्पर तय करके समूह में किसी रेस्टोरेंट, किसी पिकनिक स्थल या फिर किसी के घर पर एकत्र हो जाते हैं और छोटी मोटी पार्टी हो जाती है। वैसे तो बच्चों के जन्म दिन या खुद के जन्मदिन, शादी की सालगिरह आदि पर पार्टियां होती ही रहती हैं जिसमें परस्पर मिलने और सामूहिक भोज का पर्याप्त अवसर मिल जाता है। पर बीच बीच में कोई न कोई बहाना लेकर, आपस में मिलने और खाने पीने की पार्टी रख लिया जाता है। इस प्रकार जहाँ मनोरंजन हो जाता है आपसी सहयोग की भावना जागृत होती है। पूरा का पूरा समूह एक परिवार की भांति लगता है।

कई बार समूचा समूह अपने अपने घर से खाने का एक एक या दो दो मद बना कर, किसी पार्क या सिंधु तट पर  हैं, वहां सबकी पिकनिक होती है और मिलजुल कर, साथ में खा पी लेते हैं। पिकनिक स्थल पर भी अपना कूड़ा, बचा सामान आदि नियमानुसार निश्चित कूड़ेदान में ही डालना होता है। यानि कि कचरा, कचरे वाले बॉक्स में और पुनः प्रयोग में आने वाली सामग्री, उसके लिए अलग से निश्चित बॉक्स में।

यदि किसी के घर पर भी पार्टी होती है तो ये नहीं कि खाने के बाद हाथ पोंछा और चल दिए। मेजबान की रसोई, बर्तन आदि, सभी लोग मिल जुल कर साफ़ करते हैं। परस्पर मित्रता व सहयोग का यहाँ अद्भुत उदाहरण देखने को मिलता है। वैसे भी यहाँ कामवाली तो होतीं नहीं, अपना काम स्वयं ही करना पड़ता है। सभी के मिल जुल कर, कर लेने से सारा काम चुटकियों में हो जाता है। 

कई बार समूह के लोग शहर से दूर कैम्पिंग के लिए चले जाते हैं। इस बार मुझे भी एक कैंपिंग में जाने का अवसर मिला। लगभग दस परिवार, कैम्पिंग में जाने के लिए तत्पर थे। हॉक्सबरी नदी के तट पर एल्डरिओ नामक रिसोर्ट जो सिडनी से लगभग सौ किलोमीटर की दूरी पर था,  हमें वहीं कैंप करना था। सब लोग शुक्रवार की ड्यूटी पूरी करके अपनी अपनी गाड़ी उठाये, और लगभग डेढ़ घंटे में वहां पहुँच गए। अपने गंतव्य तक पहुँचने हेतु हॉक्सबरी नदी भी पार करनी थी। नदी बहुत चौड़ी थी और उस पर कोई पुल भी नहीं बना था। नदी को पार करने के लिए कार फेरी का ही प्रयोग करना था। पूरी फेरी एक बड़े प्लेटफार्म जैसी थी जिस पर कार चलाकर ही अंदर प्रवेश मिल जाता कार में  बैठे बैठे उस पार। पार पहुँच कर बस एक्सीरेटर दबाओ और गंतव्य हेतु निकल जाओ। सैकविल्ले मार्ग पर, चौबीसों घंटे चलने वाली यह फेरी, सरकार की ओर से निःशुल्क व्यवस्था है। दर्जन भर कार एक बार में ले जाने वाली यह फेरी महीने में मात्र तीन घंटे लिए, रखरखाव हेतु बंद किया जाता है, अन्यथा यह चैबीसों घंटे चलती है और  पांच मिनट में नदी को पार करा देती है। नदी पार करके लगभग दस मिनट में गंतव्य स्थल पर पहुँच गए। 

पहाड़ियों के बीच, छोटी सी घाटी; एक अत्यंत रमणीय स्थल था।  पहुंचने में थोड़ा अँधेरा हो गया था जिस कारण उस स्थल दृश्य का स्पष्ट अवलोकन नहीं हो पा रहा था, कहीं कहीं पहाड़ी जंगलों में वापस लौटते हुए कंगारू अवश्य दिख रहे थे। सात साढ़े सात बजे तक हम हॉक्सबरी, अपने लॉज पहुँच गए। दस बारह कमरों वाला एक बड़ा सा लॉज, जो बहुत साफ़ सुथरा था और उसमें रसोई, फ्रिज, बिजली का चूल्हा, गैस, बर्तन सभी कुछ था, पर भोजन स्वयं ही बनाना था। वहां आस पास कोई बाजार नहीं था। बस एक रेस्तरां भर था जो हमारे रिसोर्ट से लगभग एक किलोमीटर पर था, उसमें भी ऑस्ट्रेलिया के अनुसार ही खाने पीने की सामग्री थी। चूकि यह पहले से ज्ञात था, अतः हम लोग गाड़ियों में भर भर कर सामान ले गए थे, ताकि कहीं कुछ कम न पड़ जाये। रिसोर्ट पर पहुँच कर निर्दिष्ट स्थान पर रखी चाभी उठाई और लॉज खोल कर सबने अपने अपने कक्ष का चयन कर लिया। मौसम का सुहाना समां मन को अत्यंत भा रहा था। शाम का समय तो खाना बनाने और खाने पीने में ही बीत गयी। सबने मिलजुल कर बनाया खाया और गप शप करके सो गए।

प्रातः नींद खुलते ही जब मैं अपने कक्ष से बाहर निकला तो नजारा देखकर दंग रह गया। हरे भरे वृक्षों से ढकी हुई, चारों ओर पहाड़ियां, बीच में हरी वादियां, बिलकुल सामने ही हरा भरा विशाल पार्क, जिसमें झुण्ड के झुण्ड कंगारू आकर घास चर रहे थे। पार्क पूरी तरह से सज्जित और घास एकदम समतल। मन मुग्ध कर देने वाला दृश्य था। ऐसा लग रहा था किसी और ही लोक में आ गए हों। मैं लॉज के अंदर गया और यह अनुपम दृश्य दिखाने के लिये अपनी पत्नी और पी. एस. सिंह को बुला लाया फिर सभी साथ होकर और समीप से जाकर, कंगारुओं को देखने लगे। जब और आगे बढे तो समीप ही हॉक्सबरी नदी अपने पूरे शबाब पर बह रही थी। अपने पहलगाम से भी सुन्दर दृश्य था। बस हॉक्सबरी बिना किसी कोलाहल के ही बह रही थी, जबकि पहलगांव में फागुनी नदी के कल कल छल छल का संगीत भी होता है। हॉक्सबरी, अतीव सुन्दर और पूरी तरह सौम्य; चंचलता का कोई नामोनिशान नहीं था। वहां कोई शोर था तो मोटर बोट से सर्फिंग करने वाली जलपरियों का। नदी के किनारे जगह जगह बेंच और मेज लगे हुए थे, जहाँ बैठ कर, कुछ देर तक तसल्ली से सम्पूर्ण दृश्य का अवलोकन कर सकें।  कुछ समय तक तो हम उन्हीं वादियों में खोये रहे। बेंच पर तब तक बैठे रहे, जब तक सूर्य देवता हटाने के हठ पर उतारू न हो गये। हॉक्सबरी, हम तीन दिन रुके पर लगा कि तीन घंटे में ही वापस चल दिए हों।

कार्यक्रम पूरा होने के पश्चात वापस चलने के लिए जब सामान पैक हो गया और अपनी अपनी गाड़ी में रख लिया तो देखा लॉज में कई जगह गन्दगी पड़ीं थी, एकाध प्लेट व प्लास्टिक की गिलास वैसे ही फर्श पर बिखरे पड़े थे। मैं सोच ही रहा था कि हम आये थे तो यह लॉज कितना साफ सुथरा था और इस हालत में छोड़ के जायेंगे! कोई सफाई करने वाला भी नहीं दिख रहा था। मगर यह क्या, सभी के सभी गाड़ी में सामान रखने के पश्चात लॉज में वापस आ गए और एक एक सामान बिनकर, कूड़ेदान में डालने लगे उसके पश्चात वैक्यूम क्लीनर उठाकर उसे पूरी तरह साफ कर दिया। सभी उच्च पदस्थ कार्यरत थे, कोई इंजीनियर, कोई मैनेजर, कोई अधिकारी, मगर किसी में किसी प्रकार का संकोच का भाव नहीं था, बड़ी तन्मयता से सफाई में जुटे थे। यहाँ तक कहीं जूठन आदि का निशान भी था, उसे भी पोंछा लगाकर साफ कर दिया गया। जिस दशा में लॉज हमें मिला था उसी दशा में साफ करके वापिस छोड़ा और बंद करके चाभी उसी स्थान पर वापस रख दिया। कोई निरीक्षण करने तक नहीं आया। 

मेरे लिए यह आश्चर्य का विषय था। अधिकारी होकर भी लोग झाड़ू पोंछा लगा रहे हैं, और लॉज को कोई देखने तक नहीं आ रहा है कि किस दशा में वापस छोड़ा है! मैंने बच्चों से पूछ ही लिया, भई! चाभी लेने कोई नहीं आएगा क्या ? नहीं अंकल, यहाँ ऐसे ही होता है।  कोई गड़बड़ नहीं करता, अगर किया भी तो लॉज वाला उसकी पेनल्टी का बिल भेज देगा जिसका भुगतान करना ही पड़ेगा। यह सब देख कर मुझे अपने देश में पार्टियो का दृश्य समक्ष आ गया, जहाँ पार्टी के बाद में इतनी गन्दगी दिखती है, कुत्ते घूमते हैं और मक्खियाँ भिनभिनाती हैं। खड़ा होना दूभर हो जाता है। कई लोग धर्म या समाज सेवा का काम करते है, सड़क पर या गली में भंडारा चलाते है, और जूठे प्लेट, पत्तल वहीं छोड़ जाते हैं। यहाँ तक कि सार्वजानिक पार्कों को भी गन्दा करने से नहीं चूकते। कोई कूड़ेदान रखकर, प्रसाद लेने वालों को अपने पत्तल उसमें डालने के लिए प्रेरित तक नहीं करते। किसी को कह भी दिया जाय तो उसके शान के विरुद्ध हो जाता है। मेरे लिए, यह जहाँ एक अति मनोरम यात्रा थी, इस यात्रा ने बहुत कुछ सिखाया भी।



    




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