अपना हाथ जगन्नाथ
'रूबी, तू रोटी बना रही है, हम तो बाजार से रेडीमेड ही लाते हैं। वही चूल्हा चक्की में लगे रहें तो विदेश आने का फायदा ही क्या। ' सुमन ने कटाक्ष भरे अंदाज में कहा।
'अरे चूल्हा चक्की में नहीं लगे तो, अपने देशी स्वाद से वंचित भी तो रहेंगे। बाजार का खाना रोज रोज तो खाया नहीं जाता। वही पिज्जा, बर्गर, पास्ता और पाई। हम लोगों को तो, घर का पकाया ही पसंद आता है। '
'अरे यार सब बनाने में कितना तो बर्तन हो जाता है। फिर सारा अपने आप धोओ। वैसे बनी बनाई सब्जी, रोटी और पराठे भी तो मिलते हैं। ' सुमन बोली।
'रेडी मेड पराठे का पैकेट रखा है, मगर ताजा खाने का स्वाद तो और ही होता है। लंदन में, काम वाली तो रखना सपना है। हम दोनों में से एक की तनख्वाह वही ले जाएगी। तू भी घर का सब काम खुद ही करती होगी ?'
'चल ठीक है तुझे अच्छा लगता है तो कोई बात नहीं। आज सब्जी क्या बनाई है ?'
'राजमा, भिंडी और भरवा बैगन '
'हा! ये तो मुझे बहुत पसंद है। चल तेरे यहाँ से ही खा के जाउंगी। ' एक पतीले का ढक्कन उठाती है, और इसमें क्या है ?'
'दही बड़े' रूबी ने कहा।
'वाह ! दही बड़े भी बनाए हैं; मजा आ गया, यार! इंडियन डिश की बात ही और है। यहाँ तो कुछ भी खाओ घूम फिर कर वही। सूखा खाना, पिज्जा, बर्गर या ब्रेड में लपेट कर कुछ भी दे देते हैं। इंडियन खाने जैसा न स्वाद न रस। '
फिर तो सुमन का लेक्चर चलता रहा -
'भारतीय व्यंजन में जो रस है और कहीं नहीं, न ही इतने प्रकार के पकवान मिलते हैं। क्षेत्र के अनुसार अलग अलग खाना, और स्वाद। उनसे भारत की सभ्यता और संस्कृति जुडी होती है। भोजन में तरह तरह के मसाले पड़े होते हैं, जो पौष्टिक और कई औषधीय गुणों से परिपूर्ण होते हैं। और तो और ताजा बना खाने की परंपरा।
सही बात है, अपना काम करने में क्या बुराई। सभी अपना काम करते हैं।'
'अब बस भी कर, चल खाना तैयार हो गया है। ये, ले चल, खाने की मेज पर लगा, सुमित भी आते होंगे। और हाँ, खाने के बाद बर्तन साफ करा के जाना। ये नहीं कि नैपकिन से हाथ पोंछा और चल दिए। '
'रूबी, तू रोटी बना रही है, हम तो बाजार से रेडीमेड ही लाते हैं। वही चूल्हा चक्की में लगे रहें तो विदेश आने का फायदा ही क्या। ' सुमन ने कटाक्ष भरे अंदाज में कहा।
'अरे चूल्हा चक्की में नहीं लगे तो, अपने देशी स्वाद से वंचित भी तो रहेंगे। बाजार का खाना रोज रोज तो खाया नहीं जाता। वही पिज्जा, बर्गर, पास्ता और पाई। हम लोगों को तो, घर का पकाया ही पसंद आता है। '
'अरे यार सब बनाने में कितना तो बर्तन हो जाता है। फिर सारा अपने आप धोओ। वैसे बनी बनाई सब्जी, रोटी और पराठे भी तो मिलते हैं। ' सुमन बोली।
'रेडी मेड पराठे का पैकेट रखा है, मगर ताजा खाने का स्वाद तो और ही होता है। लंदन में, काम वाली तो रखना सपना है। हम दोनों में से एक की तनख्वाह वही ले जाएगी। तू भी घर का सब काम खुद ही करती होगी ?'
'हां यार, करना ही पड़ता है, कपड़े, फ्लोर की सफाई सब कुछ। इंडिया में ये सुख तो है। घर की साफ़ सफाई से कोई मतलब नहीं, बस गप्पें लगाते रहो। बाई आ जाती है, कर जाती है; ऊपर से थोड़ा डांट डपट भी लो तो कोई फर्क नहीं। यहाँ किसी को बुलाओ तो इतना सारा पैसा भी लेगी, और सही गलत करे तो कुछ कह भी नहीं सकते।'
'अपना हाथ जगन्नाथ। बाकी काम जब करते ही हैं, झाड़ू, पोंछा, कपडे सब अपने आप ही करना होता है, तो बर्तन कौन सा बड़ा पहाड़ है। कभी ज्यादा हो जाते हैं तो डिश-वॉशर है ही। मुझे तो खाना बनाना अच्छा लगता है। सुदेश को भी घर का इंडियन खाना ही पसंद आता है। बाहर भी जाते हैं तो इंडियन रेस्तरां ही जाते हैं। हां, कभी कभी मन किया तो पिज्जा वगैरह खा लिया, वैसे बहुत कम।' रूबी बोली।
'चल ठीक है तुझे अच्छा लगता है तो कोई बात नहीं। आज सब्जी क्या बनाई है ?'
'राजमा, भिंडी और भरवा बैगन '
'हा! ये तो मुझे बहुत पसंद है। चल तेरे यहाँ से ही खा के जाउंगी। ' एक पतीले का ढक्कन उठाती है, और इसमें क्या है ?'
'दही बड़े' रूबी ने कहा।
'वाह ! दही बड़े भी बनाए हैं; मजा आ गया, यार! इंडियन डिश की बात ही और है। यहाँ तो कुछ भी खाओ घूम फिर कर वही। सूखा खाना, पिज्जा, बर्गर या ब्रेड में लपेट कर कुछ भी दे देते हैं। इंडियन खाने जैसा न स्वाद न रस। '
फिर तो सुमन का लेक्चर चलता रहा -
'भारतीय व्यंजन में जो रस है और कहीं नहीं, न ही इतने प्रकार के पकवान मिलते हैं। क्षेत्र के अनुसार अलग अलग खाना, और स्वाद। उनसे भारत की सभ्यता और संस्कृति जुडी होती है। भोजन में तरह तरह के मसाले पड़े होते हैं, जो पौष्टिक और कई औषधीय गुणों से परिपूर्ण होते हैं। और तो और ताजा बना खाने की परंपरा।
सही बात है, अपना काम करने में क्या बुराई। सभी अपना काम करते हैं।'
'अब बस भी कर, चल खाना तैयार हो गया है। ये, ले चल, खाने की मेज पर लगा, सुमित भी आते होंगे। और हाँ, खाने के बाद बर्तन साफ करा के जाना। ये नहीं कि नैपकिन से हाथ पोंछा और चल दिए। '
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