साथ जियेंगे
लेक्चरर इतनी तेजी से बोल गया कि कुछ बातें पल्ले ही नहीं पड़ी। जैसे ही लेक्चर समाप्त हुआ, ईशा ने
आशुतोष से पूछ लिया, तुम्हें इस प्रोग्राम का सिंटेक्स समझ आया ?
'हाँ'
'मुझे एक जगह थोड़ा कन्फूजन रह गया।'
'अच्छा, चलो कैंटीन चलते हैं, मैं क्लियर कर दूंगा।'
कैंटीन जाकर, आशुतोष ने ईशा की समस्या हल कर दिय। चाय पीने के बाद आशुतोष ने ईशा से कह दिया,
'कभी कोई प्रॉब्लम (समस्या) आये तो बता देना।'
'इतनी जल्दी क्यों जा रही हो! कुछ दिन और रुकते हैं। '
'मगर, मम्मी पापा को क्या कहूँगी?'
'कह देना, अभी प्रैक्टिकल बाकी है या असाइनमेंट जमा करना है। शुक्रवार को दो नयी फिल्में आ रही हैं साथ देखते हैं। बीच में नैनीताल घूम आते हैं।'
'नैनीताल तो नहीं जा पाऊँगी हाँ एक दो दिन रुकने का देख लेती हूँ, मगर टिकट?'
'वो देख लेंगे कुछ पैसे ही तो कटेंगे।'
'ठीक है, मैं अपनी रूम पार्टनर से बात कर लेती हूँ, और टिकट एक दिन आगे का करा लेती हूँ। वैसे भी एक सप्ताह से अधिक हॉस्टल में रुकने की अनुमति कहाँ है।'
आशुतोष के आग्रह पर, ईशा एक दिन और रुक गयी। परीक्षा के अगले दिन दोनों ने साथ फिल्म देखी। और घर जाने से पहले कुछ शॉपिंग कर लिया। आज ईशा को गाड़ी पकड़नी है, आशुतोष उसे छोड़ने स्टेशन पहुँच गया। आशुतोष को तो अभी दो दिन बाद जाना है। आशुतोष के लिए आज का दिन बहुत दुःख भरा है, धीरे धीरे गाड़ी खिसकनी शुरू हो गयी। ईशा को अपने से दूर होते देख के आशुतोष के आँखों में आंसू छलक आये। ईशा भी आंसू बहाये बिना कहाँ रह पाती। नम आँखों से वह विदा हो गयी। और रूक कर आशुतोष पछताता ही रहा। उसका मन बहुत उदास था। अब वह ईशा के जाने के अगले ही दिन चला गया।
'मैं मना लूंगी।'
लेक्चरर इतनी तेजी से बोल गया कि कुछ बातें पल्ले ही नहीं पड़ी। जैसे ही लेक्चर समाप्त हुआ, ईशा ने
आशुतोष से पूछ लिया, तुम्हें इस प्रोग्राम का सिंटेक्स समझ आया ?
'हाँ'
'मुझे एक जगह थोड़ा कन्फूजन रह गया।'
'अच्छा, चलो कैंटीन चलते हैं, मैं क्लियर कर दूंगा।'
कैंटीन जाकर, आशुतोष ने ईशा की समस्या हल कर दिय। चाय पीने के बाद आशुतोष ने ईशा से कह दिया,
'कभी कोई प्रॉब्लम (समस्या) आये तो बता देना।'
फिर तो प्रॉब्लम आने का क्रम बढ़ता गया, बिना प्रॉब्लम के भी प्रॉब्लम आती रही और कैंटीन में जाकर हल होती रहीं। दोनों कभी कैंटीन में तो कभी लाइब्रेरी में बैठ अपनी प्रॉब्लम सॉल्व करते करते दोस्त बन गए। ईशा ने बिहार बोर्ड से उच्चतर माध्यमिक परीक्षा पास किया था और आशुतोष पंजाब बोर्ड से। इंजीनियरिंग करने के लिए दोनों को लखनऊ के एक इंजीनियरिंग कॉलेज में प्रवेश मिला। समय के साथ उनकी मित्रता बढ़ती गयी और फाइनल करते करते एक दूसरे को चाहने लगे। अंतिम सत्र की परीक्षा सिर पर आ चुकी थी। परीक्षा की तैयारी जोर शोर पर थी। परीक्षा समीप आने के साथ उनकी चिंता भी बढ़ती जा रही थी कि परीक्षा के पश्चात दोनों को अपने अपने घर चले जाना होगा। फिर तो मिलना भी मुश्किल हो जायेगा। कहाँ पंजाब में जालंधर और कहाँ बिहार में पटना! फिर उसके आगे न जाने कौन क्या करेगा, कहाँ जॉब मिलेगी? खैर अभी परीक्षा पर ध्यान देना जरूरी था, आगे के कार्यक्रम की रूप रेखा परीक्षा के बाद तय की जाएगी, यह सोच कर दोनों परीक्षा में जुट गए।
उधर परीक्षा से पहले ही प्लेसमेंट (नियुक्ति) के लिए कंपनी वाले इंटरव्यू (साक्षात्कार) लेने आये थे। ईशा को इंटरव्यू में ही बता दिया कि उसका सिलेक्शन (चयन) हो गया और परीक्षा के पश्चात ट्रेनिंग (प्रशिक्षण) के लिए मुंबई जाना है। ईशा अपने चयनित होने पर बहुत प्रसन्न थी, घर पर बताने की फ़ोन मिला ही रही थी कि उसे आशुतोष का ध्यान आ गया। सोची इसके बारे में वह घर बताएगी तो मम्मी पापा मुंबई जाने पर जोर डालेंगे, पहले वह आशुतोष का भी देख ले, तभी घर पर बताएगी। थोड़ी देर बाद इंटरव्यू हाल से आशुतोष भी आता हुआ दिख गया। ईशा ने पूछा, 'और कैसा हुआ इंटरव्यू ?'
'हमारा इंटरव्यू कहाँ हुआ !'
'क्यों, क्या हो गया?'
'उन्होंने बोला, जरूरत भर कैंडिडेट (उम्मीदवार) हो चुके हैं। अब दूसरी कंपनी में अवसर मिलेगा। और तुम्हारा क्या हुआ ?'
'मुझे तो बोल दिया है, एग्जाम के बाद मुंबई ट्रेनिंग के लिए जाना है।'
'चलो अच्छा हुआ, बधाई। तुम मुंबई जाओ, हमारा देखो क्या होता है।'
'तुम्हारे बिना मैं मुंबई कहाँ जाने वाली हूँ। इसीलिए तो अभी घर पर भी नहीं बताया है। तुम्हारा जहाँ होगा मैं भी वहीँ कोशिश करुँगी।'
'चलो अच्छी बात है, पहले परीक्षा देते हैं। फिर बाद में ये सब सोचेंगे।'
'मैं तो सोच रही थी परीक्षा में फेल हो जाते हैं। इसी बहाने एक साल और यहीं साथ रहेंगे।
'ईशा, लगता है तू तो पागल हो गई है। इंजीनियरिंग पूरी करके जॉब भी तो एक जगह ढूंढ सकते हैं।'
'हा हा हा ..., वो तो मजाक कर रही थी। मैं तो उसी जगह पर जॉब ढूंढूंगी, जहाँ तुम करोगे।'
'चलो ठीक है, अब लगन से एग्जाम दो और मुझे भी डिस्टर्ब (तंग) नहीं करना।'
'हमारा इंटरव्यू कहाँ हुआ !'
'क्यों, क्या हो गया?'
'उन्होंने बोला, जरूरत भर कैंडिडेट (उम्मीदवार) हो चुके हैं। अब दूसरी कंपनी में अवसर मिलेगा। और तुम्हारा क्या हुआ ?'
'मुझे तो बोल दिया है, एग्जाम के बाद मुंबई ट्रेनिंग के लिए जाना है।'
'चलो अच्छा हुआ, बधाई। तुम मुंबई जाओ, हमारा देखो क्या होता है।'
'तुम्हारे बिना मैं मुंबई कहाँ जाने वाली हूँ। इसीलिए तो अभी घर पर भी नहीं बताया है। तुम्हारा जहाँ होगा मैं भी वहीँ कोशिश करुँगी।'
'चलो अच्छी बात है, पहले परीक्षा देते हैं। फिर बाद में ये सब सोचेंगे।'
'मैं तो सोच रही थी परीक्षा में फेल हो जाते हैं। इसी बहाने एक साल और यहीं साथ रहेंगे।
'ईशा, लगता है तू तो पागल हो गई है। इंजीनियरिंग पूरी करके जॉब भी तो एक जगह ढूंढ सकते हैं।'
'हा हा हा ..., वो तो मजाक कर रही थी। मैं तो उसी जगह पर जॉब ढूंढूंगी, जहाँ तुम करोगे।'
'चलो ठीक है, अब लगन से एग्जाम दो और मुझे भी डिस्टर्ब (तंग) नहीं करना।'
दोनों तन्मयता से पढ़ाई में जुट गए और कुछ दिनों में परीक्षा समाप्त हो गयी। परीक्षा समाप्त होते ही दोनों मिले। 'और कैसे पेपर हो गए?' आशुतोष ने ईशा से पूछा।
'अच्छे हो गए। और तुम्हारे?'
'अपनी तरफ से तो मैंने भी अच्छा कर दिया बाकी कॉपी जांचने वाला जाने।'
'हा हा ... , अब तो घर जाने का समय आ गया। तुम्हारा क्या कर्यक्रम है?'
'देखते हैं अभी कुछ निर्णय नहीं लिया। तुम कब जा रही हो?'
'बस, परसों।'
'परसों! टिकट हो गया?'
'हाँ, और तुम्हारा ?'
'अभी नहीं।''अच्छे हो गए। और तुम्हारे?'
'अपनी तरफ से तो मैंने भी अच्छा कर दिया बाकी कॉपी जांचने वाला जाने।'
'हा हा ... , अब तो घर जाने का समय आ गया। तुम्हारा क्या कर्यक्रम है?'
'देखते हैं अभी कुछ निर्णय नहीं लिया। तुम कब जा रही हो?'
'बस, परसों।'
'परसों! टिकट हो गया?'
'हाँ, और तुम्हारा ?'
'इतनी जल्दी क्यों जा रही हो! कुछ दिन और रुकते हैं। '
'मगर, मम्मी पापा को क्या कहूँगी?'
'कह देना, अभी प्रैक्टिकल बाकी है या असाइनमेंट जमा करना है। शुक्रवार को दो नयी फिल्में आ रही हैं साथ देखते हैं। बीच में नैनीताल घूम आते हैं।'
'नैनीताल तो नहीं जा पाऊँगी हाँ एक दो दिन रुकने का देख लेती हूँ, मगर टिकट?'
'वो देख लेंगे कुछ पैसे ही तो कटेंगे।'
'ठीक है, मैं अपनी रूम पार्टनर से बात कर लेती हूँ, और टिकट एक दिन आगे का करा लेती हूँ। वैसे भी एक सप्ताह से अधिक हॉस्टल में रुकने की अनुमति कहाँ है।'
आशुतोष के आग्रह पर, ईशा एक दिन और रुक गयी। परीक्षा के अगले दिन दोनों ने साथ फिल्म देखी। और घर जाने से पहले कुछ शॉपिंग कर लिया। आज ईशा को गाड़ी पकड़नी है, आशुतोष उसे छोड़ने स्टेशन पहुँच गया। आशुतोष को तो अभी दो दिन बाद जाना है। आशुतोष के लिए आज का दिन बहुत दुःख भरा है, धीरे धीरे गाड़ी खिसकनी शुरू हो गयी। ईशा को अपने से दूर होते देख के आशुतोष के आँखों में आंसू छलक आये। ईशा भी आंसू बहाये बिना कहाँ रह पाती। नम आँखों से वह विदा हो गयी। और रूक कर आशुतोष पछताता ही रहा। उसका मन बहुत उदास था। अब वह ईशा के जाने के अगले ही दिन चला गया।
अब तो दोनों की फोन से ही बात हो पाती। कहाँ पटना और कहाँ जालंधर, मिल पाना तो असंभव प्रायः ही था। लेकिन दोनों का एक दूसरे के बिना रहना भी कठिन था। एक दिन आशुतोष ने फ़ोन पर प्रस्ताव रखा, 'क्यों न हम दोनों लखनऊ में एम. टेक. में प्रवेश ले लें? इसी बहाने दो वर्ष और साथ रहेंगे, फिर उसके बाद देखेंगे कि क्या करना है।'
ईशा को यह आईडिया पसंद आया और उसने हां भी कर दिया। दोनों एम. टेक. की प्रवेश परीक्षा में बैठे। मेरिट के आधार पर ईशा को तो प्रवेश मिल गया, पर आशुतोष असफल रहा। अब ईशा के सामने बड़ी समस्या हो गयी, जिस उद्देश्य से वह एम. टेक. करने की सोची वह पूरा ही नहीं हो पा रहा है। अकेले एम. टेक. करने की उसकी बिल्कुल भी इच्छा न थी। एक बार तो वह जॉब की तिलांजलि दे ही चुकी थी, अब एम. टेक. भी छोड़ने का मन बना लिया और अपने इरादे से आशुतोष को अवगत करा दिया। किन्तु आशुतोष ने उसे प्रवेश लेने पर जोर दिया, और समझाया कि वह एम. टेक. में प्रवेश ले ले तब तक वह स्वयं भी किसी न किसी बहाने लखनऊ आ जायेगा। चाहे किसी और कोर्स में प्रवेश ले ले या कोई जॉब ढूंढ लेगा। ईशा का साथ पाने के लिए आशुतोष कुछ भी करने को तैयार था। आशुतोष ने लखनऊ में एक नौकरी ढूंढ ली। समय बीता, और ईशा का एम. टेक. भी पूरा हो गया। अब साथ रहने का बहाना बनाने की और कोई गुंजाईश नहीं थी । बस या तो दोनों को एक ही स्थान पर जॉब मिले या फिर शादी कर लें। वैसे ईशा को उसी इंजीनियरिंग कॉलेज में पढ़ाने का प्रस्ताव मिल रहा था किन्तु वह लेक्चरर नहीं बनना चाहती थी।
ईशा को यह आईडिया पसंद आया और उसने हां भी कर दिया। दोनों एम. टेक. की प्रवेश परीक्षा में बैठे। मेरिट के आधार पर ईशा को तो प्रवेश मिल गया, पर आशुतोष असफल रहा। अब ईशा के सामने बड़ी समस्या हो गयी, जिस उद्देश्य से वह एम. टेक. करने की सोची वह पूरा ही नहीं हो पा रहा है। अकेले एम. टेक. करने की उसकी बिल्कुल भी इच्छा न थी। एक बार तो वह जॉब की तिलांजलि दे ही चुकी थी, अब एम. टेक. भी छोड़ने का मन बना लिया और अपने इरादे से आशुतोष को अवगत करा दिया। किन्तु आशुतोष ने उसे प्रवेश लेने पर जोर दिया, और समझाया कि वह एम. टेक. में प्रवेश ले ले तब तक वह स्वयं भी किसी न किसी बहाने लखनऊ आ जायेगा। चाहे किसी और कोर्स में प्रवेश ले ले या कोई जॉब ढूंढ लेगा। ईशा का साथ पाने के लिए आशुतोष कुछ भी करने को तैयार था। आशुतोष ने लखनऊ में एक नौकरी ढूंढ ली। समय बीता, और ईशा का एम. टेक. भी पूरा हो गया। अब साथ रहने का बहाना बनाने की और कोई गुंजाईश नहीं थी । बस या तो दोनों को एक ही स्थान पर जॉब मिले या फिर शादी कर लें। वैसे ईशा को उसी इंजीनियरिंग कॉलेज में पढ़ाने का प्रस्ताव मिल रहा था किन्तु वह लेक्चरर नहीं बनना चाहती थी।
आशुतोष ने प्रस्ताव रखा, चलो शादी कर लेते हैं, फिर साथ मिलकर भविष्य की योजना तय करेंगे। आशुतोष ने कह तो दिया पर ईशा के लिए यह इतना आसान नहीं था। वह अपने माँ बाप से पूछे बिना ऐसा कदम नहीं उठा सकती थी।
आशुतोष से बोली - 'ठीक है मम्मी पापा से बात करूंगी।'
'अगर वे नहीं माने तो।''मैं मना लूंगी।'
ईशा ने घर जाकर, मम्मी पापा से शादी की बात किया, मगर उसे बड़ा स्पष्ट उत्तर मिला 'नहीं'। दोनों अलग राज्य के और जाति भी अलग अलग। यह ईशा के परिवार को कत्तई पसंद नहीं। पंजाब की संस्कृति बिहार से भिन्न, और फिर माँ बाप बेटी को इतनी दूर कैसे भेज सकते थे। वे शादी के लिए पहले ही एक लड़का देख रखे थे, बस ईशा के एम. टेक. की प्रतीक्षा थी। संभ्रांत परिवार, वह भी एम. टेक., अपने जाने सुने लोगों में, ऐसी सुन्दर जोड़ी सरलता से कहाँ मिलती है। ईशा को जब पता चला तो उसके नीचे से जमीन खिसक गयी। उधर आशुतोष का परिवार भी ईशा के साथ शादी से सहमत नहीं था। अब तो आशुतोष और ईशा के पास एक ही विकल्प था कि अभी शादी के लिए ना कर दें, हो सकता है कुछ समय के बाद घर वाले मान जाएँ। आशुतोष जॉब कर ही रहा था, कुछ दिनों में ईशा भी कोई जॉब ढूंढ लेगी।
थोड़ा समय और बीता मगर, दोनों को कोई सफलता नहीं मिली। दोनों के ही परिवार इस सम्बन्ध को स्वीकार करने के पक्ष में नहीं थे। अब वे सोचने लगे कि कोर्ट मैरिज कर लें।
थोड़ा समय और बीता मगर, दोनों को कोई सफलता नहीं मिली। दोनों के ही परिवार इस सम्बन्ध को स्वीकार करने के पक्ष में नहीं थे। अब वे सोचने लगे कि कोर्ट मैरिज कर लें।
इसी बीच आशुतोष को एक मित्र से पता चला, ऑस्ट्रेलिया में टेक्निकल योग्यता वालों के लिए, वहां का स्थाई निवासी होने का अवसर दिया जा रहा है, उसके लिए जी.आर.ई. का स्कोर और आई.इ.एल.टी. की परीक्षा का ग्रेड प्रमुख मानदंड है। बाकी कुछ और औपचारिकतायें हैं, वो एजेंट बता देगा। आशुतोष सोचा वहीँ जाने की योजना बनाई जाय। चुपके से कोर्ट में शादी करके ऑस्ट्रेलिया के स्थायी निवासी का आवेदन पत्र दे दिया जाय। वहां जाने के बाद किसी के कहा सुनी का कोई चक्कर नहीं होगा, और धीरे धीरे दोनों के मम्मी पापा भी सामान्य हो जायेंगे।
आशुतोष ने ईशा के बारे में बिना कुछ बताये, ऑस्ट्रेलिया के स्थायी निवासी के लिए आवेदन की बात घर पर बताया। विदेश जाने के नाम से आशुतोष का परिवार प्रसन्न हो गया। एक तो बेटा विदेश चला जायेगा, दूसरे उस बिहारन से शादी से भी छुटकारा मिल जायेगा। वहां अच्छी जॉब के साथ अच्छी कमाई होगी। आशुतोष ऑस्ट्रेलिया के स्थाई निवासी की औपचारिकताएं पूरी करने में जुट गया और उसे घर वालों से भी पूरा सहयोग मिला। साथ ही कोर्ट मैरिज करके ईशा से भी आवेदन करवा दिया। एक वर्ष प्रतीक्षा के पश्चात, एक प्रातः की किरणें उसके लिए जीवन की सबसे बड़ी खुशखबरी लेकर आई। अपना ईमेल खोलते ही आशुतोष सुखद आश्चर्य से झूम उठा, वह था ऑस्ट्रेलिया के स्थाई निवासी होने की अनुमति। वह फूले नहीं समाया, सबसे पहले ईशा को यह बात बताया और फिर फ़ोन पर, अपने मम्मी पापा को। आशुतोष ने ईशा से कहा तुम भी अपना ईमेल देखो तुम्हारा क्या हुआ। ईशा ने देखा तो उसे कोई सूचना नहीं आयी थी। आशुतोष ने एजेंट को फ़ोन मिलाया, एक पी. आर. आने का धन्यवाद करते हुए ईशा के नहीं आने की शिकायत भी की।
एजेंट ने परामर्श दिया एक दो दिन प्रतीक्षा कर लो, वो भी आ जायेगा।
दोनों ऑस्ट्रेलिया की पी. आर. (परमानेंट रेजिडेंट) मिलने की ख़ुशी में शाम को रेस्तरां में खाने चले गए। आशुतोष के पी. आर. से दोनों बहुत खुश थे पर, ईशा के नहीं आने से चिंतित भी। ईशा को चिंता सताने लगी कि कहीं आशुतोष उसे छोड़कर अकेला न चला जाय और उसे भूल न जाय। बात बात में वह अपनी चिंता प्रकट भी कर दी। आशुतोष समझाता रहा कि यह सब वह उसी के लिए कर रहा है, जब तक उसका पी. आर. नहीं आ जाता, वह ऑस्ट्रेलिया नहीं जायेगा। फिर भी आशुतोष ने ऑनलाइन ही एक ऑस्ट्रेलियाई कंपनी में जॉब के लिए अप्लाई कर दिया। बस दो ही दिन बीते थे, ईशा ने जैसे ही अपना लैपटॉप खोला वह भी ख़ुशी से चिल्ला उठी। उसने तुरंत आशुतोष को बताया कि उसका भी पी. आर. आ गया। बस फिर था अब तो ऑस्ट्रेलिया जाने की तयारी आरम्भ।
आशुतोष ने ईशा के बारे में बिना कुछ बताये, ऑस्ट्रेलिया के स्थायी निवासी के लिए आवेदन की बात घर पर बताया। विदेश जाने के नाम से आशुतोष का परिवार प्रसन्न हो गया। एक तो बेटा विदेश चला जायेगा, दूसरे उस बिहारन से शादी से भी छुटकारा मिल जायेगा। वहां अच्छी जॉब के साथ अच्छी कमाई होगी। आशुतोष ऑस्ट्रेलिया के स्थाई निवासी की औपचारिकताएं पूरी करने में जुट गया और उसे घर वालों से भी पूरा सहयोग मिला। साथ ही कोर्ट मैरिज करके ईशा से भी आवेदन करवा दिया। एक वर्ष प्रतीक्षा के पश्चात, एक प्रातः की किरणें उसके लिए जीवन की सबसे बड़ी खुशखबरी लेकर आई। अपना ईमेल खोलते ही आशुतोष सुखद आश्चर्य से झूम उठा, वह था ऑस्ट्रेलिया के स्थाई निवासी होने की अनुमति। वह फूले नहीं समाया, सबसे पहले ईशा को यह बात बताया और फिर फ़ोन पर, अपने मम्मी पापा को। आशुतोष ने ईशा से कहा तुम भी अपना ईमेल देखो तुम्हारा क्या हुआ। ईशा ने देखा तो उसे कोई सूचना नहीं आयी थी। आशुतोष ने एजेंट को फ़ोन मिलाया, एक पी. आर. आने का धन्यवाद करते हुए ईशा के नहीं आने की शिकायत भी की।
एजेंट ने परामर्श दिया एक दो दिन प्रतीक्षा कर लो, वो भी आ जायेगा।
दोनों ऑस्ट्रेलिया की पी. आर. (परमानेंट रेजिडेंट) मिलने की ख़ुशी में शाम को रेस्तरां में खाने चले गए। आशुतोष के पी. आर. से दोनों बहुत खुश थे पर, ईशा के नहीं आने से चिंतित भी। ईशा को चिंता सताने लगी कि कहीं आशुतोष उसे छोड़कर अकेला न चला जाय और उसे भूल न जाय। बात बात में वह अपनी चिंता प्रकट भी कर दी। आशुतोष समझाता रहा कि यह सब वह उसी के लिए कर रहा है, जब तक उसका पी. आर. नहीं आ जाता, वह ऑस्ट्रेलिया नहीं जायेगा। फिर भी आशुतोष ने ऑनलाइन ही एक ऑस्ट्रेलियाई कंपनी में जॉब के लिए अप्लाई कर दिया। बस दो ही दिन बीते थे, ईशा ने जैसे ही अपना लैपटॉप खोला वह भी ख़ुशी से चिल्ला उठी। उसने तुरंत आशुतोष को बताया कि उसका भी पी. आर. आ गया। बस फिर था अब तो ऑस्ट्रेलिया जाने की तयारी आरम्भ।
ईशा ने अपने मम्मी पापा को बताया तो उनकी कोई प्रतिक्रिया नहीं थी। उसके मम्मी पापा उसे अकेले विदेश नहीं जाने देना चाहते थे। उन्होंने ईशा को बहुत समझाया कि वह अकेले विदेश कहाँ जाएगी। फिर बाद में इंडिया में शादी होने में बड़ी परेशानी आएगी। उन्हें क्या पता था कि ईशा अब ईशा कौर हो चुकी है। ईशा ने इस अवसर का लाभ उठाना चाहा, उसने अपने मम्मी पापा के समक्ष दो शर्तें रख दी। या तो वे आशुतोष से शादी कर दें या वह ऑस्ट्रेलिया जाएगी। उसकी जिद्द के आगे, मम्मी पापा को आशुतोष से विवाह करना अधिक उचित लगा। जब दोनों के परिवार को पता चल गया कि उन्हें अब ऑस्ट्रेलिया जाने से उसे कोई नहीं रोक सकता, और वहां जाकर दोनों शादी कर ही लेंगे। इससे अच्छा यहीं अच्छी तरह से शादी कर दें, ताकि वे ख़ुशी ख़ुशी यहाँ जांय और सुखपूर्वक रहें। साथ ही समाज में प्रतिष्ठा भी बची रहे।
सभी बाधाओं को पार करते हुए, दोनों का धूमधाम से विवाह संपन्न हो गया, और ऑस्ट्रेलिया में सुख पूर्वक जीवन बिताने लगे ।
सभी बाधाओं को पार करते हुए, दोनों का धूमधाम से विवाह संपन्न हो गया, और ऑस्ट्रेलिया में सुख पूर्वक जीवन बिताने लगे ।
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