दो बिस्वा जमीन
जानकी ने टका सा जबाब दे दिया, 'पर साहब आप तो इतने पैसे वाले हैं, आप अपने पैसे के बारे में इतना सोच रहे हैं तो बताईये, मैं गरीब बीस लाख की चीज आपको आधी कीमत पर कैसे दे दूँ। मेरा भी तो एक बेटा है, वह कहाँ जायेगा? उसकी सरकारी नौकरी लगवा दीजिये।'
'सरकारी नौकरी ऐसे ही कैसे लग जायगी, उसके लिए तो परीक्षा पास करनी पड़ेगी, न।'
'विधायक साहब, आप तो खुद ही सरकार हैं। आपको क्या, कुछ भी कर सकते हैं। हमारा तो यह जमीन का छोटा सा टुकड़ा ही सहारा है, इसे भी आपको दे दिया तो हम कहाँ जायेंगे!'
धीरे धीरे स्कूल के आस पास का स्थान अब बाजार का रूप ले चुका था। वहां कई दुकानें खुल चुकी थीं, यूनियन बैंक की शाखा भी खुल गयी थी। अब उस जगह की कीमत बढ़ चुकी थी। जानकी के, प्रारम्भ के प्रस्ताव को ठुकरा कर, विधायक जी बार बार पछताते। उसी समय ले लिए होते, तो बीस लाख में वो जमीन मिल गयी होती। अब कीमत भी बढ़ चुकी है, और पता नहीं वो इस टुकड़े को बेचे या नहीं। विधायक जी उस जमीन को किसी भी कीमत पर हथियाना चाहते थे। पहले तो उसकी कीमत चालीस लाख तक लगा दिए, परन्तु जब जानकी ने उसे चालीस लाख में भी बेचने से मना कर दिया तो उन्होंने किसी और के द्वारा खरीदने की तिकड़म लगाने लगे। जब उनके सभी प्रयास विफल हो गए तो जानकी को तंग करने लगे। जब बच्चों को लेकर, बसें आतीं तो वहीँ खड़ी करवा देते। जब जानकी विधायक जी से शिकायत करती तो बोलते, 'खाली जगह थी, इसलिए खड़ी करा दिया। जब कुछ बोओगी तो वहां नहीं खड़ी होंगी।' लेकिन यह तो उसे भरमाने वाली बात थी। उनका वास्तविक इरादा तो उसे परेशान करना ही था। उन्होंने स्कूल की चारदीवारी में छेद करवाकर, पानी की नाली जानकी की जमीन में छोड़ दिया। शिकायत करने पर फिर वही, 'जब भी बनवाना तो इसे बंद कर देना।'
जानकी ने बिल्डर की बात, बेटे से फ़ोन पर बताया तो वह बड़ा खुश हुआ।
'यह तो बहुत बढ़िया सौदा है, माँ ! उसे बेचकर शहर में अच्छा सा फ्लैट खरीद लेंगे।'
'मगर बेटा, तेरी प्राइवेट नौकरी है। कब लगे, कब छूटे, क्या पता? कम से कम, यह जमीन वर्तमान का एक सहारा है और साथ ही भविष्य की सुरक्षा भी। इसे बेच दिया तो बचेगा ही क्या, गांव में एक छोटा सा घर और बस डेढ़ बीघे खेती की जमीन। जितनी कीमत इस दो बिस्वे की है उस पूरे डेढ़ बीघे की भी नहीं है।'
'लेकिन माँ, अब तुम्हारे से खेती कहाँ होगी। नौकरी छोड़कर, मेरा भी गांव आना मुश्किल है। डेढ़ बीघे खेत में हम क्या कर लेंगे। कल को बाल बच्चे होंगे तो इतनी सी जमीन पर खेती करके विधायक जी के स्कूल में तो पढ़ाने से रहे। सरकारी स्कूल में पढ़कर फिर से मेरे जैसे छोटी मोटी नौकरी के लायक बन पाएंगे। शहर में पढ़ाई का अच्छा साधन है। कम से कम बच्चे पढ़ लिख जायेंगे तो उनका जीवन अच्छा हो जायेगा। और वह विधायक भी तंग करता रहेगा, हम उससे कहाँ तक लड़ पाएंगे। गांव वाले भी उसी के पिछलग्गू हैं। हम दलित भी तो नहीं कि कानून हमारा पक्ष लेगा और मिडिया हमारे साथ खड़ी हो जाएगी।'
'उसे तो मैं देख लूंगी, मेरा क्या बिगाड़ लेगा विधायक। मैं तो सोच रही थी आधी जमीन बेच दें और उसी पैसे से आधे में दुकान बना लें। चल ठीक है, तेरे मामा से सलाह ले लेती हूँ।'
विधायक जी ने अकूत संपत्ति कमा ली थी। कहाँ तो उनके पिता जी ने कच्चे मकान में रहकर, और पुरानी साईकिल पर भ्रमण कर, जिंदगी काट लिया, वहीँ आज विधायक जी के पास शानदार बंगला है, दो दो बड़ी गाड़ियां हैं, घर में तीन चार नौकर चाकर हमेशा लगे रहते हैं। पढ़ाई लिखाई में औसत रहने के कारण उन्हें अच्छी नौकरी मिलना संभव नहीं था, अतः उन्होंने नेतागिरी में भाग्य आजमाने की सोचा। वे कॉलेज की यूनियन का चुनाव लड़े। भाग्य साथ था, चुनाव जीत भी गए, फिर क्या था अब तो वे प्रतिष्ठित नेता बन चुके थे। उनकी यह यात्रा चलती रही, जुगाड़ लगा और एक राजनितिक पार्टी का टिकट मिल गया। नेता जी ने चुनाव के लिए अपने मित्र, सम्बन्धी, पास पड़ोस आदि सबसे चंदा एकत्र किया। चूकि उनकी पार्टी की हवा थी, नेता जी चुनाव सरलता से जीत गए।
सत्ताधारी पार्टी के विधायक होने के कारण अपने क्षेत्र के अधिकारियों पर उनकी पूरी धौंस थी। रुपये पैसे कमाने का उनके पास पहले से ही हुनर था, ऊपर से सरकारी अधिकारियों का सहयोग। विधायक जी की आड़ लेकर अधिकारी भी कमा लेते थे। धीरे धीरे विधायक जी ने करोड़ों कमा लिया। उन्होंने सोचा, अभी तो पांच वर्ष के लिए विधायक हूँ, फिर अगली बार जाने क्या हो! पैसे को किसी ऐसी जगह निवेश कर दिया जाय, जिससे नियमित आय होती रहे। उनके बेटे ने सलाह दिया कि कोई कारखाना खोल दिया जाय। मगर, विधायक जी किसान परिवार के थे, परिवार में किसी को भी फैक्टरी चलाने का अनुभव नहीं होने के कारण, उन्हें यह काम उचित नहीं लगा। उन्होंने, अपने क्षेत्र में कान्वेंट स्कूल खोलना अधिक लाभ का सौदा समझा। आजकल स्कूल खोलने से बढ़िया और कोई धंधा नहीं, एक तो अच्छी कमाई और इसके सहारे राजनितिक क्षेत्र का विस्तार भी होगा। आज कल हर माता पिता, अपने बच्चे को कन्वेंट स्कूल में पढ़ाना चाहता है। सरकारी विद्यालयों में कोई जाना नहीं चाहता। ऐसा नहीं है लोग फैशन में कान्वेंट स्कूल में जाते हों, इसके लिए तो सरकारी स्कूलों की दुर्व्यवस्था भी जिम्मेदार है। सरकारी स्कूल में पढ़कर, इक्का दुक्का बच्चा ही आगे निकल पाता है। सरकारी स्कूल में अति निर्धन बच्चे, दोपहर के आहार के लोभ में जाते हैं। निजी स्कूलों की खूब बहार है। जिनको कुछ नहीं आता, वो भी अपना स्कूल खोलकर अच्छा पैसे कमा रहे हैं। निजी स्कूल तो दबंगई और पैसे के बल, खूब फल फूल रहे हैं। पहले तो प्रवेश में ही जगह नहीं है कहकर, अधिक पैसे लेकर दाखिला देते हैं; उसके पश्चात् भी अच्छी खासी राशि फीस की, और उस पर भवन शुल्क, लाइब्रेरी शुल्क, ड्रेस के पैसे, कापी किताब स्कूल से, पिकनिक, स्विमिंग पूल, घुड़सवारी, जूडो आदि सिखाने; और भी तरह तरह के तरीके अपनाकर पैसे कमाते हैं। शिक्षा से सुन्दर तो कोई व्यवसाय ही नहीं रह गया।
बस फिर क्या था! विधायक जी का कार्यक्रम आरम्भ हो गया। वे स्कूल के लिए पांच एकड़ जमीन खरीदना चाहते थे, रुपये पैसों की कमी तो थी नहीं। उनकी सोच दूर तक थी, वे चाहते थे, आधे क्षेत्र में स्कूल खोल दें और शेष आधा खाली मैदान रहे। यदि स्कूल चल पड़ा तो बाद में चलकर, इसी में इंजीनियरिंग कॉलेज भी खोल लेंगे। जमीन खोजने के काम में उन्होंने कई लोगों को लगा दिया। उन्हें इतना बड़ा प्लाट, एक जगह नहीं मिल पा रहा था। बड़ी कोशिश के बाद मरदान पुर के पास दो एकड़ की खेती की जमीन मिली, जो सड़क से दस बारह मीटर हट कर थी। सड़क के किनारे जो शेष दस बारह मीटर चौड़ी जमीन थी, उसमें से दो दो बिस्वे के दो टुकड़े रविशंकर और एक अधेड़ उम्र की विधवा, जानकी के थे। अब और जमीन के लिए विधायक जी के गुर्गे उपाय लगाने लगे। उन्होंने अफवाह फैला दिया कि यहाँ की जमीन पर कोई सरकारी योजना आ रही है, और सारी जमीन औने पौने दाम देकर, सरकार ले लेगी। वह पैसा लेने के लिए भी पता नहीं कब तक, सरकारी दफ्तरों के चक्कर काटने पड़ें, सरकारी बाबुओं से पैसा निकलवाना इतना आसान नहीं होता। इससे अच्छा जमीन विधायक जी को बेच दो और हाथों हाथ पैसा ले लो। फिर क्या था उस खेत के पीछे की जमीन भी विधायक जी को मिल गयी, और उनके पांच एकड़ पूरे हो गए। उस भूमि के पीछे, कुछ और किसान भी जमीन बेचना चाहते थे, परन्तु अब विधायक जी की आवश्यकता पूरी हो चुकी थी। उन्हें अब सड़क वाली जमीन चाहिए थी। रविशंकर अपनी जमीन महँगी बेचना चाहता था, क्योंकि वह जनता था कि सड़क पर की जमीन की कीमत अधिक होती है। और जब कान्वेंट स्कूल बनकर तैयार हो जायेगा तो इस जमीन की कीमत और बढ़ जाएगी। कहाँ तो विधायक जी ने पांच एकड़ जमीन दो करोड़ में ख़रीदा, कहाँ रविशंकर दो बिस्वा के ही बीस लाख मांग रहा था। विधायक जी को दो विस्वा के बीस लाख देना गवारा नहीं था। उसके बाद, विधायक जी ने जानकी को दबाना आरम्भ किया। इधर जानकी भी अड़ गयी कि जिस भाव पर रविशंकर बेचेगा, वह भी उसी कीमत पर बेचेगी।
विधायक जी ने जानकी को बहुत डराया, 'यहाँ स्कूल खुल जायेगा तो तुम्हारी यह जमीन किसी काम की नहीं रह जाएगी यहाँ बच्चे उधम करेंगे, स्कूल की बसें खड़ी होने लगेंगी तो खेती भी नहीं कर पाओगी। इसलिए अच्छा है, दस लाख में बेच दो और यह राशि बैंक में जमा करा कर, आराम से ब्याज खाओ।'जानकी ने टका सा जबाब दे दिया, 'पर साहब आप तो इतने पैसे वाले हैं, आप अपने पैसे के बारे में इतना सोच रहे हैं तो बताईये, मैं गरीब बीस लाख की चीज आपको आधी कीमत पर कैसे दे दूँ। मेरा भी तो एक बेटा है, वह कहाँ जायेगा? उसकी सरकारी नौकरी लगवा दीजिये।'
'सरकारी नौकरी ऐसे ही कैसे लग जायगी, उसके लिए तो परीक्षा पास करनी पड़ेगी, न।'
'विधायक साहब, आप तो खुद ही सरकार हैं। आपको क्या, कुछ भी कर सकते हैं। हमारा तो यह जमीन का छोटा सा टुकड़ा ही सहारा है, इसे भी आपको दे दिया तो हम कहाँ जायेंगे!'
विधायक जी इस बात पर जानकी से चिढ़ गए और उसकी जमीन खरीदने से ही मना कर दिया। चूकि उन्हें सड़क पर की जमीन लेनी आवश्यक थी, उन्होंने रविशंकर की जमीन खरीद ली। इतनी जमीन लेकर उन्हें स्कूल में बस इत्यादि ले जाने भर जगह मिल गयी। स्कूल का आलीशान भवन बन कर तैयार हो गया। रविशंकर वाले प्लाट में दोनों ओर से चार चार फ़ीट ऊँची दीवार खड़ी कर दी गयी, सड़क के किनारे एक बड़ा सा प्रवेश गेट और सुरक्षा गार्ड का कमरा बन गया। अंग्रेजी माध्यम से पढ़ने वाले बच्चों की भीड़ लग गयी। अब तो उस स्कूल में प्रवेश लेने के लिए अधिकारियों और नेताओं की सिफारिश आने लगी, निर्धारित शुल्क के अतिरिक्त भी हजारों रुपये वसूले जाने लगे। सड़क के दूसरे किनारे पर चाय, जूस और पंचर लगाने की दुकानें खुल गयीं। जानकी वाला हिस्सा वैसे ही खाली पड़ा रहा। जानकी के वश का दुकान करना तो था नहीं, बेटे से भी दुकान करवाये तो कैसे करवाये! उसके पास पैसा कहाँ था कि वह दुकान में लगाए। बेटे को तो नौकरी का ही सहारा लेना था।
कुछ ही वर्षों में, विधायक जी ने स्कूल से भी अच्छा खासा धन कमा लिया। उन्हें एक बार फिर से जानकी के जमीन की कमी अखरने लगी। वे सोचने लगे, यदि यह जमीन और होती तो विद्यालय की भव्यता बढ़ जाती, और जब कभी इंजीनियरिंग कॉलेज खोलेंगे तो उसके लिए इधर से अलग मार्ग भी मिल जायेगा। विधायक जी ने जानकी को वह भूमि का टुकड़ा खरीदने के लिए प्रस्ताव भेजा, पर जानकी ने इस बार भी यह जमीन विधायक जी को बेचने से मना कर दिया। अब तक उसने भी अपने सपने बुन लिए थे। बेटे को शहर में नौकरी भी मिल गयी थी। जानकी ने सोच रखा था, बेटा जब पैसा भेजेगा तो जोड़कर, वह कुछ दुकानें बनवा लेगी। कम से कम छः सात दुकानें तो निकल ही आएंगी। उनमें से दो अपने लिए रख लेगी, कभी बेटे का मन करेगा तो अपना काम कर लेगा और बाकी किराये पर चढ़ा देगी। चार पांच दुकानों के किराये से उसका काम सरलता से चल जायेगा, और बुढ़ापे की जिंदगी, भली कट जाएगी।
एक बार बरसात के मौसम में, स्कूल के प्रांगण का पानी उसके खेत में भर गया और धान के पौधे कई दिनों तक डूबे रहने के कारण मर गये। बेचारी जानकी का गरीबी में आटा गीला, उसे फिर से धान बोना पड़ा। विधायक जी से कहने पर बोले, 'बारिश पर मेरा नियंत्रण थोड़े ही है। मैंने तो पहले ही कहा था, छेद को मूंद देना।' अब जानकी मन ही मन डरने लगी, अगर विधायक इसी प्रकार परेशान करता रहा तो वह अकेली कहाँ से लड़ पायेगी। अब तो उसने ठान लिया, कुछ भी हो जाय, इस प्लाट को वह विधायक को नहीं देगी।
जानकी हर महत्वपूर्ण काम में अपने भाई, कैलाश से सलाह लेती थी। उसने सारी बात, कैलाश को फोन पर बताई तो उसने उस प्लाट को अभी नहीं बेचने की सलाह दिया। कैलाश का साला सार्वजानिक निर्माण विभाग में कनिष्ठ इंजीनियर था। कैलाश को उससे पता चल गया था, स्कूल के समीप से उस सड़क को क्रॉस करती हुई शीघ्र ही एक एक्सप्रेस सड़क बनाने की योजना बन रही है, जो सीधे वाराणसी राजमार्ग से जुड़ जायेगी। कैलाश ने जानकी को बता दिया कि जब सड़क का काम शुरू होगा तो जमीन की कीमत और बढ़ जाएगी, यदि बेचना है तो वही उचित समय होगा।
क्षेत्र के एक बिल्डर ने अनुमान लगा लिया था कि जिस गति से यह स्थान विकास कर रहा है, और सादात का बाजार भी इस ओर बढ़ रहा है, आने वाले समय में यह स्थान उसी में मिल जायेगा और यहाँ की कीमत बहुत बढ़ जाएगी। जानकी की वित्तीय स्थिति अच्छी नहीं है, यदि वह उससे यह जमीन खरीद कर छोड़ दे तो साल दो साल में ही लाखों रुपये कमा लेगा। चाहे तो बाद में वह इसमें कटरा बना कर बेच देगा तो भी अच्छी कमाई हो जाएगी। दो मंजिलों में दर्जन भर से अधिक दुकानें निकल आएंगी। फिर क्या था बिल्डर ने उस जमीन का मुयायना भी कर लिया। जमीन देख भाल कर, वह जानकी के पास पहुंचा और उस जमीन का सीधे पचास लाख का भाव लगा दिया। इसी बीच चुनाव का समय आ गया, विधायक जी अपने चुनाव में व्यस्त हो गए।
'यह तो बहुत बढ़िया सौदा है, माँ ! उसे बेचकर शहर में अच्छा सा फ्लैट खरीद लेंगे।'
'मगर बेटा, तेरी प्राइवेट नौकरी है। कब लगे, कब छूटे, क्या पता? कम से कम, यह जमीन वर्तमान का एक सहारा है और साथ ही भविष्य की सुरक्षा भी। इसे बेच दिया तो बचेगा ही क्या, गांव में एक छोटा सा घर और बस डेढ़ बीघे खेती की जमीन। जितनी कीमत इस दो बिस्वे की है उस पूरे डेढ़ बीघे की भी नहीं है।'
'लेकिन माँ, अब तुम्हारे से खेती कहाँ होगी। नौकरी छोड़कर, मेरा भी गांव आना मुश्किल है। डेढ़ बीघे खेत में हम क्या कर लेंगे। कल को बाल बच्चे होंगे तो इतनी सी जमीन पर खेती करके विधायक जी के स्कूल में तो पढ़ाने से रहे। सरकारी स्कूल में पढ़कर फिर से मेरे जैसे छोटी मोटी नौकरी के लायक बन पाएंगे। शहर में पढ़ाई का अच्छा साधन है। कम से कम बच्चे पढ़ लिख जायेंगे तो उनका जीवन अच्छा हो जायेगा। और वह विधायक भी तंग करता रहेगा, हम उससे कहाँ तक लड़ पाएंगे। गांव वाले भी उसी के पिछलग्गू हैं। हम दलित भी तो नहीं कि कानून हमारा पक्ष लेगा और मिडिया हमारे साथ खड़ी हो जाएगी।'
'उसे तो मैं देख लूंगी, मेरा क्या बिगाड़ लेगा विधायक। मैं तो सोच रही थी आधी जमीन बेच दें और उसी पैसे से आधे में दुकान बना लें। चल ठीक है, तेरे मामा से सलाह ले लेती हूँ।'
जानकी को बिल्डर से बात करते देखते ही गांव वालों को भनक लग गयी थी कि स्कूल वाली जमीन बिकेगी। अब जानकी के यहाँ लोगों ने चक्कर काटना शुरू कर दिया।
अगले ही दिन शंकर नाइ का बेटा आकर बोला, 'ताई एक दुकान भर जगह हमें भी दे देना, मुझे सैलून खोलना है। तो फिर नन्हकू धोबी, प्रेस की दुकान खोलने के लिए जगह मांगने लगा।
दशरथ शाह की मिठाई की एक दुकान, सादात में चल रही थी, वो भी एक और दुकान खोलना चाहते थे। दो दुकान होने से उनके दोनों बेटे की अलग अलग दुकान हो जाएगी। पता चला तो वो भी एक दुकान के लिए जानकी को बोल गए।
मुन्नवर मियां भी आ धमके, 'मुझे कम से कम दो दुकान भर जगह चाहिये, मेरी टेंट की दुकान किराये पर है, उसे यहीं शिफ्ट कर लूंगा।'
फिर किशन अपने बेटे के लिए स्टेशनरी की दुकान खोलने के लिए जगह मांगने लगा।
जानकी तो बड़ी दुविधा में पड़ गयी, लग रहा था पूरा गांव आकर उसी छोटे से प्लाट में बस जायेगा। इतना छोटा सा जमीन का टुकड़ा, और इतने सारे लोग लेने आ गये। सबको यही कहकर हटाया, 'अभी बेचने के बारे में मन नहीं बनाया है, जब बेचूंगी तो बता दूंगी।'
जानकी की नींद अब हराम हो चुकी थी। सोचने लगी, सारी जमीन बिल्डर को ही बेचती है तो उसे पचास लाख मिलेंगे, वही यदि अलग अलग बेचती है तो कुछ अधिक पैसे मिल जायेंगे, किन्तु सबसे अलग अलग सौदा करना, जमीन की लिखा पढ़ी, ये सब भी कौन सा आसान काम है। इससे अच्छा, एक ही बार में बेचकर, सारा झंझट ख़त्म कर ले। थोड़ा सा और के चक्कर में कहीं लेने के देने न पड़ें।
जानकी, कई दिनों तक इसी उधेड़ बुन में लगी रही। तीन चार दिनों के बाद अचानक ही कैलाश आ गया। जैसे वह कैलाश के लिए पानी लेकर आयी, कैलाश उसे घर के भीतर ले गया, 'चल घर में पानी पी लेंगे।'
'भईया! लगता है कोई खास बात है। बड़ी हड़बड़ी में लग रहे हो।'
'हाँ, यही समझ।'
घर के अंदर जाकर, कैलाश पहले चारों ओर देख लिया, घर में कोई और तो नहीं है। फिर जानकी को समीप बुलाकर समझाया, 'जितनी जल्दी हो सके अपनी स्कूल वाली जमीन बेच दे।'
'किन्तु भईया आप तो रुकने के लिए कह रहे थे।'
'भईया! लगता है कोई खास बात है। बड़ी हड़बड़ी में लग रहे हो।'
'हाँ, यही समझ।'
घर के अंदर जाकर, कैलाश पहले चारों ओर देख लिया, घर में कोई और तो नहीं है। फिर जानकी को समीप बुलाकर समझाया, 'जितनी जल्दी हो सके अपनी स्कूल वाली जमीन बेच दे।'
'किन्तु भईया आप तो रुकने के लिए कह रहे थे।'
'हाँ, वो पहले कह रहा था। मुझे रविकांत के द्वारा पता चला है, कि सड़क की योजना बदल दी गयी है। अब स्कूल के सामने वाली सड़क को चौड़ी करके उसी को राजमार्ग से मिलाया जायेगा। सड़क के चौड़ीकरण में पता नहीं कितनी जमीन चली जाय, और मुवावजे के रूप में खेत के भाव से ही पैसे मिलेंगे। यदि यह जमीन सरकार ने अधिग्रहित किया तो पता नहीं दस लाख भी मिलेंगे या नहीं।'
'चलो अच्छा है भइया, समय से बता दिया। बिल्डर उसे लेने के लिए आया था। चलो उससे बात कर के उसे ही दे देते हैं।'
जानकी ने अपना वो दो बिस्वे का टुकड़ा बेच दिया। जब विधायक जी को इस बात का पता चला तो वे फूले न समाये। इससे पहले कि बिल्डर कोई योजना बनाये, विधायक जी ने उसे को दो लाख अधिक देकर उस जमीन को अपने नाम करा लिया। विधायक जी ने फटाफट उसे घिरवा कर, स्कूल की बसें खड़ी करने लगे। अभी साल ही बीता था कि सड़क चौड़ी करने की योजना आ गयी। जब विधायक जी को पता चला तो वे बहुत चिंतित होने लगे। उन्हें लगा कि लाखों रुपये पानी में गए। उन्होंने सड़क के चौड़ीकरण की योजना रुकवाने के लिए एड़ी चोटी का जोर लगा दिया। वे बहुत छटपटाये, मगर कोई लाभ नहीं मिला। इस बार उनकी पार्टी की सरकार नहीं बन पायी थी, उनकी सुनने वाला कोई नहीं था। उस जमीन का आधे से भी अधिक भाग सड़क में चला गया। स्कूल के सुरक्षा गार्ड वाला कमरा ढाह दिया गया। अब स्कूल की चारदीवारी से सड़क के बीच बस छः सात फुट की जगह ही बची थी।
यह सब, जब जानकी को पता चला तो बड़ी राहत की सांस ली। 'हे भगवान! तूने समय से भाई को भेजकर, मुझे बचा लिया, वरना मैं तो कहीं की नहीं होती।'
विधायक जी उस जमीन को पहले ना खरीदकर पछताए, अब खरीदकर पछता रहे थे। मुआवजा में बस साढ़े चार लाख ही मिला, उन्हें पैसे डूबने का बहुत मलाल था। थोड़े समय तक वे चिंतित अवश्य रहे, मगर, उनके स्कूल का पूरा अग्रिम भाग प्रमुख सड़क पर आ गया, इस बात से प्रसन्न थे।
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