हवाई जहाज का टिकट
शालिनी के फोन रखते ही मोना ने पूछा, 'मौसी क्या कह रही थी, मम्मी!'
'कह रही थी अपना गोवा का ट्रैन का टिकट रद्द करा दो, मैं हवाई जहाज का टिकट करा देती हूँ। ट्रैन में दो दिन धक्के खाओगी और जहाज से दो घंटे में पहुंच जाओगी।'
'यह तो बहुत अच्छी बात है मम्मी। हम लोग पहली बार हवाई जहाज में घूमेंगे।'
'नहीं! हमें नहीं घूमना, हवाई जहाज में। हम जितने में हैं, ठीक हैं। अभी कौन सी जिंदगी निकल गयी है। तुम और मंटू पहले पढ़ाई कर लो, फिर तुम लोग हवाई जहाज में घुमाना।'
'मगर मम्मी! मौसी तो टिकट करवा ही रही है, उनके पास इतना पैसा है, हमारे टिकट से उन्हें क्या अंतर पड़ने वाला। और हम थोड़े ही मांग रहे हैं, वो तो खुद ही कह रही है।'
'हां बेटी, उन्हें तो अंतर नहीं पड़ने वाला, मगर हमें तो पड़ेगा न! देख ये मोबाइल फोन, जबसे दी है कितनी बार सुना चुकी है। मेरे तो सुन सुन कर कान पाक चुके हैं। जब भी मिलती है, ये भी नहीं देखती सामने कौन बैठा है, कौन नहीं; किसी न किसी बहाने जताने लग जाती है कि यह फोन उसने गिफ्ट किया है। उसके हवाई जहाज में जितना ऊँचा उड़ूँगी नहीं, उससे अधिक नीचे तो वो एहसान में गाड़ के रख देगी।'
कल कौन देगा चॉकलेट
मिहिर चाय पानी पीकर चलने को हुआ तो सौ का नोट निकल कर बिट्टू को थमा दिया। जैसे ही उसकी माँ ने देखा, आवाज लगायी, 'नहीं'।
बिट्टू को डाँटते हुए बोली, 'लौटा दे।'
मिहिर उसका मुंह ही ताक रहा था कि जशोदा वो नोट बिट्टू के हाथ से छीन कर, मिहिर को लौटाने लगी।
'अरे क्या हुआ, भाभी! बच्चा है इतने दिनों बाद दिल्ली से आया हूँ और मिठाई वगैरह भी नहीं लाया।'
'कोई बात नहीं, इसके लिए मिठाई मैं बना दूंगी।'
'ठीक है तो आप ही रख लो, इसके लिए चॉक्लेट खरीद देना।'
'नहीं, चॉक्लेट खिलाकर इसकी आदत नहीं ख़राब करनी। आज तो आप खिला रहे हो, कल को कौन खिलायेगा? हमारे पास जितनी चादर है, उतने में ही पैर रखना है हमें।'
सौ रुपये का नोट चारपाई पर रखकर; जशोदा बिट्टू का हाथ पकड़, अपने पास खड़ा कर ली।
दिन की सब्जी
सोनम के आते ही कौतुकी ने कहा, 'जा मम्मी जी से पूछ ले कितनी रोटी खाएंगी, सेक देना।'
'सब्जी नहीं बनेगी भाभी?'
'नहीं दिन की पड़ी है न! गरम करके खा लेंगी।'
'और आप दोनों की रोटी?'
'हम कहीं बाहर जा रहे हैं। आज बाहर ही खाएंगे।'
'आंटी नहीं जाएँगी ?'
'तू बहुत सवाल जबाब करती है। लगता है आंटी की तुझे ही चिंता है, हमें नहीं। तू चाहती है तुझे दो रोटी भी न सेकनी पड़े।'
'नहीं भाभी मैं तो यूँ ही कह रही थी। मुझे क्या है, दो रोटी सिकवा लो चाहे दस। आप लोग चले जाओगे और ये घर में अकेली रहेंगी ... ।'
कौतुकी और अमन के जाते ही सोनम ने जले पर नमक छिड़क दिया। उसकी सास को सुनाने लगी, 'बताओ आज कल की बहुएं अपने तो जाकर रेस्तराँ में व्यंजन उड़ाएंगी और सास को बासी ... ।'
वैसे शारदा देवी को ठेस तो लगी थी, लेकिन बात घर की थी। वे समझ रहीं थीं कि ये आग लगा रही है। शारदा देवी ने उसे चुप करा दिया, बोलीं, 'तू जा, आज मेरा खाने का मन नहीं है। रेस्तरां में खाना होता तो मैं जाती नहीं क्या !'
सोनम के जाने के बाद वे दो रोटी सेंक कर अंचार से खा लीं, सब्जी को छुईं भी नहीं।
ब्रांडेड
शशि कभी अपना पर्स आगे कर देती तो कभी अपनी ड्रेस को निहारने लगती कि सुमित्रा उससे पूछे। लेकिन सुमित्रा इस पर तनिक भी ध्यान नहीं दी। थक हार कर शशि ने ही सुमित्रा से पूछ लिया, 'तूने अपना पर्स कहाँ से लिया?'
सुमित्रा को तो पता ही था कि शशि किसी भी तरह अपनी चीज को ऊपर करके बताएगी। शशि से यह सुन सुन कर, उसके कान पहले ही पक चुके थे कि 'मुझे लोकल चीजें पसंद नहीं आती मैं तो हमेशा ब्रांडेड ही खरीदती हूँ।' सुमित्रा के पास इतने पैसे होते नहीं कि वह ब्रांडेड चीज खरीदे, बस सुन लेती। इस बार, वह मन ही मन सोचने लगी कि हर बार यह मुझे नीचा दिखाती है, इस बार मैं भी इसे थोड़ा सबक सिखाऊं। उसने पर्स तो लक्ष्मी नगर बाजार से ही खरीदा था मगर शशि से बोल दिया, 'मैंने नहीं ख़रीदा है, जीजा जी दुबई घूमने गये थे उन्होंने गिफ्ट दिया है।'
बस फिर क्या था शशि उससे पर्स लेकर उलाट पलाट कर देखने लगी, 'किस ब्रांड का है?'
'मुझे ये सब नहीं पता।'
'मेरा तो 'लेवी' का है बहुत मंहगा है। ढाई हजार का खरीदी हूँ। लेकिन तेरा अच्छा लग रहा है। इम्पोर्टेड है न।'
'हां वो तो है। जीजा जी कह रहे थे शायद गुक्की का है।'
तब तक शशि को गुक्की का लेबल भी दिख गया। 'सुमित्रा! अब तो ये पर्स मेरा है। तू मेरे से बदल ले या फिर मैं तेरे लिए दूसरा खरीद दूंगी।'
सुमित्रा तो बड़ी खुश हुई कि यह बड़ा अच्छा सौदा है, सात सौ के पर्स के बदले उसे ढाई हजार का मिल रहा है। लेकिन उसकी जमीर गवाही नहीं दे रही थी। सात सौ का हो चाहे ढाई हजार का, काम तो वही कर रहा है। मुझे न तो दाम के पीछे भागना है, न ही नाम के। उसने बहाना कर दिया, अरे जीजा जी क्या कहेंगे।
ऋण
अनमोल ने डब्बा आगे बढ़ाया, 'ये लीजिये सर! लड्डू खाइये।'
'वाह! बधाई हो, क्या खुशखबरी लाये हो? अनमोल!'
'सर, बैंक ने मुझे ऋण देने की स्वीकृति दे दी है।'
खन्ना साहब ने एक कागज का टुकड़ा लिया और डिब्बे में से एक लड्डू उठाकर मेज पर रख लिया- 'बहुत अच्छा, बैठो मैं भी तुम्हें मिठाई खिलता हूँ।'
अनमोल सामने कुर्सी पर बैठ गया। खन्ना साहब ने दराज से मिठाई का डिब्बा निकाला और अनमोल की ओर बढ़ाते हुए बोला, 'मैं इसे लेकर घूमा नहीं, सोचा जो जो यहाँ आते रहेगा, उसे मिठाई खिलाता रहूँगा। जब अपनी सीट पर जाना तो आरती को भी भेज देना।'
'ठीक है, सर! आप किस बात की मिठाई खिला रहे हैं?'
'बस यूँ समझो, मैं भी बैंक के ऋण का ही खिला रहा हूँ। तुम अपने सिर पर कर्ज का भार चढ़ा कर खिला रहे हो और मैं भार को उतार कर। मैंने भी अपनी कार खरीदने के लिए चार लाख का ऋण लिया था, कल अंतिम किस्त का भुगतान कर दिया। अब मैं बहुत हल्का महसूस कर रहा हूँ। बैंक के किस्त के चक्कर हर महीने कितनी ही बातों के लिए मन मार के रखना पड़ता था।'
प्यार की सवारी
रिंकी को दादा की उंगली पकड़े स्कूल आते सभी बच्चे देखते थे। इस बार एक बच्चे ने पूछ ही लिया ।
'तुम कार से क्यों नहीं आते? क्या तुम्हारे पास कार नहीं है?'
यह प्रश्न तो रिंकी के मन में भी पहले कई बार आया था, और उसने दादा से उसका उत्तर पूछ लिया था। एक बार स्कूल जाते हुये उसने दादा से पूछा, 'दादा! आखिर कार तो हमारे पास भी है, फिर आप मुझे पैदल क्यों लेकर जाते हैं? सभी बच्चे स्कूल, या तो बस में आते हैं या अपने पापा की कार में।'दादा से मिला, वही उत्तर रिंकी ने दोहरा दिया, 'मैं तो प्यार की सवारी करके आता हूँ। देखो, न तो कोई धुआं न पर्यावरण को हानि। मेरा घर कोई अधिक दूर भी नहीं है, इतना भी पैदल नहीं चले तो पांव बेकार हो जायेंगे। और जहाँ कार ले जाना संभव नहीं और पैदल चलना ही पड़ गया तो तुम लोग थक जाओगे, परन्तु मैं चल लूंगा। पता है दादा की उंगली में कितनी ताकत होती है, मुझे चलने लायक उनकी उँगलियों ने ही बनाया है।'
यह उत्तर सुनकर सभी बच्चे अवाक् थे। रिंकी ने अपने उत्तर से सबको चित्त कर दिया था।
बिट्टू बोल पड़ा - 'मैंने तो अपने दादा जी को देखा ही नहीं।'
स्वीटी बोली, 'मेरे दादा तो गांव में रहते हैं। हम लोग कभी कभी ही जा पाते हैं।'
सन्नी बोला, 'मेरे दादा जी को कार चलाने नहीं आता। पापा छोड़ने आते हैं तो इतनी जल्दी में होते हैं, लगता है कार से ही धक्का दे देंगे।'
मोनू कहाँ चुप रहता, 'मेरा घर तो ज्यादा दूर नहीं है, लेकिन डैडी कहते हैं, बेटे को इतने महंगे स्कूल में डाला है, पैदल जायेगा तो लोग कहेंगे पैसा बचा रहा है।'
'पैसा से ज्यादा जरूरी तो हमारी सांसे हैं। देखो मैं उंगली पकड़ के आता हूँ तो तुम लोगों से तेज दौड़ लेता हूँ।'
वहां क्या ये सब नहीं मिलता
सुभाष की बहन सुभांगी जब उससे मिलने, आगरा से दिल्ली आती तो चाहती कि यहाँ क्या क्या खरीद लूँ। उसे आगरा में नहीं खरीदना पड़ेगा। और सच्ची बात तो यह थी यहाँ कम पैसों में ज्यादा शॉपिंग हो जाती। यह बात नहीं थी कि दिल्ली में चीजें बहुत सस्ती हों अपितु सुभांगी, सुभाष को लेकर शॉपिंग पर जाती तो एकाध सामान के पैसे वो दे देती, कई सामान के पैसे सुभाष देता तो वह चुप्पी लगा जाती।
सुभाष की आमदनी अपने जीजा से बहुत अधिक थी। इस बात को वह समझता था, और सुभांगी की सामान लेने में मदद करना चाहता था। परन्तु इस प्रकार सुभाष का सुभांगी के लिए पैसे खर्च करना, सुभाष की पत्नी, मनोरमा के आंख लगता था। एक बार तो वह बोल ही दी, 'क्या यह सब सामान, इन्हें आगरा में नहीं मिलता !'
सुभाष ने उसे समझाया, 'हम लोग जब तुम्हारी माँ के यहाँ अलवर जाते हैं तो वो चाहती हैं, बेटी दामाद को क्या क्या दे दूँ। जब कि हम लोग कहते रहते हैं, दिल्ली में सब कुछ मिलता है। शायद हमें छोटा समझ कर ऐसा करती होंगी। ये भी तो हमारी छोटी बहन है। और यहाँ आकर ये सब खरीददारी के लिए उसके पास खाली समय होता है। कौन सा रोज आती है।'
माँ की प्रशंसा ने मनोरमा का मन बदल दिया।
किसके मजे
'क्या हुआ शशि! बड़े दिनों बाद फोन की। मैं कितने दिनों से तेरे फोन का इंतजार कर रही थी।' कनक बोली।
'पिछले दोनों ही सप्ताह शनिवार और रविवार को कहीं न कहीं घूमने निकल गए। इस बार भी तीन दिन की छुट्टी थी, शंभू बेल्जियम जाने का कार्यक्रम बना रहा था, मैंने मना कर दिया।'
'तुम्हारे मजे हैं यार! हर सप्ताह दो दिन मिल जाते हैं घूमते रहो। यहाँ तो साल में कहीं ऐसा अवसर मिल पाता है।'
अरे क्या मजे हैं। यहाँ लन्दन में दो दिन जरूर मिल जाते हैं बाकी जिंदगी तो एकदम मशीन है। सुबह उठते ही मशीन की तरह लग जाओ। नाश्ता तैयार करो, चिंटू को तैयार करो, फिर खुद तैयार होवो। अपना, रोहन का और चिंटू का टिफ़िन पैक करो। फिर ऑफिस जाते समय चिंटू को शिशु सदन छोडो, शाम को आते हुए ले के आओ। फिर डिनर तैयार करो। और रात से ही अगले दिन की तैयारी शुरू, रोज रोज पिज्जा तो खाया नहीं जाता। वीक एन्ड पर दो दिन मिलते हैं, उसमें भी एक दिन घर और कपड़ों की सफाई में निकल जाता है। फिर घर के घटे बढ़े सामान लाकर रखो। कई बार तो सोचकर परेशान हो जाती हूँ, आखिर हम मशीन हैं या इंसान।'
'क्यों? रोहन मदद नहीं करता ?' मृदुला ने पूछा।
'रोहन हाथ तो बंटाता है, मैं अकेले कहाँ से कर पाती। मगर सभी काम तो जंजीर की कड़ियों की भांति, एक दूसरे से लगे होते हैं; कोई भी काम स्वतंत्र तरीके से नहीं कर पाते। और हर बात का ध्यान तो मुझे ही रखना पड़ता है। मर्दों का तो तुझे पता ही है।'
'काम तो हमारे पास भी कौन सा कम होता है।'
'वो मुझे पता है, तुम लोग काम की चिंता ज्यादा करती हो, हमारे जैसे अपने हाथ काम थोड़े ही करती हो। तुम्हारे यहां तो हर काम के लिए अलग अलग बाई मिल जाती हैं। तुम्हारी झाड़ू-पोंछा, बर्तन के लिए अलग आती है तो कपड़े धोने वाली अलग। अगर हम काम वाली लगवा लें तो एक का वेतन वही ले जाएगी।"
ये भी तो देखो, हमने क्या प्रणाली बनायीं है; आधे लोग मजे करते हैं, और आधे उनकी सेवा। यहाँ सभी अपना काम करते हैं, कोई किसी का नौकर नहीं। यहाँ सभी अपने काम का उचित पारिश्रमिक पाते हैं, और वहां कामवाली बाई को अपनी मेहनत का पूरा मिलता है क्या?
दूर के ढोल
बेड ख़रीदा
नवीन ने आईकिया से बेड ख़रीदा। बेड के पाये, पाटी, और कई पुर्जे तथा नट, बोल्ट, पेंच आदि पैकेटों में बंद
शोरूम के बाहर लाकर रख दिया गया।
अब घर लाकर पुर्जों को लगाकर बेड तैयार करना था। लगाने पर पता लगा कि एक पाटी लग ही नहीं पा रही। साथ मिली ड्राइंग को नवीन कई बार ध्यान से पढ़कर लगाने का प्रयत्न किया, पर असफल रहा।
अब वह शिकायत लेकर आईकिया पहुंचा तो बताया गया सामान तो पूरा और सही दिया गया था। फिर भी
यदि वह बेड लेकर आए तो उसकी समस्या का निदान ढूंढा जाय या फिर उसे बदल दिया जाय। इस पर नवीन थोड़ा खीझ गया, ' अब तो हमने पूरी पैकिंग खोल दी है, लाना बड़ा मुश्किल है। और लाने, ले जाने में कितना समय और किराया खर्च होगा।'
'ठीक है सर, आप किराया मत दीजिये, हम अपनी गाड़ी से माँगा लेंगे। फिर भी थोड़ा रुकिए देखते हैं क्या गड़बड़ है।'
आईकिया के कर्मचारी ने बिल का विवरण देखा तो पता चला उसी समय एक और बेड बिका था। बिल पर अंकित फ़ोन नंबर मिलाया तो पता चला कि वह ग्राहक भी परेशान था और उसका बेड भी फिट नहीं हो रहा था। वह आईकिया को संपर्क करने ही वाला था। कर्मचारी, समझ गया कि बेड के एक पुर्जे के पैकेट की अदला बदली हो गयी है। नवीन को सही पुर्जा, दो दिन के भीतर उसके घर पहुँचाने का आश्वासन देकर वापस भेजा गया।
व्यापारी साहित्यकार
विमलेश्वर प्रसाद भी अपने गांव के नाम फिरदौस के आगे वी लगाकर विमलेश्वर प्रसाद फिरदौसवी हो गए थे। उनकी कई किताबे छप चुकी थीं। उनके परिचितों में से एक प्रमोद सहाय भी कुछ कवितायेँ लिख लेता था। प्रमोद के पास भी काफी सारी कवितायेँ हो चुकी थीं तो सोचा एक पुस्तक ही छपवा ली जाय। प्रमोद यह सोचकर कि अपनी पुस्तक के बारे में फिरदौसवीं जी से कुछ शब्द लिखवा ले तो कुछ मान बढ़ जायेगा, उनके पास गया।
'सर, ये देखिये मेरी यह काव्य पुस्तक। आप के दो शब्द जुड़ जायेंगे तो इस पुस्तक का मान बढ़ जायेगा।'
फिरदौसवी जी ने पुस्तक का एक पन्ना पलटा और मेज पर रख दिया और बोले, 'देखो भाई यह सब काम सबके लिए नहीं होते। इसके लिए बड़ा मँजना पड़ता है। देखो मैंने कितने साल इसमें खपाये हैं। कई बार रातों को सोया नहीं हूँ।'
'सर यह सब तो मैंने भी किया है। साल भर में जाकर यह पुस्तक लिख पाया हूँ। ये है कि आप प्रकाश में आ चुके हैं और मुझे अभी आप जैसे लोगों के सहारे की आवश्यकता है। मैं जो परिश्रम कर रहा हूँ, मुझे भरोसा है एक दिन मेरी भी पुस्तकें साहित्य की दुनियां में होंगी। मैंने भी यूँ ही नहीं लिख दिया है, किताब प्रकाशित होने का अर्थ तो मुझे भी पता है। मैं तो आपके पास इसीलिए आया हूँ की कोई कमी बेसी हो आपके अनुभव का लाभ मुझे भी मिलेगा।'
'कोई बात नहीं, इन कामों के लिए धन खर्च करना पड़ता है। मेरे शागिर्द आते हैं, पैसे खर्च करते हैं और गजल मुकतक लिखना सिखते हैं। कइयों ने किताबें लिखीं और मुझसे ठीक करायीं।'
प्रमोद समझ रहा था कि वे क्या कहना चाहते हैं। फिर भी पूछ लिया, 'तो क्या लेते हैं?'
'एक गजल या कविता के सौ रूपये।'
प्रमोद ने देखा कि उन्हें काम की दर बताने में भी कोई झिझक नहीं हुई तो वह समझ गया कि ये साहित्य के सेवक नहीं हैं अपितु साहित्य के व्यवसायी हैं। प्रमोद साहित्य के क्षेत्र में बेशक नया था परन्तु उसे अपनी लेखनी पर विश्वास था। फिरदौसवी जी की बातों से वह निराश तो था पर कहने से नहीं चूका -
'सर! मुझे नहीं पता था आप साहित्य की दुकान चलाते हैं, नहीं तो मैं पैसे लेकर आता। और वैसे भी अगर मुझे किसी दूसरे साहित्यकार को पैसे देकर ही किताब छपवानी थी तो इतनी मेहनत करने की भी क्या आवश्यकता थी आप से ही खरीद लेता और अपने नाम से छपवा लेता।'
अनेक या अनेकों
बहुत बहुतों
कई कइयों
क्या पाया क्या खोया
रवि प्रकाश को अमेरिका रहते वर्षों बीत गए थे। वह अपने माँ बाप को भी वहीँ ले जाना चाहता था पर वे अपना देश छोड़कर जाने को तैयार नहीं थे। इस बार वह कई साल बाद आया था। अभी तो अप्रैल का ही महीना था कि गर्मी से हाय तोबा करने लगा। वह बार बार मम्मी पापा को कोस रहा था।
'आप लोग वहां चले होते तो सही था। अब यहाँ की जलवायु झेलना मेरे वश की तो नहीं है।'
'बेटा तू वहां की परिस्थितियों और जलवायु का गुलाम हो चुका है। भारत माँ यहां अपने सवा सौ करोड़ लाल पालती है और वे सब सुख पूर्वक रह रहे हैं। उन्हें यहाँ की परिस्थितियां और जलवायु से कोई परेशानी नहीं। अब बताओ तुम्हारी शक्ति कितनी क्षीण हो चुकी है। अब अगर भारत में रहना पड़े तो उस लायक भी नहीं रहे।
बनवारी आज घर से देर से निकला था। अपने अड्डे पर जा ही रहा था कि उसे भंडारे की भनक लग गयी। वह जाकर कतार में खड़ा हो गया। उसका नंबर अभी बहुत पीछे था। वह पंक्ति छोड़ कर आगे मेज की ओर बढ़ गया, 'सेठ जी! मैंने सुबह से कुछ नहीं खाया, भूख लगी है। अल्ला की मेहरबानी से, इस बार मुझे मिल जायेगा?'
पंक्ति में खड़े लोग चिल्लाने लगे, 'अरे ये तो उस चौराहे वाला भिखारी है, लाइन में आ जा, बाबा!'
भंडारा परोसने वाला उनकी बात सुनकर, बनवारी को लौटा दिया, 'बाबा लाइन में आ जाओ। ये सब लाइन में खड़े हैं, बेवकूफ थोड़े ही हैं। जब नंबर आएगा, तुम्हें भी मिल जायेगा।'
'या अल्ला! लगता है, आज भूखे ही रहना पड़ेगा या किसी गुरूद्वारे में जाना पड़ेगा।' कहते हुआ वहाँ से चल दिया। बनवारी ने भांप लिया था, सब्जी भी थोड़ी ही है। पता नहीं जो पहले से खड़े हैं उन्हें भी पूरी पड़ेगी या नहीं, ऐसा हुआ तो उसका वहाँ खड़ा होना भी व्यर्थ ही होगा। आज घर से देर से निकलने के कारण, अभी तक कोई कमाई भी नहीं हो पायी थी।
उसके जाने के बस पांच मिनट में ही पूड़ी की नई घान आ गयी। कुछ लोगों को देने के बाद भंडारा परोसने वाले ने चार पूड़ी अलग कर दी और बच्चों से पूछने लगा, अरे, वो भिखारी कहाँ गया?
बच्चे चिल्लाने लगे, 'वो तो चला गया।'
एक बच्चे की ओर इशारा करते हुए, 'जाओ देखो यहीं कहीं होगा, बुला लाओ। तुम्हें, मैं लाइन से अलग दे दूंगा।'
वह बच्चा आस पास देखा मगर बनवारी नहीं मिला, तब तक पता नहीं कहाँ अंतर्ध्यान हो गया था। तभी भंडारा करवा रहे, सेठ जी आ गए। परोसने वाले ने उन्हें बता दिया, 'एक भिखारी आया था, पूड़ी तैयार नहीं थी, पता नहीं कहाँ चला गया? एक बच्चे को भेजा था पर वो दिखा नहीं।'
सेठ जी के दिल में करुणा जागी, बोले, 'तुम खुद जाकर देख लो, कहीं आस पास ही होगा। बुला कर खिला दो। '
'बच्चों में से आवाज आई, 'वो आगे वाले चौराहे पर बैठता है। वहीँ गया होगा।'
सेठ जी ने उस कार्यकर्ता को थोड़ी सब्जी और कुछ पूड़ियाँ एक पन्नी में डाल कर वहीं ले जाने को कहा। वह कार्यकर्ता अविलम्ब अपना स्कूटर उठाया और उधर गया, मगर थोड़ी ही देर में, वह सब लेकर वापस आ गया, 'सेठ जी वो तो वहां भी नहीं मिला।'
अब सेठ जी भंडारे का विश्लेषण करने लगे, 'वैसे काफी लोग निबट गये। तुम लोगों ने बड़ा सहयोग दिया। देखो! दो बोरा आटा खप गया! चलो, अब हो गया, सब समेटो।'
सेठ जी की बात सुनकर, एक सहयोगी बोल पड़ा, 'हां, लाला जी! खाने की भी सभी लोग बहुत तारीफ कर रहे थे। एक हजार से भी ऊपर, लोग खा चुके होंगे। बस वही, एक भिखारी भूखा चला गया। वह बेचारा तो कह भी रहा था कि बहुत भूखा है।'
खा पीकर आया हूँ
सेठ जी की पत्नी बहुत करुण विचार वाली स्त्री थीं। उन्हें रात में ही पता चल गया था कि एक भिखारी भंडारे से भूखा चला गया था, इस बात का उन्होंने रात भर पश्चाताप किया और सुबह उठते ही सेठ जी से बोलीं 'बताओ आपने सैकड़ों लोगों को तो खिला दिया और एक भूखे को नहीं खिला पाए। मैं भोजन बनाकर पैक कर देती हूँ, ले जाकर यह उसे खिला देना।'
'क्या करता? मुझे जब पता चला कि वह अगले चौराहे पर बैठता है तो एक लड़के को पूड़ी सब्जी लेकर भेजा था, मगर वह वहां मिला ही नहीं।'
सेठ जी को भिखारी का ठिकाना तो पता लग ही चुका था, वे डिब्बे में बंद भोजन ले गए। भाग्य वश बनवारी उसी चौराहे पर बैठा मिल गया। उसकी ओर खाने का डब्बा बढ़ाते हुए सेठ जी ने कहा, 'ये लो बाबा! भोजन कर लो।'
बनवारी इस प्रकार से अचानक उसके पास भोजन आने पर चौंक गया, 'लेकिन, मैं तो आज खा पीकर आया हूँ। मुझे तनिक भी भूख नहीं है।'
'ठीक है, रख लो, किसी और को दे देना।'
'वाह साहब! जो चीज मेरी नहीं है, मैं क्यों रख लूँ? और मैं किसको दूंगा? चले जाओ पास में ही मंदिर है, कोई न कोई भिखारी मिल जायेगा, खिला देना। बाकी आपकी किस्मत। आपने मेरे बारे में सोचा, मैं आपके लिए दुआ करता हू, अल्ला आपकी खैर करे।'
जेब में क्या छुपा रखा
छठी कक्षा की परीक्षा चल रही थी। सभी बच्चे सिर झुकाये परीक्षा में तल्लीन थे। जौहर था कि दाहिने हाथ से लिख रहा था और बायां हाथ, बार बार निकर के जेब में डाल लेता। जब निरीक्षक की नजर उस पर पड़ी तो वह समझा, जौहर ने जेब में कुछ छुपा रखा है।एक बार निरीक्षक ने डपट कर बोल दिया, 'क्या बार बार जेब में हाथ डाल रहे हो।'
इसके बाद कुछ देर तक वह नहीं डाला, मगर थोड़ी देर बाद फिर वही हरकत। निरीक्षक को अब विश्वास हो गया इसने जरूर कोई चिट या फर्रा जेब में रखा होगा। निरीक्षक उसके समीप जाकर पूछा, 'जेब में क्या है?'
'कुछ नहीं सर। '
'कुछ तो है। तुमने जेब में फर्रा छुपा रखा है? खड़े हो जाओ।'
जौहर खड़ा हो गया और निरीक्षक उसकी जेब में हाथ डाल कर देखने लगा कि क्या है। जब पता चला कि उसकी जेब फटी हुई है तो 'बैठो' कहकर अपने स्थान पर चला गया।
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