आशिक अली की होली, भूमिका
प्राक्कथन
वैसे तो मेरी पहली पसंद, काव्य रचना ही है, किन्तु अनेक बातें ऐसी भी होती हैं, जिन्हें कविता में ढाल कर कह पाना सरल नहीं होता। अपनी बात को समग्र और सशक्त रूप से कहने के लिए गद्य का सहारा लेना पड़ता है। गद्य लेखन की विधाओं में सामाजिक खूबियां, विसंगतियां, कुरीतियां, परम्पराएं, घटनाएं, चरित्र इत्यादि को दर्शाने और समझाने के लिए कहानी से सुन्दर, साहित्य की और कोई विधा नहीं हो सकती। कहानी में जीवन के किसी एक अंग, भाव अथवा खंड को दर्शाती है। वही जीवन का सम्पूर्ण अथवा वृहत चित्रण, एक ही कहानी में होने से उपन्यास हो जाता है। गद्य के रूप में कहानी विधा का प्रादुर्भाव और विकास उन्नीसवीं सदी में माना जाता है, यानि की यह गद्य विधा काव्य साहित्य से सैकड़ों वर्ष पश्चात् आयी। वैसे प्राचीन काल में काव्य के माध्यम से ही अनेक कवि कहानियां कह कर अमर हो गए। कई प्राचीन कवियों ने अपनी भावपूर्ण काव्य रचना के लिए किसी गाथा या कथा का सहारा लिया। अलिखित कहानियों का सिलसिला और भी पुराना रहा है। अपनी यात्रा का वृतांत, साहस और बहादुरी की कहानियां, अपनी उपलब्धियां, घटनाएं, प्रेम प्रसंग, चरित्र का चित्रण इत्यादि मौखिक रूप कहने की प्रक्रिया अनंत काल से चली आ रही हैं। मुझे तो लगता है जबसे भाषा का विकास हुआ होगा, तभी से कहानियों का सिलसिला भी होगा। कोई व्यक्ति किसी प्रकार का दृश्य या घटना देखता होगा तो अन्य लोगों से शब्दों में ही बताता रहा होगा। कहानी ने बस अपना साहित्यिक रूप बाद में लिया होगा।
कहानी साहित्य की एक ऐसी विधा है, जिसके माध्यम से रचनाकार, अपने मन के पूरी बात की विस्तृत रूप से सजीव प्रस्तुति कर सकता है, जो कि कविता में संभव नहीं है। कहानी के अनेकों रूप हो सकते हैं। कहानी के द्वारा समाज, प्रकृति, जीवन और राजनीति से जुड़े वास्तविकताओं का सम्पूर्ण चित्रण हो सकता है। कहानी समाज को उसका बिम्ब दिखाने, उपदेश और सन्देश देने के अतिरिक्त मनोरंजन का भी एक अमूल्य साधन है। पुराने लोगों ने अपने दादी, नानी से राजारानी की कहानियां अवश्य सुनी होंगी। वो कहानियां जहाँ मनोरंजन करती थीं, वहीँ ज्ञान वर्धन भी। इसी प्रकार पंचतंत्र की कहानियों जो मुख्यतः जानवरों पर आधारित हैं, बच्चे तो क्या बड़ों के भी मनोरंजन के साथ ज्ञान बढ़ाती हैं। मैं उन सौभाग्यशाली लोगों में से हूँ, जिन्होंने अपनी दादी और नानी से कहानियां सुन रखी हैं। मेरी दादी जब राजा-रानी की कहानियां, राजकुमार की कहानियां, बहादुरों की कहानियां बीच बीच में गीत गाकर सुनाती थीं तो मैं बहुत रोमांचित होता था और उसी में खो जाता था। बीच बीच में वे मेरे कौतुहल भरे प्रश्नों का समाधान भी करतीं रहती थीं।
आजकल कहानियां सुनने सुनाने का प्रचलन प्रायः समाप्त हो चुका है। अब तो सभी कहानियां फिल्मों और धारावाहिकों के द्वारा प्रस्तुत की जा रही हैं। फिर भी कहानी की पुस्तकों का महत्त्व कम नहीं हुआ है। अपनी सुविधा और समय के अनुसार पढ़ने की जो स्वतंत्रता पुस्तक में है, फिल्मों में कहाँ है। धारावाहिकों की कहानियां इतनी लम्बी होती हैं कि उनकी कड़ियों को जोड़ना भी एक कठिन कार्य हो जाता है। फिर दृश्यों के अवलोकन में शब्दावली के रस का आनंद भी तो नहीं आ पाता।
अपने परिवेश में विभिन्न पहलू जो मैंने देखा सुना, उन्हें शब्दों में ढालने के लिए यहाँ मैंने भी कहानियों का माध्यम चुना। मेरी इस पुस्तक 'आशिक अली की होली' में कुछ विनोदपूर्ण और भावनात्मक प्रसंगों को दर्शाया गया है। इस पुस्तक के अतिरिक्त मेरी कई अन्य कहानियों की पुस्तकें भी हैं। जिनमे, लघु कथा 'इनकी उनकी' और विदेश में जाकर बसे भारतियों पर आधारित 'बसे विदेश' भी हैं। मुझे पूर्ण विस्वास है पाठक इन कहानियों का भरपूर आनंद लेंगे और अपने स्नेह से और आगे लिखने के लिए प्रेरित करेंगे।
एस. डी. तिवारी, एडवोकेट
बसे विदेश
मेरी बात
विदेश भ्रमण की चाहत लगभग हम सभी भारतीयों की होती है, किन्तु आय सिमित रहने के कारण, अधिकतर लोगों का सपना धरा ही रह जाता है। यूरोप, अमेरिका में वे ही लोग घूम पाते हैं, जिनका कोई सागा सम्बन्धी वहां रहता हो या अपने व्यापारिक कार्यों से यात्रा पर गए हों। कई देशों में अधिक आय होने के कारण, मध्यम आय वर्ग के परिवारों के युवाओं को रोजगार के लिए आकर्षित करते हैं। वहां आय अधिक होने और जीवन स्तर बेहतर होने के कारण प्रत्येक वर्ष अनेकों लोग जाते हैं और बहुत से लोग वहीँ बस जाते हैं। कई अन्य घटक भी हैं जिनके कारण अनेकों भारतीय विदेश गए और वहीँ के होकर रह गए। अमेरिकी और यूरोपीय देशों की कंपनियां, 'टैलेंट हंटिंग' (प्रतिभा दोहन) करके भी अनेक भारतीय प्रतिभाओं को ले जाती हैं। हमारे देश बिडम्बना ही है कि अनेकों महान प्रतिभाओं ने विदेश जाकर पूरी दुनियाँ में नाम किया है। हो सकता था, उन्हें अपने देश में अपनी प्रतिभा दिखाने का अवसर नहीं मिल पाता। हमारे यहां, एक ओर धन के अभाव में प्रतिभाएं उभर नहीं पातीं तो दूसरी ओर, यहाँ की राजनीति और भाई भतीजावाद भी अनेकों बार प्रतिभाओं के हनन के लिए उत्तरदायी होती हैं।
विदेशों में जाकर पैसा कमाने की ललक, मध्यम वर्ग के अधिकतर भारतीयों की होती है। जिन्हें विदेश जाने का अवसर मिल जाता है वे स्वयं को भाग्यशाली समझते हैं। बहुत से लोग तो विदेश से पैसा कमाकर, वापस आ के शान औ शौकत से भारत में रहना चाहते हैं, पर अनेक लोग कई विभिन्न कारणों वश वहीँ बस जाते हैं। कुछ लोगों को वहां की जलवायु और व्यवस्था भाने लगती है, जिसके कारण वापस नहीं आते तो कई लोग अपने बाल बच्चों के कारण वहीँ रह जाते हैं और नहीं आ पाते।
एस. डी. तिवारी
विदेश की चटनी
मेरी बात
बहुत से भारतीय रोजगार की खोज, उत्तम जीवन स्तर और अधिक आय अर्जित करने के उद्देश्य से, प्रत्येक वर्ष विदेश चले जाते हैं और वहीँ के होकर रह जाते हैं। आज करोड़ों भारतीय, भारत से बाहर विभिन्न देशों अलग अलग क्षेत्रों में कार्यरत हैं और अनेक क्षेत्रों में शीर्ष पर हैं। संसार में ऐसा कोई भी देश नहीं, जहाँ भारतीय नहीं रहते हों। पैसा कमाने की ललक में, मध्यम वर्ग के अधिकतर भारतीय किसी न किसी रूप में विदेश जाने का अवसर ढूंढते हैं। अनेकों लोग शिक्षा ग्रहण के लिए विदेश जाते हैं, और वहीँ रोजगार पाने के उपाय ढूंढ लेते हैं। जिन्हें विदेश जाने का अवसर मिल जाता है वे स्वयं को भाग्यशाली समझते हैं। कई बार हमारे देश में धन के अभाव में या फिर राजनितिक कारणों से प्रतिभाएं उभर नहीं पातीं, वहीँ विदेशों में जाकर, अनेकों लोगों ने नाम कमाया है। रोजगार के अतिरिक्त, और भी कई ऐसे कारण और परिस्थितियां हैं, जिनके चलते हमारे भारतीय विदेशों में जाकर बस गए हैं। विदेश जाने वालों में से कुछ लोगों को वहां की जलवायु और व्यवस्था भाने लगती है, जिसके कारण वापस नहीं आते तो कई लोग अपने बाल बच्चों के वहीँ बसे होने के कारण नहीं आ पाते।
विदेशों में जाकर, उच्च जीवन स्तर के साथ रहना और वहां घूमना, वहां की साफ सफाई और व्यवस्था देखना तो अच्छा लगता है। पर कई बार वहां की विषम परिस्थितियों से भी सामना करना पड़ता है। विदेशों में जहाँ जीवन स्तर अच्छा है, वहीँ रहने की लागत भी बहुत ऊँची होती है। कई बार वहां के नियमों से अनभिज्ञ रहने या किसी कारण वश पालन न कर पाने से भारतीयों को त्रासदी झेलनी पड़ जाती, है तो कई बार विषम जलवायु की मार भी झेलनी होती है। विदेशों में अच्छी कमाई और वहां की व्यवस्था कई बार जहाँ सुख देती हैं, वहीँ अपने देश जैसी स्वतंत्रता का अभाव, अपनेपन की अनुभूति का अभाव, मान सम्मान का अभाव अखरते भी हैं; और अपनी मातृभूमि की याद, मन को कचोटती रहती है। अपने देश की परम्पराएं, त्यौहार, व्यंजन, अपने मित्र व सम्बन्धियों से वंचित रहना पड़ता है। कई बार भावनात्मक परिस्थितियां मन को उद्वेलित करती हैं।
विदेश भ्रमण की चाहत भला किसे नहीं होती, किन्तु सभी को इसका अवसर भी मिले ऐसा नहीं हो पाता। फिर भी वे लोग पुस्तकों, समाचार पत्रों, फिल्मों अदि के द्वारा विदेशों और वहां के जीवन के बारे में जानकारी पा लेते हैं। जिनके बच्चे या परिवार का कोई सदस्य विदेश चला गया, उन्हें तो कम से कम से एक बार विदेश घूम लेने का अवसर मिल ही जाता है। मुझे भी कई देशों का भ्रमण करने का अवसर मिला। अपने भारतीयों के सन्दर्भ में, वहां के जन जीवन और रहन सहन का जो अनुभव मुझे मिला है, उसका चित्रण मैंने अपनी कुछ कहानियों के द्वारा करने का प्रयत्न किया। उन्हीं कहानियों के संग्रह, मेरी दो पुस्तकों 'बसे विदेश' और 'विदेश की चटनी' में समाहित हैं।
एस. डी. तिवारी, एडवोकेट
कविता तो बोलेगी में युगीन चेतना के स्वर
इंद्रधनुषी रंगों से सुसज्जित 'कविता तो बोलेगी' कविता संग्रह पेशे से एडवोकेट सत्य देव तिवारी द्वारा रचित है। सत्य देव तिवारी जी ने हिंदी और अंग्रेजी दोनों भाषाओँ में रचनाधर्म को निभाया है। हास्य, गजल, मुक्तक और गीतों के रचयिता तिवारी जी का कविता संग्रह 'कविता तो बोलेगी' वर्तमान परिवेश के विविध सामाजिक, धार्मिक, सांस्कृतिक तथा राजनैतिक पहलुओं पर सूक्ष्म दृष्टि से चिंतन करने में सक्षम हैं। ध्यात्मिक चेतना से ओतप्रोत सूर्य वंदना, सरस्वती वंदना, समय कहाँ भाग जाता, मैं कौन हूँ तथा समय गोल है, कवितायेँ मन को आकृष्ट कराती हैं। स्वयं से बात करते हुए कवि का भोलापन दृष्टव्य हैं -
स्वयं को पहचान लेना कितना कठिन है,
प्रभु को याद करूँ तो संज्ञान पाता हूँ मैं।
कवि की 'समय कहाँ भाग जाता' में संसार की नश्वरता और रहसयवादिता में कवि पंत की परिवर्तन कविता का भान होता है। मृत्यु के सच को जानने हेतु आतुर कवि प्रभु से प्रश्न करता है --
हे प्रभु!
अब तक, जग से जाने
कितने ही लोग हो चुके विदा
कहाँ हैं? न कोई पदचिन्ह
न कोई संकेत, न उनका कोई पता।
कवि ने प्रशासनिक तथा राजनैतिक व्यवस्था में व्याप्त भ्रष्टाचार पर आक्रोश किया है। 'मग्गू का मुक़दमा' आम आदमी के न्याय पाने की जद्दोजहद को बयां करते हुए न्यायतंत्र के खोखलेपन तथा दोगलेपन को रेखांकित करती है। आजादी के इतने वर्षों बाद भी हम कार्यपालिका, न्यायपालिका और विधायिका को दुरुस्त नहीं कर पाए हैं। यह कविता धूमिल, सर्वेश्वर दयाल सक्सेना तथा नागार्जुन जैसे कवियों की याद दिलाती है।
इसी क्रम में 'कानून बौना क्यों है, भूमि अधिग्रहण, रोटी के लिए, लाठी चार्ज, तथा सोने की चिड़िया ऐसी ही आक्रामक तेवर से भरी रचनाएँ हैं। कानून में शिथिलता, न्याय में बिलम्ब, चोर रास्ता निकालने की प्रवृत्ति तथा निरपराध व्यक्ति को दंड ऐसे ज्वलंत मुद्दे हैं जिनका कोई हल निकलता नहीं दिखाई देता। 'राजनीती की लड़ाई' में 'करते बड़े घोटाले जमकर' या 'नेता से ज्यादा चेले चपाटे' तथा 'सरकारी धन से चंडी काटें'जैसी पंक्तियाँ भ्रष्ट राजनीती की विद्रूपता को प्रकट कर रही हैं। वहीँ 'बाँट डालो' कविता में जातिवाद, भाषावाद, क्षेत्रवाद तथा धर्म के नाम पर भारत को खंडित करने की साजिश को प्रकट किया गया है। राजनीती से जुड़े भ्रष्ट अपराधी नेताओं पर 'मोती खाल उनकी' कविता में कितना करारा व्यंग हैं -
लिखा जाता है नाम, काले अक्षरों में भी
असर होता नहीं है पर, उनकी मोटी खेलों पर।
पर्यावरण प्रदूषण तहत पारिस्थितिक असंतुलन जैसे गंभीर विषय पर कवी ने 'पहाड़ बोल रहा है' 'वृक्ष के बिना' तथा 'जंगल का सन्देश आदि रचनाएँ लिखी हैं। पहाड़ों को डायनामाइट से उड़ाकर कंक्रीट के जंगल उगाये जा रहे हैं जिसका परिणाम बाढ़, भूकंप तथा जलप्रलय जैसी आपदाएं प्रतिवर्ष असंख्य जीव जंतु, मनुष्य एवं करोड़ों की सम्पदा को लील जाती हैं। शांत पर्वतीय जीवन भौतिक लालसा का शिकार होकर विनष्ट हो रहा है। वृक्षों को काटकर सडकों चौड़ीकरण तथा दस मंजिला भवन बनाने की प्रक्रिया विकास के तहत की जा रही है। इन योजनाओं ने कितनों को बेघर और बेरोजगार भी किया है। चारित्रिक प्रदुषण को केंद्र में रखकर लिखी गयी कविता 'पप्रदूषण न फैलाओ' विचारणीय है। 'उसका क्या कसूर' कविता अंतर्गत वैषम्य के बीच बदलते जीवन मूल्यों में चरित्रहीन धनाढ्य व्यक्ति को सम्मान तथा चरित्रवान को असम्मान पर तर्जनी उठाकर सोचने को विवश कराती है।
'क्या खोया क्या पाया' तथा 'जिंदगी तू कितनी बदल गयी है'कवितायेँ आर्थिक जीवन मूल्यों के परिवर्तन पर कुठाराघात करती हैं। आगे बढ़ने की ललक, भौतिक सम्पदा का सुख, यश सम्मान प्राप्ति की लालसा मृगतृष्णा बनकर जीवन के अंतिम मोड़ पर एकाकीपन के जंगल में रोदन को विवश कर देती हैं। तब हमें ज्ञात होता है कि परोपकार तथा समाजकल्याण के लिए किये गए सत्कर्म ही हमें मोक्ष प्रदान कर सकते हैं। कवि 'जिंदगी तू कितनी बदल गयी है' में भी सहजता और सरलता को छोड़कर बाजारवाद की चपेट में हम कितने कृत्रिम एवं बनावटी जीवन को जीने लगे हैं इसी यथार्थ को इंगित किया गया है।
आज का बालक कल का राष्ट्र निर्माता है। बालकों के भोलापन, सच्चापन तथा अर्जस्विता की टी.वी. , मोबाइल तथा कंप्यूटर ने चुरा लिया है। आउटडोर गेम का स्थान इनडोर गेम ने ले लिया है। 'कौन छीन रहा बचपन', 'बालक की मुस्कान' तथा 'खिलौने की दुकान पर' तथा 'सपनों को मरते देखा' कवितायेँ बालकों के प्रति चिंता से जुडी हैं। कवि कहता ही -
सपनों को हवा मिल जाती तो,
वह आज देश का धावक होता।
हताशा, निराशा हाथ में लेकर
आस को ताक पर धरती देखा।
स्त्री सशक्तिकरण के इस युग में 'तेरी आँखों में नारी' के विविध गुणों की चर्चा करते हुए 'पति चाहे पतित, व्यसनी हो, सहती उसको भी चुपके नारी। नारी मन के निष्ठां, त्याग, धैर्य, सहनशीलता एवं त्याग को प्रदर्शित करने का प्रयास किया है। दूसरी और स्त्रियों के प्रति अनाचार और बलात्कार के प्रति रोष 'शहरों में दरिंदे' में व्यंजित हुआ है -
कौन सी दुनिया के हैवान और दरिंदे
घुसकर आतंक मचाये हैं शहरों में?
राष्ट्रिय चेतना की अभिव्यक्ति 'भारत अपना' 'तिरंगा' तथा 'फौजी की होली' 'दुश्मन ने आंख दिखाई तो' तथा
खून का जूनून में हुई है। आतंकवाद को इंसानियत का दुश्मन मानकर कवि ने तीव्र आलोचना की है। 'आग के रंग' कविता में आग की उपयोगिता को ही व्यक्त किया है यदि कवि मानव मन में बसी स्वाभिमान, क्रांति और विद्रोह की आग की चर्चा करता तो कविता अपने उत्कर्ष पर पहुँच सकती थी।
चाय, नमक, गांठ, अलीबाबा का सिमसिम आदि कविताओं में निम्न पंक्ति मन को छूती है -
गाँधी जी ने पहचानी नमक की ताकत
नमक से हिला डाली अंग्रेजी हुकूमत।
भीड़तंत्र का कोई विवेक नहीं होता। कभी कभी शक के दायरे में आये व्यक्ति को भीड़ द्वारा मौत का फरमान सुना दिया जाता है। लोकतंत्र में ऐसे लज्जाजनक कुकृत्य में षड्यंत्र की बू आती है-
अब समाचार बनेगा
राजनीति की क्रीड़ा होगी।
सांत्वना के आंसू से धुलती
उसके परिवार की पीड़ा होगी।
'सुबह' 'तितली' 'पाप के बादल'कवितायेँ प्रकृतिपरक हैं। तितली को देखभर कहना 'पतझड़ में कहाँ पर जाकर सोती हो ?' बालमन जैसी जिज्ञासा और उत्कंठा का भाव कविता के लालित्य में श्रीवृद्धि करता है।
हर व्यक्ति की प्रेरक कोई न कोई स्त्री होती है। कवि के कोमल मन में पत्नी के प्रति गहन प्रेम एवं निष्ठां की अनुभूति 'मेरी पत्नी' तथा 'ऐसा दर्पण हो' में अभिव्यक्त हुई है। कवी अपनी पत्नी को ऐसा दर्पण मानता है जिसमें वह अपने को निहार, बांच, टाक और आंक लेता है। दाम्पत्य प्रेम पर लिखी उत्कृष्ट रचना है। कवि वृद्धावस्था के उस पड़ाव पर है जहाँ बच्चों के साथ खेलना पोते, पोती के साथ कागज के जहाज बनाकर उड़ाना सुखद प्रतीत होता है। 'बच्चों का घर' 'बुढ़ापे ने सताया बड़ा' 'बूढ़ों को कमजोर न समझें' ऐसी रचनाएँ हैं। बुजुर्गों की होती अवहेलना एवं उपेक्षा को देखकर कवि कह उठता है -
बूढ़ा पेड़ फल न भी दे, पर छाया तो देता ही है।
शिल्प की दृष्टि से कुछ रचनाएँ सुघड़ हैं परन्तु कुछ में परिष्कार की आवश्यकता है। भाषा की दृष्टि से कवि ने लोकजीवन में प्रयुक्त हिंदी तथा अंग्रेजी, उर्दू के शब्दों से परहेज नहीं किया है। क्लच, ब्रेक, डील, फील, पासवर्ड, ए.टी.एम. पिनकोड जैसे शब्द स्वाभाविक रूप से आ गए हैं। कहीं कहीं बिम्ब योजना सुन्दर बन पड़ी है। 'स्याह क्यों करें'में बिम्ब योजना सुन्दर बन पड़ी है। ईश्वर की और से प्रतिदिन प्रदत्त होता है एक दिन प्रदत्त उसे स्याह क्यों करें -
फूलों, तितलियों से रंग लेकर
पक्षियों के रंगीन पंख लेकर
धूप, बारिश का पानी मिलाकर
ऊँचे, हरे वृक्षों से हिलाकर
एक ऐसा चित्र बना डालें
जी करे, रखें संभाले।
:
अर्जस्विता एवं ताजगी से भरी यह रचना हर क्षण को जिंदादिली से जीने को प्रेरित करती है। सकारात्मक सोच से ओत प्रोत उनकी अनुभूतियों की निधि 'कविता तो बोलेगी' सार्थक ग्रन्थ है। ऐसी बहुरंगी भावों एवं विचारों को गतिमयता प्रदान हेतु आप बधाई के पात्र हैं। काव्य संसार में यह संग्रह अपना महत्वपूर्ण स्थान सुरक्षित रखेगा। मेरा ऐसा विश्वास है।
डॉ. बीना रानी गुप्ता
एसोसिएट प्रोफेसर एवं विभागाध्यक्ष, हिंदी
भगवानदीन आर्य कन्या स्नात. महाविद्यालय
लखीमपुर खीरी
मेरी बात
अपनी बात को समग्र और सशक्त रूप से कहने के लिए कहानी सबसे उत्तम माध्यम है। गद्य लेखन की विधाओं में सामाजिक खूबियां, विसंगतियां, कुरीतियां, परम्पराएं, घटनाएं, चरित्र इत्यादि को दर्शाने और समझाने के लिए कहानी से सुन्दर, साहित्य की और कोई विधा नहीं हो सकती। प्राचीन काल में तो लोग कहानियों को भी काव्य के द्वारा कहते थे। किन्तु उन कहानियों में केवल प्रमुख घटनाओं और चरित्रों का ही वर्णन होता था। हमारे जीवन में हमारे आस पास ही अनेकों घटनाएं घटित होती हैं जो किसी न किसी रूप में कोई सबक दे जाती हैं। अगर उन घटनाओं को कलमबद्ध न किया जाय तो वे अतीत में लुप्त हो जाती हैं। कहानी के माध्यम से उन घटनाओं को साहित्य की निधि बनाया जा सकता है जो भविष्य में लोगों के पढ़ने, सीखने का प्रभावशाली माध्यम बन सकती हैं। हमें बहुत सी बातें, अपनी तथा अन्य लोगों की गलतियों से सीखने को मिलती हैं। यह संभव नहीं कि सभी घटनाओं को स्वयं देखा जा सके। इसके लिए कई बार औरों के द्वारा कही या लिखी कहानियों पर निर्भर करना पड़ता है।
हमारी रोजाना की जिंदगी में लोगों के व्यव्हार मनोभाव आदि से साक्षत्कार होता रहता है। यदि उन बातों का एकत्र कर मूल्यांकन किया जाय तो हमें सीखने के लिए अनेक उपयोगी बातें सामने आती हैं। उन घटनाओं में समाज और मानवता के लिए क्या कुछ सन्देश छुपा होता है। मुझे तो लगता है जबसे भाषा का विकास हुआ होगा, तभी से कहानियों का सिलसिला भी होगा। कोई व्यक्ति किसी प्रकार का दृश्य या घटना देखता होगा तो अन्य लोगों से शब्दों में ही बताता रहा होगा। कहानी ने बस अपना साहित्यिक रूप बाद में लिया होगा। हम सभी ने अपने मित्रों, सम्बन्धियों या परिवार के सदस्यों से भी उनके समक्ष घटित घटनाओं का विवरण अथवा
यात्रा वृतांत, उनके साहस की कहानियां, उपलब्धियां, चरित्र का चित्रण इत्यादि मौखिक रूप अवश्य ही सुना होगा। इन्हीं घटनाओं को सज्जित शब्दों में ढाल कर पत्र, पत्रिकाओं में लोगों के समक्ष लेन से साहित्य बन जाता है।
कहानी का छोटी से बड़ी, विभिन्न आकार हो सकता है तथा कहानी के अनेकों रूप हो सकते हैं। कहानी के द्वारा समाज, प्रकृति, जीवन और राजनीति से जुड़े वास्तविकताओं का सम्पूर्ण चित्रण हो सकता है। कहानी समाज को उसका बिम्ब दिखाने, उपदेश और सन्देश देने के अतिरिक्त मनोरंजन का भी एक अमूल्य साधन है।
बच्चों को दादा, दादी से राजा-रानी की कहानियां, राजकुमार की कहानियां, बहादुरों की कहानियां सुनाने में बड़ा आनंद आता है। बीच बीच में कौतुहल भरे प्रश्नों के द्वारा उन्हें कई बातें सीखने का भी अवसर मिलता है। चरित्र निर्माण में कहानियों की बहुत महत्वपूर्ण भूमिका रही है।
आजकल कहानियां सुनने सुनाने का प्रचलन प्रायः समाप्त हो चुका है। अब तो सभी कहानियां फिल्मों और धारावाहिकों के द्वारा प्रस्तुत की जा रही हैं। इसलिए कहानीकारों ने अपनी कहानी का छोटा करके परोसना आरम्भ कर दिया ताकि कम समय में पढ़ी जा सकें और उनके रुचिकर रहते हुए आवश्यक सन्देश दिया जा सके। अपने परिवेश में विभिन्न पहलू जो मैंने देखा सुना, उन्हें छोटी छोटी कहानियों में ढालने का प्रयत्न किय है । मेरी इस पुस्तक 'इनकी उनकी' में अधिकतर वही बातें हैं जो देखि सुनी हैं और हो सकता है आपके सामने भी ऐसा कुछ हुआ हो। इस पुस्तक के अतिरिक्त मेरी कुछ अन्य कहानियों की पुस्तकें भी हैं, जिनमे, 'आशिक अली की होली' और विदेश में जाकर बसे भारतियों पर आधारित 'बसे विदेश' तथा 'विदेश की चटनी' भी हैं। मुझे पूर्ण विस्वास है कि मेरी कविताओं के साथ पाठक इन कहानियों का भी आनंद लेंगे और अपने स्नेह से अनुगृहीत करेंगे।
एस. डी. तिवारी, एडवोकेट
हिंदी
सर्कार
मीडिया
गांव
रोजगार
शिक्षा
शब्दावली
अन्य देशों में परंपरा
सामाजिक परिवेश
नन्हीं
बोलते मोती
हाइकु शास्त्र
मोतियन की लड़ी
दिल्ली के झरोखे
दुनिया गिर गयी
गुनगुनाती हवा
पांच दाने मोती
गीत गुंजन
कविता तो बोलेगी
तेरे नाम के मोती
प्यार का पिंजरा
आशिक अली की होली
हाइकु रामायण
चाँद के गांव
बसे विदेश
विदेश की चटनी
मुहब्बत के मोती
इनकी उनकी
क्या सखि, साजन ?
अनुक्रम
चाय वाला
चार चक्का
अमीर कौन
हैप्पी मैरिज एनिवर्सरी
बिजूका
काले धन का हिसाब
पंडिताईन का आम
खाता गुलजार
दिवाली की मिठाई
पटाखे की चोरी
बिजूका
काले धन का हिसाब
पंडिताईन का आम
खाता गुलजार
दिवाली की मिठाई
पटाखे की चोरी
बिस्कुट चोर
पानी पर पैसा
आरक्षण
आरक्षित सीट
धारावाहिक
प्यारी सी बहू
प्यारी सी बहू
ऐसी ही साड़ी पहनती हूँ !
एक दिन की हिंदी
काम वाली की चाय
जज साहब
साली की राखी
शनि की साढ़ेसाती
हवाई जहाज का टिकट
महंगा लहंगा
रैली में फंसे
अंतिम अध्याय
न्याय
अंतिम अध्याय
न्याय
बाबा का प्रवचन
स्वामीजी के दर्शन
खिलौना
खिलौना
ऋण
प्यार की सवारी
क्लब का चस्का
होली की ठिठोली
होली की ठिठोली
ब्रांडेड
सोच का बोझ
स्पीड लिमिट
स्पीड लिमिट
काला कौवा - १
काला कौवा - २
काला कौवा - ३
काला कौवा - २
काला कौवा - ३
भोला मन
मैं प्रमुख हूँ
मच्छरों से रोजी रोटी
कौवा कान ले गया
कौवा कान ले गया
बेगानी शादी में
घर का भेदी
अल्लाह से मांगो
मक्खी भगाने की दवा
चोर पे मोर
निमंत्रण
वीसा नहीं मिला
वी. आई. पी. सीट
वी. आई. पी. सीट
नोट का क्या करें ?
वहां क्या ये सब नहीं मिलता
घर का चोर
मिट्टी की मिट्टी
गुरु जी
व्यापारी साहित्यकार
ठेकेदार
किसके मजे
क्या पाया, क्या खोया
डॉक्टर बहू
गिफ्ट का डिब्बा
नहर का पानी
पेट ख़राब है
दहेज़ में शौचालय
मुंडन का वीडियो
वाह री किस्मत
मुंडन का वीडियो
वाह री किस्मत
हेर फेर
गाड़ी का चालान
पूरब की गाड़ी
छत पर धुआं
चुड़ैल देखा
शीशी में भूत
पूरब की गाड़ी
छत पर धुआं
चुड़ैल देखा
शीशी में भूत
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