Saturday, 28 March 2015

Videshi bahu

विदेशी बहू

पीटर को इंडिया से आये चार पांच वर्ष हो चुके थे। मोना उसके ऑफिस में ही काम करती थी। दोनों की सीट अगल बगल थी, अतः प्रायः आपस में बात होती रहती थी। पीटर जब काम में कहीं अटकता तो मोना उसकी मदद कर दिया करती। पीटर जब अपने लिए काफी लाता तो मोना के लिए भी ले आता। दोनों ही अक्सर काफी साथ पिया करते। धीरे धीरे दोनों में अच्छी दोस्ती हो गयी। पीटर गोर रंग का मोहा तो इन्डिया से ही लेकर गया था, मोना के रंग रूप पर मुग्ध था। भाग्य वश गोरी अंगरेजन उसके बगल में ही बैठती थी, मोना को वह मन ही मन प्यार करने लगा। पीटर के मन में कई बार आया कि वह उससे कहा दे, 'आई लव यू। ' किन्तु  उसके मन में डर भी था कि मोना उसके काला होने के कारण ना न कर दे।  मोना तो गोरी चिट्टी लड़की थी, भला वह काले को क्यों चाहती।  यह सब उधेड़ बुन करते महीनों बीत गए। मोना धीरे धीरे, पीटर के दिल में उतरती जा रही थी। एक बार पीटर ने सोचा, मोना से 'आयी लव यू' बोल देना ही उचित रहेगा। क्या होगा, अधिक से अधिक ना ही तो कर देगी, नहीं कहने से भी 'ना' ही है। अगर बात बन गयी तो गोरी अपनी। एक दिन पीटर ने मोना से कहा, 'चलो आज पैंट्री में काफी पीते हैं। '
मोना 'गुड आईडिया' कहकर साथ चल दी।
पैंट्री में जाकर पीटर काफी बनाने लगा। 'मोना तुम क्या लोगी कपचीनो या मौका?'
'आई लव मौका। '
'एंड आई लव यू। '
 पीटर के मुंह से यह कैसे निकल गया, यह उसे समझ ही नहीं आया।
  मोना को इस बात से कोई आश्चर्य नहीं हुआ। इस बात का अनुमान तो उसे पहले से ही था। उसने भी मन में सोच रखा था, यहां की सारी लड़कियां गोरों के पीछे ही भागती हैं, उनसे वह कुछ अलग करेगी। उठने किताबों में पढ़ रखा था काले लोग दृढ इच्छा शक्ति के होते हैं और उनके शरीर की रोग रोधक क्षमता अधिक होती है । पीटर काला था तो क्या! उसका व्यक्तित्व आकर्षक था, और ऊपर से इंडियन। मोना को पता था इंडियन लोग परिवार के लिए समर्पित होते हैं और पति के रूप में उन पर पूरा विस्वास किया जा सकता है। उसने भी बिना और सोचे, 'आई लव यू टू' कहकर, पीटर के होंठ चूम ली।  बस फिर क्या था, अब तो काम के बाद मिलना जुलना और साथ घूमना फिरना शुरू हो गया।

पीटर ने सोचा अब तो अमेरिका में ही रहना है, धर्म भी दोनों का एक ही है, मोना से शादी करने में कोई हर्ज नहीं। मोना के गोरी और स्मार्ट लड़की होने के कारण, पीटर उस पर मरता था। अब तो खुद के काला होने के कारण, मोना द्वारा तिरस्कृति होने का डर निकल चुका था। एक बार उसके मन में विचार आया, इन अंग्रेज लोगों से बिना शादी के भी साथ में समय बिताते रहो कोई अंतर तो पड़ता नहीं, एक बार अपने भारतीय मित्रों से बात कर ले तो अच्छा रहेगा। एक दिन अपने मन की बात उसने नितिन से कर दी। नितिन ने मोना को कभी देखा नहीं था, उसने बताया कि मोना के व्यवहार और विवेक के बारे में उसे कुछ पता नहीं, फिर भी इंडिया से विवाह करके इंडियन बहू लाये तो अच्छा है। वहां की लड़कियां संस्कारी होती हैं। इंडियन पत्नी जितनी समर्पित रहेगी, अमेरिका की लड़की नहीं होगी। वह कब तक साथ रहे, कब पिनक कर तलाक ले ले, कोई गारंटी नहीं। मगर पीटर तो मोना के रंग का दीवाना हो चुका था। उसने सलाह ले भर ली, करना तो उसे अपने मन का ही था। उसने नितिन की बात पर बहुत अधिक ध्यान नहीं दिया और एक दिन मोना से शादी का प्रस्ताव रख दिया। मोना को भी हाँ करने में कोई भी हिचक नहीं हुई। दोनों ने एक चर्च में शादी कर ली, और रजिस्टर करा लिया। दोनों को साथ रहना, बड़ा अच्छा लगा। कई मामलों में दोनों की खूब पटती थी। पब और क्लब दोनों को ही रास आ रहा था, इसके अलावा डांस के भी दोनों शौक़ीन थे । 

पीटर बड़ा मिलनसार लड़का था, उसके कई इंडियन मित्र थे, जो पीटर के यहाँ मिलने जुलने आते थे। मोना को उसके यहाँ किसी इंडियन का आना, ज्यादा पसन्द नहीं आता। हां, कहीं बाहर घूमने फिरने चलो तो कोई बात नहीं। किसी के आने पर कुछ जलपान की व्यवस्था करना तो उसे बहुत बड़ा भार लगता। अधिकतर काम पीटर को ही करना पड़ता। पीटर पहले कभी कभी, घर पर भारतीय व्यंजन बना लेता था, परन्तु अब घूमने फिरने के कारण समय कम मिल पाता। भारतीय व्यंजन का स्वाद, बस इंडियन रेस्टोरेंट में ही जाकर मिलता। घर पर खाने के लिए रेडीमेड ही होता, पिज्जा, बर्गर, सौसेज या होट डॉग। मोना खाना पकाने के नाम पर  केवल  माइक्रोवेव या फिर चूल्हे पर, बना बनाया खाना गरम करना जानती थी। अंडे का ऑमलेट उसे बहुत पसंद था, वो पीटर को ही बनाकर खिलाना पड़ता।

धीरे धीरे समय बीता, एक बार पीटर, अपनी मम्मी को अमेरिका ले आया। सोचा कुछ समय वो रहेंगी तो घर का इंडियन खाना, खाने को मिलेगा और एकाध चीज बनाना, मोना भी सीख लेगी। मां के आने से, पीटर के मन में ख़ुशी भर गयी। काम से आते ही, मां कुछ न कुछ देशी नाश्ता बना कर रखती। माँ के हाथ का देशी स्वाद, पीटर को आनंद से भर देता। मोना को एकाध चीजें पसंद आतीं, वरना वही पाई, सौसेज और हॉट डॉग।

सास बहू का ताल मेल बैठना तो मुश्किल था ही। मोना को भारतीय भाषा बिलकुल भी नहीं आती थी और पीटर की माँ को बस टूटी फूटी अंग्रेजी ही आती थी। कई बार बातों को वे कुछ का कुछ समझ लेतीं, फिर यदि पीटर वहां होता तो समझाता, वरना जो समझ आता वही करतीं। एक बार पीटर की माँ अगले दिन एक पार्टी में जाने के लिए गिफ्ट पैक कर रही थीं, तभी मोना वहां आ गयी और ध्यान से देखने लगी। पीटर की माँ ने अपने साथ शामिल करने के लिए कहा, 'ओपन द टेप।' मोना गई बाथ टब का नल खोल आयी। वह समझी शायद ये टब में नहायेंगी। पीटर की माँ सारी बात समझ गयीं, वो टॉयलेट जाने के बहाने जाकर बंद कर आयीं। फिर मोना ने खाने का इशारा करते हुए पूछा, 'माँ हॉट डॉग।' पीटर की माँ ने उत्तर दिया, 'तुम्हीं लोगों को मुबारक हो। बताओ गोर डॉग भी नहीं छोड़ते।'  

विवाह के अभी छः महीने ही बीते थे, मोना के व्यव्हार में बहुत परिवर्तन आ चुका था। वह पीटर को अपनी माँ को प्यार और इतना सम्मान करते देखती तो उसे लगता कि उसकी माँ का भी ऐसे ही सम्मान होना चाहिए। पीटर की माँ को वहां के ठण्ड के बारे में अनुमान नहीं था, इसलिए वह गर्म कपड़े, कोई खाई नहीं ले गयी थी।पीटर ने माँ के लिए वहां के मौसम के हिसाब से गरम कपड़े वगैरह खरीद दिया। मोना बोली  'मेरी माँ के लिए तो कभी ये सब खरीदा नहीं, केवल अपनी माँ लिए ही  खरीद रहे हो।' तब पीटर ने मुश्किल से समझाया, 'तुम्हारी माँ के पास तो ये सब है ही। इंडिया में इतनी ठण्ड नहीं पड़ती, इसलिए लोग ज्यादा गरम कपडे नहीं रखते।'

मोना को तो रेडी मेड खाना पसंद आता, लेकिन पीटर की मम्मी को वहां का खाना पसंद नहीं था। वे इंडियन खाना बनातीं तो बर्तन अधिक जूठे होते, जिन्हे साफ करने को मोना तैयार नहीं होती। बेचारी बूढी माँ को ही साफ करना पड़ता। पीटर कभी कभी मदद करा देता या डिश वाशर का प्रयोग करता। घर की सफाई में भी वही झंझट होता, मोना तो वैक्यूम क्लीनर से घर साफ़ करती, पीटर की मम्मी ने एक बार सोचा कि सैनिटाइजर छिड़क कर  पोंछा लगा दे, ताकि फर्श कीटाणुरहित हो जाय और चिपके हुए धूल के कण भी निकल जाएँ। पोंछा लगाकर, साबुन से हाथ धोयी और फिर खाना परोस दिया। मोना ने वह खाना खाया ही नहीं। वह अपने लिए अलग इंतजाम करने लगी। जब पीटर ने पूछा, 'आखिर क्या बात है? तुम तो यह डिश पसंद से खाती हो। '
वह बोली, 'ओल्ड मदर ने हाथों में बिना ग्लोब्स (दस्ताने) पहने ही पोंछा लगाया था और उसी हाथ से खाना सर्व किया (परोसा)।'
'धो तो लिया था। '
'नो, नो; ग्लोब्स नहीं लगाया था।  उसके हाथ में जर्म्स होंगे।'

पीटर की माँ सोचतीं, अगर इसका यही रवैया रहा तो पोता, पोती होने पर हाथ भी नहीं लगाने देगी। उनको हम खिलाएंगे कैसे !

पीटर की मम्मी जब छौंक या तड़का लगातीं तो मोना परेशान हो जाती। उसे छौंक का उठा धुआं बिल्कुल भी बर्दास्त नहीं होता। छींक से उसकी हालत खराब हो जाती और अंग्रेजी में बुदबुदाने लगती।

कभी कभी शाम को पीटर और मोना पब वगैरह चले जाते; और कभी ऐसा भी होता कि मोना घर में ही बियर खोल कर बैठ जाती और खीरा, छुरी पीटर की माँ को पकड़ा देती, 'मदर सलाद'। यह सब पीटर की माँ को अच्छा तो नहीं लगता पर कर भी क्या सकती थी। अमेरिका में रहना है तो सब करना ही पड़ेगा। कुछ ही दिनों में वह ददुःखी हो गयी।

एक दिन पीटर की माँ के सिर में दर्द हो रहा था। उसने पीटर को बता दिया। पीटर बोला, 'लाओ पहले सिर में तेल लगा देता हूँ, फिर दवाई का इंतजाम करता हूँ।' पीटर तेल लेकर माँ के सिर में मालिश करने लगा। मोना ने पूछा, 'ये क्या कर रहे हो ?'
पीटर ने बताया 'मसाज, तेल मालिश।'
'मसाज सेंटर क्यों नहीं ले जाते? ओ. के. मसाज भी करते हो ! मेरा और मेरी मां का तो कभी नहीं किया। '

धीरे धीरे, दोनों में बात बात पर नोक झोंक होने लगी और आपस की खट-पट बढ़ती गयी, और नौबत यह आ गयी कि मोना अपने माँ बाप के यहाँ चली गयी। अब पीटर का भी गोरी चमड़ी से मोह भंग हो चुका था। फिर भी फोन करके मोना को एडजस्ट करने के लिए बहुत समझाया, पर सब बेकार। मोना इंडियन माहौल से सामंजस्य नहीं रख पा रही थी। पीटर को भी मोना से विवाह करके गोरी चमड़ी के अतिरिक्त कुछ नहीं मिला। मोना जब मन होता अपने माँ बाप के यहाँ चली जाती और पीटर व उसकी माँ घर अकेले रह जाते। पीटर की माँ को तो उसके जाने से अच्छा ही लगता, कम से कम घर में शांति तो हो जाती। पीटर के पास अब एक ही विकल्प था 'तलाक'। 
दोनों की खटपट की बात जब भारतीय मित्रों को चली तो वो भी बहुत दुखी हुए। नितिन ने कहा, पहले ही समझाया था पर यही गोरी चमड़ी का दीवाना था। कितना भी ये गोर भेद भाव तो रखते ही हैं। अब हो भी क्या सकता था। पीटर ने मन बनाया मोना को तलाक करके इंडिया से दूसरी दुल्हन लाये। यह सब सोचकर उसने तलाक का अनुरोध पत्र दाखिल कर दिया। मोना भी कौन सी कम थी, हर्जाने के रूप में उसने एक भारी भरकम राशि की मांग रख दी तो पीटर के होश उड़ गए। फिर भी जिंदगी की शांति से वह रकम देनी उसे सस्ती लग रही थी। आपसी बातचीत और कोर्ट की मध्यस्थता से समझौता हुआ तथा पीटर और मोना का तलाक हो गया।  

कुछ महीनों में पीटर की मां का वीसा समाप्त हुआ और वह वापस इंडिया आ गयी। बेचारे पीटर को फिर से अब अकेले समय बिताना था। अब उसने ठान लिया था, बेशक कुंआरा रह जाय किन्तु गोरी यानी अंग्रेजन से शादी नहीं करेगा। दो वर्ष अकेले काटने के बाद जब वह इंडिया आया तो उसकी में ने भारतीय परिवारों के तौर तरीकों से चलने वाली व्यवहार कुशल बहू पहले ही तलाश रखी थी। पीटर उसके साथ विवाह करके अमेरिका ले गया। उसके साथ पीटर चैन की जिंदगी जीने लगा। अब उसकी मां को भी अमेरिका आने जाने में कोई परेशानी नहीं थी। 


No comments:

Post a Comment