Tuesday, 29 March 2016

Aaj ki urmila


आज की उर्मिला
बहू के आते ही सास ने अपना शासन प्रारम्भ कर दिया था। सवा महीने तो दूर, सप्ताह भी नहीं बीता कि उसे घर के काम काज में लगा दिया गया। विवाह के समय उसकी उम्र अभी कुछ भी नहीं थी, और उसे नई दुल्हन की अनुभूति तनिक भी नहीं हो पाई। आते ही घर की जिम्मेदारियों का बोझ लाद दिया गया। रसोई और घर की साफ सफाई का सारा काम, और ऊपर से सास की लताड़। ऐसा लग रहा था कि दुल्हन नहीं बल्कि कोई सेविका लाई गयी हो। सास की दबंगई के नीचे वह पूरी तरह से दबी हुई थी। रमेश उसे प्यार तो बहुत करता, पर, उस पर हो रहे अत्याचार के विरुद्ध माँ से कुछ नहीं बोल पाता। उर्मिला धीरे धीरे सब सहने की अभ्यस्त हो चुकी थी । रमेश कुछ काम धाम नहीं करता था इस कारण सब देखते हुए भी मूक दर्शक बना रहता।

विवाह के तीन महीने बीत चुके थे, रमेश अभी निठल्ला ही था। उर्मिला ने एक दिन, सहमी आवाज में उससे कहा, 'क्यों न शहर जाकर, कुछ काम कर लेते! अम्मा, बाबूजी को भी कुछ सहारा हो जायेगा।' रमेश चुप्पी साध गया। मगर इस बात से उसके मन में नौकरी करने का बीज अंकुरित हो गया। गांव के एक सज्जन, कुशवाहा जी, भोपाल में किसी कंपनी में काम करते थे, गांव आये थे। उनसे पता चला कि उनकी कंपनी में कुछ जगह खाली हैं और वहां वे किसी को भी लगवा सकते हैं। बस रमेश ने अपना आवेदन उनके समक्ष रख दिया। कुशवाहा जी रमेश को अपने साथ भोपाल ले गए। उर्मिला इतनी जल्दी उसके साथ जाने की बात भी नहीं कर  सकती थी।  रमेश के जाने के बाद, उर्मिला पर उसकी सास के अत्याचार का और बढ़ना स्वाभाविक था। रमेश, अपने वेतन  में से बचाकर कुछ पैसे घर भेजता। जब जब पैसे आते उर्मिला सुनकर बहुत खुश होती, पर उसके हाथ कुछ नहीं आता। वह सब तो सास ससुर ही रखते। उर्मिला को तो हर बात के लिए अपना मन मार के ही रहना पड़ता। 

उसकी सास हर बात पर भला बुरा कह देती। कभी काम में कमी निकालती तो कभी दहेज़ को लेकर ताने मारती। उसकी एक छोटी ननद थी, वह भी उसका साथ नहीं देती। उर्मिला एक गरीब परिवार से आयी थी। सास ससुर के मन के अनुसार दहेज़ नहीं लाई थी। मायके की गरीबी का अभिशाप वह ससुराल में भुगत रही थी। अब तो अति हो चुकी थी, उसकी सास उसके माँ बाप के बारे में भी अपशब्द कहने लगी थी, और जबाब देने पर हाथ तक उठा लेती।

उर्मिला गर्भवती थी, उसमें भी उसका ख्याल नहीं रखा गया। उसे आराम तो दूर, मानसिक प्रताड़ना से भी गुजरना पड़ता। उसके पास फोन तक नहीं था कि रमेश को कुछ बता सके। एक दिन रमेश का फोन आया। उसकी सास, निठुरी घर में नहीं थी, उर्मिला ने पति से अपने मन की बात कह दी। रमेश ने हिम्मत जुटाकर, अपनी माँ से उर्मिला के बारे में पूछ लिया तो वह उर्मिला पर आग बबूला हो गयी। उर्मिला सफाई देती रही, मगर उसने एक न सुनी और वहां पड़े झाड़ू को उठा कर चला दिया । उर्मिला रोने लगी और यह बात रमेश और अपने मम्मी पापा को बताने की धमकी दे डाली। अब तो उसकी निठुरी का क्रोध सातवें आसमान पर था। आँखों में खून उतर आया। वह उसे पेट साफ़ कराने के लिए दबाव डालने लगी। सास थी की पिशाचन। ठीक उसी समय वर्मा जी की पत्नी उसके घर आ गयीं। रमेश की माँ ने झट से अपने को काबू में की, और दर्शाने लगी जैसे कि कुछ हुआ ही नहीं ।

समय बीता, विवाह के ठीक नौ महीने पश्चात्, उर्मिला के लड़का हुआ। निठुरी ने अनमने ढंग से गीत गाना तो करवा दिया, पर अगले ही दिन उसके ऊपर लांछन भी मढ़ दिया कि यह बच्चा रमेश का नहीं लगता, 'इसकी शक्ल तो रमेश से बिलकुल भी मेल नहीं खाती।' यही नहीं उसने उर्मिला के मायके भी शिकायत भिजवा दी। उसने उर्मिला को घर से बाहर निकालने का चक्रव्यूह रच डाला। गांव में डंका बजा दिया कि उर्मिला का सम्बन्ध किसी और से है और यह बच्चा उसी का है। उर्मिला के ऊपर तो दुखों का पहाड़ टूट पड़ा। उनकी कथनी, करनी में भी  बदल गयी और सास ससुर ने मिलकर, उर्मिला को घर से बाहर निकाल दिया। अब वह बच्चे को लेकर गांव के पास एक मंदिर में चली गयी। वह मंदिर रमेश के बाबा के भाई ने बनवाया था, और उसकी देख रेख उनका परिवार ही करता था। मंदिर में एक कमरा खली करके उर्मिला को रहने के लिए दे दिया गया। गांव वालों ने उसे सहारा दिया और उर्मिला मंदिर के एक कमरे में रहने लगी। उसने भी ठान लिया था कि वह मायके नहीं जाएगी, बल्कि यहीं रहकर अपने अधिकार की लड़ाई लड़ेगी। मायके जाने पर लांछन की पुष्टि होने का भी डर था। उधर रमेश को, उसके माँ बाप ने हिदायत दे दी थी कि वह जब तक कहा न जाय, गांव न आये। गांव के एकाध लोगों ने उसके सास ससुर को समझाया बुझाया, पंचायत भी हुई, पर वे झुकाने को तैयार नहीं थे और उर्मिला को वापस घर में जगह नहीं दिए। पंचायत ने उसे खर्चा पानी देने को कहा, तो उसे भी सास ससुर ने धता ही बता दिया। उर्मिला के सास ससुर अपने घर से एक टूक भी देने को तैयार न थे। उन्होंने उर्मिला को घर और खेत से बेदखल कर दिया था। मायके और गांव वालों की छोटी मोटी मदद से ही उसका जीवन यापन चल रहा था। रमेश का पता भी किसी के पास नहीं था कि उसे पत्र लिखा जा सके। 

दूसरे के घर का मामला मानकर, लोग बीच में पड़ना नहीं चाहते थे। उन लोगों के सामने, इंसानियत का कोई मायने नहीं था। अपने गांव की ही किसी बहू पर अत्याचार हो रहा था, और मदद के लिए कोई आगे नहीं आ रहा था। मायके वाले गरीब और अशिक्षित होने के कारण, ज्यादा कुछ करने में सक्षम नहीं थे। माँ बाप पढ़े लिखे नहीं थे और कोर्ट कचहरी का खर्च और परेशानी सोचकर, कानून का दरवाजा भी खटखटाने का प्रयत्न नहीं किये। उर्मिला को उसी के हाल पर छोड़ दिया गया। वह एकदम अकेली पड़ गयी थी, ईश्वर के अतिरिक्त कोई भी उसके साथ नहीं था। कोई देखे न देखे, पर ईश्वर तो सब देखता ही है। कुछ समय बीता, गांव के एक निवासी वर्मा जी को उर्मिला की दशा पर दया आ गयी। अन्याय के विरुद्ध लड़ने के लिए उनके जमीर ने उन्हें ललकारा। वे उर्मिला की मदद के लिए आगे आये, उनकी पत्नी ने भी इसमें उनका साथ दिया। दोनों उसके खाने पीने और अन्य आवश्यकता पूरी करने में जुट गए । उर्मिला के सास ससुर, वर्मा जी पर भी उससे अवैध सम्बन्ध होने का आरोप मढ़ दिया। 

यह तो उर्मिला के जख्म पर नमक था। वर्मा जी का इस तरह की बात सुनकर चिढ़ना  स्वाभाविक था। यह तो शुक्र था उनके इस नेक काम में उनकी पत्नी साथ थीं, नहीं तो उनका घर भी कलह में घिर जाता। वर्मा जी मदद से उर्मिला ने घर और खेत में हिस्सा देने के लिए, महिला आयोग में प्रार्थना पत्र डाल दिया। वर्मा जी के इस पवित्र काम में, कुछ और लोग भी जुट गए। महिला आयोग ने रमेश और उर्मिला के सास ससुर को सम्मन किया। रमेश सब कुछ जान कर भी, कायर की भांति अंजान बना रहा। महिला आयोग के सम्मन पर ही वह आया।

महिला आयोग में भी सास, ससुर ने अपनी कुटिल चाल नहीं छोड़ी और अवैध बच्चे का आधार बनाकर विवाह को अवैध घोषित करवाना चाहा। उन्होंने दलील दिया कि उर्मिला अपने पेट में मायके से ही बच्चा लाई थी। गाँव की बात थी न तो वहां डीएनए की जाँच की कोई सुविधा थी न ही उर्मिला के पास इतनी बुद्धि।  महिला आयोग के सामने निठुरी की यह कुटिल चाल नहीं चली। अंततः सत्य की विजय हुई, उर्मिला को तीन वर्ष निर्वासित जीवन व्यतीत करने के पश्चात, न्याय मिला । स्पष्ट निर्णय दिया गया कि उर्मिला को घर और खेत में हिस्सा मिले और रमेश तथा सास ससुर को निर्देश दिया गया कि उसके जीवन यापन के लिए दो हजार रुपये प्रति माह की दर से नकद भुगतान किया जाय। इस निर्णय से उर्मिला बहुत प्रसन्न हुई मगर फिर से उसी नरक में जाकर नहीं रहना चाहती थी। उसके पति की मति फिर गयी थी। वह अभी भी माँ के ही कहने में था। पता नहीं उसकी क्या विलक्षण बुद्धि थी कि वह सही गलत में अंतर नहीं कर पा रहा था, न ही माँ को समझा पा रहा था। विवाह के मंडप में पत्नी की रक्षा की सौगंध भी लगता है भूल चूका था। अपना स्वतंत्र निर्णय बिलकुल भी नहीं ले पा रहा था। आयोग की सुनवाई के बाद वह फिर भोपाल चला गया।

महिला आयोग के निर्णय से उर्मिला को बहुत राहत मिली। उसके पश्चात, उसने मंदिर से अलग एक कमरा ले लिया था और वहां रहकर अपने बेटे को पढ़ा रही थी। अब उर्मिला उम्र के पहाड़ की चोटी से दूसरी ओर लुढ़कने को तैयार थी और अभी तक के जीवन में, उसे वैवाहिक जीवन का बस दो माह का सुख मिला था। उसकी पूरी दुनिया मात्र उसका बेटा और संघर्ष ही रह गयी थी। उसका पति भी निर्वासित जीवन ही बिता रहा था। उसके आने पर, कहीं गांव वाले उस पर उर्मिला को साथ रखने का दबाव न बनायें, इस डर से वह गांव ही नहीं आया और शेष जीवन अविवेकी, कायर, डरपोक और कुंवारे की भांति ही व्यतीत किया। उर्मिला को जो कुछ भी मदद मिलती, अपने बेटे को पढ़ाने में लगा देती। उर्मिला की और किसी बात का चाहत नहीं थी। अब तो उसकी बस यही इच्छा थी कि उसका बेटा पढ़ लिख कर अपने पैरों पर खड़ा हो जाय, उसे अपने बाप या दादा, दादी से आश्रय न मांगना पड़े। धीरे धीरे वह जवान हुआ और पढ़  लिख कर काम पर लग गया ।

कुछ लोगों की मदद ने उर्मिला का इंसानियत पर भरोसा बनाए रखा। वह वर्मा जी की बड़ी एहसान मंद थी, अगर वे नहीं होते तो जाने क्या होता। उर्मिला के धैर्य और अदम्य साहस ने, उसकी और उसके बेटे की जिंदगी बचा ली। 

एस० डी० तिवारी 







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