Friday, 4 March 2016

Hong kong ki bas natra


हांगकांग में सड़कें तो बहुत चौड़ी नहीं हैं पर ट्रैफिक जैम भी ना के बराबर ही देखा और ना ही कहीं चौराहों पर ट्रैफिक पुलिस वाला नजर आया। सडकों पर दो मंजिली बसें नई नवेली दुल्हन की तरह दौड़ती नजर आयीं।  सड़क से मात्र ६ -७ इंच ऊँची सतह, चढ़ने में यात्री को कोई परेशानी नहीं।  इतनी नीची बस तो अपने देश में स्पीड ब्रेकर पर ही अटक जाएँगी।
जहाँ जहाँ सड़क पर कोई मरम्मत आदि का काम होता है; लाल, नीली, पीली प्लास्टिक ब्लॉक के विभाजक लगा  दिए जाते हैं और दिशा निर्देश के साथ पृथक रास्ता दे दिया जाता है। पूरी सड़क को बंद नहीं किया जाता। पटरी बिलकुल खाली रहती है, न तो दुकानदारों का कब्ज़ा न रेडी वालों का, न ही पटरी पर कोई गाड़ी खड़ी कर सकता।लोग गाड़ी निश्चित लेन में और नियमानुसार ही चलाते हैं, जिससे ट्रैफिक जाम होने का अवसर कम रहता है।यदि किसी ने नियमों का उलंघन किया है तो उसे जुर्माना देना ही होगा, यहां कोई यादव जी का फोन काम नहीं करता।
अधिक आबादी होने के कारण बहु मंजिले भवन और उनमे छोटे छोटे फ्लैट।  निजी कार रखना तो सपने जैसा है, क्योंकि गाड़ी खड़ी करने की जगह ही नहीं है।  वैसे निजी गाड़ी रखने की कोई आवश्यकता भी नहीं है, सार्वजानिक यातायात की प्रणाली बहुत अच्छी है। अधिक से अधिक लोग सार्वजनिक साधनों का ही प्रयोग करते हैं। सार्वजनिक साधन अति सुविध और धक्का मुक्की से रहित हैं। मेट्रो, रेल बस और फेरी तीनों का सुन्दर और सुविध प्रचालन।  इतनी जनता सार्वजानिक वाहनों में चलती है पर कोई  धक्का मुक्की नहीं करता, अपने आप ही पंक्तिवद्ध होकर बस या ट्रैन में चढ़ते हैं। लोग अनुशासित हैं और नियम पालन को प्राथमिकता देते हैं। घर और दफ्तर से बस स्टाप तक पैदल जाना पड़ता है, इस कारण शारीरिक रूप से स्वस्थ भी रहते हैं।

किराया के लिए ओपल कार्ड का प्रयोग करते हैं।  बस, मेट्रो या फेरी में चढ़े, मशीन से कार्ड सटाया और किराया कट गया। यहां बसों में कंडक्टर नहीं होते। कार्ड स्वैप करने की मशीन ड्राइवर के पास लगी होती है। वह बस कार्ड पंच होने की आवाज भर सुनता है उसे पता लग जाता है कि यात्रा का किराया जमा हो गया। जिसके पास कार्ड नहीं होता वह वहीँ लगे बॉक्स में निश्चित किराया डाल देता है।  ड्राइवर पैसे गिनता तक नहीं, बस सिक्कों की खनक से ही अनुमान लगाता है कि किराया दे दिया।

एक दिन मुझे कहीं घूमने जाना था, बेटे ने ओपल कार्ड पकड़ा दिया।  मैं बस में चढ़ा, मशीन से कार्ड सटाया बीप की ध्वनि के साथ ७ डॉलर कट गये। सीधे ऊपर वाली मंजिल पर चढ़ कर सबसे आगे वाली सीट पर बैठ गया। ऊपर से बस स्टॉप का नाम देखने में आसानी थी। उतरने के लिए बड़ा सतर्क रहना था क्योंकि अमुक बस स्टैंड कोई बताने वाला नहीं था।  अगली बार उसी जगह जाना हुआ, इस बार १९ डॉलर कट गए। मैं अवाक् रह गया, बहुत गुस्सा आया पर किससे शिकायत करता।  ड्राइवर को बात समझनी ही नहीं थी। वहां तो अंग्रेजी बोलने वाला भी कोई नहीं मिलता । घर आकर, बेटे को बताया कि आज तो बस में बहुत पैसे कट गये।  उसने पूछा किस नंबर की बस में बैठे थे ? जब उसको नम्बर बताया तो उसने बताया कि यहां बस में अंतिम स्थान तक का किराया देना होता है, उतरो चाहे कहीं भी।  अगर कम दूरी की यात्रा करनी हो तो कम दूर जाने वाली बस में सवार होना ही बुद्धिमानी है।  जिस बस में मैं दूसरी बार बैठा था वो लम्बी दूरी तक जाने वाली थी।

एक दिन हम बस में सवार हुए।  बस में दीप का एक दोस्त भी मिल गया। दीप ने  मेरे बारे में बताया, उसने नमस्ते किया। 'कब आये अंकल' पूछा।
'अभी एक हफ्ते पहले ' दीप ने ही उत्तर दे दिया। फिर उसने दीप से दो डॉलर खुला माँगा।
वह आश्चर्य से उसकी और देखा और पूछा, 'ओपल कार्ड तो लिए हो पैसे क्या होंगे ?'
दीप बोला - 'कल मैं कार्ड लाना भूल गया था, किराये के लिए पूरे खुले पैसे नहीं थे जिसके कारण दो डॉलर कम पड़ गया था।  अब क्या करता, ड्राइवर को पता लगता तो बस से उतार देता।अतः उसे बताये बिना १२ की जगह ११ डॉलर ही डाल दिया। छोटी छोटी रेजगारी थी, इस कारण उस महिला ड्राइवर को अंदाज नहीं चला। अगर जरा भी शक होता तो जाने क्या करती। मैं कल से ही परेशान था कि कहीं भूल न जाऊं।  इसीलिए
ओपल कार्ड से भुगतान नहीं कर रहा हूँ। '
आज ११ डॉलर की जगह १२ डॉलर बॉक्स में डालना है।  अगली बार जब मिलेंगे, दो डॉलर मैं लौटा दूंगा।
   

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