चुड़ैल देखा
मैं गांव के स्कूल में छठी कक्षा में पढता था। एक दिन छुट्टी के दिन एक मित्र आया और बोला, पता है बगल वाले गांव में एक बहुत बड़ी चुड़ैल है। कई बड़े-बड़े ओझा शोखा आये मगर किसी के काबू में नहीं आ रही। आज एक बहुत बड़े बाबा आये हैं। वे बड़े से बड़े भूत को भी चुटकियों में भगा देते हैं, चल देखने चलते हैं। मैंने दादी से कहा-
'दादी हम सराय, भूत देखने जा रहे हैं। उसे भगाने एक बड़े बाबा आये हैं। '
कई वर्षों के बाद, बड़े होने पर ही, उस भूत के बारे में कुछ समझ आया। सम्भवतः उसे तपेदिक रोग था । उस समय आस पास कोई डॉक्टर होता नहीं था। अस्पताल दूर होते थे और आने जाने के साधन का अभाव, और साथ ही चिकित्सा के लिए धन का अभाव। एक्स रे का तो वहां किसी ने नाम भी नहीं सुना था। छोटे मोटे रोगों के लिए बस सरलता से मिलने वाली जड़ी बूटी का प्रयोग किया जाता था और असाध्य रोग होने पर लोग झाड़ फूंक का ही सहारा लेते थे।
एस० डी० तिवारी
मैं गांव के स्कूल में छठी कक्षा में पढता था। एक दिन छुट्टी के दिन एक मित्र आया और बोला, पता है बगल वाले गांव में एक बहुत बड़ी चुड़ैल है। कई बड़े-बड़े ओझा शोखा आये मगर किसी के काबू में नहीं आ रही। आज एक बहुत बड़े बाबा आये हैं। वे बड़े से बड़े भूत को भी चुटकियों में भगा देते हैं, चल देखने चलते हैं। मैंने दादी से कहा-
'दादी हम सराय, भूत देखने जा रहे हैं। उसे भगाने एक बड़े बाबा आये हैं। '
'मत जा, ऐसी जगह नहीं जाते। मुझे पता है, रामदास की पत्नी को चुड़ैल पकड़ी है। उससे उतर कर किसी और पर भी जा सकती है। कहीं तुझे पकड़ ली तो। ' दादी बोलीं।
मैं तो डर गया। वैसे भी गांव से बाहर नदी की ओर एकाध बार मुर्दे जलते देखा था। और शाम को अँधेरा होने पर, आसमान में लपट जैसी उड़ती वस्तुएं भी कई बार देखी थीं । नदी की ओर तो दिन में भी अकेले जाने की हिम्मत नहीं होती थी। मैं उसके साथ जाने में टाल मटोल करने लगा। मगर वह लड़का एक ओर बुलाया और समझाया 'अरे चल, कुछ नहीं होगा, चुड़ैल बच्चों को थोड़े ही पकड़ती है। '
मुझे भी लगा कि वह सही बोल रहा है, क्योंकि मैंने भी बड़े लोगों को ही झाड़ फूंक करवाते देखा था और वो भी ज्यादातर औरतें। कई तो अनावश्यक पारिवारिक यातनाओं से बचने के लिए भी अपने ऊपर भूत, प्रेत या चुड़ैल आने का बहाना करती थीं। कइयों के ऊपर कीर्तन आदि में देवी भी आते देखा था। उनके ऊपर देवी आतीं तो अन्य सभी औरतें नत मस्तक हो जातीं, ऐसा करने से उन्हें विशिष्ट दर्जा प्राप्त होता।
उसके कहने पर हम तीन चार बच्चों का समूह बन गया और चुपके से वहां भूत देखने चले गए। वहां पहुंचे तो देखा कि काफी भीड़ लगी हुई थी। भीड़ के बीच में एक बाबा चोला पहने, एक त्रिशूल खड़ा किये, सामने आग सुलगाये बैठा है। वह कभी कभी आग में कुछ डाल देता जिससे आग भभक उठती और ढेर सा धुआं निकालता और वह एक मोरपंख के बने झाड़ू से धुआं को हवा करता, साथ ही कुछ मंत्रोच्चारण। यह तो हमें नहीं पता था कि उसके पास क्या शक्ति थी पर लोग कह रहे थे की बड़े सिद्ध बाबा हैं, इनके सामने कोई भूत नहीं ठहर सकता।
थोड़ी देर में उसने रामदास की पत्नी को बुलवाया। वह घर से निकल कर आई। एक एक कदम बहुत संभल कर, धीरे धीरे बढ़ा रही थी। क्योकि उसका शरीर एकदम निर्बल हो चुका था। वह चल पाने में बिलकुल भी सक्षम नहीं थी। मैला कुचैला साया-ब्लाउज पहने। ब्लाउज बहुत ढीला होने के कारण उसके कन्धों से बह रही थी । ऐसा लग रहा था कि कोई नर कंकाल जो चमड़ी से ढका हो, चला आ रहा है। एक एक हड्डी बिना एक्स रे के नजर आ रही थी। किसी भूत की परिकल्पना के द्वारा, मानस में जो चित्र बन सकता था, बस, वह वही लग रही थी। उसे देख कर, हम तो उसे ही चुड़ैल समझे और जोर से भाग चले। बाबा ने किस प्रकार झाड़ फूंक किया, वह तो देखने की हिम्मत हम नहीं जुटा पाए; पर चुड़ैल ने उसकी जान को अधिक दिन उसके पास नहीं रहने दिया। लगभग पंद्रह दिन बाद ही उसके प्राण छोड़ देने की खबर मिली ।
थोड़ी देर में उसने रामदास की पत्नी को बुलवाया। वह घर से निकल कर आई। एक एक कदम बहुत संभल कर, धीरे धीरे बढ़ा रही थी। क्योकि उसका शरीर एकदम निर्बल हो चुका था। वह चल पाने में बिलकुल भी सक्षम नहीं थी। मैला कुचैला साया-ब्लाउज पहने। ब्लाउज बहुत ढीला होने के कारण उसके कन्धों से बह रही थी । ऐसा लग रहा था कि कोई नर कंकाल जो चमड़ी से ढका हो, चला आ रहा है। एक एक हड्डी बिना एक्स रे के नजर आ रही थी। किसी भूत की परिकल्पना के द्वारा, मानस में जो चित्र बन सकता था, बस, वह वही लग रही थी। उसे देख कर, हम तो उसे ही चुड़ैल समझे और जोर से भाग चले। बाबा ने किस प्रकार झाड़ फूंक किया, वह तो देखने की हिम्मत हम नहीं जुटा पाए; पर चुड़ैल ने उसकी जान को अधिक दिन उसके पास नहीं रहने दिया। लगभग पंद्रह दिन बाद ही उसके प्राण छोड़ देने की खबर मिली ।
एस० डी० तिवारी
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