Thursday, 31 March 2016

Panchhi ki shikayat


पंछी की शिकायत 

फ्लैट तो पुराना था ही, बहुत समय से मरम्मत भी नहीं हुआ था । दीवारें बहुत गन्दी हो चली थीं, एकाध जगह तो डिस्टेंपर की पपड़ी उखड़ने लगी थी। कोमल ने नागर साहब से, इस दिवाली से पहले, फ्लैट की रंगाई-पुताई के लिए जोर डाला । नागर जी के मन में भी यही घूम रहा था, अतः उन्होंने तुरंत हां कर दिया। 'आज ही जाता हूँ, सफेदी वाले से बात करता हूँ। '
तभी कोमल ने कहा, 'लेकिन सफेदी से पहले ये खिड़की बदलवा दो।'

नागर साहब का फ्लैट ऊपर का था, खिड़कियां प्राधिकरण की ही लगी हुई थीं। जब हवा तेज चलती तो उसका शीशा उखड़कर नीचे गिर जाता। हमेशा डर बना रहता, किसी को चोट न लग जाये। अब तक तीन बार ऐसा हो चुका था। प्राधिकरण की लगाई हुई खिड़कियों पर, नागर साहब को भरोसा नहीं था, इसलिए सुरक्षा की दृष्टि से उन्होंने अतिरिक्त ग्रिल लगवा दिया था। ग्रिल घना होने के कारण प्रकाश आने में बाधित हो रहा था, यह कोमल को अच्छा नहीं लगता। वह चाहती थी कि शयन कक्ष में सोते समय आकाश का स्पष्ट दृश्य समक्ष रहे। इस बार वह एल्युमीनियम के फ्रेम में, शीशे जड़े सरकने वाले पल्लों की खिड़की चाहती थी। उसने नागर साहब से खिड़कियां बदलवाकर अल्युमिनियम का लगवाने का आग्रह किया। 

उनके शयन कक्ष की खिड़की के रोशनदान में जो ग्रिल लगा था, उस पर कबूतर का एक जोड़ा आकर बैठ जाता। और वह ग्रिल पर गन्दगी फैलाता और कोमल को बार बार उसे साफ करना पड़ता। यह कोमल को बिलकुल अच्छा नहीं लगता था। कभी कभी वह उड़ा भी देती, मगर वे ढीठ थे, फिर आकर बैठ जाते। कभी कभी तो लगता कि कबूतरों और कोमल के बीच, यह कोई खेल चल रहा हो।

नागर साहब और कोमल में सहमति बनी, घर की खिड़कियां बदल दी गयीं। उनके शयन कक्ष की भी खिड़की, जिसपर कबूतर बैठते थे बदल दी गयी और घर की रंगाई भी हो गयी। इस बार एल्युमीनियम के फ्रेम की खिड़की लगी, जिसमें शीशे के बड़े बड़े, सरकने वाले पल्ले लगे। प्रकाश आने में रूकावट न हो, इसलिए इस बार ग्रिल तो नहीं लगा, मगर नागर साहब सुरक्षा के प्रति सजग थे, उन्होंने खिड़की में कही कहीं स्टील की रॉड जड़वा दी ताकि कोई शीशा तोड़ कर फ्लैट में प्रवेश न कर सके। खिड़कियों के ऊपर बरसात के पानी से रूकावट के लिए प्लास्टिक शीट के शेड भी लगवा दिये। अब विस्तर पर लेटे, आसमान का अच्छा और विस्तृत नजारा दिखता। दिन में कभी लेटते तो कोमल और नागर साहब की नजर आसमान की ओर ही रहती।

जब तक काम चल रहा था, कबूतर का जोड़ा मकान खाली कर कहीं चला गया था और तैयार होते ही एक शहरी किरायेदार की भांति, जाने कहाँ से फिर आ टपका। अब तो वह कबूतर दम्पति बहुत प्रसन्न था। उन्हें बैठने के लिए एक बहुत ही उपयुक्त रॉड मिल गयी थी, ऊपर धूप, बारिश से बचने के लिए शेड। किसी बड़े शहर में पक्षी को और क्या चाहिए। अपनी दिनचर्या के काम करने के पश्चात वे वहीँ आकर विश्राम करते। उधर जहाँ कबूतर दम्पति को अच्छा आशियाना मिला, कोमल को नागर साहब पर शिकंजा कसने का सुन्दर अवसर।
 'मैंने कहा था न, केवल शीशा रहने दो। अब फिर से ये गन्दा करेंगे। '

उनकी बीट कभी कभी खिड़की के शीशे पर गिरती और शीशा गन्दा हो जाता। कोमल खिड़की की ओर देखती और नागर साहब को दो सुना देती। 'इसे रोज रोज कौन साफ़ करेगा।'

नागर साहब प्रकृति प्रेमी थे। उन्हें खिड़की से आसमान देखना, कभी बारिश हो तो उसे, और उस पक्षी के जोड़े को भी देखना बहुत अच्छा लगता। वे कहते, 'अरे, वह तो बाहर है, कभी कभी किसी को बुलवा कर साफ करवा लेंगे। नहीं तो मैं ही साफ कर दूंगा, उसमें है क्या!'

नागर साहब सेवानिवृत्त हैं।  कभी दिन के समय वे बिस्तर पर लेटते तो नभ के नजारे में खो जाते, दूर उड़ते पंछी, कहीं कहीं बादलों के टुकड़े, कभी कोई उड़ती पतंग, तो कभी जहाज और बाहर के मौसम का स्पष्ट अवलोकन। कोमल उन्हें सोच में खोया देखती तो बोल पड़ती, 'हरदम क्या सोचते रहते हो?' और खिड़की की गन्दगी दिखाने लग जाती। कभी कभी तो खूब ढेर सा सुना देती। नागर साहब सब सुन लेते और धीमी आवाज में कहते, 'अरे भाग्यवान खिड़की क्यों देखती हो? उस जोड़े को देखो, वे हमारी बातें सुनकर हँसते होंगे। सोचते होंगे, दो इंसान जहाँ भी होंगे झगड़ते ही होंगे, चाहे वे पति पत्नी ही क्यों न हों। देखो, इनका किसी ने मंत्रोच्चार के द्वारा विवाह नहीं कराया फिर भी ये यह स्थान छोड़कर साथ ही गए और साथ ही आ गए। वो बैठे कितने प्यार से चोंच में चोंच लड़ा रहे हैं। कभी एक अपनी चोंच से दूसरे की पीठ खुजला रहा है, तो कभी दूसरा। हम उनकी बीट को लेकर टेंशन में हैं और बिना बात के नोक झोंक। अरे, उन्हें भी तो कहीं न कहीं रहना है न। यहाँ नहीं तो घर का कोई और कोना ढूंढ लेंगे। वे तो पंख वाले परिंदे हैं, कहाँ कहाँ पीछे पड़े रहेंगे।'

नागर साहब की बात सुनकर कोमल कुछ नरम हुई, 'तुमसे भला, बातों में कौन जीत सकता है।' धीरे धीरे कोमल भी उनके प्रति उदार चित्त हो गयी और समय समय पर उनके आने जाने, पंख फड़फड़ाने, एक दूसरे से चोंच लड़ाने और परस्पर पीठ खुजलाने का आनंद लेने लगी। खिड़की तो साफ हो ही जाती, दस पंद्रह दिन में एक बार गीला कपड़ा घुमा देती; शीशे की खिड़की थी, चमक उठती। अब तो कोमल समय समय पर नागर साहब को उनकी हरकतें दिखती रहती और उस पंछी के जोड़े की शिकायत बंद कर दी थी।

     - एस० डी० तिवारी 




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