Wednesday, 2 March 2016

Samajhaunga, aur kya


समझाऊंगा, और क्या

बस स्टैंड पर खड़े प्रतीक्षा का समय समाप्त हुआ, गंतव्य को जाने वाली बस आ ही गयी। वह बूढ़ा व्यक्ति बस में सवार हुआ। पीछे की सीट वरिष्ठ नागरिक हेतु आरक्षित और उसके आगे की सीटों की पांच कतार महिलाओं के लिए आरक्षित थीं। एक युवती वरिष्ठ नागरिक वाली सीट पर बैठी थी जबकि आगे की दो तीन महिला सीटें खाली थीं।
बूढ़े व्यक्ति ने युवती से कहा, ' आप आगे वाली महिला सीट पर चले जायं तो मैं यहाँ बैठ जाऊं।'
युवती ने उत्तर दिया - 'आप ही उस पर बैठ जाइये, खाली ही तो है।'
बूढ़े व्यक्ति ने पुनः आग्रह किया और कहा 'महिला सीट तो खाली है आप उस पर क्यों नहीं चली जातीं?' उन्हें यह डर था कि बैठने पर आगे कोई महिला आ गयी तो उठना पड़ेगा।
मगर युवती को सीट से उठना शान के विरूद्ध लग रहा था।
कंडक्टर यह सब सुन रहा था पर कुछ बोला नहीं, वह भी असमंजस में था, एक तरफ बुजुर्ग तो दूसरी तरफ महिला। उसके लिए दोनों ही सम्मान व सहानुभूति के अधिकारी थे।
बूढ़े व्यक्ति के कई बार आग्रह करने पर युवती चिढ़ कर बोली, 'नहीं उठूंगी तो क्या कर लोगे अंकल?'
बूढ़े व्यक्ति ने आश्चर्य से कहा, 'क्या कर लूँगा! समझाऊंगा, और क्या। अब तुम बैठी रहो। देखता हूँ कैसे बैठी रहती हो। '
अगले  स्टैंड पर कुछ लोग चढ़े, उनसे बूढ़े व्यक्ति ने बोला, 'देखो ये महिला बुजुर्ग सीट पर बैठी हैं'।
उनमे से एक दो लोग सुनकर मुस्करा दिये और आगे बढ़ गये।
उसके अगले स्टैंड पर भी ऐसा ही हुआ। फिर तेन चार स्टैंड तक ऐसा ही हुआ। अब युवती परेशान होने लगी थी।
अंत में वह परेशान होकर सीट छोड़ ही दी और एक महिला-सीट पर बैठने को लपकी, ठीक उसी समय एक अन्य महिला उस सीट पर बैठ गयी। बेचारी युवती मुंह ताकने लगी।
वे बुजुर्ग यह देख रहे थे, सीट से खड़े हो गए, 'आ जाओ, यहाँ बैठ जाओ।'
अब युवती लौट कर कैसे आती, वह शर्म से पानी पानी थी, उधर देखा तक नहीं।  


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