Sunday, 6 March 2016

Asahishnuta intolernce

असहिष्णुता

चार पांच दिन हो गए थे ।  देख कर समझ नहीं आता था कि वो व्यायाम कर रही हैं या कोई नृत्य। हमारे यहाँ जिस प्रकार नृत्य की मुद्रायें होती हैं और शरीर के एक एक अंग को विशेष प्रकार की मुद्रा बनाकर नृत्य को  दर्शाया जाता है, ठीक उसी प्रकार वे अपने अंगों की मुद्रा बनाकर संगीतमय वातावरण में व्यायाम में तल्लीन हो जातीं। उम्र की रेखाएं किसी के चेहरे पर प्रकट ही नहीं होती।  

हार्बर पर जगह जगह बेंच लगे थे। प्रातः ही सागर की ओर मुंह करके बैठने पर अनुपम दृश्य का अवलोकन हो जाता।  जी चाहता, घंटो वहीँ बैठे रहें। वहीँ हार्बर के बगल में ही एक हरा भरा सुन्दर सा पार्क था। उसमें भी जगह जगह बेंच लगे थे। पार्क में दो तीन मंडप भी बने थे, जिसमे शाम को कई समूह, संगीत व नृत्य प्रस्तुत करते। कार्यक्रम देखने के लिए कोई शुल्क आदि नहीं था। हम तो थोड़ा टहल कर बेंच पर बैठ जाते, मगर हांगकांग के निवासी, घंटा भर तो व्यायाम करते ही। बारी बारी से प्रत्येक अंग का। लोगों का अनेकों प्रकार के व्यायाम का तरीका था, कोई भाग कर, कोई कदम ताल, कोई दिवार पकड़ , कोई हार्बर की रेलिंग पकड़, कोई बेंच को पीछे से पकड़, कोई अपनी छतरी को नचाते, कोई हाथ का, कोई पैर का, कोई सर का, अँगुलियों का, पिंडली का, मांशपेशियों का। प्रातः तो लगता वह बीच (समुद्री तट) नहीं बल्कि कोई व्यायामशाला है। पार्क में भांति भांति की व्यायाम की मशीनें लगी हैं, जिम में जाकर पैसे खर्च करने की भी आवश्यकता नहीं। खर्च करना है तो बस समय और थोड़ी शक्ति। वहां का कोई निवासी मोटा या आलसी नहीं दिखता। 

 एक युवक अपने पिता को प्रतिदिन, पहिये वाली कुर्सी पर लेकर, व्यायाम करने आता। उसे देखकर श्रवणकुमार की याद आ जाती। श्रवणकुमार भी आज होता तो कांवर नहीं बल्कि व्हील चेयर का ही प्रयोग करता।

मेरा मोटापा और लम्बाई देख कर, उनके लिए यह अनुमान लगा लेना बहुत सहज था कि मैं विदेशी हूँ। वहां का तो एक भी व्यक्ति मोटा नहीं दिखा।  क्या पुरुष, क्या स्त्री सभी स्लिम व ट्रिम यानि छरहरे बदन वाले। यह अनुपम दृश्य देखकर, हम पति पत्नी सुबह शाम दोनों समय उस स्थल पहुंच जाते और वातावरण का आनंद उठाते। यहां एक समस्या तो थी कि हम बस उनके मुख देख सकते थे और वे हमारे। एक दूसरे की भाषा समझना टेढ़ी खीर थी। बस संकेतों से हेल्लो हो जाती।

एक स्त्री मुझे बहुत ध्यान से देखती और मेरी दृष्टि उसकी ओर होते ही एक सुन्दर सी मुस्कान फेंक देती। वह अधेड़ उम्र की थी मगर देह की बनावट कोई पच्चीस वर्ष के युवती सी थी। मैं प्रतिदिन प्रातः ही पार्क में पहुँच जाता। एक दिन पार्क में, मैं उससे पहले ही पहुँच गया।  बेंच पर बैठा था, उसने आते ही 'गुड मॉर्निंग' बोल दी।  मैंने भी 'गुड मॉर्निंग' कहकर उत्तर दिया। लोग कई समूहों में बंटे, संगीत बजाकर सामूहिक व्यायाम (ऐरोबिक) भी करने लगे। मुझे तो व्यायाम से अधिक, उनका  यह नृत्य का शो लगता।  थोड़ा बहुत टहल कर बेंच पर बैठ जाता और उनका व्यायाम देखने लगता।

एक सप्ताह बीत चूका था । एक दिन वह मेरी ओर बढ़ी और हाथ पकड़ ली। मैं कुछ समझ पाता कि मुझे खींच कर बेंच से उठा दी और खींच  कर ले जाने लगी। एक सुखद आश्चर्य की अनुभूति हुई, मानो मरुभूमि में बरसात हो रही हो। सोच ही रहा था कि वह क्या करना चाह रही है, खींच कर ले गयी और एक स्थान पर खड़ा कराके इशारे से समझाने लगी कि मैं भी वैसा करूँ।  वह सब करने का तो पहले ही मन होता, पर उनके समूह में कैसे सम्मिलित हो सकता था। बस, मैं भी शुरू हो गया।  वहां आदमी, औरत सब साथ ही व्यायाम करते थे। न तो किसी को कोई झिझक, न संकोच। उसके बाद अब रोज प्रातः जाकर उस ऐरोबिक व्यायाम में सम्मिलित होने लगा। वहां किसी को कैसे भी व्यायाम करने में कोई झेंप नहीं थी। मुझे भी कोई संकोच नहीं लगा, क्योंकि कोई हंसने वाला नहीं था। वैसे भी सभी अपरिचित ही थे। तीन चार दिन बीत जाने पर तो कुछ और लोगों की मुस्कराहट मिलने लगी थी। उनकी मुस्कराहट देखकर लगने लगा कि वे मेरा स्वागत कर रहे हैं और समूह में मेरा भी स्थान बन गया है। एकाध लोग गरदन हिला कर अभिवादन करते; कोई, कुछ बोल भी देता पर मैं क्या समझता। मुझे तो लगता कि कई चिड़ियों की आवाज एक ही मुंह से निकल रही हो। मेरी भाषा उन्हें नहीं समझनी थी, इसलिए मैं चुप रहना ही उचित समझता। बस मुस्कराहटों में बात चीत हो जाती। 

एक माह, एक अलग दुनिया में रहने के पश्चात इंडिया वापस लौटने का समय आ गया। अब तो अगले दिन ही मेरी इंडिया की फ्लाइट थी। उनसे मैं बताना चाहता था कि कल इंडिया चले जाना है, लेकिन बोलकर या लिखकर बताया नहीं जा सकता था। इसलिए बहू से केक बनवा कर ले गया उनको एक एक टुकड़ा देकर इशारों से बताया की मुझे उड़ान भरनी है। केक खाकर वे झूम उठे और प्रसन्नता दर्शाने के लिए व्यायाम की कुछ कड़ियाँ बड़ी तेजी से करने लगे।  

एक माह में तो मेरा वजन पांच किलो कम हो गया था। मुझे अब समझ आया कि उन्हें मोटापा और आलस कत्तई सह्य नहीं था।  

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