खुल जा सिमसिम
कैलाश के पापा चौधरी साहब बेटे के पास, हांगकांग घूमने आये। कैलाश उन्हें हवाई अड्डे से लेकर अपने फ्लैट पर आया और नीचे से ही तीस मंजिले भवन में इक्कीसवीं मंजिल पर अपना फ्लैट दिखाने लगा तो चौधरी साहब की टोपी सरक कर पीछे गिर गयी। भवन में प्रवेश करने के लिए मुख्य द्वार पर इलेक्ट्रॉनिक्स ताला लगा था । कैलाश ताले का कोड नंबर दबाया, दरवाजा खुला और टोपी उठाकर चैधरी साहब ने भवन की लॉबी में प्रवेश किया, जहाँ से लिफ्ट के द्वारा इक्कीसवीं मंजिल पर जाना था। कैलाश का फ्लैट इक्कीसवीं मंजिल पर था।
जब चौधरी साहब फ्लैट में घुसे तो उन्हें बड़ा आश्चर्य हुआ कि इतने छोटे से फ्लैट में तीन व्यक्ति कैसे अंट गए। कैलाश और उसकी पत्नी इस छोटे से फ्लैट में रहते हैं। क्षेत्रफल पांच सौ वर्गफीट और किराया एक लाख रुपये महीना। आखिर वो हांगकांग में क्यों है। मगर थोड़ी ही देर में उन्हें समझ आ गया कि वह पूरा स्थान इस प्रकार व्यवस्थित है, जैसे की वह फ्लैट नहीं किसी मशीन का बॉक्स हो जो डिज़ाइन करके मशीन के पुर्जे फिट करने भर के लिए बनाया गया हो। एकदम छोटा सा, कहने को तीन कमरे का फ्लैट। शयन कक्ष का आकार बस ५ फ़ीट ७ फीट, कमरे में डबल बेड भी नहीं आ सकता। वहां के डबल बेड भी साढ़े चार फ़ीट चौड़े ही होते हैं। बेड रूम में घुसो तो सीधे बिस्तर पर। हाँ, बेड के पैर वाले हिस्से में दो फ़ीट छोड़कर शेष ऊपरी हिस्से में अलमारी अवश्य है, जिसमें कपड़े वगैरह आराम से रख सकते हैं। इतने छोटे से स्थान में कैलाश रहता है। इंडिया में तो चौधरी साहेब का फ्लैट यहाँ के दस फ्लैटों से भी बड़ा अकेले का ही होगा। देख कर मन ही मन कभी हंसी आती तो कभी दुखी होते इतना पैसा उसकी कंपनी देती है, अपने दोस्त मित्रों, रिश्तेदारियों में कितना नाम है कि चौधरी साहब का बेटा विदेश में काम कर रहा है और वे यह फ्लैट देख लें तो कितना बड़ा मजाक होगा।
कहने को तो डबल बेड के दो कमरे थे, मगर एक कमरे में चौधरी साहब जैसा एक ही आदमी सो सकता था। चौधरी साहब देखकर, हैरान, परेशान -
'अरे कैलाश इतने छोटे फ्लैट में कैसे रह लेते हो ?''क्या करें पापा, यहाँ इसी तरह के फ्लैट मिल पाते हैं। सभी इसी तरह के फ्लैट में रहते हैं, मेरा तो फिर भी बड़ा है। और देखेंगे तो इससे भी छोटा। मगर कोई परेशानी नहीं है। यहाँ सब कुछ मकान मालिक का है। देखिये टी वी, फ्रीज, ए.सी., वाशिंग मशीन, ओवन, गैस स्टोव, सोफा, बेड। '
'अच्छा, किराया कितना देते हो ?
'अगर इंडिया के हिसाब से देखें तो यही कोई एक लाख रुपये महीना। '
किराया सुनकर तो चौधरी साहब अवाक् रह गए। 'बताओ इतनी महंगाई। '
' इसी छोटी जगह में सब कुछ है। कोई कमी महसूस नहीं होती।' कैलाश बोला।
'मगर मुझे तो घुटन सा लग रहा है। अगर ए.सी. नहीं होता तो रह ही नहीं पाते।'
'पापा, थोड़े दिन रहने के बाद आदत पड़ जाएगी। यहाँ सभी लोग ऐसे ही रहते हैं। यहाँ के लोग खाना पीना बाहर हीं करते हैं या पैक करा के बाहर से लाते हैं। घर पर खाना बनाने का प्रचलन नहीं है, इसलिए घर में ज्यादा सामान नहीं रखते। छुट्टी के दिन भी घूमने फिरने चले जाते हैं। घर में तो बस सोने के लिए ही होते हैं । '
वास्तव में दो तीन दिन के बाद चौधरी साहब को वहां अच्छा लगने लगा। अंदर फ्रिज, वाशिंग मशीन, बड़े परदे वाला टेलीविज़न, ओवन, गैस का चूल्हा, सोफा, बेड सब अपनी जगह बड़े व्यवस्थित ढंग से था। फ्लैट तो आसमान से बातें कर रहा है, खिड़की खोलते ही दूर तक का नजारा दिखता है। कमरे से बैठे बैठे, आसमान में बादल देखने में बहुत अच्छा लग रहा था। जी चाहता था ऑंखें आकाश में ही गड़ाए रखें।
घर के पास ही हार्बर था। दिन में जब कैलाश ड्यूटी जाता चौधरी साहब हार्बर पर घूमने निकल जाते। समुद्र के तट पर जगह जगह बेंच लगे थे। कहीं बेंच पर बैठ के एकाध घंटा लहरें और आते जाते जहाज देखते, समय जाते पता ही नहीं चलता । जी चाहता, इस शांत वातावरण में एकाध घंटे यूँ ही बैठे रहें। पास में एक पार्क भी है जिसमे व्यायाम की मशीन लगी हैं। अगर इन्डिया में होता तो लोग तोड़ ताड एक और करते और नहीं तो एकाध सामान घर भी ले जाते।
उन्होंने कहावत तो सुनी थी कि दिल में जगह होनी चाहिये वो यहाँ पर दिख रही है। इन्डिया में तो लोगों के पास इतनी जगह हो के भी और हड़पने के लिए ही लगे रहते हैं। बहुत से लोग अपने घर के आगे चबूतरा, छजली, कबाड़ आदि रख के कब्ज़ा जमाये रहते हैं, दुकानदार भी दुकान के बाहर तक सामान फैला के रखते हैं। यहाँ कोई एक इंच भी अतिरिक्त जगह कब्ज़ा नहीं किया है।
कैलाश जिस बिल्डिंग में रहता था, उसका मुख्य द्वार कोड से खुलता था। कैलाश और उसकी पत्नी को तो दिन में अपने काम पर जाना होता, इसलिए कैलाश ने पापा को द्वार का कोड बता दिया ताकि यदि दिन में वे कहीं बाहर निकलें तो भवन में पुनः प्रवेश पा सकें।
एक दिन कैलाश और बहू के जाते ही चौधरी साहब सोचे, चलो हार्बर तक टहल आते हैं फिर खाना वाना खायेंगे। जाकर हार्बर पर कुछ देर बैठे, कुछ समय पार्क में बिताये उसके पश्चात दोपहर तक घर वापिस आये। उन्होंने गेट का कोड दबाया पर दरवाजा खुला ही नहीं। कोड में एक अक्षर और चार संख्याएँ थीं । यह सोचकर संभवतः वे नम्बर गलत दबा रहे होंगे, उसे उलट पलट कर दबा के देखा, पर दरवाजा खुलने का नाम ही नहीं ले रहा था। अक्षर को पहले लगा के फिर बाद में लगा के कई तरह से देख लिया पर दरवाजा नहीं खुला। इतने में सुरक्षा गार्ड आ गया। चौधरी साहब को लगा की वह इनकी मदद करेगा, पर वह इन्हें पहचाना तक नहीं, और दरवाजा खोलकर अंदर चला गया। जब चौधरी साहब ने अंदर जाने का प्रयत्न किया तो उन्हें वहीँ रोक दिया। जब चौधरी साहब आये थे तो दूसरे गार्ड की ड्यूटी थी। चौधरी साहब उसे अपनी बात समझा भी नहीं सकते थे, क्योंकि उसे चीनी भाषा के अतिरिक्त और कोई भाषा नहीं आती। अब तो इधर उधर करते, शीशे के दरवाजे से इशारों में समझाते, पर कोई लाभ नहीं। शाम होने को आ गयी, इधर चौधरी साहब भूख से तड़प रहे थे। वहां रेस्तरां में भी उनके खाने लायक कुछ है या नहीं, पता नहीं। इस कारण चीनी रेस्तरां में जाना उन्हें गवारा नहीं।
तभी चौधरी साहब को एक उपाय सूझा। वे प्रतीक्षा करने लगे कि कोई व्यक्ति जब गेट से घुसे तो साथ वे भी घुस जांय। तभी एक व्यक्ति के दरवाजा खोलकर घुसते ही, ये भी पीछे से अंदर चले गये। गार्ड ने उन्हें रोका तो उसे अपने फ्लैट की चाभी दिखा दिया ताकि उसे विश्वास हो जाय कि वे वहीं रहते हैं। गार्ड उनकी बात समझ गया और उनके साथ फ्लैट तक गया। जब चाभी सही लग गयी तो वह वापस आ गया। अब चौधरी साहब के जान में जान आयी। वे काफी थक गए थे और भूखे थे ही। बहू सुबह ही पराठे सब्जी बना कर गयी थी, चौधरी साहब ने दो पराठा लिया और गरम करके खाया। कैलाश कुछ जल्दी छुट्टी कर के, थोड़ी देर बाद ही आ गया।
तभी चौधरी साहब को एक उपाय सूझा। वे प्रतीक्षा करने लगे कि कोई व्यक्ति जब गेट से घुसे तो साथ वे भी घुस जांय। तभी एक व्यक्ति के दरवाजा खोलकर घुसते ही, ये भी पीछे से अंदर चले गये। गार्ड ने उन्हें रोका तो उसे अपने फ्लैट की चाभी दिखा दिया ताकि उसे विश्वास हो जाय कि वे वहीं रहते हैं। गार्ड उनकी बात समझ गया और उनके साथ फ्लैट तक गया। जब चाभी सही लग गयी तो वह वापस आ गया। अब चौधरी साहब के जान में जान आयी। वे काफी थक गए थे और भूखे थे ही। बहू सुबह ही पराठे सब्जी बना कर गयी थी, चौधरी साहब ने दो पराठा लिया और गरम करके खाया। कैलाश कुछ जल्दी छुट्टी कर के, थोड़ी देर बाद ही आ गया।
चौधरी साहब ने उसे सारी बात बताईं। कैलाश सुनकर बहुत दुःखी हुआ। दरअसल इस सारी घटना में उसी की गलती थी और वह अपने किये पर बहुत पछता रहा था। भवन के मुख्य द्वार का पासवर्ड, सुरक्षा कारणों से हर महीने के पहले बुधवार को बदल दिया जाता था और सभी निवासियों को मैसेज कर दिया जाता था। आज महीने का पहला बुद्धवार था। नया पासवर्ड का मैसेज तो कैलाश को आया था परन्तु वह पापा को बताना भूल गया। चौधरी साहब के पास पहले वाला ही पासवर्ड था।
अब कर भी क्या सकते थे जो होना था हो चुका, कैलाश पछताने और पिता जी से माफी मांगने के सिवा और कुछ नहीं कर सकता था । हाँ, नया पासवर्ड एक कागज पर लिख कर उन्हें दे दिया।
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