Friday, 1 April 2016

Secretary sahab

सेक्रेटरी साहब 

आज, उनका वो मकान वीरान सा हो गया है। एक कमरा अनाज का गोदाम बना हुआ है, दूसरे कमरे में ताला लगा रहता है जो कभी कभार मेहमानों के आने पर ही खुलता है। बरामदे में एक दो चारपाई खड़ी रहती हैं, और कुर्सियों को एक के ऊपर एक रखे हफ्तों बीत जाते हैं। हाता में अब न तो कोई फूल खिलता है, न ही कोई पूजा के लिए तोड़ने आता है। कई पौधे सूख चुके हैं। हाता में लगा हैण्ड पंप भी सूखा रहता है। जब जब आवश्यकता पड़ती है, उसमें पानी डाल कर चालू किया जाता है।  न तो कोई चाय पीने आता है, न ही अख़बार पढने। झाड़ू लगे भी हफ़्तों हो जाते हैं। घर में कई जगह जाले लगे हुए हैं, और अनेकों छिपकलियों का बसेरा है। धूल से ढकी उनकी साईकिल, बिना हवा के बरामदे के एक कोने में खड़ी है। कभी यहाँ दिन भर रौनक रहती थी, अब कोई झांकने भी नहीं आता। एक कुत्ता, कभी कभी मकान के द्वार पर आता है और कुछ देर बैठकर चला जाता है। यह उन्हीं कुत्तों में से एक है, जो उनके पास मिलने आते रहते थे । यही उनका सबसे प्रिय कुत्ता था, जिसे शेरू कहकर बुलाते थे। 

राज्य सरकार की सेवा से निवृत्त होने के पश्चात सेक्रेटरी साहब अपने गांव चले आये। सी० डी० पांडेय, अपनी नौकरी से अपना नया नाम लेकर आये थे, सभी लोग उन्हें सेक्रेटरी साहब के नाम से जानते थे। यूँ तो उनके परिवार का बंटवारा हो चुका था, उन्होंने अपने चचेरे भाई के बगल में अपना अलग मकान बनवा लिया था। चूकि सेक्रेटरी साहब, पत्नी के स्वर्गवास हो जाने के कारण अकेले रह गए थे, उनका भोजन चचेरे भाई के यहाँ ही बनता था।सेक्रेटरी साहब ने अपनी तीनों बेटियों का अपने कार्यकाल में ही, अच्छा विवाह कर दिया था। तीनों ही संपन्न परिवार में व्याही थीं। उनकी ओर से वे पूर्णतः चिंतामुक्त थे। बंटवारे में उनके हिस्से में अंदर वाला मकान आया, परन्तु सेक्रेटरी साहब स्वतंत्र और स्वछन्द रहने वाले व्यक्ति थे, इसलिए अंदर वाला मकान, अपने चचेरे भाई के परिवार के रहने के लिए छोड़ दिया और अपने लिए बाहर खुले में एक अलग मकान बनवा लिया था।अंदर वाले मकान में तो उन्हें जाना भी पसंद नहीं था। मिलनसार प्रकृति के होने के कारण, उनके पास आने वालों का भी ताँता लगा रहता था।

उनका नया घर बहुत खुला था, आगे बड़ा सा बरामदा, उसके आगे थोड़ी सहन जो पांच फुट की चारदीवारी से घिरी थी और उसी में फूल फुलवारी। बरामदे और सहन में मिलाकर, काफी लोगों के सोने, बैठने के लिए स्थान था। अकेले बरामदे में ही दस बारह चारपाई सरलता से बिछ जाती। उनका घर लगता था, जैसे कोई आश्रम हो। लोगों के प्रति उनका असीम प्यार और उनका, उनसे मिलने जुलने आना ही, अलग मकान  बनवाने का मुख्य कारण था। उस समय गांव में किसी के यहाँ टेलीविज़न नहीं था, उन्होंने टेलीविज़न लगवा दिया था, जिससे गांव के कई बच्चे वहीँ बैठे रहते। जब टेलीविज़न पर, क्रिकेट का मैच आता तो उनका घर, कोई छोटा मोटा स्टेडियम सा लगने लगता। गांव की कुछ स्त्रियां, पूजा का फूल लेने इन्हीं के हाता में आतीं। उन्हें विश्वास था वहां गेंदे या गुड़हल का फूल अवश्य ही मिल जायेगा। गुलाब का फूल सेक्रेटरी साहब को अति प्रिय था, अतः तोड़ने से मना कर देते। वैसे भी गुलाब के फूल थोड़े होते। सेक्रेटरी साहब का मकान, उनके अकेले रहते हुए भी कितना गुलजार रहता, वर्णन करना कठिन है।

चचेरे भाई के परिवार के लोग तो मान सम्मान करते ही, पास पड़ोस के लोग क्या, दूसरे गांव के लोग भी, उन्हें बहुत आदर सत्कार देते। भाई पट्टेदार का भी कोई मेहमान आता, खा पीकर सोने इन्हीं के यहाँ आता। सबको इन्हीं के यहाँ अच्छा लगता। वे लोगों से बड़े प्रेम से मिलते, एकाध लोग जब दरवाजे पर आ जाते तो माहौल ठहाकों और कहकहों से गूँज जाता। सेक्रेटरी साहब के यहाँ पर्याप्त मात्रा में खटिया, बिछौना पड़ा रहता। कितने भी मेहमान आ जायँ, उनको ठहराने में कोई परेशानी नहीं होती। यहाँ तक कि पास पड़ोस के लोग भी मेहमान आने पर, खटिया बिछौना मांगकर ले जाते। उन्हें पेंशन मिलती थी और उनके ऊपर कोई दायित्व नहीं था। पेंशन की राशि वे चचेरे भाई की मदद के अतिरिक्त, आतिथ्य सत्कार और नेवता हँकारी आदि में खर्च कर देते। 

सेक्रेटरी साहब तड़के ही उठ जाते। वे नित्य प्रातः की क्रिया से निवृत्त होते और स्टोव जलाकर बड़े भगौने में दस पंद्रह कप चाय का पानी रख देते। जब तक चाय का पानी खौलता, बरामदे में और आगे के सहन में झाड़ू लगा लेते। इधर चाय उबाल लेना आरम्भ करती, धीरे धीरे आस पास के लोग, जुटना शुरू हो जाते। बरामदे में चारपाई और आठ-दस प्लास्टिक की कुर्सियां हमेशा पड़ी रहती थीं। जिसको जहां स्थान मिलता, आसीन हो जाता। फिर सेक्रेटरी साहब भगौने की चाय, एक बड़ी सी केतली में छान लेते, और एक हाथ में स्टील के कप और दूसरे में चाय की केतली उठाकर चल देते। लगता कि गाड़ी के आने का समय हो गया है, और वे प्लेटफॉर्म पर चाय लेकर तैयार हैं। केतली और कप लेकर, वे एक एक व्यक्ति के पास जाते; पहले कप पकड़ाते, फिर केतली से चाय उलच देते। एक दो लोग तो चाय पीकर शीघ्र चले जाते, मगर कुछ लोग अख़बार की प्रतीक्षा में बैठे रह जाते। कुछ इधर उधर की बातें होतीं, इतने में अख़बार आ जाता और एक एक पन्ना, प्रसाद की भांति बंट जाता। थोड़ी देर में पन्नों की अदला बदली होती। लगभग एक घंटे तक यह कार्यक्रम चलता, यहीं पर क्षेत्रीय अलिखित समाचारों का भी आदान प्रदान हो जाता। 

उनकी पत्नी सेवानिवृत्ति के कुछ ही वर्षों बाद साथ छोड़ गयीं थीं। बेटियां उन्हें अपने यहाँ बुलातीं, परन्तु वे अपनी यह जिम्मेदारी छोड़ कर जल्दी कहीं नहीं जाते। जब किसी रिश्तेदारी में कोई शादी व्याह आदि पड़ता; वे तभी घर से निकलते। यहाँ तक कि बेटी दामाद भी आते, तब भी सुबह की चाय वे ही बनाते। अगर वे बनाने को कहतीं तो कहते, 'ठीक है, तुम लोग तो रोज बनाती ही हो, जा के ससुराल में बनाना।' उनके सबसे छोटे बेटी दामाद जब दिल्ली से आते तो सबसे पहला कप उनके ही हाथ में पकड़ाते, कप खाली होने से पहले ही एक बार फिर पहुँच जाते और भर देते। नहीं करने पर बोलते, 'मुझे पता है शहर के लोग बहुत चाय पीते हैं।'

उनके दरवाजे पर, दो तीन कुत्ते हमेशा रहते थे । पालतू नहीं होते हुए भी सेक्रेटरी साहब के द्वार पर आकर बैठ जाते। भाई के यहाँ से, उनके भोजन में कुत्तों के लिए अलग से रोटी आती और उनके खाने के लिए अलग से बर्तन भी रखा था। बाकी कुत्तों को एक दो रोटी डाल देते, जिसे खाकर, वे कहीं और मुंह मारने चले जाते। शेरू को वे अलग से खिलाते और अन्य कुत्तों से अधिक खाने को देते। शेरू कहीं और नहीं जाता था।  दिन भर वहीँ आस पास ही समय बिताता था। यदि कोई  बाहरी व्यक्ति आ जाता और सेक्रेटरी साहब घर पर नहीं होते तो वह गुर्राने लगता। यदि सेक्रेटरी साहब घर पर होते तो किसी को कुछ नहीं कहता। सेक्रेटरी साहब में एक कमी अवश्य थी, वे कहीं किसी रिश्तेदारी में जाते तो शेरू को साथ नहीं ले जाते। शेरू उदास बैठा रहता। वैसे उनके भाई भतीजे शेरू को खाने को दे तो देते पर समय, असमय और वो भी उसकी पसंद का नहीं।  एक दिन सेक्रेटरी साहब, किसी रिश्तेदारी में गए। शाम को भोजन के बाद मुन्नु की नजर, शेरू पर पड़ी। वह द्वार पर चुपचाप बैठा था। उसने उसके लिए तुरंत रोटियां मंगायी और उसके सामने डाल दिया। शेरू रोटी सूंघ कर हट गया। रात भर वह भूखे रहा पर रोटी नहीं खाया। मुन्नू के साथ, सभी लोग आश्चर्य में थे; आखिर शेरू ने रोटी क्यों नहीं खाया।  वे अनुमान लगा रहे थे, सम्भवतः सेक्रेटरी साहब नहीं हैं, इसलिए वह उदास होगा। अगले दिन सेक्रेटरी साहब आ गए, उनसे शेरू के न खाने की बात बतायी गयी। उन्होंने रोटी मंगाई और उसके टुकड़े करके शेरू के बर्तन में दूध के साथ परोस दिया। वह लप लप कर, सब खा गया। वास्तव में, उन्होंने, कुत्ते को दूध के साथ रोटी खाने का ऐसा चाव डाला कि वह दूध के बिना रोटी खाता ही नहीं था और यह बात और किसी को नहीं पता थी।  

सेक्रेटरी साहब की यह दिनचर्या, पैतीस साल तक निरन्तर अबाध्य चलती रही। उनकी पेंशन की राशि लोगों को प्रसन्न रखने और त्यौहार आदि मनाने में खर्च हो जाती। उनके ऊपर कोई और दायित्व नहीं था; तीनों बेटियां अपने अपने घर में संपन्न और खुशहाल थीं। वे सेक्रेटरी साहब से कभी कुछ लेने की उम्मीद भी नहीं करतीं, अपितु उन्ही से उनकी आवश्यकता पूछती रहतीं। खाने पीने के लिए खेत पर्याप्त था। उनकी खेती बारी की जिम्मेदारी उनके चचेरे भाई के परिवार पर ही थी और खेत की पैदावार को वही रखते थे। गांव के बच्चों का त्यौहार इन्हीं के यहाँ मनता। दिवाली पर पटाखे छोड़ने हों, होली पर ठंडई हो या जन्माष्टमी की झांकी या संकीर्तन; गांव के लोग इनके यहाँ जुट जाते और सेक्रेटरी साहब का मन आह्लादित हो जाता। सेक्रेटी साहब, गांव, घर, भाई, दयाद आदि में कोई शादी व्याह पड़ता, तो कुछ न कुछ वित्तीय मदद अवश्य कर देते। उन्हें न तो कोई चुनाव लड़ना था, न ही मिडिया की सुर्ख़ियों में आना था। इतना कुछ वे मात्र इसलिए करते कि 'इंसान का इंसान से हो भाई चारा'। वे इंसान से इंसान के प्यार को बहुत महत्त्व देते और स्वयं इसका एक अद्भुत उदाहरण थे। सेक्रेटरी साहब बड़े गर्व से कहते, सरकारी नौकरी में उन्होंने वो नहीं कमाया, जितना सेवानिवृत्ति के पश्चात् कमाया। 

उनके नब्बै पार होने पर, गांव वाले पहले ही चिंतित होने लगे थे। उनके बाद का हाल सोच कर, वे दुखी हो जाते। जिस दिन सेक्रेटरी साहब नहीं होंगे, यह जगह कितनी विरान हो जाएगी। कौन आएगा यहाँ चाय पीने। ये फूल फुलवारी, पानी देने वाला भी कोई होगा या नहीं। कुत्तों को रोटी कौन खिलायेगा। अख़बार तो बंद ही हो जायेगा। समय का पहिया घूमता रहा, पहले भी एक बार दौरा पड़ चुका था। एक दिन गांव की हवाओं को नम होना ही था। यूँ तो कोई अमर नहीं होता, मगर उनका नाम पूरा गांव एक हीरो की तरह गाता रहेगा। 

एस० डी० तिवारी 

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