खरबूजे को देख रंग
पटेल जी के पड़ोसी कुंदन लाल का साला अमेरिका में रहता था। जब भी कुंदन लाल, उनके साथ उठता बैठता, वह अमेरिका की ही बातें करता। कुंदन लाल द्वारा अमेरिका की तारीफ सुन सुन कर, पटेल जी के कान पक जाते। वहां की सुन्दर व्यवस्था, वहां की साफ सफाई, वहां इतनी आमदनी है कि एक महीने के अंदर कार खरीद लो, आदि, आदि। दो तीन साल की कमाई में तो यहाँ बड़ा सा घर भी खरीद लो। लोग बड़े बंगलों में रहते हैं। जबसे वीरेंदर अमेरिका गया है, वहां पर कितना कुछ बना लिया है और यहाँ भी घर कितना सुधार दिया। उसके पास महँगी वाली कार है, घर में स्विमिंग पूल; इत्यादि। यह सब सुनकर, पटेल जी को तो ऊबन होती पर बेटे अंकित के मन में और जानने की जिज्ञासा उठती। धीरे धीरे उसके मन में भी अमेरिका जाने का सपना घर कर लिया । परन्तु, अमेरिका जाने का उसे रास्ता कौन बताये।
एक दिन उसे पता लगा कि पडोसी के यहाँ वीरेंदर आया हुआ है, अंकित की जिज्ञासा उसके पास खींच ले गयी।
'अरे, वीरेंदर ! कब आये?'पटेल जी के पड़ोसी कुंदन लाल का साला अमेरिका में रहता था। जब भी कुंदन लाल, उनके साथ उठता बैठता, वह अमेरिका की ही बातें करता। कुंदन लाल द्वारा अमेरिका की तारीफ सुन सुन कर, पटेल जी के कान पक जाते। वहां की सुन्दर व्यवस्था, वहां की साफ सफाई, वहां इतनी आमदनी है कि एक महीने के अंदर कार खरीद लो, आदि, आदि। दो तीन साल की कमाई में तो यहाँ बड़ा सा घर भी खरीद लो। लोग बड़े बंगलों में रहते हैं। जबसे वीरेंदर अमेरिका गया है, वहां पर कितना कुछ बना लिया है और यहाँ भी घर कितना सुधार दिया। उसके पास महँगी वाली कार है, घर में स्विमिंग पूल; इत्यादि। यह सब सुनकर, पटेल जी को तो ऊबन होती पर बेटे अंकित के मन में और जानने की जिज्ञासा उठती। धीरे धीरे उसके मन में भी अमेरिका जाने का सपना घर कर लिया । परन्तु, अमेरिका जाने का उसे रास्ता कौन बताये।
एक दिन उसे पता लगा कि पडोसी के यहाँ वीरेंदर आया हुआ है, अंकित की जिज्ञासा उसके पास खींच ले गयी।
'बस आज ही '
'और अमेरिका से कब आये? '
'तीन चार दिन हो गए। सोचा, थोड़ा फुआ, फूफा से मिल आऊँ, चला आया।'
'और, कब तक रहना है?'
'`एक महीने के लिए आया हूँ '
फिर अंकित अमेरिका के बारे में एक एक करके सवाल दागता रहा, वीरेंदर उत्तर देता रहा। कई बातें तो अंकित को सपने सी लगीं। वीरेंदर ने बताया कि वहां लोगों की बड़ी अच्छी आय है, सुविधा की सब वस्तुएं बड़ी सरलता से प्राप्त हो जाती हैं, ऐश की जिंदगी है। सबके पास, सभी आधुनिक वस्तुएं हैं। लोगों का अनुशासित जीवन है, कोई किसी को तंग नहीं करता। सभी अपने अपने तरीके से रहते हैं। साफ सफाई के पूछने क्या, एक तिनका भी सड़क पर फैला हुआ नहीं मिलेगा। वहां जीवन और प्रकृति का सामंजस्य भी सुन्दर है, आदि आदि।
यह सब सुनकर, अंकित के मन में और जिज्ञासा बढ़ना स्वभाविक था। उसने पहले भी सुन रखा था कि अमेरिका में बड़ी सरलता से नौकरी मिल जाती है, वहां ठाट की जिंदगी होती है, यह सब बातें उसे गुदगुदाती रहतीं। वह हमेशा सोचता था कि अमेरिका चला जाए और ठाट से रहे। खूब रूपया पैसा कमा लेगा तो यहाँ भी अपने घर की दशा बदल देगा। उसने वीरेंदर से बोला,'यार, मुझे भी ले चलो।'
'मगर वहां सीधे जा पाना तो लगभग असंभव सा है। यदि कोई कंपनी अमेरिका में नौकरी दे, और वहां से वीसा भेजे तो ही जा पाओगे।'
'हूँ .. मुझे ऐसे कौन सी अमेरिकन कंपनी नौकरी देगी ! तुम कैसे गए थे?'
'मैं तो बी. टेक. करके एम. एस. करने वहां गया और एम. एस. के बाद, वहीं जॉब मिल गयी।'
'तो मेरा भी बी. टेक. का अंतिम वर्ष है, वहां एम. एस. में ही दाखिला दिला दो।'
'पर वहां से एम. एस. करने का खर्च बहुत अधिक है। तुम लोग कैसे कर पाओगे।'
'वो मैं पापा से बात करता हूँ। लेकिन सुना है, उच्च शिक्षा के लिये जाने वाले वहां कोई अल्पकालिक जॉब ढूंढ लेते हैं और अपनी पढ़ाई के खर्च का कुछ हिस्सा निकाल लेते हैं। बस प्रारंभिक खर्च की ही कठिनाई है।'
'हाँ वो तो है, वहां का खर्च लगभग पंद्रह लाख प्रति वर्ष है। फिर उसके अतिरिक्त पहले जी. आर. ई. और टॉफेल पास करना पड़ेगा। बाकी देख लो, मुझसे जो मदद होगी बता देना।'
बस अंकित को तिनके का सहारा मिल गया। उसने वीरेंदर का फ़ोन न. ले लिया और घर आते ही अपने मम्मी पापा से बी. टेक. के बाद एम्. एस. की पढ़ाई के लिए अमेरिका जाने की बात छेड़ दिया। पटेल जी ने यह कहकर बात टाल दिया पहले बी. टेक. तो कर लो। बी. टेक. अब क्या देर थी, एक महीने बाद ही अंतिम सत्र की परीक्षा होनी थी, अंकित अंकित इधर उधर से और जानकारी एकत्र करने लगा और टॉफेल (टेस्ट ऑफ़ फॉरेन इंग्लिश लैंग्वेज) की परीक्षा का फॉर्म भी भर दिया। उसकी अंग्रेजी ठीक ठाक थी, टॉफेल की परीक्षा सरलता से पास कर लिया।
मगर अब समस्या यह थी कि वह आगे किस कोर्स में और किस संस्थान में प्रवेश ले, उसकी लागत क्या आएगी; इन बातों की जानकारी नहीं थी। इसके लिए किसी की मदद लेनी थी जो इन सबके बारे में बताये। उसे वीरेंदर से ही एक एजेंट का नाम पता चल गया था। जब अंकित एजेंट के पास गया उसे यह पता चला कि इसके लिए उसे जी. आर. ई. (ग्रेजुएट रिकॉर्ड एग्जामिनेशन) की परीक्षा और पास करनी पड़ेगी तथा एम. एस. करने का दो वर्ष खर्च लगभग ३० लाख होगा। तीस लाख सुनकर उसे लगने लगा कि इतने रुपयों की बात सुनेंगे तो मम्मी पापा बिलकुल भी नहीं मानेंगे।
यह सब सुनकर, अंकित के मन में और जिज्ञासा बढ़ना स्वभाविक था। उसने पहले भी सुन रखा था कि अमेरिका में बड़ी सरलता से नौकरी मिल जाती है, वहां ठाट की जिंदगी होती है, यह सब बातें उसे गुदगुदाती रहतीं। वह हमेशा सोचता था कि अमेरिका चला जाए और ठाट से रहे। खूब रूपया पैसा कमा लेगा तो यहाँ भी अपने घर की दशा बदल देगा। उसने वीरेंदर से बोला,'यार, मुझे भी ले चलो।'
'मगर वहां सीधे जा पाना तो लगभग असंभव सा है। यदि कोई कंपनी अमेरिका में नौकरी दे, और वहां से वीसा भेजे तो ही जा पाओगे।'
'हूँ .. मुझे ऐसे कौन सी अमेरिकन कंपनी नौकरी देगी ! तुम कैसे गए थे?'
'मैं तो बी. टेक. करके एम. एस. करने वहां गया और एम. एस. के बाद, वहीं जॉब मिल गयी।'
'तो मेरा भी बी. टेक. का अंतिम वर्ष है, वहां एम. एस. में ही दाखिला दिला दो।'
'पर वहां से एम. एस. करने का खर्च बहुत अधिक है। तुम लोग कैसे कर पाओगे।'
'वो मैं पापा से बात करता हूँ। लेकिन सुना है, उच्च शिक्षा के लिये जाने वाले वहां कोई अल्पकालिक जॉब ढूंढ लेते हैं और अपनी पढ़ाई के खर्च का कुछ हिस्सा निकाल लेते हैं। बस प्रारंभिक खर्च की ही कठिनाई है।'
'हाँ वो तो है, वहां का खर्च लगभग पंद्रह लाख प्रति वर्ष है। फिर उसके अतिरिक्त पहले जी. आर. ई. और टॉफेल पास करना पड़ेगा। बाकी देख लो, मुझसे जो मदद होगी बता देना।'
बस अंकित को तिनके का सहारा मिल गया। उसने वीरेंदर का फ़ोन न. ले लिया और घर आते ही अपने मम्मी पापा से बी. टेक. के बाद एम्. एस. की पढ़ाई के लिए अमेरिका जाने की बात छेड़ दिया। पटेल जी ने यह कहकर बात टाल दिया पहले बी. टेक. तो कर लो। बी. टेक. अब क्या देर थी, एक महीने बाद ही अंतिम सत्र की परीक्षा होनी थी, अंकित अंकित इधर उधर से और जानकारी एकत्र करने लगा और टॉफेल (टेस्ट ऑफ़ फॉरेन इंग्लिश लैंग्वेज) की परीक्षा का फॉर्म भी भर दिया। उसकी अंग्रेजी ठीक ठाक थी, टॉफेल की परीक्षा सरलता से पास कर लिया।
मगर अब समस्या यह थी कि वह आगे किस कोर्स में और किस संस्थान में प्रवेश ले, उसकी लागत क्या आएगी; इन बातों की जानकारी नहीं थी। इसके लिए किसी की मदद लेनी थी जो इन सबके बारे में बताये। उसे वीरेंदर से ही एक एजेंट का नाम पता चल गया था। जब अंकित एजेंट के पास गया उसे यह पता चला कि इसके लिए उसे जी. आर. ई. (ग्रेजुएट रिकॉर्ड एग्जामिनेशन) की परीक्षा और पास करनी पड़ेगी तथा एम. एस. करने का दो वर्ष खर्च लगभग ३० लाख होगा। तीस लाख सुनकर उसे लगने लगा कि इतने रुपयों की बात सुनेंगे तो मम्मी पापा बिलकुल भी नहीं मानेंगे।
दो महीने बीत चुके थे। अंकित जी. आर. ई. की परीक्षा में बैठ गया और पास कर लिया तब तक उसका बी. टेक. का परिणाम भी आ गया। अब उसने पापा से अमेरिका की बात फिर से छेड़ दिया।
'पापा! मेरा बी. टेक. पूरा हो गया, इसके अलावा टॉफेल और जी. आर. इ. भी पास कर लिया। अब अमेरिका जाने के लिए फाइनेंस प्रबंध करना है।'
'बहुत ख़ुशी की बात है बेटा, जी. आर. इ. कर लिया तो इंडिया में भी कहीं न कहीं नौकरी मिल जाएगी, अमेरिका जाने की क्या जरूरत है।'
'नहीं पापा मुझे एम. एस. करना है।'
'तो यहीं से एम. टेक. कर लो। यहाँ भी अच्छे इंस्टिट्यूट हैं।'
'नहीं पापा, फिर यहीं नौकरी करनी पड़ेगी। अमेरिका जितना पैकेज कहां मिलेगा।'
'तो खर्च भी सोचा है !'
'यही, लगभग ३० लाख, मैंने एजेंट से पूछा था।''पापा! मेरा बी. टेक. पूरा हो गया, इसके अलावा टॉफेल और जी. आर. इ. भी पास कर लिया। अब अमेरिका जाने के लिए फाइनेंस प्रबंध करना है।'
'बहुत ख़ुशी की बात है बेटा, जी. आर. इ. कर लिया तो इंडिया में भी कहीं न कहीं नौकरी मिल जाएगी, अमेरिका जाने की क्या जरूरत है।'
'नहीं पापा मुझे एम. एस. करना है।'
'तो यहीं से एम. टेक. कर लो। यहाँ भी अच्छे इंस्टिट्यूट हैं।'
'नहीं पापा, फिर यहीं नौकरी करनी पड़ेगी। अमेरिका जितना पैकेज कहां मिलेगा।'
'तो खर्च भी सोचा है !'
तीस लाख सुनकर तो माँ का तो माथा ठनक गया, ' तीस लाख! इतनी बड़ी रकम तो घर बेचकर भी पूरी नहीं होगी।'
'तो बैंक से लोन ले लेते हैं। कर्ज भी पूरा नहीं उठाएंगे, शुरू के थोड़े से पैसे लेंगे, फिर मैं वहां कोई पार्ट टाइम कर लूँगा।'
पटेल जी बोले, 'बैंक से लोन लेना भी कौन सा आसान काम है।'
पटेल जी इस बात से मन में तो प्रसन्न होते हैं कि पडोसी को पटखनी देने का अच्छा अवसर है, वह अमेरिका की बड़ी बड़ी बातें करता है। बेटा जब अमेरिका चला जायेगा तो अपना भी एक रुतबा होगा पर इतनी राशि का प्रबंध करना भी एक कठिन कार्य है। फिर भी वे अंकित को इस काम में सफल बनाना चाहते थे। वे लोन के बारे बैंकों से बात करने लगे। बैंकों की शर्तें सुनकर, और जमानत के लिए सारी संपत्ति गिरवी रखने की बात सुनकर पस्त हो जाते। सभी पहलुओं पर विचार करके वो अंकित से बोले, 'अमेरिका जाने का सपना छोड़ो, मैं इतने पैसों का प्रबंध नहीं कर पाउँगा।'
'आप चिंता मत करिये, मेरे एक दोस्त के पापा बैंक में मैनेजर हैं, मैं उनसे बात करता हूँ। और आपका दस लाख भी लगने दूंगा, वहां जाकर कुछ न कुछ कर ही लूंगा। बस दो वर्ष की समस्या है उसके बाद तो पैसे ही पैसे होंगे। आपको कभी पैसे के बारे में नहीं सोचना पड़ेगा। बस आप बैंक के लिए जमानत की व्यवस्था कर दीजिये।'
'लेकिन सुना है, अमेरिका वाले वीसा देने में बहुत नखरे दिखाते हैं।'
'वो तो मैं एजेंट के माध्यम से करवाऊंगा। कागज वगैरह की औपचारिकता वही करवाएगा। पहले भी कई लोगों को भिजवा चूका है। पैसे की चिंता तो बिल्कुल मत करिये, वहां जाकर असिस्टेंटशिप कर लूँगा और बाकी का खर्च निकाल लूँगा।'
पटेल जी अपने बैंक खंगालने लगे तो पता चला उनके पास मात्र पांच लाख की एक एफ. डी. है और उसके अतिरिक्त कुल मिलकर एक लाख तक और हो सकते हैं। इन पैसों को वे बेटी स्नेहा के विवाह में खर्च करने के लिए सुरक्षित रखे थे। एक बार फिर से उन्होंने अंकित को यही कहा, 'चलो छोडो, यहीं कहीं नौकरी ढूंढ लो, देख रहे हो न, इतनी महंगाई में कैसे गुजारा कर रहे हैं। अभी तुम्हारी बहन की शादी के लिए भी पैसे चाहिए होंगे। अगर पढ़ना ही है तो यहीं मास्टर्स में दाखिला ले लो, यहाँ भी क्या कमी है। पढने वाले लड़कों के लिए कहीं भी कोई परेशानी नहीं है।'
अंकित मायूस हो गया। मुंह बनाकर अपने कमरे में चला गया। अब तो वह इंडिया में ही कहीं जॉब ढूंढने की सोचने लगा। एक दिन अचानक एजेंट का फ़ोन आ गया, और अंकित से उसके कार्क्रम के बारे में पूछने लगा। अंकित ने सब सही सही बता दिया। एजेंट ने उसे अपने यहाँ बुलाया और समझाया बैंक से लोन केवल मंजूर कराना होगा और विश्वविद्यालय को किस्तों में देना होगा। जो बच्चे पहले गए हैं बस पहली किस्त देकर बाकी पैसे नहीं लिये, वहीं पर कुछ छोटा मोटा काम कर लिया या जूनियर कक्षा के छात्रों को पढ़ाकर अपना खर्च निकाल लिए। शुरू में तो इंस्टिट्यूट को लोन की स्वीकृति पत्र और कोई पांच लाख भेजने पड़ेंगे। तुमने जी. आर. ई. और टॉफेल कर लिया है। यह कोई आसान काम नहीं है। इस अवसर को हाथ जाने मत दो। जी. आर. ई. करके भी अमेरिका न जा पाओ तो तुम्हारी बदकिस्मती ही होगी।
इस बात से उत्साहित होकर, अंकित एक बार फिर अपने अमेरिका जाने के प्रोजेक्ट पर जुट गया। एक बैंक में उसके दोस्त के पिता काम करते थे उनके पास जाकर और जानकारी लिया। फिर घर आकर पापा को समझाया कि वे एफ. डी. बैंक के के पास गिरवी रखकर लोन मंजूर करवा लें और बस पांच लाख का ही प्रबंध करा दें। बाकी कोई आवश्यकता पड़ी तो वीरेंदर ने भी मदद करने के लिए बोला था।
पटेल जी ने अंकित को फिर यह कहकर निरुत्साहित किया कि उसका कॉलेज वीरेंदर के यहां से दूर हुआ तो क्या करेगा? वहां तो हॉस्टल में रहना पड़ेगा। अंकित सोच में पड़ गया। वह सुबह ही सुबह बिना बताये घर से निकल गया। इधर उसकी मम्मी नाश्ता बनाकर इंतजार करती रही, पर उसका कहीं अता पता नहीं था। वह जाकर उमेश के यहां भी पूछ आई, उमेश ने भी यही बताया कि आज अंकित उसे नहीं मिला। दोपहर हो गयी पर अंकित अभी तक घर नहीं लौटा। अंकित की मम्मी परेशान होकर पटेल जी पर बरस पड़ी, 'जाने तुमने क्या कह दिया, बेटा घर से बाहर चला गया और हो कि हाथ पर हाथ धरे बैठे हो। जाकर कहीं ढूंढते भी नहीं। '
इस बात से उत्साहित होकर, अंकित एक बार फिर अपने अमेरिका जाने के प्रोजेक्ट पर जुट गया। एक बैंक में उसके दोस्त के पिता काम करते थे उनके पास जाकर और जानकारी लिया। फिर घर आकर पापा को समझाया कि वे एफ. डी. बैंक के के पास गिरवी रखकर लोन मंजूर करवा लें और बस पांच लाख का ही प्रबंध करा दें। बाकी कोई आवश्यकता पड़ी तो वीरेंदर ने भी मदद करने के लिए बोला था।
पटेल जी ने अंकित को फिर यह कहकर निरुत्साहित किया कि उसका कॉलेज वीरेंदर के यहां से दूर हुआ तो क्या करेगा? वहां तो हॉस्टल में रहना पड़ेगा। अंकित सोच में पड़ गया। वह सुबह ही सुबह बिना बताये घर से निकल गया। इधर उसकी मम्मी नाश्ता बनाकर इंतजार करती रही, पर उसका कहीं अता पता नहीं था। वह जाकर उमेश के यहां भी पूछ आई, उमेश ने भी यही बताया कि आज अंकित उसे नहीं मिला। दोपहर हो गयी पर अंकित अभी तक घर नहीं लौटा। अंकित की मम्मी परेशान होकर पटेल जी पर बरस पड़ी, 'जाने तुमने क्या कह दिया, बेटा घर से बाहर चला गया और हो कि हाथ पर हाथ धरे बैठे हो। जाकर कहीं ढूंढते भी नहीं। '
'क्यों घबरा रही हो, कहीं दोस्त मित्रों के यहाँ गया होगा, लौट आएगा।'
इतने में दरवाजे की घंटी बजी, श्रीमती पटेल इस उम्मीद में कि अंकित ही होगा, दरवाजा खोलने दौड़ीं।
'आपका बिजली का बिल।'
बिल लेकर मुड़ी ही थी कि पीछे से आवाज आई, 'माँ बंद नहीं करना।'
बाहर देखी तो अंकित, 'कहां था बेटा? तूने तो जान ही निकाल दी। सुबह से बिना कुछ खाये पिये, घर से गायब है।'
'बस माँ साइबर चला गया था, वीरेंदर से स्काइप पर बात करने।'
'अच्छा ! क्या कह रहा था ?'
'यही कि तू एक बार आ जा, बाकी मैं देख लूंगा। कोई न कोई काम मिल ही जायेगा। कुछ खाने को दे दे, भूख लगी है।'
'चल, खाना तैयार है, तेरा नाश्ता भी अभी वैसे ही पड़ा है।'
अब अंकित के अमेरिका जाने के कार्यक्रम पर काम शुरू हो गया। पटेल जी ने अंकित की पढ़ाई के लिए लोन लेने की जमानत दी और अपनी एफ. डी. गिरवी रख दिया। बैंक के तीस लाख के लोन का स्वीकृति पत्र मिल गया और पांच लाख सीधे यूनिवर्सिटी को भुगतान हो गया। यूनिवर्सिटी ने अंकित के दाखिला की कन्फर्मेशन भेज दिया। एजेंट ने उसका वीसा करवा दिया। आज अंकित के अमेरिका के लिए उड़ने का दिन है। एक ओर तो बेटे के विदेश जाने की ख़ुशी वहीँ दूसरी ओर उसे इतनी दूर भेजने का गम। भांति भांति की आशंकाओं के बीच, अंकित के मम्मी-पापा ने, अमेरिका पढने के लिए, बेटे को नम आँखों से विदा किया।
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