प्रीति जैसी बहू
'नहीं मम्मी मैं किसी को नहीं चाहती। खन्ना जी हो सकता है बड़े होंगे किन्तु अच्छे भी हैं यह कैसे कह सकती हो। उनके बेटे को देखी हो न शकल न सूरत ऊपर से पैसे का घमंड इतना कि वो सोचते हैं किसी को भी खरीद लेंगे। वे मुझे प्यार कहाँ देंगे, जिंदगी भर पैसे से ही तौलते रहेंगे। माँ! जल्दी क्या है, मुझे पैसे की भूख नहीं है। एक साल रूक जाओ फिर जैसा कहोगी कर लूंगी। '
फिर तो श्रीमती कपूर के घर में क्लेश शुरू हो गया। कपूर साहब को बेइज्जती की चिंता सताने लगी। खन्ना जी से अब क्या मुंह ले के बात करेंगे। इतना स्पष्ट मना करने पर भी बीच बीच में खन्ना के यहाँ शादी की चर्चा हो जाती। दो तीन महीने बीत गए, लेकिन कपूर की जुबान पर खन्ना के अलावा और कोई नाम नहीं आया। अपने मम्मी पापा का व्यव्हार देखकर, प्रीति को लगने लगा कि अब इस समस्या का उपाय उसे स्वयं ही ढूंढना पड़ेगा।
एक दिन प्रीति, अपनी सहेली के साथ एक मॉल में घूम रही थी कि वहां अचानक उसे सुमित दिख गया। प्रीति लपक कर पास पहुंची, 'अरे सुमित, यहाँ कैसे! तुम तो अमेरिका चले गए थे न!'
'हाँ, अभी एक सप्ताह पहले आया था, सोचा मम्मी को थोड़ी शॉपिंग करा दूँ। ये मेरी मम्मी हैं।'
प्रीति ने झुक कर सुमित की मम्मी के पैर छू लिया।
सुमित की मम्मी उसे देखीं तो देखती रह गयीं। 'कितनी प्यारी बच्ची है। क्या नाम है बेटा?'
'प्रीति'
'बहुत सुन्दर नाम है। और बेटा, करती क्या हो?'
'बैंक में जॉब कर रही हूँ, ऑन्टी। इसी साल लगी हूँ। ग्रेजुएशन सुमित के ही साथ किया था। ये अमेरिका चला गया, और मैंने एम. बी. ए. करके, बैंक ज्वाइन कर लिया।'
'अच्छी बात। और मम्मी पापा।'
'दोनों बहुत अच्छे हैं, पापा एक कंपनी में मैनेजर हैं और मम्मी घर पर ही रहती हैं।'
सुमित की ओर देखते हुए 'कितनी प्यारी बच्ची है।'
सुमित की मम्मी, प्रीति से मिलकर मंत्र मुग्ध हो गयीं। शायद मन में यही सोच रही थीं यह लड़की उनकी बहू हो जाय तो कितना अच्छा लगेगा, सुन्दर, सुशील और सभ्य। सुमित के साथ इसकी जोड़ी कितनी अच्छी लगेगी। प्रीति और उसकी सहेली शॉपिंग में सुमित की मम्मी की मदद करने में लग गयीं, थोड़ी बहुत खरीददारी हो जाने के बाद प्रीति बोली, 'अच्छा ऑन्टी चलते हैं। देर हो जाएगी।'
'चलो कुछ खा पी लेते हैं ' सुमित ने कहा।
'नहीं, चलते हैं, देर हो रही है, मम्मी इंतजार कर रही होंगी।'
'अरे ऐसा कैसे होगा, तुमसे कॉलेज के बाद अब मिले हैं, सामने ही तो फ़ूड कोर्ट है।'
सुमित की मम्मी भी बोल पड़ती हैं, 'कुछ खा लो बेटी, कम से कम सुमित का मन तो रख दो।'
इतना कहने पर प्रीति, सुमित की मम्मी की बात, टाल नहीं पायी। चाहती तो वो भी थी, कुछ समय सुमित के साथ रहे, पर घर जाने की भी चिंता थी। फ़ूड कोर्ट में जाकर, सभी ने बर्गर और कोल्ड ड्रिंक लिया। खा पीकर, प्रीति चलने लगी तो सुमित बोल पड़ा, 'अपना फ़ोन नंबर तो दे दो।'
'सॉरी, भूल ही गयी थी, तुम भी अपना नंबर दे दो।'
'खाली नंबर ही लेना है या फोन भी करना है।'
'हाँ, हाँ देखना करती हूँ कि नहीं, वैसे जब अमेरिका चले जाओगे तो तुम्हीं नहीं करोगे।'
'अमेरिका जाने में तो अभी समय है, आज ही, घर पहुंचते ही करता हूँ।'
प्रीति वहां से चल दी। जाते समय कई बार मुड़ कर सुमित को देखी और एक बार जब थोड़ा सा हाथ निकाल कर, धीरे से हिलाकर मुस्करायी तो सुमित के दिल को छू गयी। सुमित ने हाथ हिला कर उसे विदा किया। घर पहुंचते ही सुमित की मम्मी ने सुमित से कहा, 'प्रीति जैसी बहू घर आती तो कितना अच्छा होता।'
सुमित भी कहाँ चुप रहने वाला, ' तो ले आओ उसी को।'
'अरे, उसके मम्मी पापा बात करेंगे तभी तो, वैसे तूने अमेरिका में देख तो नहीं रखा है न!'
'नहीं मम्मी! तेरी बहू तो इंडियन ही होगी।'
सुमित तो प्रीति को चाहता ही था और उसकी मम्मी पहले ही पसंद कर चुकी थीं, उसने सलाह दी कि अगले महीने वह फिर इंडिया आ जायेगा, 'चलो कोर्ट मैरिज कर लेते हैं और साथ ही अमेरिका चली आना। मेरा ग्रीन कार्ड तो है ही, मैरिज रजिस्टर होने के बाद तुम्हे वीसा मिल जायेगा।'
सुमित आया और दोनों ने कोर्ट मैरिज करके रजिस्टर करवा लिया। सुमित की मम्मी को यह तरीका पसंद नहीं आया, वह अपने बेटे का बड़ी धूम धाम से विवाह करना चाहती थी। सुमित ने माँ को समझाया कि कोर्ट मैरिज औपचारिकता मात्र है, खन्ना साहब से बात करके फंक्शन कर लेना। सुमित की माँ ने इस बारे में जब खन्ना साहब बात किया तो वे हतप्रभ रह गए। उन्होंने सोचा भी नहीं था कि ऐसा भी सकता है। लेकिन अब खन्ना साहब के पास और कोई विकल्प नहीं था। शादी तो हो ही चुकी थी, एक भव्य समारोह का आयोजन हुआ। रिश्तेदार, मित्र सब एकत्र हुए। सगे सम्बन्धियों से आशीर्वाद लेकर प्रीति सुमित के साथ उड़ गयी।
मम्मी, पापा ने ठान लिया था कि प्रीति की शादी वहीं करनी है। वैसे तो प्रीति के पापा खन्ना जी को पहले से जानते थे। अच्छा घर बार है, धनी परिवार है, बढ़िया कारोबार चल रहा है, अपने ही शहर के रहने वाले हैं; और क्या चाहिए! लड़की वहां सुख करेगी, खाने पीने की कभी कोई कमी नहीं होगी। माता, पिता को तो लगता है पैसा होना ही सुख है, पर प्रीति को समीर की शक्ल, सूरत और तो और व्यव्हार भी कत्तई पसंद नहीं था। जब देखो पैसे के घमंड में चूर रहता, पढ़ा लिखा कुछ खास नहीं, बात करने का सऊर तक नहीं। वह किसी तरह इस मुसीबत से छुटकारा पाना चाहती थी। मगर इस मुसीबत से निकलने का कोई उपाय भी तो दिखे।
प्रीति अपनी उधेड़ बुन में थी कि आखिर वह क्या करे, इस मामले में किससे मदद मांगे कि कपूर साहब एक दिन शादी का प्रस्ताव लेकर, खन्ना जी के यहाँ चले गए। खन्ना जी को भला कैसे एतराज होता। प्रीति जैसी सुन्दर, एकदम मृदुल स्वाभाव की लड़की उन्हें जो मिल रही थी। फिर भी औपचारिकता के तौर पर, एक बार बेटे से पूछकर बताने के लिए टाल दिए। प्रीति को जब पता चला तो बहुत दुःखी हुई। उसने सोचा अगर यूँ चुप रही तो सब अनर्थ हो जाएगा और उसकी शादी खन्ना के बेटे से कर दी जाएगी। उसने हिम्मत बटोरा और मम्मी से कह दिया, 'मम्मी, शादी की अभी इतनी जल्दी क्या है? मैं क्या आप लोगों को बोझ लग रही हूँ।'
'नहीं बेटा, तू बोझ काहे को है। फिर भी जिंदगी भर कुंवारी तो नहीं रहेगी न! जिम्मेदारी वाले काम जितनी जल्दी हो जांय, अच्छा है।'
'तो मैं अभी शादी नहीं करुँगी।'
'आखिर बात क्या है?'
'मम्मी, एक तो मुझे संजय पसंद नहीं, दूसरे नौकरी में अभी प्रोबेशन पर हूँ। कम से कम एक वर्ष शादी नहीं करनी है।'
प्रीति की मम्मी ने सारी बात कपूर साहब को बताई, तो उनके पांव के नीचे से जमीन खिसक गयी। 'आखिर खन्ना के घर, शादी का प्रस्ताव लेकर तो वे खुद ही गए थे। खन्ना ने प्रीति से मिलने की बात भी कह दी है।खन्ना क्या कहेगा। इतना बड़ा आदमी है, पैसे वाला है। वह हमारे यहाँ रिश्ता करने को तैयार हो गया, हमरे लिए तो गर्व की बात है। ऐसा रिश्ता कहाँ मिलेगा। अब उसे हम किस मुंह से मना करेंगे।'
प्रीति की माँ ममता ने कहा, रुको एक दो दिन में उसे समझाकर देखती हूँ। एक दिन प्रीति को अच्छे मूड में देखकर, ममता ने कहा, 'बेटी, खन्ना साहब बड़े आदमी हैं, शहर में रुतबा है, बड़े उद्योगपति हैं। फिर ऐसा रिश्ता नहीं मिलेगा। अगर किसी और लडके को चाहती है तो भी बता दे।'प्रीति अपनी उधेड़ बुन में थी कि आखिर वह क्या करे, इस मामले में किससे मदद मांगे कि कपूर साहब एक दिन शादी का प्रस्ताव लेकर, खन्ना जी के यहाँ चले गए। खन्ना जी को भला कैसे एतराज होता। प्रीति जैसी सुन्दर, एकदम मृदुल स्वाभाव की लड़की उन्हें जो मिल रही थी। फिर भी औपचारिकता के तौर पर, एक बार बेटे से पूछकर बताने के लिए टाल दिए। प्रीति को जब पता चला तो बहुत दुःखी हुई। उसने सोचा अगर यूँ चुप रही तो सब अनर्थ हो जाएगा और उसकी शादी खन्ना के बेटे से कर दी जाएगी। उसने हिम्मत बटोरा और मम्मी से कह दिया, 'मम्मी, शादी की अभी इतनी जल्दी क्या है? मैं क्या आप लोगों को बोझ लग रही हूँ।'
'नहीं बेटा, तू बोझ काहे को है। फिर भी जिंदगी भर कुंवारी तो नहीं रहेगी न! जिम्मेदारी वाले काम जितनी जल्दी हो जांय, अच्छा है।'
'तो मैं अभी शादी नहीं करुँगी।'
'आखिर बात क्या है?'
'मम्मी, एक तो मुझे संजय पसंद नहीं, दूसरे नौकरी में अभी प्रोबेशन पर हूँ। कम से कम एक वर्ष शादी नहीं करनी है।'
प्रीति की मम्मी ने सारी बात कपूर साहब को बताई, तो उनके पांव के नीचे से जमीन खिसक गयी। 'आखिर खन्ना के घर, शादी का प्रस्ताव लेकर तो वे खुद ही गए थे। खन्ना ने प्रीति से मिलने की बात भी कह दी है।खन्ना क्या कहेगा। इतना बड़ा आदमी है, पैसे वाला है। वह हमारे यहाँ रिश्ता करने को तैयार हो गया, हमरे लिए तो गर्व की बात है। ऐसा रिश्ता कहाँ मिलेगा। अब उसे हम किस मुंह से मना करेंगे।'
'नहीं मम्मी मैं किसी को नहीं चाहती। खन्ना जी हो सकता है बड़े होंगे किन्तु अच्छे भी हैं यह कैसे कह सकती हो। उनके बेटे को देखी हो न शकल न सूरत ऊपर से पैसे का घमंड इतना कि वो सोचते हैं किसी को भी खरीद लेंगे। वे मुझे प्यार कहाँ देंगे, जिंदगी भर पैसे से ही तौलते रहेंगे। माँ! जल्दी क्या है, मुझे पैसे की भूख नहीं है। एक साल रूक जाओ फिर जैसा कहोगी कर लूंगी। '
फिर तो श्रीमती कपूर के घर में क्लेश शुरू हो गया। कपूर साहब को बेइज्जती की चिंता सताने लगी। खन्ना जी से अब क्या मुंह ले के बात करेंगे। इतना स्पष्ट मना करने पर भी बीच बीच में खन्ना के यहाँ शादी की चर्चा हो जाती। दो तीन महीने बीत गए, लेकिन कपूर की जुबान पर खन्ना के अलावा और कोई नाम नहीं आया। अपने मम्मी पापा का व्यव्हार देखकर, प्रीति को लगने लगा कि अब इस समस्या का उपाय उसे स्वयं ही ढूंढना पड़ेगा।
एक दिन प्रीति, अपनी सहेली के साथ एक मॉल में घूम रही थी कि वहां अचानक उसे सुमित दिख गया। प्रीति लपक कर पास पहुंची, 'अरे सुमित, यहाँ कैसे! तुम तो अमेरिका चले गए थे न!'
'हाँ, अभी एक सप्ताह पहले आया था, सोचा मम्मी को थोड़ी शॉपिंग करा दूँ। ये मेरी मम्मी हैं।'
प्रीति ने झुक कर सुमित की मम्मी के पैर छू लिया।
सुमित की मम्मी उसे देखीं तो देखती रह गयीं। 'कितनी प्यारी बच्ची है। क्या नाम है बेटा?'
'प्रीति'
'बहुत सुन्दर नाम है। और बेटा, करती क्या हो?'
'बैंक में जॉब कर रही हूँ, ऑन्टी। इसी साल लगी हूँ। ग्रेजुएशन सुमित के ही साथ किया था। ये अमेरिका चला गया, और मैंने एम. बी. ए. करके, बैंक ज्वाइन कर लिया।'
'अच्छी बात। और मम्मी पापा।'
'दोनों बहुत अच्छे हैं, पापा एक कंपनी में मैनेजर हैं और मम्मी घर पर ही रहती हैं।'
सुमित की ओर देखते हुए 'कितनी प्यारी बच्ची है।'
सुमित की मम्मी, प्रीति से मिलकर मंत्र मुग्ध हो गयीं। शायद मन में यही सोच रही थीं यह लड़की उनकी बहू हो जाय तो कितना अच्छा लगेगा, सुन्दर, सुशील और सभ्य। सुमित के साथ इसकी जोड़ी कितनी अच्छी लगेगी। प्रीति और उसकी सहेली शॉपिंग में सुमित की मम्मी की मदद करने में लग गयीं, थोड़ी बहुत खरीददारी हो जाने के बाद प्रीति बोली, 'अच्छा ऑन्टी चलते हैं। देर हो जाएगी।'
'चलो कुछ खा पी लेते हैं ' सुमित ने कहा।
'नहीं, चलते हैं, देर हो रही है, मम्मी इंतजार कर रही होंगी।'
'अरे ऐसा कैसे होगा, तुमसे कॉलेज के बाद अब मिले हैं, सामने ही तो फ़ूड कोर्ट है।'
सुमित की मम्मी भी बोल पड़ती हैं, 'कुछ खा लो बेटी, कम से कम सुमित का मन तो रख दो।'
इतना कहने पर प्रीति, सुमित की मम्मी की बात, टाल नहीं पायी। चाहती तो वो भी थी, कुछ समय सुमित के साथ रहे, पर घर जाने की भी चिंता थी। फ़ूड कोर्ट में जाकर, सभी ने बर्गर और कोल्ड ड्रिंक लिया। खा पीकर, प्रीति चलने लगी तो सुमित बोल पड़ा, 'अपना फ़ोन नंबर तो दे दो।'
'सॉरी, भूल ही गयी थी, तुम भी अपना नंबर दे दो।'
'खाली नंबर ही लेना है या फोन भी करना है।'
'हाँ, हाँ देखना करती हूँ कि नहीं, वैसे जब अमेरिका चले जाओगे तो तुम्हीं नहीं करोगे।'
'अमेरिका जाने में तो अभी समय है, आज ही, घर पहुंचते ही करता हूँ।'
प्रीति वहां से चल दी। जाते समय कई बार मुड़ कर सुमित को देखी और एक बार जब थोड़ा सा हाथ निकाल कर, धीरे से हिलाकर मुस्करायी तो सुमित के दिल को छू गयी। सुमित ने हाथ हिला कर उसे विदा किया। घर पहुंचते ही सुमित की मम्मी ने सुमित से कहा, 'प्रीति जैसी बहू घर आती तो कितना अच्छा होता।'
सुमित भी कहाँ चुप रहने वाला, ' तो ले आओ उसी को।'
'अरे, उसके मम्मी पापा बात करेंगे तभी तो, वैसे तूने अमेरिका में देख तो नहीं रखा है न!'
'नहीं मम्मी! तेरी बहू तो इंडियन ही होगी।'
फुर्सत पाते ही, सुमित ने फोन उठाया और प्रीति को मिला दिया, 'हेलो, प्रीति!'
'हाँ, कौन सुमित। और हो गयी शॉपिंग पूरी? आंटी कैसे हैं? आंटी बहुत अच्छी हैं।'
'वो भी तो तुम्हारी तारीफ कर रही थीं। तुमसे मिलके उनका तो जी ही नहीं भरा ... और मेरा भी ... '
'तो साथ ही लिए चलते।'
'वाह! उस समय तुम्हारी रजामंदी नहीं मालूम थी न!'
'अब फिर कब मिलेंगे ?'
'जब तुम कहो!'
फिर कॉलेज की पुरानी बातें शुरू हुईं तो घंटा निकल गया, पता ही नहीं चला।
प्रीति इस अवसर का लाभ उठाना चाहती थी। खन्ना साहब के बेटे से छुटकारा पाने का यही सही मौका था। दोनों के मिलने जुलने का सिलसिला शुरू हो गया। कुछ ही दिनों में, दोनों एक दूसरे को बहुत चाहने लगे। अब सुमित के वापस अमेरिका जाने का समय आ गया। उसने प्रीति से शादी का प्रस्ताव रख दिया। प्रीति के मन में तो पहले से हाँ थी, पर वह अपने माँ बाप को कैसे मनाये। पापा तो पहले ही कहीं और बात चला रहे थे। और साथ ही मन में डर भी था कि कहीं सुमित अमेरिका जाकर, उसे भूल न जाये। जब सुमित ने अमेरिका जाने के बाद भी उससे बात चीत चालू रखा तो प्रीति को उसके प्यार पर भरोसा हो गया। एक दिन वह अपनी माँ से सुमित से विवाह करने की बात कह दी। माँ को इसका कोई एतराज नहीं था, पर पापा को खन्ना साहब से बात पलटने की चिंता अभी तक सता रही थी।
अब सुमित और प्रीति का एक दूसरे के बिना, रहना मुश्किल था। एक दिन सुमित का फोन आया तो प्रीति ने उसे बता दिया, 'तुम्हे पता है, पापा मुझे दलदल में धकेलना चाह रहे हैं। अब तुम्हे ही कोई रास्ता निकालना है। देर हो जाय, इससे पहले कोई उपाय ढूंढो।''हाँ, कौन सुमित। और हो गयी शॉपिंग पूरी? आंटी कैसे हैं? आंटी बहुत अच्छी हैं।'
'वो भी तो तुम्हारी तारीफ कर रही थीं। तुमसे मिलके उनका तो जी ही नहीं भरा ... और मेरा भी ... '
'तो साथ ही लिए चलते।'
'वाह! उस समय तुम्हारी रजामंदी नहीं मालूम थी न!'
'अब फिर कब मिलेंगे ?'
'जब तुम कहो!'
फिर कॉलेज की पुरानी बातें शुरू हुईं तो घंटा निकल गया, पता ही नहीं चला।
प्रीति इस अवसर का लाभ उठाना चाहती थी। खन्ना साहब के बेटे से छुटकारा पाने का यही सही मौका था। दोनों के मिलने जुलने का सिलसिला शुरू हो गया। कुछ ही दिनों में, दोनों एक दूसरे को बहुत चाहने लगे। अब सुमित के वापस अमेरिका जाने का समय आ गया। उसने प्रीति से शादी का प्रस्ताव रख दिया। प्रीति के मन में तो पहले से हाँ थी, पर वह अपने माँ बाप को कैसे मनाये। पापा तो पहले ही कहीं और बात चला रहे थे। और साथ ही मन में डर भी था कि कहीं सुमित अमेरिका जाकर, उसे भूल न जाये। जब सुमित ने अमेरिका जाने के बाद भी उससे बात चीत चालू रखा तो प्रीति को उसके प्यार पर भरोसा हो गया। एक दिन वह अपनी माँ से सुमित से विवाह करने की बात कह दी। माँ को इसका कोई एतराज नहीं था, पर पापा को खन्ना साहब से बात पलटने की चिंता अभी तक सता रही थी।
सुमित तो प्रीति को चाहता ही था और उसकी मम्मी पहले ही पसंद कर चुकी थीं, उसने सलाह दी कि अगले महीने वह फिर इंडिया आ जायेगा, 'चलो कोर्ट मैरिज कर लेते हैं और साथ ही अमेरिका चली आना। मेरा ग्रीन कार्ड तो है ही, मैरिज रजिस्टर होने के बाद तुम्हे वीसा मिल जायेगा।'
सुमित आया और दोनों ने कोर्ट मैरिज करके रजिस्टर करवा लिया। सुमित की मम्मी को यह तरीका पसंद नहीं आया, वह अपने बेटे का बड़ी धूम धाम से विवाह करना चाहती थी। सुमित ने माँ को समझाया कि कोर्ट मैरिज औपचारिकता मात्र है, खन्ना साहब से बात करके फंक्शन कर लेना। सुमित की माँ ने इस बारे में जब खन्ना साहब बात किया तो वे हतप्रभ रह गए। उन्होंने सोचा भी नहीं था कि ऐसा भी सकता है। लेकिन अब खन्ना साहब के पास और कोई विकल्प नहीं था। शादी तो हो ही चुकी थी, एक भव्य समारोह का आयोजन हुआ। रिश्तेदार, मित्र सब एकत्र हुए। सगे सम्बन्धियों से आशीर्वाद लेकर प्रीति सुमित के साथ उड़ गयी।
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