Sunday, 8 March 2015

badshahat ke din


अपना घर सबसे अच्छा

'बहुत दिनों से कह रहा है, वीसा और टिकट भी लगवा दिया है। अब तो सोच रहा हूँ कनाडा हो ही आऊँ। उसका एक दोस्त आया है वो अगले महीने की १५ तारीख को जा रहा है, उसी के साथ जाना है।' मंगल हाँ, हाँ करता रहा,  कुलदीप अपनी कहता रहा।
'भैया कितने दिन में आ जाओगे? यहाँ तो सूना हो जायेगा।  चलो काम धाम तो सोनू सम्भाल लेगा पर हम लोग गपशप करने कहाँ जायेंगे।' मंगल बोला।
'अब इतनी दूर जा रहे हैं तो एक दो महीने तो रहेंगे ही।  वैसे वीसा ३  महीने का मिला है।'
'अकेले जा रहे हो?'
'नहीं, तुम्हारी भौजाई भी जाएगी। अब १५ तारीख आने में दिन ही कितने रह गए।  बड़ी तैयारी करनी है, वहां पर तो अपनी देशी चीजें मिलती कहाँ हैं।  कुछ मसाले वसाले ले लेंगे बाकी उससे पूछ लेंगे क्या क्या ले जाना है।'
'भैया सुना है, वहां खाने पीने की चीज नहीं ले जाने देते।'
'हाँ, सो तो है बस वही चीजें ले जायेंगे जो सीलबंद आती  हैं। वजन का भी लफड़ा है, ज्यादा वजन तो ले नहीं जा सकते।'
'सीधी उड़ान है ?'
'नहीं, ट्रैन से दिल्ली जायेंगे।  वहां से उड़ान लेंगे।  बीच में जहाज, एम्सटरडर्म रुकेगा, बड़ा लम्बा समय है।
मुझे तो पहली बार जहाज में बैठना है।  कैसे सब होगा, समझ नहीं आ रहा है।'
'अरे चिंता क्या, पप्पू का दोस्त तो साथ है न, संभाल लेगा। '
तैयारियां शुरू हो गयी। ये लाओ, वो लाओ।  बड़ा पैकेट, छोटा पैकेट। इसे रख लो, इसे छोड़ दो।  करते करते
यात्रा का दिन आ गया।  दिल्ली हवाई अड्डे पहुँच गए।  पप्पू का दोस्त रमेश पहले ही वहां प्रतीक्षा कर रहा था।  चेक-इन करा के बोर्डिंग पास ले लिया। एयरलाइन्स से कहके एक सीट, खिड़की वाली ले ली थी। इमीग्रेशन का फॉर्म भरा, सुरक्षा जाँच हुई और हवाई जहाज में बैठने चल दिये।  कुलदीप हक्का बक्का सा था। चमकता हुआ साफ सुथरा हवाई अड्डा, चलने के लिए स्वचालित पट्टी यह सब वह पहली बार देखा।  पट्टी अपने आप ही चलती रहती है। उस पर खड़े हो जाओ और गंतव्य बे तक पहुँच जाओ। प्रस्थान के लिए प्रतीक्षा करने हेतु बाड़ा बना हुआ था। वहां बैठने के लिए सुन्दर सोफे लगे थे। वे लोग वहां बैठे। बाड़े की सभी दीवारें शीशे की थीं। कुलदीप बड़े कौतुहल से हवाई अड्डे से उड़ते और वहां उतरते विमान देख रहा था। यह देख कर उसे बड़ा आश्चर्य होता कि पांच मिनट भी नहीं होते दूसरा विमान उड़ने को तैयार।

कुछ समय बाद कुलदीप को लघु शंका के लिये जाना पड़ा। हाथ धोने के लिए बेसिन के पास पहुंचा तो टोंटी में पानी चलाने के लिए कोई घुंडी या नोब ही नहीं थी। वह नल के चारों ओर देखने लगा कि नल को कहाँ से खोले। फिर नल को हाथ से ठोंकने लगा तो हाथ नल के निचे आते ही पानी चल पड़ा। कुलदीप चौंका कि कहीं कुछ टूट तो नहीं गया, पर थोड़ी ही देर में नल बंद भी हो गया। कुलदीप ने राहत की सांस ली और वापस आ गया। कुछ देर बैठने के बाद घोषणा की जाती है, 'एम्स्टर्डम जाने वाले यात्री विमान की ओर प्रस्थान करें।'
विमान को एम्स्टरडर्म होकर जाना था। एम्स्टरडर्म जाने के बाद, टोरेंटो के लिए जहाज बदलना था।   

वे विमान की ओर बढे, हवाई जहाज के गेट पर विमान परिचारिका ने नमस्कार किया और उनकी सीट कहाँ है , बता दिया। वे जाकर अपनी सीट पर बैठ गये। कुलदीप ने खिड़की वाली सीट ली। विमान उड़ान भरने के लिए दौड़ा तो उसकी गति देख वह हतप्रभ रह गया और थोड़ी ही देर में विमान ने जमीन छोड़ दिया।  लग रहा था कि कान सुन्न हो रहें हैं, कुछ क्षण तो कुछ सुनायी नहीं दे रहा था। कुलदीप ने  रमेश को बताया तो उसने घंटी बजाकर रुई मंगवा ली और बता दिया कि किसी वस्तु की आवश्यकता होने पर वह घंटी बजा देगा और परिचारिका से मांग लेगा।  थोड़ी देर बाद आजमाने के लिए कुलदीप ने घंटी बजा दी परिचारिका आई। वह बोला-
'पानी मिलेगा'
'येस, जस्ट लाई', वह बोली और पानी की छोटी सी बोतल लाकर पकड़ा दी।
बस इतना सा पानी, मुश्किल से १०० मिली, वह तो बड़ा गिलास पीता था जिसमे आधा लीटर तो होता ही है।  पूरी बोतल वह एक ही घूँट में पी गया और दूसरी बोतल के लिए तुरंत घंटी बजा दी।  पप्पू की मम्मी ने कुहनी मारी ज्यादा पानी मत पियो, छोटी बोतल जान बूझ के रखी होगी, 'आसमान में टॉयलेट कहाँ जाओगे ?'
आरम्भ में तो ऊपर से नदी, सड़क, भवन आदि सभी नजर आ रहे थे, वह बार बार झांक कर देखता और पप्पू की मम्मी को भी दिखाता रहता।  कुछ देर में ही विमान अच्छी खासी ऊंचाई पकड़ लिया। नदी, भवन, पेड़ सब बादलों के नीचे हो गए। कुलदीप यह अद्भुत दृश्य देखकर अचंभित हो गया।  पूरी जिंदगी बादलों को अपने से ऊपर ही देखा था, आज वह बादलों से ऊपर है। ऊपर से लग रहा था आसमान और बादल नीचे चले गए हैं।  बादल को नीचे देख अत्यंत रमणीय दृश्य लग रहा था। उसकी ऑंखें चौड़ी हुई पड़ी थीं, मानो लाखों टन रुई के फाहे आसमान में फैला दिए गए हों। कुलदीप बहुत रोमांचित था।
तभी एक सुन्दर सी परिचारिका ट्राली लिए आई। 'ड्रिंक सर! जूस लेंगे या स्कॉच ?'
कुलदीप ने जूस मांग लिया।
'और स्नैक्स '
'ब्रेड, कटलेट या ऑमलेट '
रमेश ने बोल दिया, 'ब्रेड और कटलेट।'
विमान टोरंटो पहुंचा, इमीग्रेशन के बाद कन्वेयर बेल्ट से सामान लिये और बाहर निकल गये। हवाई अड्डे पर पप्पू बी.एम.डब्लू. गाड़ी लिए पहले से खड़ा था। अपनी गाड़ी में बिठाया और रमेश को उसके घर छोड़ता हुआ मम्मी पापा को घर ले गया। कुलदीप और उसकी पत्नी दो महीने अमेरिका में रहे। वहां का वातावरण और सुख सुविधा देख कर उसे लगता कि क्या उत्तम जिंदगी है। साफ़ सुथरी जगह, कहीं कोई गन्दगी नहीं, सभी काम व्यवस्थित ढंग से, कहीं कोई धक्का मुक्की नहीं, हरे भरे पार्क, पप्पू का आलीशान मकान, खूब मोटा गद्देदार सोफा बाकी सब जरूरत की चीजें थीं।
कुलदीप को कुछ दिन तो अच्छा लगा, फिर उसे वतन की याद सताने लगी। जिसका बचपन और जवानी इंडिया में बीती हो, उसे विदेश घूमने में तो अच्छा लगेगा, रहना नहीं। क्योंकि इतना अधिक अनुशासन और अपने आप में रहना, वश की बात कहाँ है। सारा काम अपने आप ही करना है। काम करने वाले इतने महंगे कि किसी की कोई सेवा लेना आसान बात नहीं। अपने इन्डिया में निकलते बढ़ते, कहीं भी चार लोग मिल जाते हैं, बात कर लो, हाल चाल पूछ लो। यहाँ तो कोई किसी से बात ही नहीं करता। और अंग्रेजी न जानो तो और मुसीबत। घरेलू काम के लिये तो किसी की सेवा लेना, दूर की कौड़ी। किसी से कोई अपनापन नहीं। मशीन जैसी जिंदगी, भावनाओं को कोई समझने वाला ही नहीं। इण्डिया में काम ठीक ठाक चल रहा हो तो बादशाहत की जिंदगी है। चीजें सस्ती, थोड़ा खर्च करके भी कामवाली, कहीं भी गाड़ी खड़ी कर लो, गली में भी खटिया बिछा लो, गाड़ी चलाने में कोई गलती हो गयी तो मान मंनव्वल से भी काम चल जाता है। यहाँ तो हर सांस डर कर लो, तनिक भी गलती हो तो भारी पेनल्टी, बाप रे। अब कुलदीप का जी उकताने लगा था और जल्दी से जल्दी वापस जाना चाहता था ।
घूम घाम कर कुलदीप इन्डिया वापस आ गया और जो मिलता, कनाडा भ्रमण की कहानियां बताता रहता। 

 



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