Friday, 13 March 2015

Need ki khoj

नीड़ की खोज


मरता क्या न करता। बेरोजगारी इतनी अधिक है कि रोजगार का एक अवसर मिले तो सौ लोग काम के लिए आ जाते हैं।  जहाँ किसी चीज की मांग अधिक हो तो ठग और नक्काल  भी अपने आप ही पनप जाते हैं। १९ वीं शदी की बात है।  देश अंग्रेजों के हाथों त्राषदी झेल रहा था।  बात बात पर लोगों को यातनाएं दी जा रहीं थीं । बरसात के सहारे ही खेती होती थी। यदि वर्षा कम तो, भूखमरी का सामना करना पड़ता। पढ़ाई लिखाई तो आम आदमी के लिए दूर की कौड़ी होती। बस आठ दस तक कोई पढ़ ले तो बड़ी बात होती थी। सुदर्शन आठ तक की पढ़ाई पूरी कर चुका।  अब घर पर ही इधर उधर समय व्यतीत करता।  जब मन होता तो अपने गोरू, बछरू का सानी-पानी कर देता, नहीं तो वो भी नहीं। उसके पिता जी कभी डाँटते तो माँ बीच में आ जाती, और उन्हें चुप करा देती।  एक दिन सुदर्शन बाजार गया था, वहां किसी के यहाँ अखबार में पढ़ा कि कलकत्ता में जूट मिल में भरती हो रही है। उसने सोचा क्यों न चल के किस्मत आजमाई जाय। 
घर पर आकर उसने माँ से बताया।  माँ तो राजी नहीं हो रही थी, वह नहीं चाहती थी सुदर्शन उससे दूर जाय, पर उसके पिता ने कहा, 'अच्छा तो है दो पैसे कमाएगा, घर पर क्या करेगा।  कलकत्ता में इधर के बहुत लोग हैं, जो जूट मिल में काम करते हैं।'
'पर यह रहेगा कहाँ? खायेगा पियेगा कैसे ?' मन्दाकिनी बोली।
'अरे सभी लोग रहते ही हैं। कोठरी ले लेगा। ठहर, रानीपुर का श्यामलाल भी कलकत्ता ही रहता है। मैं कल ही जाकर पता करता हूँ, रहने की कोई व्यवस्था करवा देगा।'
तैयारी शुरू हो गयी, एक दिन सत्तू पिसान लेकर, सुदर्शन धनबाद से कलकत्ता के लिए रवाना हो गया। वह श्यामलाल के यहाँ जाने की बजाय सीधे अख़बार में दिए पते पर पहुंचा। वहां एक कमरे में एक व्यक्ति बैठा था, जो आने वालों का इंटरव्यू ले रहा था। वह कंपनी का एजेंट था, जिसे कर्मचारियों की नियुक्ति करनी थी। इंटरव्यू बस औपचारिकता मात्र था, उसे तो यह देखना था की उम्मीदवार स्वस्थ है या नहीं। आखिर मजदूरी ही तो करनी थी। सुदर्शन के जाते ही उसका नाम, पता पूछ कर रजिस्टर में नोट किया और एक पर्ची पकड़ा दिया। 'ठीक है, इनके साथ जाओ और सराय में आराम करो, दो दिन बाद तुम्हें रंगून जाना होगा। वहीँ पर मिल में काम करना है' एक आदमी की ओर इशारा करते हुए वह बोला ।
सुदर्शन सराय में गया, उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था। कहाँ तो कलकत्ता नौकरी के लिए लिखा था और ये लोग रंगून भेज रहे हैं। उसे वहां अपने क्षेत्र के कुछ और लोग मिले तो, उनसे बात करके थोड़ी हिम्मत आई। एक आदमी ने समझाया, अरे भाई, जब नौकरी करनी है तो क्या कलकत्ता, और क्या रंगून ! अखबार में कलकत्ता में भर्ती के लिये लिखा था, नौकरी कहाँ करनी है ये थोड़े ही लिखा था। सुदर्शन बीच में समय निकाल कर, श्यामलाल के पास पहुंचा। श्यामलाल से जब अपनी नौकरी की बात किया तो उसने भी वही कहा, 'कलकत्ता से तो रंगून अच्छा रहेगा, वहां ज्यादा मजदूरी मिलेगी।' 
फिर तो सुदर्शन ने भी कमर कस ली। अब जो होगा देखा जायेगा, वापस घर तो नहीं जायेगा। दो दिन बाद सब जहाज में सवार हुए, और जहाज बंगाल की खाड़ी में आगे बढ़ा। किस्मत ने एक बार और खेल खेला।  यह किसी को नहीं पता था कि एजेंट उनसे धोखा कर रहा है। जहाज, पूरे महीने भर समुद्र में चलता रहा। उन्हें खाने पीने की चीजें बड़ी सिमित मात्रा में मिलती। लेकिन वहां न तो ये कुछ कह सकते थे, न ही कोई सुनने वाला था। यदि कोई सवाल जबाब करता तो मार खाता। एक महीने बाद पता चला कि जहाज रंगून की जगह मौरीसस पहुंच गया।  ये क्या हुआ, लोगों में हाहाकार मच गया। यह तो सरासर धोखा है, रंगून कहा और मारीशश ले आये। अब हो भी क्या सकता था। इतने लोग थे, सभी एक दूसरे को ढांढस बंधाने लगे। ओखली में सिर दे दिया तो मूसल से क्या डर। अब जो होगा, देखा जायेगा। उन्हें ले जाकर, एक चीनी मिल में काम पर लगा दिया गया। खैर वहां उनके लिए रहने वगैरह की व्यवस्था ठीक ठाक थी, वे अपने काम पर लग गए।
इधर सुदर्शन की माँ उसकी खोज खबर न मिलने पर बड़ी चिंतित होने लगी थी।  जाने कहां होगा, कैसे होगा, मेरा लाल ! कैसे खाता पीता होगा।  उधर का कोई भी कलकत्ता से आता तो सुदर्शन के बारे में पूछती, पर कोई क्या बताता। उसे गए एक वर्ष हो चुके थे, अभी तक कोई खोज खबर नहीं। एक दिन सुदर्शन के पिता से बोली 'आप क्यों नहीं कलकत्ता चले जाते, और सुदर्शन के बारे में पता करते। '
'कलकत्ता क्या छोटी जगह है ? कहाँ ढूंढूंगा?' उसके पिता बोले।
पत्नी के रोने गाने और कई बार आग्रह करने पर वे जाने को तैयार हुये। अभी जाने की तैयारी चल ही रही थी कि पता चला श्यामलाल कलकत्ता से छुट्टी आया हुआ है। सुदर्शन के पिता बिना देर किये श्यामलाल के गांव गए। वहां जाकर पता चला कि सुदर्शन तो रंगून चला गया। अब तो उसकी माँ का रो रोकर बुरा हाल। कहां तो कलकत्ता जाने पर ही वह इतनी दुखी थी, पता चला कि उससे भी दूनी दूरी पर चला गया। अब कब तक लौट के आएगा? उसके बारे में किससे पता करें ? सोच सोच कर पागल हुई जा रही थी।   
कुछ दिन और बीते कि सुदर्शन का भेजा पोस्ट कार्ड आ गया। उसमें उसने अपने मौरीसस पहुंचने की बात लिखी थी और साथ यह भी लिखा था कोई जाने वाला मिलेगा तो पैसे भी  भेजेगा। अब उसके माता पिता की जान में जान आई, चलो वह जीवित तो है न! कभी न कभी आ भी जायेगा। और साथ सी सोच कर हैरान, परेशान थे कहाँ कलकत्ता, रंगून और कहां मारीशश पहुंच गया।
उधर मौरीसस में भी अंग्रेजों का शासन था। जो एक बार वहां गया तो गया, लोगों की कमी थी, इसलिए छुट्टी मिलना आसान नहीं था और वहां आना जाना तो बहुत बड़ा पहाड़। महीनोंं में कभी कोई जहाज आता जाता। धीरे धीरे सुदर्शन को वहां रहते कई वर्ष बीत गए, वह सुन्दर, स्वस्थ जवान तो था ही, एक लड़की उस पर मर मिटी।
सुदर्शन, जिस रेस्तरां में भोजन करने जाता, उसके मालिक की बेटी का नाम मलिका था। एक बार उसने खाने में गड़बड़ी की शिकायत करने गया तो उस समय ठीहे पर मलिका ही बैठी थी। मलिका ठन्डे  दिमाग की और समझदार थी, उसने सुदर्शन की बात ध्यान से सुनी और उसे समझा बुझा कर शांत किया। उसके बाद जब कभी सुदर्शन रेस्तरां में भोजन करने आता और मलिका वहां होती तो उसके पास जाकर उससे  ने उससे  खाने पीने के बारे में पूछती। धीरे धीरे दोनों का इस तरह से मिलना प्यार  में बदल गया। और एक दिन दोनों एक दूसरे के हो गए।
सुदर्शन के मलिका से शादी के बाद बाल बच्चे हो गए और उसने वहां अपनी पूरी घर गृहस्थी बसा लिया। इधर उसके माँ बाप उसका मुंह ताकते रहे। बीच बीच में एकाध बार चिठ्ठी और कुछ पैसे तो जरूर भेजा किन्तु वह मारीशश से भारत नहीं आ पाया। धीरे धीरे पंद्रह वर्ष बीत गए, इस बीच उसके पिता का स्वर्गवास हो गया। उसकी कंपनी के नियम में कुछ बदलाव आये और उसे छुट्टी पर भारत आने का अवसर मिला। फिर वही पानी के जहाज से आना था और यात्रा में एक महीने का समय लगना था। जब तक वह भारत पहुंचा, पता चला कि एक महीने पहले ही उसकी माता का भी देहांत हो चुका है। अब वह गांव में रह  कर क्या करता, उसके बाल बच्चे तो मौरीसस में ही थे। एकाध दिन अपने चाचा के यहाँ रहकर, वापस हमेशा हमेशा के लिए मारीशश चला गया।



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