Saturday, 28 March 2015

Udan pari

उड़न परी

सिम्मी का एयर होस्टेस का कोर्स पूरा हो गया था। उसे एक विदेशी एयरलाइन्स में होस्टेस की जॉब भी मिल गयी। वह बहुत खुश थी, और घर के सभी लोग बड़े खुश थे। पहला वेतन मिलने पर, घर में सबको कुछ न कुछ सौगात लायी। माँ के लिए महँगी वाली साड़ी, पापा के लिए जैकेट, छोटे भाई के लिए जींस और टी. शर्ट । ट्रेनिंग पूरी होने पर उसकी ड्यूटी, मुंबई हवाई अड्डे पर ग्राउंड स्टाफ में लगी थी, और उसे कस्टमर केयर (ग्राहक सेवा) का काम देखना था । एक दिन फ्रांस एयरलाइन्स की, पेरिस से फ्लाइट आई। सभी यात्री विमान से उतर कर, अपने अपने सामान के लिए कन्वेयर बेल्ट के चारों ओर खड़े हो गए। उन्हीं में एक यात्री रोहन भी था। लगभग सभी यात्री सामान लेकर, हवाई अड्डे से बाहर जा चुके थे, बस दो चार यात्री ही रह गए थे उनमें से एक रोहन भी था। उसका सामान अभी तक कन्वेयर बेल्ट पर नहीं आया था। वह कई बार पूरी तरह से देखा, पर उसे अपना बैग नहीं मिला। वह एयरलाइन्स के काउंटर पर शिकायत करने जा ही रहा था कि उसी समय फ्रांस एयरलाइन्स की यूनिफार्म पहने, सिम्मी दिख गयी। उसने सिम्मी से सामान न मिलने की शिकायत की तो सिम्मी बोली -
'ठीक है सर, थोड़ी प्रतीक्षा करें, अभी देखती हूँ।'
सिम्मी ने फ्लाइंग स्टाफ से छान बीन की तो पता चला कि रोहन का सूट केस पीछे छूट गया था, वह अगली फ्लाइट से आ रहा है। रोहन इस बात से बहुत नाराज हुआ। वह एयरलाइन्स को भला बुरा कहने लगा। सिम्मी ने उसका बैग छूट जाने का खेद व्यक्त किया और उसे एयरलाइन्स के कार्यालय ले गयी। कार्यालय में उससे एक फॉर्म पर उसका नाम, पता, फ़ोन आदि नोट करवा कर आश्वस्त किया, कल तक उसका सूट केस उसके घर पहुंचा दिया जायेगा। सिम्मी ने फोन से पता करने के लिए उसे अपना नंबर भी दे दिया।  अब रोहन कर भी क्या सकता था, वह अपने घर चला गया। अगले दिन उसका सामान आ गया और उसके दिए पते पर भिजवा दिया गया। सामान पहुँचने की पुष्टि के लिए सिम्मी ने रोहन को फोन किया और एक बार फिर सारी बोली। उसके व्यवहार और सहयोग से रोहन बहुत प्रभावित था। 
छुट्टी बिता कर, रोहन फिर पेरिस जाने के लिए हवाई अड्डे पहुंचा। इस बार सिम्मी की ड्यूटी बदल गयी थी और उसे आगमन से प्रस्थान में लगा दिया गया था। इस बार भी बोर्डिंग पास लेते समय रोहन की मुलाकात सिम्मी से हो गयी। सिम्मी ने उसे पहचान लिया और मुस्करा कर बोली, 'सॉरी सर, आपको आगमन में काफी परेशानी हुई थी। उम्मीद है, अगली बार ऐसा नहीं होगा। आप पेरिस में ही रहते हैं ?'
'हां, कई साल हो गए। मुझे अब वहीँ की नागरिकता मिल चुकी है।'
'क्या, वहां जॉब करते हैं ?' सिम्मी ने पूछा।
'हाँ, एक आई टी फर्म में। कभी पेरिस गयी हो कि नहीं?'
'अभी नहीं, अभी हाल ही में जॉब मिली है। चूकि वहीं की एयरलाइन्स है तो कभी न कभी जाना होगा ही। आपका इंडिया का चक्कर कितने दिन में लग जाता है ?'
'अक्सर ही आ जाता हूँ, कुछ इंडियन ग्राहक भी हैं।  काम का काम हो जाता है और अपने पुराने लोगों से मिलना भी।'
'ठीक है सर, आपकी यात्रा मंगलमय हो। फिर कभी एयरपोर्ट पर कोई परेशानी हो तो, मेरा नंबर आपके पास है ही, फोन कर देना। किसी भी एयर लाइन्स का टिकट क्यों न हो। वैसे मैं तो यही कहूँगी, फ्रांस एयरलाइन्स से ही यात्रा करना।'
रोहन ने भी अपना फ्रांस का नंबर दे दिया, 'कभी पेरिस आना तो फोन करना। '
अब दोनों में फोन से बातें होने लगीं और वह मुलाकात धीरे धीरे दोस्ती में बदल गयी। तीन चार महीने में ही रोहन का फिर से चक्कर लगा। वह सिम्मी को सरप्राइज देना चाहता था, इसलिए पहले नहीं बताया। मुंबई हवाई अड्डे पर पहुँच कर ही उसने फोन किया, 'हेलो ! सिम्मी!'
'एस, अरे रोहन। कैसे हो ?'
'अच्छा हूँ और तुम कैसे हो?"
'मैं भी अच्छी हूँ।  मुंबई कब आ रहे हो?
'मैं मुंबई से ही बोल रहा हूँ। अभी अभी लैंड किया हूँ। अराइवल में आ जाओ, साथ काफी पीते हैं।"
'लेकिन मैं तो ड्यूटी पूरी करके घर आ चुकी हूँ। तुमने पहले तो अपने आने के बारे में बताया नहीं।"
'हां, सोचा था तुम्हें सरप्राइज दूंगा। मगर यह तो उल्टा पड़ गया। चलो कल डिनर साथ करते हैं।"
'सारी! कल भी नहीं,  कल तो मेरे छोटे भाई रोमी का जन्मदिन है, और हमने घर पर ही पार्टी रखा है।'
'तो फिर कैसे मिलेंगे।'
'जब समय निकाल पाती हूँ तो फ़ोन करती हूँ।"
'मगर मेरी भी कई मीटिंग हैं, ऐसा न हो कि जब तुम्हें समय हो, मुझे न हो।"
'देख लो साथ डिनर करना है तो समय तो निकालना पड़ेगा। ठीक है, अब बाद में बात करेंगे।"
 
रोहन बहुत पछताया। वहीँ से फोन कर दिया होता तो कम से कम एयरपोर्ट पर ही उससे मिल लेता। इस बार उसे चार पांच दिन ही रुकना था। रोहन सोचने लगा कि शायद सिम्मी उसे अपने भाई के जन्म दिन की पार्टी पर निमंत्रित करेगी पर ऐसा कुछ नहीं हुआ। अभी तक सिम्मी ने रोहन के बारे में घर पर किसी को नहीं बताया था। एक बा एक, उसे कैसे आमंत्रित कर सकती थी। रोमी के जन्म दिन पर बहुत ही बढ़िया, चॉकलेट वाला सुन्दर सा केक कूरियर से उसके घर पहुंचा। केक पर लिखा था 'विथ गुड विशेष फ्रॉम रोहन'। रोहन का नाम देखकर सभी अचंभित थे। किसने भेजा होगा अभी अटकलें ही चल रही थीं कि इतने में वहां सिम्मी भी आ गयी। उसने बोल दी कि एयरलाइन्स के किसी स्टाफ का पेरिस ट्रांसफर हो गया है और यह केक उसने भेजा है। खैर, दान की बछिया का दांत देखने से क्या लाभ। केक कटा और खाकर सबको मजा आ गया।

रोहन और सिम्मी के डिनर का कार्यक्रम उसके अगले दिन के लिए तय हो गया। दोनों ने एक जाने माने होटल में साथ खाना खाया। रोहन, सिम्मी के लिए पेरिस से परफ्यूम लाया था, जो सिम्मी को गिफ्ट किया। परफ्यूम की महक ने तो सिम्मी के दिल को ही छू लिया। रोहन के दिए दोनों सौगातों ने सिम्मी के दिल में जगह बना ली। रोहन अपना काम पूरा करके वापस पेरिस चला गया। अब दोनों के बीच फ़ोन से वार्तालाप का सिलसिला और तेज हो गया, सुबह शाम दोनों समय ही फोन से बातें होतीं। शाम को कई बार तो उनकी बात घंटे घंटे तक चलती।

कुछ समय पश्चात्, सिम्मी को विमान परिचारिका बन कर पेरिस जाने का अवसर मिला। जब रोहन को पता चला तो वह एयरपोर्ट पर ही मिलने आ गया। रोहन ने उसका शानदार स्वागत किया। रोहन चाहता था, सिम्मी को अपने घर ले जाये और उसे पेरिस अपने साथ घुमाये परन्तु सिम्मी को अगली ही फ्लाइट से फिर वापस आना था। सिम्मी को न तो घूमने का अवसर मिला न ही रोहन के साथ कुछ समय बिताने का। खैर, यह तय हो गया कि अगली उड़ान में जब वह पेरिस आएगी तो रोहन के साथ ही खाना खायेगी। अब पेरिस में एक दूसरे से मिलने का जल्दी जल्दी अवसर मिलने लगा। सिम्मी होटल में रुकती, रोहन को कभी लंच पर तो कभी डिनर पर होटल में बुला लेती। कभी सिम्मी के पास ज्यादा समय होता तो दोनों साथ घूमने चले जाते। दोनों की दोस्ती अब प्यार में बदल चुकी थी। दोनों एक दूसरे को बहुत चाहने लगे थे।

एक बार फिर सिम्मी फ्लाइट लेकर पेरिस पहुंची। रोहन ने उसे डिनर पर आमंत्रित किया। इस बार रोहन ने उससे कह दिया, 'सिम्मी! चलो हम विवाह कर लेते हैं।'
सिम्मी के दिल में भी उत्तर तो हाँ में ही था पर उसे अपने मम्मी पापा से अनुमति लेनी थी। वह बोली, 'मम्मी से बात करके बताउंगी।'
'लेकिन, आई लव यू,  तुम मुझे प्यार करती हो या नहीं?'
'आई टू लव यू, लेकिन मम्मी पापा से पूछने में क्या जाता है ?'
'अगर वो नहीं कर दिए तो।'
'तो कोई रास्ता निकालेंगे। बात को समझो, तुम यूरोप में हो और मैं भारत में, और ऊपर से लड़की हूँ।  तुम्हें पता है, वहां लड़कियों को कितने बंधन में जीना पड़ता है। '
'लेकिन तुम उन लड़कियों में से नहीं हो। तुम तो उड़न परी हो। तुमने आकाश नापकर यूरोप तक का  रास्ता तय कर लिया। बीच में नदी, समुद्र, जंगल, पहाड़ ये सब पार कर के आयी हो, तो ये छोटी सी रूकावट तुम्हें कैसे रोक लेगी।'
'फिर भी सिम्मी ने उसे समझाया, कोई काम तरीके से करने से वह सुन्दर और पक्का होता है। थोड़ी औपचारिकता निभाने में जाता ही क्या है। जब मम्मी पापा नहीं मानेंगे तब देखेंगे। मैं तू तुम्हारी हो ही चुकी हूँ। ' 
इंडिया वापस आकर सिम्मी ने मम्मी से सारी बात बताई। मम्मी को उसकी यह बात कत्तई पसंद नहीं आयी। वह बेटी को इतनी दूर नहीं भेजना चाहती थी। सिम्मी के विवाह को लेकर, घर में काफी बहसबाजी हुई। उसके मम्मी पापा को रोहन से विवाह में कोई खास एतराज नहीं था, परन्तु उनके मन में तरह तरह की आशंकाएं थीं। वहां जाकर, सिम्मी परिवार से दूर एकदम अकेली हो जाएगी, रोहन के ही व्यव्हार के बारे में किसको क्या पता, विदेश में सिम्मी के साथ कहीं कुछ हो गया तो वे उसकी कौन मदद करेगा।

इन सब बातों का सिम्मी के पास उत्तर था। वह कहती, अब वह कोई बच्ची नहीं है, देश दुनिया घूमी है।  उसे अपने ऊपर और रोहन पर भी पूरा भरोसा है। फिर भी जिंदगी में कुछ न कुछ तो जोखिम उठाना ही पड़ता है। भारत में विवाह करें तो भी क्या गारंटी है, सब ठीक ही होगा। पूरी तरह से आत्म मंथन करके सिम्मी ने मम्मी को समझाया, 'वह पेरिस जाएगी तो रोमी को भी आगे की पढ़ाई के लिए विदेश जाने का अवसर मिल जायेगा और आप लोग भी इसी बहाने विदेश घूमेंगे। एयरलाइन्स से टिकट मिलेगा और रहने के लिए अपना घर होगा, कभ मैं इंडिया आ जाउंगी कभी आप लोग फ्रांस आ जायेंगे। फिर क्या समस्या होगी।"
उस उड़नपरी के आत्म विस्वास और दृढ़ता को देखकर, उसके मम्मी पापा को झुकना पड़ा। अंत में उन्होंने शर्त रखी कि शादी इंडिया में होगी। ताकि यहाँ का समाज और सम्बन्धी भी विवाह को देखें। सिम्मी ने रोहन को यह बात बताई, उसे इसमें कोई आपत्ति नहीं थी। अंधे को और क्या चाहिए, दो ऑंखें।  रोहन इस बात को तुरंत मान गया। विवाह की तैयारियां प्रारम्भ हो गयीं। मुंबई के एक अच्छे होटल में दोनों का विवाह धूम धाम से संपन्न हो गया। सिम्मी ने अपनी बदली वहां के घरेलू उड़ान के परिचालन में करवा ली और दोनों सुखपूर्वक पेरिस में रहने लगे।  

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