Monday, 2 May 2016

Kamwali ko chay

 -तीसरा पहिया 
2 -बोलती खामोशी 
3 -पुतले का दर्द 
4 - मैला इन्द्रधनुष 
5 -रिश्तों का ब्याज 
6 - एक पुख्ता सवाल 
7 -संजीवनी 
8 -स्वयंसिद्धा 
9 -विभीषण
10 - धर्म का अर्थ

काम वाली की चाय

भुवन ने उठते ही चाय के लिए बोला, मगर नीतू इधर उधर के कामों में लगी रही। आधा घंटा हो गया और चाय बनने का नामो निशान नहीं। भुवन की चाय पीने की प्रबल इच्छा थी, उसने एक बार फिर याद दिलाया। 
नीतू बोली 'अभी'

थोड़ी देर में घंटी बजी, लक्ष्मी दाखिल हुई और दो मिनट में चाय सामने आ गयी। भुवन ने पूछा, 'अभी तो आई है। इतनी जल्दी उसने कैसे चाय बना ली?'

'मैने पानी पहले ही रख दिया था। उसका भी आने का समय हो गया था, फिर उसके लिए अलग से बनानी पड़ती। '
नीतू बोली। 

'वाह, तुम भी गजब हो! लक्ष्मी के चक्कर में मुझे चाय के लिए आधा घंटा तरसा दिया। उसे चाय पिलाना जरूरी था तो दुबारा बना लेती या वह खुद बना लेती। पहले बताती तो मैं ही बनाकर पी लेता, पर तुम्हारे हाथ की चाय की बात कुछ और ही है। कल तो मेरे कहने से भी पहले चाय आ गयी थी । '
'कल लक्ष्मी जल्दी आ गयी थी न !' फिर नीतू चिल्लाई, 'लक्ष्मी! चूल्हे के पास पराठा पड़ा है, गरम करके खा लेना। ' फिर, धीरे से भुवन के कान के पास मुंह करके बोली 'जानते हो! पटाकर रखना पड़ता है ! कई बार दूसरे काम भी लेने होते हैं। और कभी कभी जब तुम बाहर जाते हो तो बाजार से छोटी मोटी चीज भी इसीसे मंगवा लेती हूँ। ' 

'मगर ध्यान रखना, पैसे दो तो ये लोग उसमें दण्डी भी मार लेते हैं।' भुवन ने समझाया। 

'खोट निकालने की तुम्हारी आदत है। तुम भी तो स्टेपनी के लिए घिसा पिता पिटा टायर रखते हो। '

एस० डी० तिवारी 




कामवाली -१
बजाज साहब शाम को घर आये, घंटी बजाये, सावित्री ने दरवाजा खोला। चेहरा कुछ मुरझाया हुआ था।
'सब ठीक है न ?' पूछते हुये सीधे शयन कक्ष में चले गये और बिस्तर पर सुस्ताने के लिए बैठ गये। सावित्री अभी कुछ बोली भी नहीं, तभी फिर से घंटी बजी, वह दरवाजा खोलने शीघ्रता से गयी। वापस खिला हुआ चेहरा लेकर आई और पूछी 'चाय पियोगे न ?'
बजाज साहब 'हां' बोलते हुये पूछे 'कौन है?'
'कामवाली। '

कामवाली - २
'मेम साहब, इस महीने के पैसे मुझे एडवांस में दे दो'  कामवाली मनोरमा से बोली।
'क्यों, क्या हो गया ?'
'मुझे दो हजार रुपये बाबा के खाते में जमा कराने हैं।  इस महीने उनके दर्शन करने जाना है। मोहन की नौकरी छूट गयी है न ! पहले गयी थी, कुत्ते को रोटी खिलाया, गाय को गुड़ खिलाया, पांच शनिवार को समोसा भी खाया, मगर कुछ नहीं हुआ। सोच रही थी एक बार और हो आऊं ।'
'और फिर नहीं लगी तो फिर से दो हजार जमा कराएगी? बाबा बोल देंगे, गुड़ में नमक लगा रहा होगा। इससे अच्छा ये पैसा उसके नौकरी ढूंढने के लिए आने जाने में खर्च कर।'
कामवाली सोच में पड़ गयी।


कामवाली - ३

फूलवती ने आते ही मुहल्लनामा  बांचना शुरू कर दिया, 'अरे मेम साहब आपको पता है ! कम्मो, जब देखो, गली के नुक्कड़ पर खड़ी होकर किसी लडके से खुसर फुसर करती रहती थी। '
'हाँ मैं भी देखती , उसके मोबाइल की घण्टी बजती ही रहती है। अधिकतर गर्दन टेढ़ी करके मोबाइल दबा लेती है और घंटे भर बर्तनों की खटपट कराती है। इधर तीन दिन से नहीं आ रही है। मैं तुझे ढूंढ ही रही थी। जब तक नहीं आती है मेरा भी काम कर दे। '
'हां हाँ मेम साहब, मुझे पता था, तभी तो आई हूँ। मैं गांव गयी तो आप ने उसे लगा लिया। मैं आपका काम छोड़ना थोड़े ही चाहती थी। अब तो मुझे करना ही है। '
'अरे नहीं, जब तक वो नहीं आती है, तभी तक। हटाउंगी तो उसे दुःख होगा। जब छोड़ेगी तो तुम आ जाना। '
'अब वो नहीं आएगी, मेम साहब ! कम्मो उसी लडके के साथ भाग गयी है।'
'अरे, उसके दस दिन के पैसे भी हैं, उसकी माँ को खबर दे देना आकर ले जाएगी। '


कामवाली - ४

शम्भू को खाना देकर मेघना दूसरे काम में व्यस्त हो गयी। सब्जी बड़ी स्वादिष्ट बनी थी, शम्भू और लेना चाहता था मगर सोचकर कहीं मेघना के लिए कम न पड़ जाय थोड़ी थोड़ी करके खा रहा था और अंचार से काम चला लिया।
अगले दिन सुबह देखा तो कामवाली सब्जी पराठा खा रही थी।
शम्भू यह देख कर चौंका, 'अरे! इतनी जल्दी खाना बन गया।'
'कल का पड़ा है, फ्रिज में रख दी थी।'
'सब्जी पड़ी थी ? मैं तो थोड़ी थोड़ी करके खाया था।'
'थोड़ी सी मैंने अलग रख लिया था। मुझे लग रहा था, तुम इससे अधिक नहीं खाओगे, काम वाली खा लेती है तो खुश रहती है।'



कामवाली - ५

सतीश ने कामवाली को दे दिया अब तो सरिता को सांप सूंघ गया।
कहीं कामवाली सतीश से ज्यादा खुश न हो जाय

वह उसका अधिक ख्याल करने लगी, चाय सामान अदि


कामवाली - ६

'मेम साहब कितनी रोटी बनानी है ?'
'बस आठ बना ले, तीन तीन हम दोनों की और दो चिंटू की। कल नौ बोली, तूने दस बना दिया और वो भी मोटी, दो बच गयीं। फ्रीज में थोड़ी सब्जी पड़ी है, गरम करके खा ले। '
कामवाली खाना बनाकर चली गयी। उसने रोटी इतनी पतली बना दी कि आज चिंटू तीन  खा गया। सुरेंदर और सिंधु खाने बैठे तो दोनों के दो, दो खाने के बाद एक ही रोटी बची। फिर वे एक दूसरे का मुंह ताकने लगे।
सिंधु बोली 'ले लो, थोड़ा सा चावल भी है, अभी गरम कर देती हूँ ।' सुरेंदर का उसे खाकर भी ठीक से पेट नहीं भरा।
अगले दिन सिंधु ने फिर दस रोटी बोल दिया तो उसने मोटी बना दी।


कामवाली -७


 ये बड़े लोग ताजी  रोटी नहीं खाने देते।  बासी हो जाती है तब कामवाली को पूछते हैं।


कामवाली - ८

मेरी साड़ी कैसे पहन ली
कोई चोरी थोड़े ही की है साहब ने दी है
नई साड़ी
सिंधु ने सोचा आज तो उसे भाव से लुंगी
बोला मेरे लिए लाया है दे उसे दिया
वह अपनी शिकायत लेकर पहुंची
की बादल पहले ही बरस पड़ा। इतने प्यार से पसंद करके तुम्हारे लिए साड़ी लाया। और तुम ने उसे दे दिया। नहीं पसंद था तू बता देती बदल लाता।
अच्छा जी उल्टा चोर कोतवाल को डाटे। पकड़े गए तो बात बना रहे हो। तुम्हे तो कामवाली का ही ज्यादा ख्याल है मेरा कहाँ। अब तो दिन का  खाना भी दोनों ने नहीं खाया। कामवाली आई तो सिंधु ने बोल दिया। दिन का पड़ा है वही खा लेंगे। चल चाय बना ले।
'क्या हो गया मेम साहब, तवियत तो ठीक है न ! खाना क्यों नहीं खाया ?'
तू ही जहर बो गयी थी।
हा दइया, मैंने क्या किया ?
तूने ही तो कहा था, कल जो साड़ी पहनी थी साहब ने दिया था।
'हाँ वो जहाँ दूसरी जगह काम करती हूँ न। उनकी मैरिज एनिवर्सरी थी, मुझे गिफ्ट दिया था।
सिंधु दौड़ी गयी और जाकर अलमारी में देखा तो साडी वहीँ पड़ी थी। किसी ने कहा कौवा कान ले गया तो कौवे के पीछे दौड़ ली, अपना कान नहीं देखा। अपने किये पर वह बहुत पछताई।


कामवाली -९

कामवाली के आने से पहले ही दरवाजा खुला था।



कामवाली १०

क्या हुआ आंटी आप खुद खाना बना रही हैं ? अल्का ने दमयंती से पूछा।
हां क्या करूँ, आजकल खाना बनाने वाली टिकती ही नहीं।  जहाँ महीना, दो महीना हुआ नहीं कि छोड़ कर चली जाती हैं।
पिंकी सुन रही थी
अरे दमयंती तुझे नहीं पता जो भी खाना बनाने वाली  आती है,मम्मी उसे अपने अच्छे डिश सिखाने लग जाती हैं। जब वो सिख लेती हैं तो उनका भाव बढ़ जाता है और ज्यादा पैसे मिलने लगते हैं।


कामवाली ११

आज तो दमयंती की लाटरी खुल गयी। पूरे एक महीने बाद, नई कामवाली मिली है। बड़ी मुश्किल से महीना काटा। घर का सारा काम खुद करना पड़ता। पड़ोस की कामवाली से कितना कहा कि यहाँ का भी पकड़ ले मगर वह सुनने को तैयार ही नहीं थी। हमेशा यही कहती 'मेरे पास टेम कहाँ है '
वैसे कभी कभार कर देती
 दमयंती नई कामवाली के आतिथ्य सत्कार में जुट गयी।  ये ले चाय, साथ में दो ब्रेड भी सेक कर ले आई। दमयंती चाहती थी बस कैसे भी फंस जाय। उसकी तिकड़म सफल हुई कामवाली ने जो पगार बोली, दो सौ रुपये करके मान गयी। और अगले दिन से काम पर आने को बोल गयी।
अभी हफ्ता भी नहीं बीता कि कामवाली ने कहा, 'मेम साहब अगले महीने मेरी बेटी की शादी है, मेरे इस महीने के पैसे एडवांस दे दो, कुछ सामान वगैरह खरीदना है ।  और पांच तारीख से पंद्रह दिन मैं छुट्टी पर रहूंगी।  २१ तारीख को आउंगी, तब तक के लिए मैं किसी को लगा जाउंगी। '
दमयंती बड़ी खुश हो गयी, चलो किसी को लगा कर, छुट्टी पर जाने को बोल रही है और पैसे तो देने ही हैं आज नहीं तो पंद्रह दिन बाद,  'ठीक है, जब दुबारा काम करने आएगी तो ले जाना। और शादी के लिए कुछ सामान भी दूंगी। ' दमयंती उसके काम से खुश थी। चाहती थी उसे कितना खुश रखे कि वह छोड़े नहीं।
कामवाली को एडवांस के साथ कई सामान भी दे दिया, लड़की की शादी थी। पुण्य भी मिलेगा।
कामवाली एडवांस और सामान लेकर गयी, मगर उसी दिन से छुट्टी मार ली।  उसके बाद काम पर नहीं आई न ही किसी को लगवाई। दमयंती बीस तारीख तक किसी प्रेमी की तरह उसकी प्रतीक्षा करती रही पर बेकार। दिन बीतते रहे मगर कामवाली का कहीं अता पता नहीं। अब तो जो भी काम वाली मिलती दमयंती पूछती अरे ऊषा को जानती हो।  जब हाँ में उत्तर मिलता तो पूछती, 'अपने गांव से आई कि नहीं?'
कइयों ने कहा, 'हाँ वो तो कबकी आ गयी है, उधर काम पर भी जाती है। '
दमयंती यही सोचती, मिलेगी तो बताउंगी। मगर वह उसे कहाँ मिली।  झख मारकर दूसरी ढूंढनी पड़ी।


कामवाली ११

'सोनम! जरा जा, देख आलमारी खुली है, एक पांच सौ का नोट निकाल ला, जाऊं कुछ सामान ले आऊं।'
सोनम पांच सौ के नोट के साथ आलमारी में पड़ी एक चांदी का छल्ला भी लाई।  हँसते हुए,  'मम्मी, इसे भी पहनती हो क्या !'
'नहीं, ले जा वहीँ रख दे। तुझे पता है, ये ४० साल पुरानी है। सम्हाल कर रखी हूँ।'
'लगता है आपको भी किसी ने धोखा दिया है। मगर, उसकी याद सम्हाल कर क्यों रखा है मम्मी? फेंक देती हूँ।'
'ले जा चुप चाप वहीँ रख आ। पता है तेरी नानी के घर एक शीला आंटी  काम करने आती थीं। मेरे पांचवे जन्मदिन पर  उन्होंने यह सौगात दिया था।  उसकी हस्ती वही थी। पर प्रेम तो देख। उनका वही प्रेम देखकर, यह निशानी मैं सम्हाल कर रखी हूँ। 

कामवाली १२

प्रिया चहकती हुई आयी 'आंटी मेरी घड़ी !'
सुनंदा को समझते देर नहीं लगी कि प्रिया बारहवीं पास हो गयी है। 'क्यों ? रिजल्ट आ गया क्या !'
'हां, कल ही आ गया। ६१ प्रतिशत आये हैं।'
'अरे वाह, तूने तो कमाल कर दिया।  काम करने के साथ पढाई के लिए भी समय निकाल लेती है, बड़ी बात है।  वो भी फर्स्ट क्लास से पास। वाह तूने  खुश किया। '
फ्रिज से मिठाई का डब्बा निकाल कर आगे बढ़ाते हुए, 'ये ले मिठाई खा। वैसे मैं तो गुस्सा थी, तू कल नहीं आयी, सारा काम मुझे खुद करना पड़ा। लेकिन तेरी इस खबर ने सारा गुस्सा  ख़ुशी में बदल दिया।'
'क्या करती आंटी, मम्मी की तवियत थोड़ी ख़राब हो गयी थी और पास होने के कारण हम लोग बहुत खुश थे इसलिए भी आने का मन नहीं हुआ।'
'चल कोई बात नहीं जल्दी से अपना काम कर ले, फिर मैं तुझे घड़ी देती हूँ। इम्पोर्टेड घड़ी है।  पिछली बार भैया आया था तो स्विट्ज़रलैंड से मेरे लिए लाया था, लेकिन मुझे अपनी पुरानी घडी ही अच्छी लगती है। अब वो तेरी है।'
प्रिया ख़ुशी से चिल्लाते हुए, 'हा, इम्पोर्टेड घड़ी, सुना है स्विट्ज़रलैंड की घड़ियाँ सबसे अच्छी होती हैं। माँ सुनेगी तो कितनी खुश होगी।'
'हाँ,  और यही नहीं तू कॉलेज में नाम लिखवा ले, तेरे कॉलेज की फीस भी मैं दूंगी।'
'सच आंटी ! फिर तो मैं अफसर बनकर दिखाउंगी।'
'शाबाश प्रिया ! वही तो मैं देखना चाहती हूँ। ऐसा हो गया तो मैं अपना जीवन धन्य समझूंगी।' 


कामवाली १३

घनश्याम जी, अपने बेटे अंकित के साथ गेट पर खड़े प्रतीक्षा कर रहे थे कि कामवाली निकले तो वे और पूछ ताछ कर लें।  कामवाली से बढ़िया घर का भेदी और कौन हो सकता है।
लड़का कब आता है। पीता पाता है कि नहीं आदि।
कई प्रश्न पूछे वह सब ठीक ही बताती गयी।
जब वो संतुष्ट होकर चलने को हुए तो वो बोल पड़ी, 'साहब उस घर से मैं पगार लेती हूँ वहां की बुराई थोड़े ही करुँगी।
'घनश्याम को बात समझ आ गयी। तुरंत एक हजार रुपये निकाले, 'हाँ अब बता'।
'रुपये लेकर बोली हाँ साहब अच्छे लोग हैं, लड़का भी अच्छा है।' 
'अच्छा, उन लोगों को बताना नहीं कि मैंने तुमसे ये सब पूछा।'
'ठीक है साहब।'



कामवाली १४ 

मशीन सी जिंदगी

चाय का कप रखते ही, शालिनी बड़बड़ाने लगी, 'यहाँ क्या जिंदगी है यार। सुबह उठते ही मशीन की तरह लग जाओ। नाश्ता तैयार करो, चिंटू को तैयार करो, फिर खुद तैयार होवो। अपना, रोहन का और चिंटू का टिफ़िन पैक करो। फिर ऑफिस जाते समय चिंटू को  शिशु सदन छोडो, शाम को आते हुए ले के आओ। फिर डिनर तैयार करो। फिर अगले  दिन की तैयारी शुरू,  रोज रोज पिज्जा तो  खाया नहीं जाता। वीक एन्ड पर दो दिन मिलते हैं, उसमें भी एक दिन घर और कपड़ों की सफाई में निकल जाता है। फिर घर के घटे बढ़े सामान लाकर रखो।  कई बार तो सोचकर परेशान हो जाती हूँ, आखिर हम मशीन हैं या इंसान। '
'क्यों? रोहन मदद नहीं करता ?' मृदुला ने पूछा।
'रोहन हाथ तो बंटाता है, मैं अकेले कहाँ से कर पाती। मगर सब काम जंजीर की कड़ियों की भांति, एक दूसरे से लगे होते  हैं; कोई भी काम स्वतंत्र तरीके से नहीं कर सकते। और हर बात का ध्यान  तो मुझे ही रखना पड़ता है। मर्दों का तो तुझे पता ही है। अपना इंडिया कितना अच्छा है यार! हर काम के लिए अलग बाई मिल जाती हैं, झाड़ू पोंछा वाली अलग, खाना बनाने के लिए अलग, कपड़े धोने के लिए अलग।"

ये भी तो देखो, हमने क्या प्रणाली बनायीं है; आधे लोग मजे करते हैं, और आधे उनकी सेवा। यहाँ सभी अपना काम करते हैं, कोई किसी का नौकर नहीं। यहाँ सभी अपने काम का उचित पारिश्रमिक पाते हैं, और वहां कामवाली बाई को अपनी मेहनत का पूरा मिलता है क्या?



मम्मी
चांदी का छला

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