Sunday, 1 May 2016

Riyal se rupaya

रियाल से रूपया

'मम्मी, मैं सऊदी अरब जा रहा हूँ।' अकरम, अख़बार से मिले पर्चे को दिखाते हुए बोला।
'इतनी दूर तू क्या करने जा रहा है ?'
'ये देख वहां बिजली का काम जानने वालों की जरूरत है। बस कल ही पासपोर्ट के लिए अप्लाई करता हूँ। फिर देखना साल भर में तुझे पैसे से तोप दूंगा। अब घर में पैसे की कोई तंगी नहीं रहेगी।'
'बस कर, कहां इतनी दूर जायेगा। चुप चाप पड़ा रह, मुझे नहीं चाहिए, पैसा वैसा।'  
'नहीं मां, हम लोग क्या ऐसे ही रहेंगे ! पता है वहां के एक रियाल में अठारह रुपये होते हैं। यानि कि वहां जो पैसा मिलेगा वह यहां के अठारह गुना होगा। '
अकरम, अख़बार का वह परचा पाकर बड़ा खुश था। अब वह विदेश में नौकरी करेगा और पैसे बचाकर भारत लाएगा, उसका एक अच्छा सा मकान होगा, अच्छी सी बिजली की दुकान होगी। दुकान का नाम, माँ के ही नाम से रखेगा। उसके मन में तरह तरह के ख्याली पुलाव पकने लगे। उसके बगल वाली वाली गली में शमशेर रहता था और वह वेल्डिंग का काम करता था। अकरम वह परचा लेकर उसके पास गया और उसे भी पासपोर्ट के लिए अप्लाई करने को कहने लगा। शमशेर ने भी वह परचा पढ़ा लिखा था, 'सऊदी अरब में भारी संख्या में तकनिकी विशेषज्ञों की आवश्यकता। प्लंबिंग, टर्नर, इलेक्ट्रीशियन, वेल्डर, मजदूर आदि का काम जानने वाले १५ दिन के अंदर दिए हुए पते पर आवेदन करें। आवेदन करने वाले के पास वैध पासपोर्ट होना आवश्यक है।'
शमशेर को भी यह बात जंच गयी और वेल्डर के लिए अप्लाई करने के लिए राजी हो गया। अकरम ने इलेक्ट्रीशियन का कोर्स कर रखा था, और बिजली के काम में उसका हाथ साफ था।  उसे पूरा विश्वास था उसका सिलेक्शन तो हो ही जायेगा। अब दोनों पासपोर्ट के लिए अप्लाई करने और अपने अपने परिवार को समझाने में लग गये। शमशेर के परिवार वालों ने तो उसे हां कर दिया पर अकरम की माँ उसे जाने देना नहीं चाह रही थी। बड़ी मुश्किल से अकरम ने माँ को समझाया कि वहां बहुत पैसे मिलते हैं। कितने ही लोग अरब जाकर अमीर हो गए। और कौन सा वहां जिंदगी भर रहना है। एकाध साल की बात है। कमाकर फिर वापस इंडिया आ जायेगा। बेटे की जिद्द के आगे  माँ को झुकना पड़ा। तय हुआ कि अकरम सऊदी चला जाये और दो तीन साल काम करके वापस आ जाये, फिर यहीं शादी करके अपना घर बसा ले।
अब प्रश्न खड़ा हुआ कि  १५ दिन में पासपोर्ट कैसे बने ? साधारण तरीके से पासपोर्ट बनवाने में एक महीने से भी अधिक समय लगता, इसलिए उन्हें एजेंट की मदद लेनी पड़ी। पैसे तो कुछ अधिक खर्च हुए पर, समय पर पासपोर्ट बन गया।
प्रार्थना पत्र  उक्त कंपनी को मुंबई के एक पते भेजना था। आवेदन भेज दिया गया और दस दिन के अंदर वहाँ से इंटरव्यू काल आ गयी। इंटरव्यू के समय, हर उम्मीदवार को दो दो हजार रुपये जमा करवाने थे और चयन होने पर बीस बीस हजार वीसा, किराया आदि के खर्च के रूप में। अकरम और शमशेर ने भी दो दो हजार रुपये दिए, उनका इंटरव्यू  हुआ और दोनों पास हो गए। घर आने के एक सप्ताह में ही उनके पास नियुक्ति पत्र आ गया। नियुक्ति पत्र पर कंपनी का पता सऊदी अरब का लिखा  था। घर में ख़ुशी छा गयी। मोहल्ले में ढिंढोरा पिट गया कि अकरम और शमशेर काम करने अरब जा रहे हैं। अब वे कभी घर से निकलते तो सिर आसमान में होता। दोनों की दोस्ती अब गहरी हो गयी थी। हो भी क्यों नहीं, दोनों विदेश जायेंगे और कुछ दिनों में उनकी अपनी शान होगी , एक अलग पहचान होगी। बढ़िया ठाट बाट का रहन सहन होगा।
खैर, पंद्रह दिन के अंदर पूरी तैयारी के साथ बताये गए पता पर मुंबई में उपस्थित होना था। और बीस हजार रुपये भी साथ ही जमा करने थे। दोनों निर्दिष्ट तिथि को  बॉम्बे पहुँच गए। कंपनी का एक कमरे का कार्यालय वहां बैठे कर्मचारी ने पासपोर्ट और पैसे ले लिया और बोला, 'हम वीसा लगवाते हैं, तुम अगले सोमवार को सुबह दो बजे दोपहर बंदरगाह पर हाजिर हो जाना वहां से मस्कट के लिए जहाज रवाना होगा। हवाई जहाज का किराया अधिक है, इसलिए सबको पानी के जहाज से जाना है। वहां बंदरगाह पर, हमारा एजेंट मिल जायेगा, जो कंपनी की साइट पर ले जायेगा। पहुंचने में २४ घंटे लग सकते हैं, अपने खाने पीने का भरपूर सामान ले लेना।'
अकरम और शमशेर, एक बार फिर, अगले सोमवार को मुंबई बंदरगाह पर पहुंचे। वहां बंदरगाह पर काफी भीड़ थी। अकरम समझ गया, अलग अलग क्षेत्र के काम जानने वाले लोग हैं। एक दो लोगों से सऊदी के बारे में पूछा तो पता लगा कि वे सभी पहली बार ही जा रहे हैं। किसी को न तो कंपनी के बारे में कोई आईडिया था, न ही सऊदी अरब के बारे में। सब लोग जहाज में सवार हुए, अँधेरा होते होते जहाज बंदरगाह से चल दिया। जहाज घंटों चलता रहा। आधी रात के बाद, जहाज एक बंदरगाह पर रुका।  सभी सो रहे थे, शोर हुआ उठो उठो आ गए।
समय देखा तो रात के तीन बज रहे थे। सभी को बड़ा आश्चर्य हुआ, इतनी जल्दी कैसे आ गए। बस आठ घंटे में, कंपनी वाला तो बोल रहा था २४ घंटे लग सकते हैं। खैर, बहस करने का समय नहीं था, हड़बड़ी में सभी उठे और जहाज से नीचे उतरे। बाहर निकले तो देखा बंदरगाह बिलकुल निर्जन था। वहां कोई भी दूर दूर तक नजर नहीं आ रहा था। बंदरगाह पर सभी प्रतीक्षा करने लगे, हो सकता है कुछ समय बाद एजेंट आ जाय। जहाज उतारते ही वहां से रफूचक्कर हो गया। सैकड़ों लोग तट पर प्रतीक्षा करते रहे, पर कोई एजेंट नहीं आया। किरण फूट गयी पर किसी का कोई अता पता नहीं। वे जान चुके थे कि ठगी का शिकार हुए हैं। सबने सोचा चलते हैं आस पास कोई गांव, क़स्बा हो तो, पता करते हैं। सभी वहां से चल दिए। चार पांच किलोमीटर चलने पर, उन्हें एक गांव दिखाई दिया वे वहां पहुंचे तो पता लगा कि वे भारत में ही कर्णाटक के एक गांव में हैं। अब वहां उनकी भाषा समझने वाला कोई नहीं था। बड़ी मुश्किल से वे पास के एक कस्बे शिरूर तक पहुंचे वहां एक मस्जिद में उन्हें शरण मिली।


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