Sunday, 1 May 2016

Chor pe mor

चोर पे मोर

अग्रवाल जी भारतीय  रेल की सेवा में कार्यरत थे। उनकी एक स्टेशन पर नियुक्ति थी और रहने के लिए स्टेशन के पास ही रेलवे क्वार्टर मिला था। अग्रवाल जी के घर के पीछे ही रेलवे का गोदाम भी था जहाँ मालगाड़ी से उतरने के बाद, अनाज का भण्डारण होता था। गोदाम पर चोरों की भी नजर रहती थी और कई बार अनाज की बोरियां गायब हो जाती थीं।

एक बार अग्रवाल जी की रात की पाली में ड्यूटी थी। उनकी पत्नी को आधी रात को घर के पीछे कुछ हलचल का आभास हुआ । आवाज सुनकर उनके कान खड़े हो गए। वे समझीं कि उनके घर की छत पर ही चोर आ गए हैं तो बिना देर किये अग्रवाल जी को फोन करके सूचना दीं और तुरंत आकर सब देखने के लिए बोलीं। इधर से उनका लड़का उनकी मदद के लिए निकल पड़ा।

अग्रवाल जी सहायता के लिये एक और सहकर्मी को साथ लेकर बिना समय गंवाए आ पहुंचे । सही वस्तुस्थिति का पता लगाने के लिए दोनों ने योजना बनाई कि एक ओर से अग्रवाल साहब बढ़ें और दूसरी ओर से सहकर्मी। जिधर अग्रवाल जी का सहकर्मी गया उधर से उनका लड़का आ रहा था। दोनों ने एक दूसरे को चोर समझा और  'चोर, चोर' चिल्लाते आक्रमण कर दिया और दोनों ही घायल हो गए। इतने में 'सुधीर, सुधीर' चिल्लाते श्रीमती अग्रवाल भी आ गयीं। सहकर्मी को तब वस्तुस्थिति का पता चला। 

उधर चोर, शोर सुनकर सतर्क हो गए और अग्रवाल साहब को देखते ही उनपर लोहे की छड़ से आक्रमण कर दिया और भाग गए। अग्रवाल साहब भी लहू-लुहान हो गए। चोरी तो बच गयी, मगर गलतफहमी ने तीनों को अस्पताल पहुंचा दिया। 

एस० डी० तिवारी 


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