पुरानी किताब - १
लौट के बुद्धू घर को आये। अब तो बिटुआ को बिना किताब के ही स्कूल जाना पड़ता। शुरू में एकाध दिन डांट पड़ी, पर बिटुआ के अध्यापक ने परिस्थिति का बोध होते ही साथ बैठने वाले छात्र के साथ, साझे में किताब पढ़ने की व्यवस्था करवा दिया।
- एस० डी० तिवारी
पुरानी किताब - २
पंडित जी को अपनी ममेरी बहन याद हो आई जिसने अपने बेटे की पुरानी किताब भी देने से मना कर दिया था। वे रमौती की ओर अवाक् कुछ देर देखते रहे।
एस० डी० तिवारी
पुरानी किताब - ३
पंडित रामधन के पास खेत तो था, पर सारी खेती अनुकूल बारिश पर निर्भर करती। खेत से खाने भर को बड़ी मुश्किल से पैदा होता। घर के छोटे मोटे सामान अनाज के बदले ही आते थे। घर के बच्चों तक को मन मार के रहना पड़ता। कपड़ा लत्ता भी एकाध साल बाद ही नया बन पाता। बेटे को पढ़ाने लिखाने के लिए पैसे नहीं होते। सरकारी स्कूल की फीस तो नाम मात्र की होती पर कापी किताब खरीदने में भी कोताही थी। किताब के लिए रिश्तेदारियों के बच्चे ढूंढे जाते। बड़े बेटे से अगली कक्षा में किस रिश्तेदार का बच्चा पढता है, उससे पहले ही बोल दिया जाता था कि किताबें सम्भाल के रखना, अगली साल बिटवा को चाहिए होगी।
बिटवा छठीं में आ गया था, पंडित जी ने जिस रिश्तेदारी में किताब के लिए बोला था, वह फेल हो गया। अब वे बड़ी परेशानी में पड़ गए। आखिर किताब के लिए क्या करें! पैसे तो थे नहीं, कि खरीदें। बिटवा पढ़ने में बहुत तेज था। कक्षा में प्रथम तीन में ही स्थान रखता था, मगर किताब के बिना कैसे पढ़ेगा। पहले तो सोचे उधार पायींच करके खरीद दें, मगर पंडित जी ने दिमाग दौड़ाया तो उनको याद आया कि उनके मामा की लड़की यानी ममेरी बहन का लड़का भी इसी वर्ष छठी कक्षा से उत्तीर्ण हुआ है। बहनोई जी जिला मुख्यालय के एक कॉलेज में लेक्चरर थे। रामधन ने सोचा, चलें उनसे एक बार किताब के लिए कहें मगर हिम्मत भी नहीं हो रही थी, बड़े लोग हैं पता नहीं बात का मान रखेंगे या नहीं, ना कर दिया तो बेइज्जती होगी और साथ में दुःख। मगर और कोई रास्ता भी नहीं सूझ रहा था। उन्होंने सोचा एक बार देख लेने में कोई हर्ज नहीं, ना कर देंगे तो देखा जायेगा। एक दिन थोड़ी लइया भूजा लेकर, वे ममेरी बहन के यहां चले गए। दीदी के यहां पहुंचते ही बड़े होने के लक्षण दिखने लगे थे। रामधन का केवल पानी पिलाकर स्वागत किया गया, क्योकि चाय बनाने में श्रम और शरबत बनाने में चीनी खर्च होती। वही अगर वो पंडित रामधन के यहाँ आते तो निर्धन होते हुए भी वह शरबत के साथ भूजा भी देते। उस समय गांव में चाय का फैशन नहीं था।
खैर, रामधन ने अपनी बात बहन के सामने रख दी। कंप्यूटर की तरह उनको उत्तर मिला, 'इस साल बेटी पांचवी में है, अगली साल छठी में जाएगी, बेटे की सारी किताबें उसके लिए सम्भाल कर रख दी हैं।'
रामधन ने कहा अगली साल वह सभी किताबें वापस कर देगा, तो बहन का कहना था कि वे पहले ही पुरानी हैं, एक साल में और पुरानी हो जायेंगी, फिर पढ़ने लायक कहाँ रह जाएँगी! बेटी वैसे ही बड़ी नखरेवाली है, ज्यादा फटी पुरानी किताब से वह पढ़ेगी ही नहीं।
रामधन ने कहा अगली साल वह सभी किताबें वापस कर देगा, तो बहन का कहना था कि वे पहले ही पुरानी हैं, एक साल में और पुरानी हो जायेंगी, फिर पढ़ने लायक कहाँ रह जाएँगी! बेटी वैसे ही बड़ी नखरेवाली है, ज्यादा फटी पुरानी किताब से वह पढ़ेगी ही नहीं।
लौट के बुद्धू घर को आये। अब तो बिटुआ को बिना किताब के ही स्कूल जाना पड़ता। शुरू में एकाध दिन डांट पड़ी, पर बिटुआ के अध्यापक ने परिस्थिति का बोध होते ही साथ बैठने वाले छात्र के साथ, साझे में किताब पढ़ने की व्यवस्था करवा दिया।
- एस० डी० तिवारी
पुरानी किताब - २
बिरजू ही पंडित रामधन के खेतों का सारा काम करता था। बदले में थोड़ा सा खेत उसे दे दिया गया था और पंडित जी के खेत में पैदा हुए अनाज में से थोड़ा बहुत मजदूरी के रूप में ले जाता था, जिससे उसके परिवार का पेट पलता था। वह एक दलित भूमिहीन था, गांव में रोजगार के और कोई साधन नहीं थे, इसलिए उसके परिवार की निर्भरता रामधन पर ही थी। उसका छोटा भाई सिरजन, कलकत्ता, किसी मिल में काम करता था। वह बचपन में ही कलकत्ता चला गया था। उसने अपना घर बिरजू से अलग बनवा लिया था। अपने मोहल्ले में उसका घर सबसे सुन्दर दिखता था। उसका परिवार गांव के किसानों पर आश्रित नहीं था। कलकत्ता से पैसा आता था और वे ठीक ठाक से रहते थे। सिरजन के बेटे को कॉपी किताब का कोई अभाव नहीं था।
बिरजू की पत्नी रमौती, अधिकतर पंडित जी के यहाँ आती और उनकी पत्नी के काम में हाथ बंटा देती थी। बदले में कुछ खाने पीने को मिल जाता। कभी कभी, घर ले जाने को, बचा खुचा खाना भी मिल जाता। एक दिन रमौती आई तो बिटुआ को देखकर पूछ दी, बिटुआ किस कक्षा में है? जब उसे पता चला छठी में तो चौंक कर बोली, अरे सिरजन का बेटा सातवीं में है। पंडित रामधन और उनकी पत्नी समझे कि वह अपने परिवार को ऊँचा दिखाना चाहती है कि उसके घर के बच्चे पढ़ने में इनसे आगे हैं। पंडित रामधन थोड़ा ऐंठ कर बोले, 'तो हम क्या करें।'
'अगली साल उसकी किताबें, बिटुआ के काम आ जाएँगी। कहें तो, अभी से बोल के रखूं। हमारे पास पड़ोस और रिश्तेदारी में इस साल और कोई छठी में नहीं है।'
पंडित जी को अपनी ममेरी बहन याद हो आई जिसने अपने बेटे की पुरानी किताब भी देने से मना कर दिया था। वे रमौती की ओर अवाक् कुछ देर देखते रहे।
एस० डी० तिवारी
पुरानी किताब - ३
आठवीं कक्षा तक बिटुआ गांव में पढ़ा। उसके चाचा सदानन्द दिल्ली रहते थे। सदानंद ने रामधन से कहा बिटुआ को उसके साथ दिल्ली भेज दें, वहां पढ़ाई लिखाई का अच्छा माहौल है, पढ़ लिख जायेगा। रामधन को भी यह बात अच्छी लगी। गांव में तो खेल कूद में ही लगा रहेगा और बच्चों के साथ बिगड़ जायेगा। बिटुआ अपने चाचा के साथ दिल्ली आ गया। उसके चाचा ने एक सरकारी स्कूल में नौवीं कक्षा में उसका नाम लिखवा दिया। अब फिर से किताब की समस्या आई। नई किताबें बहुत मंहगी थीं और किसी से जान पहचान भी नहीं थी कि पुरानी मांग कर काम चलाये। उसके चाचा उसे समझाते कि शहर का खाने पीने का ही खर्च बहुत होता है, ऊपर से पढ़ाई का खर्च। यह वेतनभोगी के लिए बहुत बड़ा भर है इसलिए कोशिश करके, अन्य लड़कों से दोस्ती कर ले ताकि कम से कम किताबों का तो बंदोबस्त हो जाय। चलो, आने जाने का तो बस का सस्ता पास बन जायेगा।
उसे साथ पढ़ने वाले बच्चों से किताबें तो नहीं मिलीं पर एक रास्ता मिल गया, लड़कों ने बताया कि नई सड़क से पुरानी किताबें खरीद ले। वहां आधे दाम पर ही किताबें मिल जाती हैं। नयी सड़क की बाजार देख बिटुआ को बड़ा आश्चर्य हुआ और अपना गांव याद आ गया। गांव में तो पुरानी किताबें मांगने पर मुफ्त में ही मिल जाती थीं, और यहाँ पुरानी किताबों का बाजार लगा है। उसने कुछ जरूरी किताबें वहां से खरीद लीं। एकाध तो साथ के बच्चों से मांगकर काम चला लेता। जिसदिन किसी बच्चे को उस विषय का काम नहीं करना होता, वह उससे किताब मांग कर ले जाता और अपना काम कर लेता।
कई बार बच्चों द्वारा बहाना का सामना भी करना पड़ता। इन घटनाओं से क्षुब्ध, बिटुआ ने ठान लिया कि वह अपने बच्चों को कभी किताब का अभाव नहीं होने देगा। खुद बेशक पुरानी किताबों से पढ़ रहा है, मगर वह इस लायक बन कर रहेगा कि उसके बच्चे किताब के लिए न तरसें। उसका परिश्रम रंग लाया माध्यमिक परीक्षा बड़े अच्छे अंकों से उत्तीर्ण किया। आगे ग्रेजुएशन में तो पुस्तकालय की सुविधा भी मिल गयी थी।
बिटुआ का बेटा नई किताबें लेकर अंग्रेजी माध्यम स्कूल में पढ़ने जाता है। पंडित रामधन पैसे की बड़ी तंगी देख चुके थे, अब बिटुआ उनके लिए हर महीने कुछ पैसे भेज देता है।
एस० डी० तिवारी
पुरानी किताब - ४
बिटुआ अब विवेक पांडेय था। दरिया गंज में पटरी पर लगी पुरानी किताबों के बाजार में विवेक को एक किताब दिख गयी। दाम पूछा तो, मात्र बीस रुपये। बिटुआ ने तुरंत बीस का नोट निकाला और उस पुस्तक को उठा लिया। वैसे, अब उसे इसकी आवश्यकता नहीं थी। परंतु उसके लिए इसका प्रसंग एक पुरानी घटना से जुड़ा था। जब वह पढता था तो बहुत महँगी होने के कारण वह मनोविज्ञान की यह पुस्तक खरीद नहीं पाया था। पुस्तकालय से वह पुस्तक उसे काफी प्रतीक्षा के पश्चात् मात्र पंद्रह दिन के लिए मिल पायी थी। केवल पंद्रह दिन में वह उस पुस्तक से क्या कुछ कर पाता? किसी तरह थोड़ा बहुत नोट बना पाया था। आज वह पुस्तक उसे लगभग मुफ्त में मिल रही है।
वह उस पुस्तक को घर लाकर समझ पाया कि अभी भी उसके लिए कितनी मूल्यवान है। पढ़ाई के समय जिस ज्ञान से वह वंचित रह गया था, उसकी पूर्ति अब हो रही है। उसे एहसास हुआ कि यह पुस्तक उसकी एक बहुत पुरानी संगिनी है, जिससे वह अब तक दूर रह रहा था।
पुरानी किताब ५
विवेक को मुंशी प्रेम चंद की कहानियां पढ़ने का शौक था। एक बार वह दरियागंज पुरानी पुस्तकों के बाजार में घूम रहा था कि उसकी दृष्टि एक किताब पर पड़ी। यह वही किताब थी जिसके लिए उसने कभी नई सड़क छान मारी थी। किताब जर्जर अवस्था में थी। उसका जिल्द तक भी नहीं था। खैर प्रेम चंद की कहानियों की मनपसंद किताब थी, उसने बिना अधिक सोचे उसे खरीद लिया।
घर लाकर, उसने किताब को मेज पर रख दिया और किसी काम से बाहर चला गया। उसके जाने के पीछे कबाड़ी वाला आ गया। उसकी उनकी पत्नी ने अखबार की रद्दी के साथ उस किताब भी दे दिया। विवेक जब लौट कर आया तो पढ़ने के लिए वो किताब ढूंढने लगा। नहीं मिली तो, शालिनी से पूछा 'मेज पर एक किताब रखी थी, नहीं मिल रही है।'
'एक फटी पुरानी सी किताब पड़ी तो थी मैंने तो उसे रद्दी में बेच दिया।'
अब तो विवेक के अफ़सोस का ठिकाना न रहा। इतनी मेहनत से ढूंढकर लाया था और वह रद्दी में चली गयी। वो भी मुंशी प्रेम चंद की किताब। अब मुंशी प्रेम चंद ये कदर रह गयी है!
खैर, उसने सोचा, अगले रविवार को एक बार फिर से प्रयास करेगा, इतने बड़े पुस्तकों के भंडार में शायद एक और किताब हो। रविवार को वह दरियागंज पहुँच गया। पहले तो वह उसी दुकान पर गया, 'भाई मैं एक प्रेम चंद की कहानियों की पुस्तक ले गया था, मुझे एक और चाहिए।'
'अरे साहब यहाँ एक शीर्षक की दो किताबें तो मुश्किल से ही मिलती हैं। ढूंढ लीजिये, शायद किसी के पास मिल जाय।'
विवेक पटरी बाजार का चक्कर लगा रहा था कि एकाएक एक दुकान पर, एक ग्राहक के हाथ में वही किताब देखकर बड़ा प्रसन्न हुआ। 'भाई साहब ! यह किताब नहीं ले रहे हों तो मैं ले लूँ।'
नहीं भाई अभी देख रहा हूँ, मेरे काम की लग रही है, बेटा हिंदी से एम० ए० कर रहा है। उसे चाहिए।
जब उस व्यक्ति ने दाम पूछा तो दुकानदार बोला १०० रुपये।
तबतक विवेक की दृष्टि उस पुस्तक पर लगे एक चिन्ह पर पड़ गयी। यह तो वही पुस्तक थी जिसे वे पिछली बार ले गया था। वह बड़ा हैरान हुआ, इतनी जल्दी वह पुस्तक फिर से इस बाजार में कैसे आ गयी।
दाम सुनकर, विवेक बोला, 'पिछली बार तो मैं यहीं से ४० रुपये में ले गया था।'
दुकानदार बोला, 'बाबूजी, इसकी छपी कीमत तो तीन सौ रुपये है। बाकी तो ग्राहक के जरूरत के हिसाब से दाम।कभी ग्राहक छपे मूल्य से भी अधिक दाम देने को तैयार हो जाता है।'
पुरानी किताब
बिटवा यानि केदारनाथ, एडवोकेट अपनी साठ की उम्र पार कर, जिंदगी के दूसरे छोर पर पहुँच चुके हैं। वे अपने जीवन से जुड़े, पुरानी किताब के इन सात प्रसंगों को कभी नहीं भूल पाते।
प्रथम
लौट के बुद्धू घर को आये। अब तो बिटुआ को बिना किताब के ही स्कूल जाना पड़ता। शुरू में एकाध दिन डांट पड़ी, पर बिटुआ के अध्यापक ने परिस्थिति का बोध होते ही साथ बैठने वाले छात्र के साथ, साझे में किताब पढ़ने की व्यवस्था करवा दिया।
द्वितीय
पंडित जी को अपनी ममेरी बहन याद हो आई जिसने अपने बेटे की पुरानी किताब भी देने से मना कर दिया था। वे रमौती की ओर कुछ देर अवाक् देखते रह गए।
तृतीय
पुरानी किताब - ४
बिटुआ अब विवेक पांडेय था। दरिया गंज में पटरी पर लगी पुरानी किताबों के बाजार में विवेक को एक किताब दिख गयी। दाम पूछा तो, मात्र बीस रुपये। बिटुआ ने तुरंत बीस का नोट निकाला और उस पुस्तक को उठा लिया। वैसे, अब उसे इसकी आवश्यकता नहीं थी। परंतु उसके लिए इसका प्रसंग एक पुरानी घटना से जुड़ा था। जब वह पढता था तो बहुत महँगी होने के कारण वह मनोविज्ञान की यह पुस्तक खरीद नहीं पाया था। पुस्तकालय से वह पुस्तक उसे काफी प्रतीक्षा के पश्चात् मात्र पंद्रह दिन के लिए मिल पायी थी। केवल पंद्रह दिन में वह उस पुस्तक से क्या कुछ कर पाता? किसी तरह थोड़ा बहुत नोट बना पाया था। आज वह पुस्तक उसे लगभग मुफ्त में मिल रही है।
वह उस पुस्तक को घर लाकर समझ पाया कि अभी भी उसके लिए कितनी मूल्यवान है। पढ़ाई के समय जिस ज्ञान से वह वंचित रह गया था, उसकी पूर्ति अब हो रही है। उसे एहसास हुआ कि यह पुस्तक उसकी एक बहुत पुरानी संगिनी है, जिससे वह अब तक दूर रह रहा था।
पुरानी किताब ५
विवेक को मुंशी प्रेम चंद की कहानियां पढ़ने का शौक था। एक बार वह दरियागंज पुरानी पुस्तकों के बाजार में घूम रहा था कि उसकी दृष्टि एक किताब पर पड़ी। यह वही किताब थी जिसके लिए उसने कभी नई सड़क छान मारी थी। किताब जर्जर अवस्था में थी। उसका जिल्द तक भी नहीं था। खैर प्रेम चंद की कहानियों की मनपसंद किताब थी, उसने बिना अधिक सोचे उसे खरीद लिया।
घर लाकर, उसने किताब को मेज पर रख दिया और किसी काम से बाहर चला गया। उसके जाने के पीछे कबाड़ी वाला आ गया। उसकी उनकी पत्नी ने अखबार की रद्दी के साथ उस किताब भी दे दिया। विवेक जब लौट कर आया तो पढ़ने के लिए वो किताब ढूंढने लगा। नहीं मिली तो, शालिनी से पूछा 'मेज पर एक किताब रखी थी, नहीं मिल रही है।'
'एक फटी पुरानी सी किताब पड़ी तो थी मैंने तो उसे रद्दी में बेच दिया।'
अब तो विवेक के अफ़सोस का ठिकाना न रहा। इतनी मेहनत से ढूंढकर लाया था और वह रद्दी में चली गयी। वो भी मुंशी प्रेम चंद की किताब। अब मुंशी प्रेम चंद ये कदर रह गयी है!
खैर, उसने सोचा, अगले रविवार को एक बार फिर से प्रयास करेगा, इतने बड़े पुस्तकों के भंडार में शायद एक और किताब हो। रविवार को वह दरियागंज पहुँच गया। पहले तो वह उसी दुकान पर गया, 'भाई मैं एक प्रेम चंद की कहानियों की पुस्तक ले गया था, मुझे एक और चाहिए।'
'अरे साहब यहाँ एक शीर्षक की दो किताबें तो मुश्किल से ही मिलती हैं। ढूंढ लीजिये, शायद किसी के पास मिल जाय।'
विवेक पटरी बाजार का चक्कर लगा रहा था कि एकाएक एक दुकान पर, एक ग्राहक के हाथ में वही किताब देखकर बड़ा प्रसन्न हुआ। 'भाई साहब ! यह किताब नहीं ले रहे हों तो मैं ले लूँ।'
नहीं भाई अभी देख रहा हूँ, मेरे काम की लग रही है, बेटा हिंदी से एम० ए० कर रहा है। उसे चाहिए।
जब उस व्यक्ति ने दाम पूछा तो दुकानदार बोला १०० रुपये।
तबतक विवेक की दृष्टि उस पुस्तक पर लगे एक चिन्ह पर पड़ गयी। यह तो वही पुस्तक थी जिसे वे पिछली बार ले गया था। वह बड़ा हैरान हुआ, इतनी जल्दी वह पुस्तक फिर से इस बाजार में कैसे आ गयी।
दाम सुनकर, विवेक बोला, 'पिछली बार तो मैं यहीं से ४० रुपये में ले गया था।'
दुकानदार बोला, 'बाबूजी, इसकी छपी कीमत तो तीन सौ रुपये है। बाकी तो ग्राहक के जरूरत के हिसाब से दाम।कभी ग्राहक छपे मूल्य से भी अधिक दाम देने को तैयार हो जाता है।'
पुरानी किताब
बिटवा यानि केदारनाथ, एडवोकेट अपनी साठ की उम्र पार कर, जिंदगी के दूसरे छोर पर पहुँच चुके हैं। वे अपने जीवन से जुड़े, पुरानी किताब के इन सात प्रसंगों को कभी नहीं भूल पाते।
प्रथम
पंडित रामधन के पास थोड़ा बहुत खेत था और सारी खेती अनुकूल बारिश पर निर्भर करती। खेत से खाने भर को बड़ी मुश्किल से पैदा होता। किसी तरह से काम चल जाता था। घर के छोटे मोटे सामान अनाज के बदले ही आते। बच्चों तक को अपनी जरूरतों के लिए मन मार के रहना पड़ता। कपड़ा लत्ता भी एकाध साल बाद ही नया बन पाता। बेटे को पढ़ाने लिखाने के लिए पैसे नहीं होते। सरकारी स्कूल की फीस तो नाम मात्र की होती पर कापी किताब खरीदने में बड़ी कोताही थी। किताब के लिए रिश्तेदारियों के बच्चे ढूंढे जाते। बड़े बेटे से अगली कक्षा में किस रिश्तेदार का बच्चा पढता है, उससे पहले ही बोल दिया जाता कि किताबें सम्भाल के रखना, अगले साल बिटवा को चाहिए होगी।
बिटवा छठीं में आ गया था, पंडित जी ने जिस रिश्तेदारी में किताब के लिए बोला था, वह फेल हो गया। अब वे बड़ी परेशानी में पड़ गए। आखिर किताब के लिए क्या करें! पैसे तो थे नहीं, कि खरीदें। उस समय सरकार की ओर से भी कापी किताब की कोई योजना नहीं थी। बिटवा पढ़ने में बहुत तेज था। कक्षा में प्रथम तीन में ही स्थान रखता, मगर किताब के बिना कैसे पढ़ेगा। पहले तो सोचे उधार पायींच करके खरीद दें, मगर पंडित जी ने दिमाग दौड़ाया तो उन्हें याद आया कि उनके मामा की लड़की यानी ममेरी बहन का लड़का भी इसी वर्ष छठी कक्षा से उत्तीर्ण हुआ है। बहनोई जी जिला मुख्यालय के एक कॉलेज में लेक्चरर थे। रामधन ने सोचा, चलें उनसे एक बार किताब के लिए कहें, मगर हिम्मत भी नहीं हो रही थी। बड़े लोग हैं पता नहीं बात का मान रखेंगे या नहीं, ना कर दिया तो बेइज्जती होगी और साथ में दुःख। मगर और कोई रास्ता भी नहीं सूझ रहा था। उन्होंने सोचा एक बार देख लेने में कोई हर्ज नहीं, ना कर देंगे तो देखा जायेगा। एक दिन थोड़ी लइया और गुड़ लेकर, वे ममेरी बहन के यहां चले गए। दीदी के यहां पहुंचते ही बड़े होने के लक्षण दिखने लगे थे। रामधन का केवल पानी पिलाकर स्वागत किया गया, क्योकि चाय बनाने में श्रम और शरबत बनाने में चीनी खर्च होती। वही, अगर वो पंडित रामधन के यहाँ आते तो निर्धन होते हुए भी वह शरबत के साथ भूजा भी देते। उस समय गांव में चाय का फैशन नहीं था।
खैर, रामधन ने अपनी बात बहन के सामने रख दी। कंप्यूटर की तरह उनको उत्तर मिला, 'इस साल बेटी पांचवी में है, अगली साल छठी में जाएगी, बेटे की सारी किताबें उसके लिए सम्भाल कर रख दी हैं।'
रामधन ने कहा अगली साल वह सभी किताबें वापस कर देगा, तो बहन का कहना था कि वे पहले ही पुरानी हैं, एक साल में और पुरानी हो जायेंगी, फिर पढ़ने लायक कहाँ रह जाएँगी! बेटी वैसे ही बड़ी नखरेवाली है, ज्यादा फटी पुरानी किताब से वह पढ़ेगी ही नहीं।
रामधन ने कहा अगली साल वह सभी किताबें वापस कर देगा, तो बहन का कहना था कि वे पहले ही पुरानी हैं, एक साल में और पुरानी हो जायेंगी, फिर पढ़ने लायक कहाँ रह जाएँगी! बेटी वैसे ही बड़ी नखरेवाली है, ज्यादा फटी पुरानी किताब से वह पढ़ेगी ही नहीं।
लौट के बुद्धू घर को आये। अब तो बिटुआ को बिना किताब के ही स्कूल जाना पड़ता। शुरू में एकाध दिन डांट पड़ी, पर बिटुआ के अध्यापक ने परिस्थिति का बोध होते ही साथ बैठने वाले छात्र के साथ, साझे में किताब पढ़ने की व्यवस्था करवा दिया।
द्वितीय
बिरजू ही पंडित रामधन के खेतों का सारा काम करता था। बदले में थोड़ा सा खेत उसे दे दिया गया था और पंडित जी के खेत में पैदा हुए अनाज में से थोड़ा बहुत मजदूरी के रूप में ले जाता था, जिससे उसके परिवार का पेट पलता था। वह एक दलित भूमिहीन था, गांव में रोजगार के और कोई साधन नहीं थे, इसलिए उसके परिवार की निर्भरता रामधन पर ही थी। बिरजू का छोटा भाई सिरजन, कलकत्ता, किसी मिल में काम करता था। वह बचपन में ही कलकत्ता चला गया था। उसने अपना घर बिरजू से अलग बनवा लिया था। अपने मोहल्ले में उसका घर सबसे सुन्दर दिखता था। उसका परिवार गांव के किसानों पर आश्रित नहीं था। कलकत्ता से पैसा आता था और वे ठीक ठाक से रहते थे। सिरजन के बेटे को कॉपी किताब का कोई अभाव नहीं था।
बिरजू की पत्नी रमौती, अधिकतर पंडित जी के यहाँ आती और उनकी पत्नी के काम में हाथ बंटा देती थी। बदले में कुछ खाने पीने को मिल जाता। कभी कभी, घर ले जाने को, बचा खुचा खाना भी मिल जाता। एक दिन रमौती आई तो बिटुआ को देखकर पूछ दी, बिटुआ किस कक्षा में है? जब उसे पता चला छठी में तो चौंक कर बोली, अरे सिरजन का बेटा सातवीं में है। पंडित रामधन और उनकी पत्नी समझे कि वह अपने परिवार को ऊँचा दिखाना चाहती है कि उसके घर के बच्चे पढ़ने में इनसे आगे हैं। पंडित रामधन थोड़ा ऐंठ कर बोले, 'तो हम क्या करें।'
'अगली साल उसकी किताबें, बिटुआ के काम आ जाएँगी। कहें तो, अभी से बोल के रखूं। हमारे पास पड़ोस और रिश्तेदारी में इस साल और कोई छठी में नहीं है।'
पंडित जी को अपनी ममेरी बहन याद हो आई जिसने अपने बेटे की पुरानी किताब भी देने से मना कर दिया था। वे रमौती की ओर कुछ देर अवाक् देखते रह गए।
तृतीय
आठवीं कक्षा तक बिटुआ गांव में पढ़ा। उसके चाचा सदानन्द दिल्ली रहते थे। सदानंद ने रामधन से कहा बिटुआ को उसके साथ दिल्ली भेज दें, वहां पढ़ाई लिखाई का अच्छा माहौल है, पढ़ लिख जायेगा। रामधन को भी यह बात अच्छी लगी। गांव में तो खेल कूद में ही लगा रहेगा और बच्चों के साथ बिगड़ जायेगा। बिटुआ अपने चाचा के साथ दिल्ली आ गया। उसके चाचा ने एक सरकारी स्कूल में नौवीं कक्षा में उसका नाम लिखवा दिया। अब फिर से किताब की समस्या आई। नई किताबें बहुत मंहगी थीं और किसी से जान पहचान भी नहीं थी कि पुरानी मांग कर काम चलाये। उसके चाचा उसे समझाते कि शहर का खाने पीने का ही खर्च बहुत होता है, ऊपर से पढ़ाई का खर्च। यह वेतनभोगी के लिए बहुत बड़ा भार है इसलिए कोशिश करके, अन्य लड़कों से दोस्ती कर ले ताकि कम से कम किताबों का तो बंदोबस्त हो जाय। चलो, आने जाने का तो बस का सस्ता पास बन जायेगा।
उसे साथ पढ़ने वाले बच्चों से किताबें तो नहीं मिलीं पर एक रास्ता मिल गया, लड़कों ने बताया कि नई सड़क से पुरानी किताबें खरीद ले। वहां आधे दाम पर ही किताबें मिल जाती हैं। नयी सड़क की बाजार देख बिटुआ को बड़ा आश्चर्य हुआ और अपना गांव याद आ गया। गांव में तो पुरानी किताबें मांगने पर मुफ्त में ही मिल जाती थीं, और यहाँ पुरानी किताबों का बाजार लगा है। उसने कुछ जरूरी किताबें वहां से खरीद लीं। एकाध तो साथ के बच्चों से मांगकर काम चला लेता। जिसदिन किसी बच्चे को उस विषय का काम नहीं करना होता, वह उससे किताब मांग कर ले जाता और अपना काम कर लेता।
कई बार बच्चों के द्वारा बहाना का सामना भी करना पड़ता। इन घटनाओं से क्षुब्ध, बिटुआ ने ठान लिया था कि वह अपने बच्चों को कभी किताब का अभाव नहीं होने देगा। खुद बेशक पुरानी किताबों से पढ़ रहा है, मगर वह इस लायक बन कर रहेगा कि उसके बच्चे किताब के लिए न तरसें। उसका परिश्रम रंग लाया माध्यमिक परीक्षा बड़े अच्छे अंकों से उत्तीर्ण किया। आगे ग्रेजुएशन में तो पुस्तकालय की सुविधा भी मिल गयी थी।
केदार यानि बिटुआ का बेटा नई किताबें लेकर अंग्रेजी माध्यम के स्कूल में पढ़ने जाता है। पंडित रामधन पैसे की बड़ी तंगी देख चुके थे, अब बिटुआ उनके लिए भी हर महीने कुछ पैसे भेज देता है।
चतुर्थ
बिटुआ अब केदार नाथ था। दरिया गंज में पटरी पर लगी पुरानी किताबों के बाजार में केदार को एक किताब दिख गयी। दाम पूछा तो, मात्र बीस रुपये। बिटुआ ने तुरंत बीस का नोट निकाला, और उस पुस्तक को उठा लिया। वैसे, अब उसे इसकी आवश्यकता नहीं थी, परंतु उस पुस्तक से उसका एक पुराना प्रसंग जुड़ा था। जब वह बी. ए. कर रहा था तो बहुत महँगी होने के कारण वह मनोविज्ञान की यह पुस्तक खरीद नहीं पाया था। पुस्तकालय से वह पुस्तक उसे काफी प्रतीक्षा के पश्चात् मात्र पंद्रह दिन के लिए मिल पायी थी। केवल पंद्रह दिन में वह उस पुस्तक से क्या कुछ कर पाता? किसी तरह थोड़ा बहुत नोट बना पाया था। आज वह पुस्तक उसे लगभग मुफ्त में मिल रही है।
वह उस पुस्तक को घर लाकर समझ पाया कि अभी भी उसके लिए कितनी मूल्यवान है। पढ़ाई के समय जिस ज्ञान से वह वंचित रह गया था, उसकी पूर्ति अब हो रही है। यह पुस्तक उसके लिए कोयले के खान में मिले हीरे के जैसी थी। उसे एहसास हो रहा था कि यह पुस्तक उसकी एक बहुत पुरानी संगिनी है, जिससे वह अब तक दूर रह रहा था।
पंचम
एक बार केदार दरियागंज में पुरानी पुस्तकों के बाजार में घूम रहा था कि उसकी दृष्टि एक किताब पर पड़ी। वह मुंशी प्रेम चंद की लिखी कहानियों की किताब थी। जिसके लिए उसने कभी नई सड़क छान मारी थी। किताब जर्जर अवस्था में थी। उसका आवरण तक भी नहीं था। केदार को मुंशी प्रेम चंद की कहानियां पढ़ने का बहुत शौक था और वो विशेषतः मनपसंद किताब थी। केदार ने बिना अधिक सोचे, उसे खरीद लिया।
घर लाकर, उसने किताब को मेज पर रख दिया और किसी काम से बाहर चला गया। उसके जाने के पीछे कबाड़ी वाला आ गया, उसकी पत्नी पूजा ने अखबार की रद्दी के साथ उस किताब को भी दे दिया। विवेक जब लौट कर आया तो पढ़ने के लिए वो किताब ढूंढने लगा। नहीं मिली तो, पूजा से पूछा 'मेज पर एक किताब रखी थी, नहीं मिल रही है।'
'एक फटी पुरानी सी किताब पड़ी तो थी, मैंने तो उसे रद्दी में बेच दिया।'
अब तो विवेक के अफ़सोस का ठिकाना न रहा। इतनी मेहनत से ढूंढकर लाया था और वह रद्दी में चली गयी। वो भी मुंशी प्रेम चंद की किताब। अब मुंशी प्रेम चंद ये कदर रह गयी है!
खैर, उसने सोचा, अगले रविवार को एक बार फिर से प्रयास करेगा, इतने बड़े पुस्तकों के भंडार में शायद एक और किताब हो। रविवार को वह दरियागंज पहुँच गया। पहले तो वह उसी दुकान पर गया, 'भाई मैं एक प्रेम चंद की कहानियों की पुस्तक ले गया था, मुझे एक और चाहिए।'
'अरे साहब यहाँ एक शीर्षक की दो किताबें तो मुश्किल से ही मिलती हैं। ढूंढ लीजिये, शायद किसी के पास मिल जाय।'
विवेक पटरी बाजार का चक्कर लगा रहा था कि एकाएक एक दुकान पर, एक ग्राहक के हाथ में वही किताब देखकर बड़ा प्रसन्न हुआ। 'भाई साहब ! यह किताब नहीं ले रहे हों तो मैं ले लूँ।'
नहीं भाई अभी देख रहा हूँ, मेरे काम की लग रही है, बेटा हिंदी से एम० ए० कर रहा है। उसे चाहिए।
जब उस व्यक्ति ने दाम पूछा तो दुकानदार बोला १०० रुपये।
तब तक विवेक की दृष्टि उस पुस्तक पर लगे एक चिन्ह पर पड़ गयी। यह तो वही पुस्तक थी, जिसे वह पिछली बार ले गया था। वह बड़ा हैरान हुआ, इतनी जल्दी वह पुस्तक फिर से इस बाजार में कैसे आ गयी।
दाम सुनकर, विवेक बोला, 'पिछली बार तो मैं यहीं से ४० रुपये में ले गया था।'
दुकानदार बोला, 'बाबूजी, इसकी छपी कीमत तो तीन सौ रुपये हैं। बाकी तो ग्राहक के जरूरत के हिसाब से दाम।कभी ग्राहक छपे मूल्य से भी अधिक दाम देने को भी तैयार हो जाता है।'
वह किताब केदार को दुबारा नहीं मिल पायी।
षष्टी
केदार को कहानियां पढ़ने और लिखने का शौक था। धीरे धीरे उसने कई कहानियां लिख डालीं। एक बार
सोचा कि जिंदगी भर किताब पढ़ते बीती है, अब अपनी कहानियों की, कम से कम एक किताब छपवा भी ले। किताब छप जाएगी तो उसका नाम होगा और समाज में वह लेखक कहलायेगा। वह छपवाने के लिए एक प्रकाशक के पास गया तो प्रकाशक ने किताब की रायल्टी देने की बात तो दूर किताब छापने की लागत भी उसी से मांगने लगा। पैसों की राशि सुनकर, विवेक ने अपनी इच्छा को ताक पर रख दिया। अब कभी पैसा होगा तो देखा जायेगा।
एक बार फिर से केदार के मन में जिज्ञासा जगी। इस बार एक अन्य प्रकाशक कुछ उचित दर पर छापने को तैयार हो गया। अब केदार अपनी पुरानी डायरी ढूंढने लगा। घर में सभी जगह ढूंढ मारा, मगर उसे उसकी डायरी नहीं मिली। वह परेशान होकर, पूजा से पूछा, 'पूजा! यहाँ अलमारी के ऊपर एक डायरी रखी थी, नहीं मिल रही है।'
'हाँ, एक दिन कृति उससे खेल रहा था, मैंने छीन कर टांड़ पर रख दिया। पता नहीं कैसे मूढ़ा पर चढ़ कर, अलमारी से उतार लिया और उसमें से पन्ने फाड़कर नाव बनाने लगा। कई पन्ने तो फाड़कर टुकड़े टुकड़े कर दिया। वो तो मेरी नजर पड़ गयी, वरना तुम्हारी पूरी डायरी का सत्यानाश कर दिया होता।'
कहते हुए, पूजा ने डायरी लाकर केदार को दे दिया। केदार ने फटाफट पन्ने पलटे, देखा तो उसकी सबसे प्रिय कहानी ही डायरी से गायब थी। अब वह अपने मस्तिष्क पर जोर डालने लगा परन्तु बड़े प्रयत्न के पश्चात् भी उसे अपनी उस कहानी का पूरा प्रसंग याद नहीं आया। उसे लग रहा था कि उस कहानी के बिना उसकी किताब में वो जान नहीं आ पायेगी। किन्तु अब कोई चारा भी नहीं था, अपनी पुस्तक उस कहानी के बिना ही प्रकाशक को देनी पड़ी।
एक दिन, छुट्टी के दिन पूजा घर की सफाई कर रही थी कि आलमारी के नीचे खाली पड़ी जगह में उसे एक कागज की नाव दिखाई पड़ी। उसने उसे निकाल कर केदार को बताने लगी, 'देखो एक नाव ये पड़ी।' केदार ने झट से वो नाव ले लिया और उसे खोल कर पढ़ने लगा। उसका चेहरा खिल गया। 'अब तो काम बन जायेगा, कहानी का प्रमुख प्रसंग मिल गया है। बस अब क्या दो तीन दिन में मेरी पूरी कहानी तैयार हो जाएगी।'
केदार ने प्रकाशक को फोन किया, 'मेरी किताब में एक कहानी और जोड़नी है। '
उत्तर ने केदार को एक बार फिर निराश कर दिया, 'किताब तो फाइनल हो चुकी है, उसमें अब कोई भी परिवर्तन संभव नहीं है।'
सप्तम
केदार नाथ की वकालत चलने लगी थी। एक दिन वह शालिनी आंटी के यहाँ गया, तो शालिनी बोल पड़ी, 'बेटा केदार तेरे अंकल की यह लाइब्रेरी खामख्वाह एक कमरा घेर रखी है। कक्कड़ साहब तो अब इस दुनिया चले गए, तुझे पता ही है, विनोद आई. टी. कंपनी में लग गया है, अब ये सारी कानून की किताबें बेकार पड़ी हैं। इन्हें रखकर कोई फायदा नहीं, ये निकल जाएँगी तो यह कमरा खाली हो जायेगा और किताबें भी किसी के काम आ जाएँगी।'
केदार मन ही मन सोचने लगा कि उसे भी कानून की धाराएं और न्यायालयों के फैसलों को देखने के लिए न्यायालय की लाइब्रेरी का सहारा लेना पड़ता है। अगर यह लाइब्रेरी उसे मिल जाय तो उसका कार्यालय भव्य लगेगा और उसका रुतबा भी बढ़ जायेगा। भेजे में क्या है कौन देखता है, बड़ी सी लाइब्रेरी देखकर, मुवक्किल प्रभावित होगा और उसे अधिक काम मिलेगा। यह विचार करते उसने पूछ दिया, 'कितना लोगी आंटी ?'
'अब तू ही देख ले बेटा, इसमें चार पांच सौ किताबें तो होंगी ही। अब लगा ले सौ, डेढ़ सौ से कम की एक किताब क्या होगी। पाँच लाख तो ठीक रहेगा न !'
अब केदार का हौसला तो पस्त हो गया। उसके पास पांच लाख कहाँ थे। हाँ चालीस पचास हजार तक सोच सकता था। तत्काल बात टालने के लिए बोला, 'ठीक है आंटी किसी वकील से बात कर के बताऊंगा।'
'अरे तू भी तो वकालत करता है।'
'हाँ आंटी, पर मेरे पास अभी इतने पैसे कहाँ हैं ?'
'देख ले तुझे तो चार लाख में ही सब दे दूंगी।'
'नहीं आंटी, मैं किसी और वकील से बात करके देखूंगा।'
अब तो केदार के मन में उस लाइब्रेरी को हथियाने की ललक लग गयी। मगर इतने पैसे जुटाना उसके लिए कठिन था। अभी इतनी राशि बचा रखा था। उसने लाइब्रेरी का भाव कम करने के उद्देश्य से एक वकील को वहां भेज दिया और लगभग एक महीने के पश्चात् वह स्वयं जा धमका। 'क्या हुआ आंटी मैंने अधिवक्ता सुरेश को भेजा था।'
'अरे छोड़, वह तो पचास हजार बोल कर गया।'
'बताओ उसे शर्म भी न आयी, आजकल इतनी मंहगी किताबें हैं और वो चाहता है फ़ोकट में मिल जाय। एक लाख तक तो मैं ही दे सकता हूँ।'
'हूँ! अच्छा, दो तीन दिन रूक जा, विनोद से पूछ लेती हूँ क्या कहता है।'
केदार प्रतीक्षा ही कर रहा था कि तीसरे दिन फ़ोन आ गया, 'आ बेटा ले जा, एक सप्ताह में यह कमरा खाली कर दे।'
बिटुआ अब केदार नाथ था। दरिया गंज में पटरी पर लगी पुरानी किताबों के बाजार में केदार को एक किताब दिख गयी। दाम पूछा तो, मात्र बीस रुपये। बिटुआ ने तुरंत बीस का नोट निकाला, और उस पुस्तक को उठा लिया। वैसे, अब उसे इसकी आवश्यकता नहीं थी, परंतु उस पुस्तक से उसका एक पुराना प्रसंग जुड़ा था। जब वह बी. ए. कर रहा था तो बहुत महँगी होने के कारण वह मनोविज्ञान की यह पुस्तक खरीद नहीं पाया था। पुस्तकालय से वह पुस्तक उसे काफी प्रतीक्षा के पश्चात् मात्र पंद्रह दिन के लिए मिल पायी थी। केवल पंद्रह दिन में वह उस पुस्तक से क्या कुछ कर पाता? किसी तरह थोड़ा बहुत नोट बना पाया था। आज वह पुस्तक उसे लगभग मुफ्त में मिल रही है।
वह उस पुस्तक को घर लाकर समझ पाया कि अभी भी उसके लिए कितनी मूल्यवान है। पढ़ाई के समय जिस ज्ञान से वह वंचित रह गया था, उसकी पूर्ति अब हो रही है। यह पुस्तक उसके लिए कोयले के खान में मिले हीरे के जैसी थी। उसे एहसास हो रहा था कि यह पुस्तक उसकी एक बहुत पुरानी संगिनी है, जिससे वह अब तक दूर रह रहा था।
पंचम
एक बार केदार दरियागंज में पुरानी पुस्तकों के बाजार में घूम रहा था कि उसकी दृष्टि एक किताब पर पड़ी। वह मुंशी प्रेम चंद की लिखी कहानियों की किताब थी। जिसके लिए उसने कभी नई सड़क छान मारी थी। किताब जर्जर अवस्था में थी। उसका आवरण तक भी नहीं था। केदार को मुंशी प्रेम चंद की कहानियां पढ़ने का बहुत शौक था और वो विशेषतः मनपसंद किताब थी। केदार ने बिना अधिक सोचे, उसे खरीद लिया।
घर लाकर, उसने किताब को मेज पर रख दिया और किसी काम से बाहर चला गया। उसके जाने के पीछे कबाड़ी वाला आ गया, उसकी पत्नी पूजा ने अखबार की रद्दी के साथ उस किताब को भी दे दिया। विवेक जब लौट कर आया तो पढ़ने के लिए वो किताब ढूंढने लगा। नहीं मिली तो, पूजा से पूछा 'मेज पर एक किताब रखी थी, नहीं मिल रही है।'
'एक फटी पुरानी सी किताब पड़ी तो थी, मैंने तो उसे रद्दी में बेच दिया।'
अब तो विवेक के अफ़सोस का ठिकाना न रहा। इतनी मेहनत से ढूंढकर लाया था और वह रद्दी में चली गयी। वो भी मुंशी प्रेम चंद की किताब। अब मुंशी प्रेम चंद ये कदर रह गयी है!
खैर, उसने सोचा, अगले रविवार को एक बार फिर से प्रयास करेगा, इतने बड़े पुस्तकों के भंडार में शायद एक और किताब हो। रविवार को वह दरियागंज पहुँच गया। पहले तो वह उसी दुकान पर गया, 'भाई मैं एक प्रेम चंद की कहानियों की पुस्तक ले गया था, मुझे एक और चाहिए।'
'अरे साहब यहाँ एक शीर्षक की दो किताबें तो मुश्किल से ही मिलती हैं। ढूंढ लीजिये, शायद किसी के पास मिल जाय।'
विवेक पटरी बाजार का चक्कर लगा रहा था कि एकाएक एक दुकान पर, एक ग्राहक के हाथ में वही किताब देखकर बड़ा प्रसन्न हुआ। 'भाई साहब ! यह किताब नहीं ले रहे हों तो मैं ले लूँ।'
नहीं भाई अभी देख रहा हूँ, मेरे काम की लग रही है, बेटा हिंदी से एम० ए० कर रहा है। उसे चाहिए।
जब उस व्यक्ति ने दाम पूछा तो दुकानदार बोला १०० रुपये।
तब तक विवेक की दृष्टि उस पुस्तक पर लगे एक चिन्ह पर पड़ गयी। यह तो वही पुस्तक थी, जिसे वह पिछली बार ले गया था। वह बड़ा हैरान हुआ, इतनी जल्दी वह पुस्तक फिर से इस बाजार में कैसे आ गयी।
दाम सुनकर, विवेक बोला, 'पिछली बार तो मैं यहीं से ४० रुपये में ले गया था।'
दुकानदार बोला, 'बाबूजी, इसकी छपी कीमत तो तीन सौ रुपये हैं। बाकी तो ग्राहक के जरूरत के हिसाब से दाम।कभी ग्राहक छपे मूल्य से भी अधिक दाम देने को भी तैयार हो जाता है।'
वह किताब केदार को दुबारा नहीं मिल पायी।
षष्टी
केदार को कहानियां पढ़ने और लिखने का शौक था। धीरे धीरे उसने कई कहानियां लिख डालीं। एक बार
सोचा कि जिंदगी भर किताब पढ़ते बीती है, अब अपनी कहानियों की, कम से कम एक किताब छपवा भी ले। किताब छप जाएगी तो उसका नाम होगा और समाज में वह लेखक कहलायेगा। वह छपवाने के लिए एक प्रकाशक के पास गया तो प्रकाशक ने किताब की रायल्टी देने की बात तो दूर किताब छापने की लागत भी उसी से मांगने लगा। पैसों की राशि सुनकर, विवेक ने अपनी इच्छा को ताक पर रख दिया। अब कभी पैसा होगा तो देखा जायेगा।
एक बार फिर से केदार के मन में जिज्ञासा जगी। इस बार एक अन्य प्रकाशक कुछ उचित दर पर छापने को तैयार हो गया। अब केदार अपनी पुरानी डायरी ढूंढने लगा। घर में सभी जगह ढूंढ मारा, मगर उसे उसकी डायरी नहीं मिली। वह परेशान होकर, पूजा से पूछा, 'पूजा! यहाँ अलमारी के ऊपर एक डायरी रखी थी, नहीं मिल रही है।'
'हाँ, एक दिन कृति उससे खेल रहा था, मैंने छीन कर टांड़ पर रख दिया। पता नहीं कैसे मूढ़ा पर चढ़ कर, अलमारी से उतार लिया और उसमें से पन्ने फाड़कर नाव बनाने लगा। कई पन्ने तो फाड़कर टुकड़े टुकड़े कर दिया। वो तो मेरी नजर पड़ गयी, वरना तुम्हारी पूरी डायरी का सत्यानाश कर दिया होता।'
कहते हुए, पूजा ने डायरी लाकर केदार को दे दिया। केदार ने फटाफट पन्ने पलटे, देखा तो उसकी सबसे प्रिय कहानी ही डायरी से गायब थी। अब वह अपने मस्तिष्क पर जोर डालने लगा परन्तु बड़े प्रयत्न के पश्चात् भी उसे अपनी उस कहानी का पूरा प्रसंग याद नहीं आया। उसे लग रहा था कि उस कहानी के बिना उसकी किताब में वो जान नहीं आ पायेगी। किन्तु अब कोई चारा भी नहीं था, अपनी पुस्तक उस कहानी के बिना ही प्रकाशक को देनी पड़ी।
एक दिन, छुट्टी के दिन पूजा घर की सफाई कर रही थी कि आलमारी के नीचे खाली पड़ी जगह में उसे एक कागज की नाव दिखाई पड़ी। उसने उसे निकाल कर केदार को बताने लगी, 'देखो एक नाव ये पड़ी।' केदार ने झट से वो नाव ले लिया और उसे खोल कर पढ़ने लगा। उसका चेहरा खिल गया। 'अब तो काम बन जायेगा, कहानी का प्रमुख प्रसंग मिल गया है। बस अब क्या दो तीन दिन में मेरी पूरी कहानी तैयार हो जाएगी।'
केदार ने प्रकाशक को फोन किया, 'मेरी किताब में एक कहानी और जोड़नी है। '
उत्तर ने केदार को एक बार फिर निराश कर दिया, 'किताब तो फाइनल हो चुकी है, उसमें अब कोई भी परिवर्तन संभव नहीं है।'
सप्तम
केदार नाथ की वकालत चलने लगी थी। एक दिन वह शालिनी आंटी के यहाँ गया, तो शालिनी बोल पड़ी, 'बेटा केदार तेरे अंकल की यह लाइब्रेरी खामख्वाह एक कमरा घेर रखी है। कक्कड़ साहब तो अब इस दुनिया चले गए, तुझे पता ही है, विनोद आई. टी. कंपनी में लग गया है, अब ये सारी कानून की किताबें बेकार पड़ी हैं। इन्हें रखकर कोई फायदा नहीं, ये निकल जाएँगी तो यह कमरा खाली हो जायेगा और किताबें भी किसी के काम आ जाएँगी।'
केदार मन ही मन सोचने लगा कि उसे भी कानून की धाराएं और न्यायालयों के फैसलों को देखने के लिए न्यायालय की लाइब्रेरी का सहारा लेना पड़ता है। अगर यह लाइब्रेरी उसे मिल जाय तो उसका कार्यालय भव्य लगेगा और उसका रुतबा भी बढ़ जायेगा। भेजे में क्या है कौन देखता है, बड़ी सी लाइब्रेरी देखकर, मुवक्किल प्रभावित होगा और उसे अधिक काम मिलेगा। यह विचार करते उसने पूछ दिया, 'कितना लोगी आंटी ?'
'अब तू ही देख ले बेटा, इसमें चार पांच सौ किताबें तो होंगी ही। अब लगा ले सौ, डेढ़ सौ से कम की एक किताब क्या होगी। पाँच लाख तो ठीक रहेगा न !'
अब केदार का हौसला तो पस्त हो गया। उसके पास पांच लाख कहाँ थे। हाँ चालीस पचास हजार तक सोच सकता था। तत्काल बात टालने के लिए बोला, 'ठीक है आंटी किसी वकील से बात कर के बताऊंगा।'
'अरे तू भी तो वकालत करता है।'
'हाँ आंटी, पर मेरे पास अभी इतने पैसे कहाँ हैं ?'
'देख ले तुझे तो चार लाख में ही सब दे दूंगी।'
'नहीं आंटी, मैं किसी और वकील से बात करके देखूंगा।'
अब तो केदार के मन में उस लाइब्रेरी को हथियाने की ललक लग गयी। मगर इतने पैसे जुटाना उसके लिए कठिन था। अभी इतनी राशि बचा रखा था। उसने लाइब्रेरी का भाव कम करने के उद्देश्य से एक वकील को वहां भेज दिया और लगभग एक महीने के पश्चात् वह स्वयं जा धमका। 'क्या हुआ आंटी मैंने अधिवक्ता सुरेश को भेजा था।'
'अरे छोड़, वह तो पचास हजार बोल कर गया।'
'बताओ उसे शर्म भी न आयी, आजकल इतनी मंहगी किताबें हैं और वो चाहता है फ़ोकट में मिल जाय। एक लाख तक तो मैं ही दे सकता हूँ।'
'हूँ! अच्छा, दो तीन दिन रूक जा, विनोद से पूछ लेती हूँ क्या कहता है।'
केदार प्रतीक्षा ही कर रहा था कि तीसरे दिन फ़ोन आ गया, 'आ बेटा ले जा, एक सप्ताह में यह कमरा खाली कर दे।'
पुस्तक की सौगात /भेंट
बद्रीनाथ को लिखने पढ़ने का शौक तो बचपन से ही था। वे कई पुस्तकें लिख चुके थे मगर उनका प्रकाशित करवाना सरल नहीं था। इतने परिश्रम से तो पुस्तक लिखी और छपवाने के लिए ऊपर से प्रकाशक को प्यासे दो। हर प्रकाशक यही कहता कि आजकल कोई किताब तो पढता नहीं। आप अपने खर्च पर छपवा कर शौक पूरा कर लें।
बद्रीनाथ के पास इतने अतिरिक्त पैसे भी तो नहीं थे कि वे लगा कर एकाध किताबे छपवा लें।
बद्रीनाथ की इच्छा थी कि इतनी पुस्तकें लिख लिए एकाध छपवा लें नहीं तो ये सब डायरियों में ही पड़ी सद जाएँगी।
बद्रीनाथ की इच्छा थी कि इतनी पुस्तकें लिख लिए एकाध छपवा लें नहीं तो ये सब डायरियों में ही पड़ी सद जाएँगी।
उन्होंने किसी तरह धन की व्यवस्था कर ली। एक प्रकाशक बद्रीनाथ की लागत पर पुस्तक छपने को तैयार हो गया।उसने अपना खर्च जोड़कर अस्सी पुस्तकें बद्री नाथ को दे दीं। उन किताबों को घर में रखे, बद्रीनाथ यही सोचते कीअब इनका क्या करें। उनकी पत्नी को भी घर की साफ सफाई में कठिनाई होती। वे बार बार कहतीं कि इन कितबों से कुछ मिलता है नहीं और ऊपर से घर कितना गन्दा दिखता है।
बद्रीनाथ को किसी को किताब खरीदने के लिए कहने में शर्म का अनुभव करते थे। बस कोई घर पर आ गया तो उसे सौगात के रूप में एक पुस्तक थमा देते। अब तक उन्होंने कई पुस्तकें छपा लीं। अब वे जब किसी जन्म दिवस आदि किसी उत्सव में जाते तो किताब को ही 'गिफ्ट पैक' करके ले जाते।
एक दिन मधु के घर महफ़िल जमी हुई थी। कई महिलाएं एकत्र थीं। मधु उनको बद्रीनाथ की पुस्तकों के किस्से सुना रही थीं। बताओ बद्रीनाथ बुलबुल के जन्मदिन पर किताब की सौगात लाये। अरे उससे अच्छा तो सौ का नॉट ही थमा देते, कुछ काम आ जाता। हम किताब का क्या करेंगे! रेनू को भी लिखने का शौक है। वह लेखक के मनोभाव और धन का आभाव दोनों बातों को समझती है। उसने तबक से उत्तर दिया, ' लोग कहीं किसी उत्सव जैसे विवाह, गृह प्रवेश, जन्म दिन इत्यादि में जाते हैं तो कुछ कुछ सौगात ले जाते हैं या फिर नगद ही थमा देते हैं। बद्रीनाथ ने अपने खर्च पर पुस्तक छपवायी और उसके विमोचन पर भी खर्च किया। वहां आने वाले बिना कुछ दिए खा पी भी लिए और मुफ्त किताब भी माँगते रहे। यह तो उचित नहीं है भाई,
अंग्रेजी पढ़ी बहू आ गयी। हिंदी का मान घाट गया। बड़ी नाथ की पुस्तकें नदारद होने लगीं अब शेल्फ में उनकी एक भी किताब नहीं थी।
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