मैं प्रमुख हूँ
'आखिर मुख्यमन्त्री तो पूरे प्रदेश की जनता के हैं, फिर सरकारी नियुक्तियों में और संसाधनों के आवंटन में अपने लोग और जाति के लिए पक्षपात पूर्ण रवैया क्यों है ? इससे एक तरफ तो हम बदनाम हो रहे हैं और दूसरी तरफ अनैतिकता पूर्ण कार्य करके अनेकों लोगों के आक्षेप और गालियां ले रहे हैं।' एक सहयोगी नेता ने पूछ लिया।
'मुझे तो एक बात मालूम है कि मैंने अपनी जाति के लोगों को बड़ी मुश्किल से संगठित किया है और उन्हीं के वोट और सहयोग के कारण जीत कर आया हूँ। इसके अतिरिक्त जिस स्थान पर आप हैं वो भी मेरे पक्षपात पूर्ण रवैये के कारण हैं, वरना आप समझ सकते हैं कि आप से भी योग्य लोग हमारी पार्टी में थे। मैं चाहता तो आपको पार्टी का टिकट ही नहीं देता, तब आप कैसे सभा के सदस्य होते।' मुख्यमंत्री ने दो टूक जबाब दे दिया।
'योग्य दावेदार तो मुख्यमंत्री के लिए भी और हैं श्रीमान जी, यह तो पार्टी के लोगों की नियति और आस्था है कि आपने जो परिश्रम और लगन से काम करके एक संगठन खड़ा किया उसके लिए प्रतिबद्ध हैं। किन्तु इसका अर्थ यह तो नहीं कि पूरा प्रदेश आपकी व्यक्तिगत सम्पदा हो जाय। इस प्रकार तो पूरा देश, जो स्वतंत्रता की लड़ाई लड़े थे, उन्हीं का होना चाहिए था। आपको इस बात का आभास होगा कि प्रदेश को इस स्थिति तक लाने में इस भूमि पर जन्म लिए हरेक व्यक्ति का योगदान रहा है, न कि केवल हमारी जाति अथवा पार्टी का। जनता सरकार को राजा के रूप में देखती है और न्यायपूर्ण रवैये की अपेक्षा करती है। पहले भी यदि कोई राजा, प्रजा की उपेक्षा करके अपने और अपने लोगों के सुख साधन का ख्याल रखता था, अप्सराओं के नृत्य आदि में लिप्त रहता था, तो वह सर्वथा निंदनीय होता था। उसकी प्रायः भर्त्सना ही होती थी और उसे मुंह की खानी पड़ती थी। सरकार किसी जाति की नहीं होती, न ही किसी जाति के लिए होती है और सभा भी एक पार्टी की नहीं अपितु सभी चुने हुए प्रतिनिधियों की है। समाज में सभी जाति और धर्म का अपना महत्व है, और सरकार व प्रकृति के लिए एक एक व्यक्ति समान हैं। पुराने जमाने में समाज ने अपनी व्यवस्था बनाई और जातियों में बांटा, वे शासक ही थे जो सबको उचित न्याय नहीं दिए, जिस कारण अनेकों लोगों को कष्ट सहना पड़ा। सबको समुचित अवसर और न्याय मिले यह शासक का कर्तव्य होता है। हमारे शरीर के हर अंग के अपने अलग कार्य हैं, शरीर जो भोजन ग्रहण करता है प्रत्येक अंग को उचित भाग में पहुंचाता है। इसी प्रकार बड़े संगठनों को सुचारु रूप से चलाने के लिये भी अलग अलग विभागों में बांटना पड़ता है। किसी को अधिक प्रमुखता और किसी का तिरस्कार सदैव ही निंदनीय है। एक अंगुली में भी कष्ट हो तो व्यक्ति कराहता है। एक विभाग की अक्षमता का प्रभाव पूरे संगठन पर पड़ता है। जब समाज का स्वरुप जाति से ऊपर उठकर पुनर्गठित होने लगा था तो हम अपनी सत्ता सुख के लिए फिर से समय को पीछे ले जाना चाहते हैं। आज हम यह बहाना लें कि पहले दूसरी जाति के लोगों ने लाभ लिया, आज हमको अवसर मिला तो अपनी जाति को देना चाहते हैं, कल फिर दूसरे किसी को अवसर मिलेगा वह अपनी जाति के लिए कार्य करेगा तो प्रदेश का समग्र विकास कभी भी संभव नहीं हो पायेगा। समाज का इस प्रकार बंटवारा कब तक चलता रहेगा? सभी संगठनों के प्रमुख, अपनी ही जाति के लोगों को बनाने का क्या उद्देश्य है ? सत्ता में बने रहने के लिए, उनसे भी अनैतिक काम करवाना चाहते हैं? इन सबसे हमारा तंत्र भ्रष्ट नहीं हो रहा है? और यह कब तक चल सकता है? इतिहास साक्ष्य है कोई भी अनिश्चित काल के लिए सत्ता प्रमुख रह सकता। ' सहयोगी नेता ने फिर से कहा।
इतनी बात तो, मुख्यमंत्री के लिए अत्यन्त पीड़ा देने वाली, और सर्वथा असहनीय थी। उन्होंने तेवर कड़े किये - 'पीकर आये हैं क्या ? यह तो बागी स्वर लग रहा है, आप को पार्टी की नीतियां पसंद नहीं तो जाने के लिए स्वतंत्र हैं। और यदि हमारी नीतियों और अपेक्षाओं के विरुद्ध काम किया तो हमही पार्टी से निकालने के लिए विवश होंगे । हमें अनुशासन हीनता कत्तई पसंद नहीं। पहले भी देखा है आप पार्टी विरूद्ध मीडिया तक में वक्तव्य दे चुके हैं। '
नेता जी भी झुकने वाले कहाँ थे उन्होंने स्पष्ट कर दिया कि ईश्वर ने उन्हें जन्म दिया है और जनता ने चुनकर सभा में भेजा है इसलिए वे पार्टी के अतिरिक्त जनता और ईश्वर के प्रति भी उत्तरदायी हैं, न कि मात्र अपने जाति और धर्म के। मुख्यमंत्री और नेता जी के बीच की दरार अत्यधिक चौड़ी हो गयी। नेता जी के ऊपर विधायक निधि में गड़बड़ी का अभियोग लग गया और जाँच बिठा दिया गया। नेता जी का मुंह ऐसे बंद हो गया जैसे बजते लाउडस्पीकर का तार कट गया हो।
नेता जी का इस घुटन के साथ पार्टी में रह पाना कठिन था। जिन्हे पद, प्रतिष्ठा, सार्वजानिक साधन अथवा जन-धन के दुरूपयोग का लोभ हो वे चाहे पार्टी से जुड़े रहें पर नेता जी को इस प्रकार का कोई लोभ तो था नहीं, उन्होंने पार्टी से स्वयं को अलग रखना ही उचित समझा।
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घर का भेदी
घर का भेदी
नेता जी को पहले ही पता था उन्हें पार्टी से अलग होना पड़ेगा। या तो बेईमान मंत्रियों का साथ देते या खुद भी बेईमान हो जाते। उन्हें नितिगत बात करने के कारण पार्टी विरोधी बताया जाता था। चूकि पार्टी में स्वार्थी लोगों और बेईमानों का बोलबाला था, नेता जी को डर था कि पार्टी से अलग होने के बाद उन्हें तंग किया जायेगा।
इसलिये वे कुछ अन्य नेताओं से, जिनकी पार्टी के वरिष्ठ नेता अनदेखी करते थे, मेल जोल बढ़ा लिए थे और पार्टी की गलत नीतियों के बारे में बता बता करके पार्टी के विरूद्ध भड़काते रहते थे । जब वे पार्टी से अलग हुए तो उनके साथ एक दर्जन सदस्य और भी थे। अब तो सरकार में भूचाल आ गया, मुख्यमंत्री की कुर्सी हिलने लगी। सरकार अल्पमत में आ गयी। फिर आरोप प्रत्यारोप का दौर शुरू हुआ, और साथ ही मीडिया का शोर शराबा।
मुख्यमंत्री कहते नेता जी को अनुशासन हीनता के कारण पार्टी से निकाला गया है और नेता जी कहते की पार्टी में बढती बुराइयों के कारण उन्होंने पार्टी छोड़ दिया है।
कारण कुछ भी रहा हो इस स्तर की और इस तरह की बात की जाँच के लिए प्रदेश में कोई तंत्र तो था नहीं और होता भी तो उसका क्या परिणाम होता, अनेकों जाँच आयोगों के कार्य प्रणाली से सभी अवगत थे। नेता जी के पृथक होते ही विरोधी दल ने हाथों हाथ लपक लिया। नेता जी ने सशर्त समर्थन देने की बात स्वीकार कर ली। फिर क्या था विरोधी दल के प्रमुख मुख्यमंत्री बन गये और नेता जी उनके सहयोगी।
अब प्रश्न था कि नेताजी, गन्दगी को गन्दगी से साफ करेंगे या कि साबुन से।
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