Friday, 6 May 2016

Nadi ro padi

नदी रो पड़ी

मन्दाकिनी शादी के बाद कनाडा चली गयी थी और वहीँ की होकर रह गयी। जब तक उसके पिता जीवित थे, कभी कभी गांव भी आ जाती थी। इस बार तो पूरे पच्चीस वर्ष बाद अपने गांव आई थी। परिवार में  उसकी एक बुढ़िया चाची, उनके बेटे बहु और बेटे के दो बच्चे बचे थे। मन्दाकिनी के माता-पिता दोनों का स्वर्गवास हो चुका था और भाई भाभी भी कनाडा चले गए थे। बचपन में चाची उसे बहुत प्यार करती। आते ही चाची से लिपट गयी, 'अरे चाची ! पच्चीस वर्ष बाद। ' चाची की ऑंखें डबडबा गयीं। एक बार फिर से उठाकर उसे गोद में ले लेना चाहती थी, पर वह समय बहुत पीछे चला गया था।
'बिटिया ! अब तो अंत समय आ चुका है। पका आम हूँ, ना जाने कब टपक जाऊं।  कितने अच्छे भाग हैं, तू आ गयी।  मैं तो समझ रही थी, परलोक में ही जाकर, तेरी प्रतीक्षा करनी पड़ेगी।'
'नहीं चाची! तू अभी कहीं नहीं जा रही। देख तेरा प्यार खींच लाया। मैं तो तुझे कितना बुलाई, आ जा, कनाडा घूम ले, पर तुझे यहीं से छुट्टी नहीं  मिल पाती। '
'अरे बेटा, मेरे लिए यहीं अमेरिका, कनाडा है। चंदू ये दो नन्हें से हैं, बस इन्हीं में पूरी दुनिया देख लेती हूँ।' चन्द्रिका के बच्चों की ओर इशारा करके चाची बोली। 'अरे बहू, आज शाम को मन्दाकिनी के लिए चोखा बाटी और खीर बना लेना, इसे बहुत पसंद है और सुनो, कल नाश्ते में मटर की घुघुनी। तू कब तक रहेगी, बेटी? एक एक करके तेरी पसंद की सब चीजें खिलाऊंगी। भैंस भी लग रही है, दूध दही का कोई अकाज नहीं। '
'बस चाची दो दिन रहूंगीं, सुदेश जी भी आये हैं, वे परसों आप से मिलने आएंगे, फिर उनके साथ ही चली जाउंगी और वहीँ से कनाडा।'
इतने में सुप्रिया चाची भी आ गयीं। 'अरे मन्दाकिनी! तू कब आई ?'
'बस आज ही चाची। अच्छा हुआ तू आ गयी, तेरे साथ मैं नदी के तीर तक चलूंगी। देख कर आउंगी, मेरी 'बेशो' अब कैसी है ? '
'अब कहां पानी होगा बेशो में। बरसात बीतते ही लोग पम्प लगाकर सारा पानी उदह लेते हैं। फिर तो अगली बरसात तक बेचारी वैसे ही उदास पड़ी रहती है। खैर, थोड़ी देर में आती हूँ तो चलते हैं। '

सुप्रिया चाची थोड़ी देर बाद अपने घर होकर आ गयी और मन्दाकिनी को लेकर नदी की ओर चली गयी। अब बहुत कुछ बदल चुका था, गांव में खड़ंजे लग गए थे, गलियां पहले से पतली हो चुकी थीं। गांव का आकार पहले से बड़ा हो चुका था और गांव के बाहर भी कई जगह छुटपुट घर बन गए थे। गांव के समीप वाली सड़क पक्की हो चुकी थी और मोटर साइकिलें सरपट दौड़ रही थीं।
मन्दाकिनी ने पूछा, 'चाची ! पखडू का एक्का अभी भी चलता है ?'
'नहीं बेटी वो तो बहुत बूढ़े हो गए। उनका बेटा दूसरा काम पकड़ लिया। अब तो लोग बाग़ जीप गाड़ी से आते जाते हैं। एक्का और घोडा गाड़ी पर कौन बैठता है !'

खेतों की मेड़ों से होते, वे नदी के तट की ओर चल दीं। राह के एक-एक स्थल को मन्दाकिनी भली प्रकार से निहारती और अपने बचपन को याद करती।
'चाची, यह मंगलू का खेत है, न ! '
'हाँ, तुझे अभी तक याद है। '
'हाँ चाची, मैं एक मटर की छिम्मी तोडूंगी। पहले भी वे इसमें मटर बोते थे, हम जब नदी पर नहाने जाते तो इसमें से एकाध छिम्मी तोड़ कर खा लेते। एक बार तो तारा ने जैसे ही छिम्मी तोड़ी, मंगलू चाचा को आहट मिल गयी।  वे चिल्लाये, कौन ? हम दोनों तेजी से नदी की ओर भाग लिए। मगर उनकी नजरें तेज थीं। जब हम नदी से वापस आये, तब तक वे वहीँ थे। हम दोनों को बुलाया, डरते डरते उनके पास गए कि वे डांटेंगे पर उन्होंने खेत से तोड़कर थोड़ी थोड़ी फली हमें दे दी। ले जाओ, घर पर जाकर खाना ।'

वे नदी के तट पर पहुंचीं।  वही बरगद का पेड़, मगर पहले जितना हरा भरा और घना नहीं था। नीचे तने के चारों ओर बना गोल चबूतरा जीर्ण शीर्ण हो चुका था और कई जगह से टूटा फूटा था। उसका किसी ने कभी जीर्णोद्धार नहीं कराया।  चाची ने बताया 'बरगद के पत्ते हाथी को खिलाने के लिए काट ले जाते हैं, इसलिये यह फ़ैल नहीं पाता।' मन्दाकिनी जाकर, चबूतरे पर बैठ गयी और एक गहरी सांस ली। फिर गर्दन घुमा घुमा कर चारों ओर, फिर आसमान की ओर देखी। आखिर में उठकर नदी के तट पर खड़ी हो गयी और जब नदी की ओर आँख गड़ाई तो फफक कर रोने लगी और आखों से धार बह निकली। नदी में उतना पानी नहीं था जितना मन्दाकिनी के आँखों में। सूखी नदी के,बस बीच में एक नाली के बराबर हिस्से में पानी था। हाँ कहीं कहीं तलहटी में गड्ढे बन गए थे, बस उनमे अवश्य थोड़ा थोड़ा पानी भरा था। चाची ने फिर बताया, अब तो बरसात ख़त्म होने से पहले नदी बेआब हो जाती है, लोग पंप लगा कर सारा पानी सिंचाई के लिए निकाल लेते हैं।

मन्दाकिनी की आँखों के सामने उसका बचपन फिल्म की रील की भांति चलने लगा। नदी उसके घर से बस दो सौ कदम की ही दूरी पर थी। जब कभी गांव के बच्चों के साथ वह निकल जाती; नदी में कम से कम घंटा भर नहाती और मस्ती करती। कई बार घर पर डांट भी खानी पड़ती। वह दृश्य आज भी याद है जब कभी कभी मां और चाची के साथ बरगद के नीचे चबूतरे पर बैठकर दूर क्षितिज में सूर्यास्त का अनुपम दृश्य का अवलोकन करते, उसका चचेरा भाई बृजेश साथ जाता तो कहता, देख पचास तक गिनने तक सूरज डूब जायेगा और वो कहती नहीं सौ तक। कभी ये जीतती, कभी वो। आंखें कभी आसमान को देखतीं तो कभी जल में। सूरज का बिम्ब नदी के जल में पड़ता तो ऐसा प्रतीत होता कि होठलाली लगाए नदी मुस्करा रही हो। जब तक सूरज पूरा नहीं डूब जाता, वहां से हिलने का जी नहीं होता। 

अभी वह अतीत में ही खोयी थी कि एकाएक नालीनुमा नदी का जल स्तर बढ़ गया। जैसे लगा कि उसे रोता देख, नदी भी रोने लग पड़ी हो और आंसुओं की धारा बह निकली हो। दो सखियाँ वर्षों बाद मिलकर, आलिंगन पाश में बंधे, बोले बिना ही एक दूसरे से विछोह की सारी बातें कह रही हों। यह देख मन्दाकिनी द्रवित भी थी और आश्चर्य चकित भी। क्या वास्तव में नदी का उसके लिए प्यार उमड़ आया ! एकाएक यह जल कहाँ से आ गया। प्रश्न भरी ऑंखें सुप्रिया चाची की ओर देखने लगीं।

चाची ने बताया, 'ठाकुर बालगोबिंद सिंह ने नलकूप का पानी छोड़ा होगा। उनके खेत का एक चक थोड़ी दूरी पर है। नदी का जल समाप्त हो जाने पर वे इसी रास्ते वहां तक पानी ले जाते हैं और पम्प से फिर से निकाल कर, खेत के उस टुकड़े की सिंचाई करते हैं। चल अब चलते हैं। '

'बस चाची, दो मिनट और! फिर पता नहीं, इस जीवन में इस नदी के दर्शन होंगे भी या नहीं। '

- एस० डी० तिवारी 


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