अल्लाह से मांगो
ख्वाजा जी की दरगाह में जैसे ही घुसा, एक व्यक्ति आकर पूछने लगा, हां जी कितने की चादर चढ़ाओगे? मैंने बोल दिया नहीं भाई, चादर नहीं चढ़ानी, बस दर्शन करना है। मैं आगे बढ़ता गया, वह बगल में साथ चलता रहा, 'पांच की नहीं तो ढाई हजार की ही चढ़ा लो, फूलों के सस्ती भी है। देखो, अभी तुमसे आगे वे साहब गये हैं, पंद्रह हजार की चढ़ा रहे हैं।' मैं उसकी बातों पर अधिक ध्यानं दिये बिना आगे बढ़ गया, जब बुलंद दरवाजा के पास पहुंचा तब तक वह पीछे हट चुका था।
मैं सीधे गरीबनवाज की मजार पर पहुंचा, सिर झुकाकर सजदा किया। जब मजार में घुसा तो अंदर मात्र छः सात लोग ही दिखाई दे रहे थे, पर न जाने कहाँ से एकाएक भीड़ आ गयी और उसी में मेरी पैंट की पीछे की जेब से किसी ने पर्स निकाल लिया। मुझे तुरंत इसका आभास हो गया और मेरे पीछे खड़े एक व्यक्ति पर मुझे शक हुआ। मैं पलट कर उसे नीचे से ऊपर तक देखा तो वह बड़े भक्ति भाव से अपने दोनों हाथ आँखों के सामने करके कुछ पढ़ते हुए दुआ मांगने लगा। मुझे विश्वास था कि पर्स उसी ने निकाला है पर वह उसके पास नहीं था। उसने अपने पीछे खड़े एक लडके को पास कर दिया था। मैंने बोला, 'जिसने भी निकाला है वह पछतायेगा ही, पर्स में विजिटिंग कार्ड के आलावा कुछ भी नहीं है।' तभी उसके पीछे खड़ी एक महिला की आवाज आई 'ये किसका पर्स है? ' मैंने देखा, मेरा ही था।
गरीबनवाज के दर्शन करके मजार के बगल में ही सूफी कव्वाली का कार्यक्रम चल रहा था। वह बहुत ही अच्छा लग रहा था पर पर समय आभाव के कारण एक दो सुनकर ही वहां से हम चल दिए। जब टैक्सी में बैठे तो ड्राइवर ने पूछ लिया 'कैसा दर्शन रहा साहब ?' मैंने उसे पूरा किस्सा सुना दिया। ड्राइवर ने कोई नाम लेते हुए पूछा, 'आप उधर नहीं गए थे?' जब मैंने नहीं बोला तो उसने फिर पूछा 'अंगूठी पहने हैं?' हाँ बोलने पर उसने बताया, 'साहब आप बच गए, वहां एक मोटी सी दीवार है जिसमे दो बड़े सुराख़ हैं, इधर ये ठग बोलते हैं इसमें दोनों हाथ डाल कर सीना दीवार से सटा लो और अल्ला से दुआ मांगो, सभी मुराद पूरी होगी। दीवार के दूसरी ओर इनके आदमी होते हैं वे अंगूठी निकाल कर भाग जाते हैं। बाहर निकल कर वहां तक जाने में पंद्रह बीस मिनट लग जाता है और इनसे शिकायत करो तो बोलेंगे कि हमें क्या पता, आप की अंगूठी अल्ला को मंजूर हो गयी। '
एस० डी० तिवारी
No comments:
Post a Comment