खुदा का फौजी
'बेटा! तीन तीन ईद बीत गयी। कब तक तू आएगा? बहुत हो गया, यहीं छोटा मोटा कोई काम कर लेना, नहीं चाहिए जयादा पैसा। '
'मां! मुझे एक मिशन पर दूसरे देश जाना है। वहां से लौटने में थोड़ा समय लगेगा और वहां मेरे पास कोई फ़ोन भी नहीं होगा, इसलिए तेरे से बात नहीं कर पाउँगा। अपना ख्याल रखना। '
'कौन से देश जा रहा है बेटा, हेलो ... हेलो .... '
अकरम के पास खड़े कमांडर ने तब तक फोन काट दिया था।
अकरम की माँ को क्या पता था फोन पर उसकी यह अंतिम बात चीत होगी।
'बेटा! तीन तीन ईद बीत गयी। कब तक तू आएगा? बहुत हो गया, यहीं छोटा मोटा कोई काम कर लेना, नहीं चाहिए जयादा पैसा। '
'मां! मुझे एक मिशन पर दूसरे देश जाना है। वहां से लौटने में थोड़ा समय लगेगा और वहां मेरे पास कोई फ़ोन भी नहीं होगा, इसलिए तेरे से बात नहीं कर पाउँगा। अपना ख्याल रखना। '
'कौन से देश जा रहा है बेटा, हेलो ... हेलो .... '
अकरम के पास खड़े कमांडर ने तब तक फोन काट दिया था।
अकरम की माँ को क्या पता था फोन पर उसकी यह अंतिम बात चीत होगी।
तीन साल हो गए थे, फेसबुक के द्वारा अकरम को एक सन्देश मिला था, अगर अमीरात में नौकरी करनी हो तो अपना बायोडाटा, यहाँ दिये ईमेल के आईडी पर मेल कर दो। वह एक साल से नौकरी के लिए परेशान था। यह सन्देश तो उसके लिए किसी मुराद से कम नहीं था। ग्रेजुएशन में उसकी थर्ड क्लास रह गयी थी। जहाँ कहीं भी अप्लाई करता इंटरव्यू तक के लिए बुलावा नहीं आता। सोचा बैंक की परीक्षा में बैठे, पर वहां भी मौका नहीं मिल पाया क्योंकि कम से कम पचास प्रतिशत अंक की मांग होती। अब देर किस किस बात की थी। अकरम ने अपना बायोडाटा बनाया और ईमेल के द्वारा भेज दिया। अगले सन्देश के द्वारा उसे इंटरव्यू के लिए मुंबई बुलाया गया। वहां वह अपनी डिग्री वगैरह लेकर पहुंचा। इंटरव्यू में उसके शारीरिक स्वास्थ्य पर अधिक ध्यान दिया गया। वह एक तंदरूस्त लड़का था, इंटरव्यू हुआ और चयन भी हो गया।
नियुक्ति पत्र जुबानी ही मिला। उसे बस यह कहा गया अपना पासपोर्ट और वीसा के लिए पैसे कंपनी के पास जमा करा दे ताकि वीसा लगवाया जा सके और वह जितनी जल्दी हो अमीरात जाने को तैयार हो जाय। उसके घर में ख़ुशी का माहौल छा गया। मां की ख़ुशी का ठिकाना नहीं रहा, अब विदेश से पैसा आएगा और सारी गरीबी दूर हो जाएगी। मगर, साथ ही बेटे का देश के बाहर जाने का दुःख भी। अकरम ने मां को समझाया कि अमीरात से आने में बस चार पांच घंटे ही लगते हैं। इससे ज्यादा समय तो अपने ही देश में एक जगह से दूसरी जगह जाने में लग जाते हैं। मां ने किसी तरह मन को समझा लिया।
एक दिन अकरम अमीरात के लिए उड़ गया। वहां उसे कुछ दिन एक मकान में रखा गया जहां रहने और खाने पीने की ठीक ठाक व्यवस्था थी। वहां किसी तरह की परेशानी नहीं थी। अकरम को वहां अच्छा लगा। अब प्रोजेक्ट पर जाने का समय आ गया था। अभी तक उसे ठीक तरह से पता नहीं था कि उसका काम क्या होगा। बस भरोसे का पाठ पढ़ाया जा रहा था और यह भरोसा दिलाया रहा था कि उसे अल्लाह के नेक काम में लगाया जायेगा। प्रोजेक्ट की ट्रेनिंग के लिये उसे अरब के किसी स्थान पर ले जाया गया, जहां उसकी ट्रेनिंग प्रारम्भ हुई। उसे बताया गया कि वह फ़ौज में भर्ती हो चुका है। ट्रेनिंग के बाद, अल्लाह के वास्ते जहाँ जरूरत होगी, लड़ना होगा। उसे इस बात का फक्र महसूस हुआ कि वह अल्लाह की खातिर लड़ेगा, मगर उससे बड़ा अचरज कि दुनिया की कोई भी फ़ौज अल्लाह के लिये तो चींटी से भी छोटी है फिर अल्लाह को इंसानों की फ़ौज की क्या जरूरत? अल्लाह चाहे तो, अपनी जगह से ही दुनिया पर कहर ढा सकता है, उसके कौन से काम के लिए हम जैसों को लड़ना है ! और तो और, अल्लाह ने इंसान को दिमाग भी बख्शा है कि सबकी हिफाजत करे। लेकिन यह सवाल, और किसी से पूछने की इजाजत नहीं थी, बस वह अपने आप से ही पूछ सकता था।
उसे अब तो समझ आ चुका था कि वह कुछ खुदगर्ज आतंकवादियों के चंगुल में फंस चुका है, और अब निकल पाना नामुमकिन सा है। उसे अपने कैंप से कहीं भी जाने की इजाजत नहीं थी । कैंप इंसानों के ऊपर क्रूरता और कहर देखकर उसका दिल दहल जाता था। अब कर भी क्या सकता था, ज्यादा पैसे का लालच उसे गर्त में धकेल चुका था। आखिर वतन छोड़ कर क्यों आया? दो रोटी तो वहां भी मिल रही थी। अब वहां रोना भी उन्हीं की मर्जी से था। कभी कभार फ़ोन से घर पर बात करवा दी जाती, पर उसे उतना ही बोलना होता जितना कहा जाता। अब एक एक लमहा काटना मुश्किल था, घुटन में जिंदगी कट रही थी। लेकिन, अब तक उसके सारे रास्ते बंद हो चुके थे। एक बार उसे ट्रेनिंग के अंतिम दौर पर भेजा गया। यह ट्रेनिंग किसी दूसरे देश में थी, वहां उसे नकली पासपोर्ट और वीसा पर जाना था। ट्रेनिंग में उसे उस देश के एक स्थान की रेकी करनी थी, यह उसकी परीक्षा भी थी। उसे बता दिया गया था, अगर कोई चालाकी की तो वहीँ सिर कलम कर दिया जायेगा। नकली दस्तावेजों के जरिये रेकी करके वापस कैंप में आने पर उसे सम्मानित किया गया और उसकी पदोन्नति भी हो गयी। तब तक कमांडरों का उस पर भरोसा भी बढ़ गया था। अब उसे उस काम को अंजाम देना था, जिसके लिए इतना सब कुछ किया गया। उसके कमांडर ने उसे शाबाशी देकर विदा किया, 'हां अपनी माँ से फ़ोन पर बात कर ले, फिर मिशन पूरा होने तक किसी से बात नहीं कर पाएगा। ' उसे अपने ही वतन जाकर दहसत फैलानी थी। उसके दिमाग में अच्छी तरह भर दिया गया कि वह अब अल्लाह का सबसे नेक काम करने जा रहा है, मगर यह बात उससे नहीं बताई गयी कि उसे अपने ही वतन भेजा जा रहा है। उसे समझाया गया कि अल्लाह के लिए उसे अपनी जान कुर्बान करनी है, ऐसा करने से उसे जन्नत मिलेगी। अब अकरम खुद से सवाल पूछने लगा कि खुदा के बनाये लोगों को मारना, अल्लाह का नेक काम कैसे हो सकता है? और इस तरह जान देने से जन्नत मिलती तो ये खुद क्यों नहीं जन्नत जाते ? एक बार अकरम के दिमाग में आया, क्यों न इनको ही ख़त्म कर दे, इनके जाने से कितने ही लोग चैन की जिंदगी बसर करेंगे। मगर यह उसके बूते की बात कहाँ थी!
अब कोई भी चारा नहीं था। उसे जान तो देनी ही थी किस तरह से देनी है, बस यही फैसला करना था। अपनी मंजिल को चल दिया, उस पर नजर रखने के लिए दो और लोगों को भेजा गया। उसे बता दिया गया था, कोई चालाकी करने पर क्या अंजाम होगा। कैंप में वह हैवानियत के कारनामे देख भी चुका था। वहां उसका सारा काम बस कोड वर्ड से चलना था, उसके ऊपर लगा पहरेदार इस बात की निगरानी रख रहा था कि यह कोई गड़बड़ करे या काम को अंजाम न दे तो फ़ौरन उड़ा दिया जाय। बाजार का रंग रूप देख कर उसे कुछ कुछ लग रहा था कि यह उसका अपना ही मुल्क है। एक भीड़ भाड़ वाली जगह पर विस्फोटक रख कर वह वहां से कुछ दूर खड़ा होकर देखने लगा कि जैसे ही भीड़ आये वह रिमोट दबा दे। लेकिन अब उसका जमीर कचोटने लगी थी और बार बार खुद से सवाल पूछने लगा कि वह ऐसा क्यों कर रहा है? बिना किसी बात के अपने ही लोगों की जान लेगा ! अब तो वह उपाय ढूंढने लगा कि कैसे भी हो, अपनी जान दे दे ताकि और लोग बच जायँ। मगर, अब ऐसा होना नामुमकिन था, उसे तो मरना था ही, पर अकेले नहीं मर सकता था। ऐ खुदा! ये क्या करवा रहा है? इसीलिए मुझे धरती पर भेजा था? जिस मिट्टी ने मुझे पाला, बड़ा किया, उसी मिट्टी के लोगों को तबाह करने जा रहा हूँ! इंसान का तो इंसान की जान बचाने का फर्ज होता है, तूने यह हैवान का काम सौंप दिया! जन्नत कहाँ, गर्त तो यहीं दिख रहा है। अब तो मेरे लिए दोजख में भी जगह नहीं! मन में यह सब चल ही रहा था कि रिमोट दब गया। उसके वहीँ परखचे उड़ गये। उसे तो पता भी नहीं चला कितने लोग मारे गए, उनमें उसका कोई अपना भी था या नहीं। खुदा के पास जाते हुये, रस्ते में उसे दर्जनों बेगुनाह जानें मिली, वे चीख चीख कर पूछ रही थीं; तूने कितनों को अपाहिज बनाया? कितनों को अनाथ किया? कितनों को बेवा किया? और तो और अपने मां बाप को भी बेसहारा कर डाला! तुझे जन्नत जाना था तो जाता, हमें तो नहीं जाना था, बेवजह अपनी जान का बाराती क्यों बनाया? तुम अपनी खुदगर्जी में दुनिया को तबाह कर रहे हो! अल्लाह तुमको कभी माफ़ नहीं करेगा!
मरकर भी अकरम के पास रोने के अलावा कोई जबाब नहीं था।
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