Sunday, 1 May 2016

Makkhi bhagane ki dawa


मक्खी भागने की दवा

एक बार सुदर्शन ने अख़बार में पढ़ा 'मक्खी भागने की अचूक दवा'। बस आप अपना पता लिख पोस्टकार्ड और पांच रुपये का डाक टिकट एक लिफाफे में कर के दिए गए पते पर भेजें। सुदर्शन भी क्यों चूकने लगा था। वह डाकखाने अपना लिफाफा भेजने गया तो मंगल मिल गया। मंगल के पूछने पर उसने उसे भी  बता दिया और बोला तू भी भेज दे। पहले तो मंगल ने आनाकानी की और भोला की कहानी बताकर हतोत्साहित किया -

'दिल्ली के एक अख़बार में भोला को एक परचा मिला उस पर नौ खाने बने थे। छः खानों में अंक भरे थे और तीन खाने खाली थे।  उन तीन खानों में इस प्रकार अंक भरने थे कि सभी पंक्तियों के जोड़ उसमे दिये अंक के बराबर हों। सही होने पर इनाम मिलेगा। उसका हल इतना सरल था कि कोई भी भर ले। भोला ने भरकर भेज दिया और उसका मोबाइल फ़ोन इनाम निकला। अब उसे सौ रुपये पहले भेजने थे और डेढ़ सौ रुपये देकर डाक का वी.पी.पी. पार्सल छुड़ाना था।  जब उसे पार्सल मिला तो उसमे खाली मोबाइल का डिब्बा मिला। ' 

खैर, इसमें कोई ज्यादा लागत नहीं है, केवल पांच रुपये का डाक टिकट और एक पोस्टकार्ड ही तो भेजना है। चलो भेज देते हैं, क्या पता कोई ऐसी दवा का अविष्कार हो ही गया हो। दोनों ने भेज दिया। अब वे मक्खी भगाने की दवा की प्रतीक्षा करने लगे। लगभग एक  माह के पश्चात उनका भेजा हुआ पोस्टकार्ड वापस आ गया। पोस्ट कार्ड पर मुहर लगी थी 'प्यारे ग्राहक ! जब आप भोजन कर रहे हों तो दाहिने हाथ से भोजन करें और बायें हाथ से मक्खी उड़ाते रहें। '

बेचारे दोनों ठगे से रह गए। पता चला कि लाखों लोगों ने पांच रुपये का डाक टिकट भेज था। 


एस० डी० तिवारी 

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