Tuesday, 10 May 2016

sharten lagu

शर्तें लागू

 दोपहर को कॉलेज से छूटने के बाद, एक मित्र के साथ योजना बनी कि आज रेस्तरां के खाने का स्वाद लिया जाय। आपात काल लगे होने का कारण, दुकानदारों को वस्तुओं के कीमत की सूची (रेट लिस्ट) लगानी जरुरी थी। उक्त रेस्तरां में भी बड़े बड़े अक्षरों में हरेक मद की दर लिखी थी। हमने पढ़ा, कीमत अपनी जेब के अनुसार ही लगी और खाने बैठ गए।
'एक प्लेट दाल तड़का, एक प्लेट सब्जी और छः रोटी। रोटी दो दो कर के लाना।' हमने आर्डर कर दिया। बैरा पहले दो प्लेट कटी प्याज और दो प्लेट रायता लाकर मेज पर रखा, फिर हमारा आर्डर किया खाना। उस समय  लगभग सभी रेस्तरां में खाने के साथ प्याज मुफ्त दी जाती थी। पर रायता भी, यह देख हम थोड़ा चौंके, मगर मन में रेस्तरां के लिए बड़ा सम्मान जागृत हुआ, 'कितना अच्छा रेस्तरां है, प्याज के साथ रायता भी। वाह! हमने खाना खा लिया। क्या सस्ती का जमाना था, दो लोगों ने मात्र १८ रुपये में खाना खा लिया। मगर  बिल आया तो हम एक बार फिर चौंक गए। ३६ रुपये का बिल।  हम दुकानदार से बोले, भाई, हमने तो १८ रुपये का खाना खाया और बिल ३६ रुपये का ?
'हां, प्याज और रायता भी तो लिया, साढ़े चार रूपया प्रति प्लेट, उसका। '
'मगर वह तो आपके रेट लिस्ट में है ही नहीं और हमने उसका आर्डर भी नहीं किया था। '
'उसका रेट दुकान के अंदर, पीछे रखे बोर्ड पर लिखा है। '
'ये तो सरासर ठगी है।'
हम उससे झगड़ने लगे, हमारा बजट बिगड़ चुका था।  सच्चाई तो यह थी कि जेब में उतने पैसे भी नहीं थे। बहसबाजी के बाद ३० रुपये पर समझौता हुआ।

- एस० डी० तिवारी 

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