Tuesday, 10 May 2016

FLAT KA JUNUN

फ्लैट का जुनून

क्षेत्र के सभी प्रॉपर्टी डीलरों की घंटियां बजने लगीं।
'ग्लोब अपार्टमेंट में कोई फ्लैट है?'
मनसुखानी की भी घंटी बजी और उत्तर दे दिया,
'अभी तो नहीं है, सिंघानिया साहब ! जैसे ही आएगा बता दूंगा। '
'देखना, जितनी जल्दी हो सके।'
फोन रखकर मनसुखानी ने अपने लोगों को काम पर लगा दिया, 'दीपक पता कर, ग्लोब अपार्टमेंट में कोई फ्लैट बिकाऊ है? सिंघानिया प्रॉपर्टी से फ़ोन आया था। अर्जेंट है।'
'ठीक है सर, वैसे उसके ठीक बगल वाले अपार्टमेंट में एक बहुत ही बढ़िया फ्लैट है, तीन ओर से खुला, बड़े बड़े कमरे, पावर बैक अप, लिफ्ट; देखते ही पसंद आ जायेगा। ' दीपक ने उत्तर दिया।
'अरे नहीं, ये तो मैं सिंघानिया जी को भी पता है। उन्हें ग्लोब में ही चाहिए, किसी एन. आर. आई. (अनिवासी भारतीय) को लेना है। '
सिंघानिया प्रॉपर्टी ने पूरा ग्लोब अपार्टमेंट खंगाल लिया, पर कोई फ्लैट बिकाऊ नहीं था। सिंघानिया ने अमेरिका फ़ोन करके राम प्रसाद से आग्रह किया कि वह किसी और अपार्टमेंट में फ्लैट ले ले। बहुत अच्छा फ्लैट और उचित दाम पर दिला देगा। मगर राम प्रसाद था कि ग्लोब अपार्टमेंट में ही फ्लैट लेने को अड़ा हुआ था। सिंघानिया के सभी आकर्षक प्रस्ताव, उस अपार्टमेंट से अच्छी लोकेशन, अधिक क्षेत्रफल, उससे अच्छी सुविधाओं से युक्त, मगर एक एक कर, रामप्रसाद ने रद्द कर दिए। उसे कोई भी विकल्प पसंद नहीं आ रहा था। सिंघानिया प्रॉपर्टी डीलर ने अनुमान लगा लिया था कि रामप्रसाद फ्लैट खरीदने में गम्भीर है इसलिए सहयोगी डीलरों को अच्छा कमीशन देने का भी प्रस्ताव रखा मगर उसके सभी प्रयास विफल रहे। उस अपार्टमेंट में कोई भी फ्लैट बिकाऊ नहीं था। राम प्रसाद को समझाना बुझाना भी व्यर्थ ही सिद्ध हुआ, वह तो ऐसे अड़ा था, मानो कोई संकल्प लिया हो, जब भी फ्लैट खरीदेगा तो उसी अपार्टमेंट में खरीदेगा। राम प्रसाद ने यहाँ तक कह दिया कि जब मिले तब बताना और कीमत की परवाह नहीं करना। 
हार कर सिंघानिया ने कहा, 'ठीक है मैं नोट कर लेता हूँ, जब कभी भी कोई सौदा आएगा, आपके लिए रख लूंगा और सूचित कर दूंगा।'
'हां, नोट कर लो और चाहो तो कुछ पैसा एडवांस भेज दूंगा। वैसे दो महीने बाद ही मुझे इंडिया आना भी है, और छः महीने तक वहीँ रहूँगा।  देख लेना, तब तक कुछ हो जाय तो अच्छा रहेगा। '
राम प्रसाद के पास पैसे की कोई कमी नहीं थी। बेटे कुशल को पढ़ा लिखा कर इंजीनियर बना दिया था। वह अमेरिका चला गया और वहां खूब डॉलर कमा रहा है। उसने प्रयास कर, अपने पिता राम प्रसाद का भी ग्रीन कार्ड बनवा दिया और वह भी वहां का निवासी हो गया। अमेरिका में कुशल ने आलीशान बंगला और मंहगी गाड़ी ले लिया था और अपने पिता के लिए भी बिजनेस डलवा दिया। राम प्रसाद का भी काम काज ठीक ठाक चल रहा था और उसे भी अच्छी कमाई हो जाती थी। अमेरिका में रामप्रसाद की बड़ी ऐश की जिंदगी कट रही थी। कभी कभी वह एकांत में बैठता तो उसे अपनी पुरानी जिंदगी याद आ जाती। आज वह महंगे से महंगा पिज्जा आर्डर करता है, कई बार पूरा नहीं खाया जाता तो छोड़ कर चल देता है। किसी भी होटल या रेस्तरां में खाने में कोई संकोच नहीं, महँगी से मंहगी शराब उसके घर में है। एक समय था कि पटरी पर बिकने वाली आलू की टिक्की के लिए भी मन मार के रहना पड़ जाता, बस का किराया बचाने के लिए, कितना पैदल चल लेता; क्योंकि उसे अपने पेट से ज्यादा चिंता, कुशल के पढ़ाई की रहती। 
  
दो महीने बीतते देर नहीं लगी और राम प्रसाद इंडिया आ गया। आते ही सिंघानिया से संपर्क किया। वह भाग्य का तेज निकला, ठीक उसी समय ग्लोब अपार्टमेंट के निवासी के० के० नागर, अपना फ्लैट बेचने के लिए किसी प्रॉपर्टी डीलर से संपर्क किया। उनकी एक ही बेटी थी और वह अमेरिका में रहती थी। अब तक तो वे अकेले ही जिंदगी काट रहे थे, पर बेटी की जिद्द थी कि अमेरिका आ जायँ क्योंकि अब वह अमेरिका की नागरिक हो चुकी थी और नागर जी का भी स्थाई निवासी होने का दर्जा दिलवा दी थी। कंचन के अब इंडिया लौटने की कोई सम्भावना नहीं थी। माँ का पहले ही देहांत हो चुका था, अतः वह चाहती थी उसके पिता भी वहीँ आ जायँ। नागर साहब के मुंह खोलते ही, बात सीधे सिंघानिया तक पहुँच गयी। नागर साहब यह सुनकर हतप्रभ कि उनके फ्लैट का सौदा हो गया और जो कीमत वे चाहते थे उसी कीमत पर।
सौदा पूरा होने तक और अधिक हो हल्ला न हो, सिंघानिया ने सबको चुप रहने को कह दिया। क्योंकि सभी प्रॉपर्टी डीलरों जुबान पर बस ग्लोब अपार्टमेंट ही था।  सिंघानिया ने रामप्रसाद को सूचित किया। रामप्रसाद ने अच्छा ख़राब, किस मंजिल पर है; कुछ नहीं पूछा और 'सौदा पक्का' बोल दिया। फ्लैट के लेन देन की प्रक्रिया भी शीघ्र ही पूरी हो गयी। रामप्रसाद ने फ्लैट को अपने नाम से पंजीकृत करवा लिया।
रामप्रसाद की ग्लोब अपार्टमेंट में फ्लैट लेने की महत्वकांक्षा थी जो पूरी हुई। उसके बाद वह बड़ी धूम धाम से गृह प्रवेश करवाने की योजना बनाई। बड़े समय से उसे यह फ्लैट मिल गया था। अभी उसके अमेरिका वापस जाने में समय था, वह चाहता था गृह प्रवेश के बहाने वह अपने पुराने रिश्तेदारों, दोस्त मित्रों से मिल भी ले। अपने सभी पुराने मित्र और रिश्तेदारों को याद कर करके, आमंत्रित किया। रामू का उत्साह देखते बनता था और वैसे ही बढ़ चढ़ कर जोश उसे बधाई देने वालों का।  

आज गृह प्रवेश का उत्सव है। खानेपीने की व्यवस्था शहर के बहुत अच्छे कैटरर को दिया गया है। अपने पुराने मित्रों और रिश्तेदारों से मिलकर, रामप्रसाद बहुत रोमांचित और प्रसन्न है। पार्टी में लोग छोटे छोटे समूह में बंटे, हाथों में खाने की प्लेट लिए, रामप्रसाद की प्रशंसा करते नहीं थक रहे थे। आयोजन तो अच्छा था ही, चर्चा का मुख्य विषय था रामप्रसाद की कर्मठता और प्रगति। अपनी जिंदगी में उसने जितनी उन्नति की है बहुत कम लोग ही मिलते हैं। उसके रिश्तेदार, धीरे धीरे बात कर रहे थे, श्रम और किस्मत का ऐसा योग तो शायद ही कहीं देखने को मिलेगा। 'इस बिल्डिंग के बनने में रामप्रसाद का भी पसीना लगा है। आज उसे अपना पसीना वापस पाकर, जिंदगी की कितनी बड़ी संतुष्टि मिली होगी। कभी वह एक मजदूर के रूप में इस भवन के निर्माण में कार्यरत था। वह स्वयं झोपड़ी में रह कर भी कुशल की पढ़ाई का कितना ध्यान रखता था। जो भी कमाई होती, बेटे की पढ़ाई पर खर्च कर देता। पेट काट कर उसे पढ़ाया और इंजीनियर बनाया। कुशल भी पढ़ने में होनहार था, पर रामप्रसाद के तपस्या की भूमिका बहुत बड़ी थी। उस समय तो इसके लिए फ्लैट में रहने की सोचना भी सपने से परे की बात थी। आज वह अपनी बनाई बिल्डिंग में अधिकार के साथ खड़ा है।'



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