Saturday, 30 April 2016

Arab se afrika

अरब से अफ्रीका

अरब में काम करते मनदीप को एक वर्ष बीत चुका था। अपना वतन छोड़कर भी, यहां कोई खास परेशानी नहीं थी।  कंपनी ने रहने के लिये कमरा दे रखा था। खाने पीने की भी कोई समस्या नहीं थी, यहाँ के रेस्तरां में भारतीय व्यंजन का स्वाद मिल जाता था। अरब की राजधानी, रियाध से कोई एक सौ किलोमीटर की ही दूरी पर, अल-खर्ज में उसकी कंपनी का प्रोजेक्ट चल रहा था। वहां कई भारतीय रहते थे, उनसे परस्पर सहयोग मिलता रहता और घर पर फ़ोन से बात हो जाती, इस कारण उसे घर से दूरी और अकेलापन नहीं अखरता था। खा पीकर जो पैसे बचते, इंडिया भेज देता। उसका सपना था कि अरब से लौटने तक अपने कस्बे में एक बड़ा सा आलीशान मकान बनवा ले।  
एक दिन उसे अचानक कम्पनी से निर्देश मिला कि उसे यूगांडा जाना है। उसका रियाध से जिंजा, जो काम्पाला से लगभग अस्सी किलोमीटर है, तक का टिकट भी कंपनी ने करवा दिया है। जिंजा में कंपनी का एक बिल्डिंग प्रोजेक्ट चल रहा है, जब वह पूरा हो जायेगा तो वापस बुला लिया जायेगा। मनदीप ने सोचा, जब घर से बाहर निकल ही गए हैं तो क्या अरब, क्या अफ्रीका। इसी बहाने एक और देश घूम लेंगे। बिना ना नुकुर किये, वह जिंजा पहुँच गया। कंपनी ने वहां भी रहने के लिए कमरे की व्यवस्था कर रखी थी, पर पास पड़ोस में यूगांडा के लोग ही थे। उनकी अलग भाषा होने के कारण बात चीत की की बड़ी समस्या थी। शाम को खाने के लिए रेस्तरां ढूंढने लगा तो आस पास, उसके मन पसंद भोजन का कोई रेस्तरां नहीं मिला। हाँ फलों की कई दुकानें थीं। वहां केला, पपीता, आम, नारियल खूब मिल रहे थे। वह रात उसने फल खाकर ही बिताया। अगले दिन सुबह टहलते हुए, कुछ दूर चल कर गया तो एक रेस्तरां देखकर, बड़ी राहत मिली। वहां अंडे के आमलेट को पराठे में लपेट कर, जिसे वे रोलेक्स कह रहे थे, खाने को मिला। मनदीप को यह व्यंजन भा गया। अब ये था कि और कुछ नहीं तो फल और रोलेक्स तो है ही।    
ड्यूटी पर जाने के बाद पता चला कि उस प्रोजेक्ट में बस एक ही भारतीय करीम काम कर रहा था और वह भी छुट्टी पर भारत गया हुआ था। किसी तरह उगांडीयन सहकर्मियों से टूटी फूटी अंग्रेजी बोल कर वह अपनी व्यवस्था बनाया।
एक दिन जब वह जिंजा घूमने निकला वहां बुजागली जल प्रपात देखकर दंग रह गया। उसकी सुंदरता मन मोहने वाली थी। अब तक उसे यह नहीं पता था कि यही प्रपात, दुनिया की सबसे लम्बी नील नदी का स्रोत है। कुछ दिन तो उसके यूगांडा में बहुत अच्छे बीते। नई नई जगह, नई नई बात। लेकिन बाद में पता चला वहां पानी की बड़ी दिक्कत  थी। किसी बात चीत न होने के कारण, मन उचाट सा रहने लगा। और मच्छरों से भी जूझना था। नम क्षेत्र रहने के कारण वहां मच्छरों की भरमार थी। बाजार में मच्छरदानी लेने गया तो मच्छरदानी नहीं मिल रही थी। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह मच्छरदानी कहां से मंगाए। चद्दर ओढ़कर सोता तो गर्मी लगाती।
मच्छरों के आतंक से उसे लगने लगा कि वह यहाँ आकर फंस गया है। उसे तो यह भी नहीं पता था, कि एक साजिश के तौर पर उसे यहाँ भेजा गया है। वहां के जलवायु के कारण, भारत से सीधे अफ्रीका जाने के लिए कोई तैयार नहीं होता, इसलिए कंपनी जिस किसी का चयन करती, पहले अरब के किसी प्रोजेक्ट पर भेजती और बाद में अफ्रीका भेजकर उसका पासपोर्ट अपने पास रख लेती।
करीम अपनी छुट्टी बिताकर लौट आया था। एक से दो भले। साथ मिल जाने से, दोनों को ही बड़ी राहत मिली। मगर मनदीप का मच्छरों से संघर्ष समाप्त नहीं हुआ। कुछ ही महीने बीते थे कि उसे मलेरिया हो गया। करीम उसे डॉक्टर को दिखाकर, दवा ले आया। दिन में तो ड्यूटी पर चले जाने के कारण, करीम उसे सुबह शाम ही देख पाता। उसका पडोसी अकीकी, एक नेक दिल इंसान था। मनदीप को संकट में देख, वह आकर दवा के लिए पूछ जाता और काफी पिला देता। उसके लिए खाने पीने का सामान भी बाजार से लाकर दे देता। तीन दिन बीत गए, मनदीप का बुखार ठीक होने का नाम ही नहीं ले रहा था। अकीकी की सलाह पर, करीम ने उसे अस्पताल में भर्ती करा दिया। अकीकी उसे देखने अस्पताल भी रोज जाता था। एक सप्ताह भर्ती रहने के बाद उसे अस्पताल से छुट्टी मिली। अब वह ड्यूटी पर जाने लगा, पर बहुत कमजोर हो गया था।  खाने पीने में, उसे मन पसंद स्वाद नहीं मिल रहा था, इसलिए इच्छा भर खा नहीं पाता था। यहाँ आस पास कोई भारतीय रेस्तरां नहीं था और अपने आप बनाने का पूरा सामान भी नहीं। अब उसका मन वहां से ऊब चुका था, चाहता था कि कब इंडिया वापस चला जाये। 
धीरे धीरे उसे दो वर्ष हो गए। उसका स्वास्थ बिगड़ता ही गया। परेशान होकर, उसने कंपनी से वापस इंडिया जाने के लिए अनुरोध किया, मगर व्यर्थ। कंपनी वाले इसके लिए तैयार नहीं हुए। उसका पासपोर्ट भी कंपनी ने  अपने पास रख लिया था। जिस प्रोजेक्ट के लिए उसे भेजा गया था वह प्रोजेक्ट पूरा हो गया तो दूसरे प्रोजेक्ट में लगा दिया गया। अब तक तो मनदीप को भी समझ में आ चुका था कि उससे छल किया गया है। मगर, उसके पास कोई चारा नहीं था, वह बुरी तरह से फंस चुका था। वहां पर, वह शिकायत भी किससे करता। उसके पास कोई पहचान पत्र तक नहीं था। अस्वस्थ होने के बारे में जब उसके माता पिता को पता चला तो वे तुरंत ही इंडिया वापिस आने के लिए कहने लगे। उसने अपना पासपोर्ट लौटाने और वापस इंडिया भेजने के लिए कई बार अनुरोध किया, पर कोई सुनवाई नहीं हुई। उसके स्तीफा देने का भी कोई लाभ नहीं था क्योंकि पासपोर्ट कंपनी के पास जमा था।  वह तो कंपनी का एक कठपुतली बन कर रह गया था। 
मनदीप, एक अजीब जाल में फंसा हुआ था। उसे निकलने को कोई तरीका नहीं सूझ रहा था, परन्तु उसने अपना विवेक और धैर्य नहीं खोया। एक बार उसे पता चला कि कंपनी के मुख्य कार्यकारी, मोईन जी एक मीटिंग के लिए कम्पाला आने वाले हैं। वह उनके होटल का पता करके वहां पहुँच गया। कमरे की घंटी बजाया। मोईन जी ने दरवाजा खोला तो देखा, सामने दुबला पतला व्यक्ति, मानो चलता फिरता नर  कंकाल हो, खड़ा है। उसे देखकर पहले तो वे चौंके, फिर पूछे -
'कौन हो तुम? क्या चाहिए ?'
'सर! मैं आपकी कंपनी में कर्मचारी हूँ। जिंजा वाले प्रोजेक्ट में काम कर रहा हूँ। मेरी हालत देखिये, बड़े दिनों से बीमार हूँ। यहाँ की जलवायु मेरे लिए अनुकूल नहीं है।  मैं इंडिया वापस जाना चाहता हूँ। '
'तो स्तीफा दो और जाओ किसने रोका है ?'
'सर ! मेरा पासपोर्ट, कंपनी में जमा है।  वापस नहीं दे रहे हैं। '
मोईन जी झोंक में बोल तो गए, स्तीफा दो और जाओ मगर उन्हें यह ध्यान नहीं था कि पासपोर्ट जमा करने की निति उन्हीं की बनाई है। खैर मनदीप को देखकर उन्हें दया आ गयी और उसका पासपोर्ट वापस करवा दिया।

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