Saturday, 16 April 2016

Dabi jindagi

 दबी जिंदगी

सक्सेना जी को दिल्ली जाना था। दिल्ली से उनके एक मित्र का फोन आ गया, 'मेरा साला, मदन एक लड़का भेजेगा उसे भी साथ लेते आना।'
'कौन लड़का है ?' सक्सेना जी ने पूछा।
'अनीस, वहीँ सतना के पास ही एक गांव का है। कोई तेरह चौदह साल का है, गरीब घर का है, पढता लिखता है नहीं। उसके माँ बाप, मदन के पीछे पड़े हैं कि अपने यहाँ रख लो। मदन को जरूरत नहीं है तो उसने मेरे यहाँ भेजने के लिए कह दिया। मैंने भी सोचा, यहीं पड़ा रहेगा। उसका नाम स्कूल में लिखवा दूंगा, पढ़ भी लेगा और साथ में घर का छोटा मोटा कुछ काम कर देगा । '
'लेकिन मेरा टिकट तो सेकंड एसी का है।' सक्सेना जी ने बताया। 
'कोई बात नहीं, उसे ले आना, किराया मैं दे दूंगा। '
सक्सेना जी ने उसका भी टिकट वातानुकूलित द्वितीय श्रेणी में करा दिया। उनको जिस दिन चलना था, मदन, अनीस को लेकर हसन के घर पहुँच गया। ट्रैन आई दोनों बैठे। अनीस कौतुहल भरी नज़रों से ट्रैन में चारों ओर देख रहा था। गर्मी के मौसम में, ठंडा वातावरण देख उसे मजा आ गया; ऊपर से साफ सफेद चद्दर, तकिया और कम्बल भी, वाह ! गर्मी के मौसम में कम्बल! अचरज।  ऐसी ट्रैन तो कभी देखा ही नहीं था।

गाड़ी चली, थोड़ी देर में सक्सेना जी खा पीकर सो गए। आधी रात के बाद जब गाड़ी झाँसी पहुंची तो सक्सेना जी की नींद खुली, देखा तो सामने वाली बर्थ से अनीस गायब था। अब तो सक्सेना जी की नींद एकदम उड़ गई। वे दौड़ कर डब्बे में इधर चक्कर काटने लगे। टॉयलेट की ओर गये पर अनीस कहीं नहीं दिखा। सक्सेना जी तो परेशान हो गए, अब क्या करें। इतने में टी० टी० दिख गया। उन्होंने टी टी से पूछा, मेरे सामने वाली बर्थ पर एक तेरह चौदह साल का लड़का था, अब वहां नहीं है। कहीं आपने तो नहीं देखा?'

'हां, एक लड़का था तो यहीं टॉयलेट के बगल में सो रहा था, मैंने सोचा कोई ऐसे ही आ गया होगा। किसी का सामान न गायब कर दे, अभी-अभी नीचे उतार दिया।' 
अब सक्सेना जी आनन फानन में ट्रैन से उतर कर प्लेटफार्म पर देखने लगे।  संयोग था कि वह अभी प्लेटफार्म पर ही खड़ा  मिल गया। सक्सेना जी के जान में जान आई और वे उसे पकड़ कर ले आये। इससे पहले अनीस को बस एक बार ही ट्रैन में चढने का अवसर मिला था। अपने पिता के साथ जबलपुर गया था, तब भीड़ के कारण वे टॉयलेट के पास नीचे बैठकर ही गए थे। रात को जब अनीस की नींद खुली तो उसे विश्वास ही नहीं हो रहा था कि यह स्थान उसके लिए है। कहीं कोई डांटे न, इस डर के मारे टॉयलेट के पास जाकर सो गया।

एस० डी० तिवारी 


 

सक्सेना जी को दिल्ली जाना था। दिल्ली से उनके एक मित्र का फोन आ गया, 'मेरा साला, मदन एक लड़का भेजेगा उसे भी साथ लेते आना।'
'कौन है लड़का ?' सक्सेना जी ने पूछा।
'अनीस, वहीँ सतना के पास का ही है। कोई तेरह चौदह साल का है, गरीब घर का है। उसके माँ बाप पीछे पड़े हैं कि अपने यहाँ रख लो। मैंने भी सोचा यहीं पड़ा रहेगा, उसका नाम स्कूल में लिखवा दूंगा, पढ़ भी लेगा और साथ में घर का छोटा मोटा कुछ काम भी कर देगा । '
'लेकिन मेरा टिकट तो सेकंड एसी का है।'  
'कोई बात नहीं, उसे ले आना, किराया मैं दे दूंगा। '
सक्सेना जी ने उसका भी टिकट वातानुकूलित द्वितीय श्रेणी में करा दिया। दोनों ट्रैन से दिल्ली के लिए रावण हो गए । अनीस ट्रैन में बैठ कर हतप्रभ था, कौतुहल भरी नज़रों से कोच में चारों ओर देख रहा था। गर्मी के मौसम में, ठंडा वातावरण देख उसे मजा आ गया; ऊपर से साफ सफेद चादर, तकिया और कम्बल भी, वाह ! गर्मी के मौसम में कम्बल! अचरज।  ऐसी ट्रैन तो कभी देखा ही नहीं था।

गाड़ी चली, थोड़ी देर में सक्सेना जी खा पीकर सो गए। आधी रात के बाद जब गाड़ी झाँसी पहुंची तो सक्सेना जी की नींद खुल गयी, देखा तो सामने वाली बर्थ से अनीस गायब था। अब तो सक्सेना जी की नींद एकदम उड़ गई। वे दौड़ कर डब्बे में इधर चक्कर काटने लगे। टॉयलेट की ओर गये पर अनीस कहीं नहीं दिखा। सक्सेना जी परेशान हो गए, अब क्या करें। इतने में टी०टी०  दिख गया। उन्होंने टीटी से पूछा, मेरे सामने वाली बर्थ पर एक लड़का था, अब वहां नहीं है। कहीं आपने तो नहीं देखा?'

'हां, एक लड़का था तो, यहीं टॉयलेट के बगल में सो रहा था। मैंने सोचा कोई ऐसे ही आ गया होगा, किसी का सामान न गायब कर दे, अभी-अभी नीचे उतार दिया।' अब सक्सेना जी आनन फानन में ट्रैन से उतर कर प्लेटफार्म पर देखने लगे।  संयोग था कि वह अभी प्लेटफार्म पर ही खड़ा  मिल गया। सक्सेना जी के जान में जान आई और वे उसे पकड़ कर ले आये।

इससे पहले अनीस को बस एक बार ही ट्रैन में चढने का अवसर मिला था। अपने पिता के साथ जबलपुर गया था, तब भीड़ के कारण वे टॉयलेट के पास नीचे बैठकर ही गए थे। रात को जब अनीस की नींद खुली तो एक बार फिर से उसे अपनी किस्मत पर भरोसा नहीं रहा था। उसके दिमाग में यही घूम रहा था 'यह स्थान  मेरे लिए नहीं है, अवश्य ही कहीं मैं अपनी सीमा का उलंघन कर रहा हूँ । इससे पहले कि कोई डांटे फटकारे, मुझे यहां से हट जाना चाहिए। '

एस० डी० तिवारी 


  

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