Wednesday, 27 April 2016

Bhola man

अनामिका
भोला मन

'रिंकी, रिंकी .... !  अरे रिंकी नहीं दिख नहीं रही', कान्ता इधर से उधर छटपटा कर ढूंढने लगी। 'रिंकी के पापा! रिंकी नहीं दिख रही एक एक कमरे में देख लिया। '
सूद साहब भी उठ कर चारों और देखने लगे। एक एक कमरे में दुबारा, किसी दरवाजे पीछे तो कहीं नहीं छुपी, एक एक पर्दा हटाकर देख लिया, टॉयलेट तक खंगाल डाला, रिंकी का कहीं पता नहीं। श्रीमती सूद तुरंत घर से बाहर निकलीं और चारों और देखते हुए पड़ोसी की घंटी बजाई।
'बहन जी चिंकी आपके यहाँ तो नहीं। '
'नहीं तो, क्या हो गया ?
'वह घर में नहीं है , चाइल्ड केयर से आकर सो गयी थी। उठी तो कमरे में बैठे खेलने लगी, मैंने सोचा थोड़ा काम निबटा लूँ, तबतक पता नहीं किधर निकल गयी। '
'चलो गेट कीपर से पूछ लेते हैं, कहीं बाहर तो नहीं निकल गयीं। '
दोनों जाकर चौकीदार पूछती हैं।  चौकीदार ने बता दिया हम बच्चों को किसी भी सूरत में बाहर नहीं जाने देते।  हाँ किसी की गाड़ी में जा रहे हों तो हम कुछ नहीं कर सकते।  गाड़ी का नाम सुनकर तो श्रीमती सूद डर ही गयीं और रो पड़ीं। फिर अपार्टमेंट में रिंकी की सहेली कौन हैं यह पता किया गया।  सूचि, अनामिका, सारिका किसी के घर नहीं थी। अब श्रीमती सूद का अपहरण की आशंका विश्वास में बदलने लगा था और पुलिस को सूचना देने की तैयारी शुरू हो गयी। हाँ अभी अंकिता के यहाँ पता नहीं किया था। उसका घर पीछे की ओर था, तीन साल की बच्ची उधर अकेले तो नहीं जा सकती फिर भी पता कर लेते हैं।

जब सब लोक अंकिता के घर पहुंचे तो पता चला वह तो घर पर है नहीं। वो शर्मीला के जन्म दिन पर गयी थी। श्रीमती सूद बिलख रही थीं। अब ये हुआ कि शर्मीला के घर जाकर ही अंकिता से पूछा जाय। सब लोग वहां गये तो श्रीमती सूद की अश्रुधारा और तीव्र हो गयी, देखीं तो रिंकी शर्मीला का जन्मदिन मना रही थी। दौड़कर गोदी उठाईं -
'बेटा तुम यहाँ कैसे ?'
' नीचे खड़ी थी, अंकिता ने कहा जन्मदिन पर चलेगी! साथ आ गयी। आप जाओ अंकिता के साथ आ जाउंगी। '
'नहीं बेटा साथ चलो, देखो मां रो रही हैं। '
'और भी तो बच्चे हैं, उनकी मां तो नहीं रो रहीं। आप जाओ मैं आ जाउंगी। '
शर्मीला के मम्मी पापा ने कहा, बहन जी आप जाईये, हम रिंकी को घर पहुंचा देंगे।



'अनामिका, अनामिका  ... ' चिल्लाते हुए उसके मम्मी, पापा इस कमरे से उस कमरे, फिर घर के बाहर फिर रहे थे। कहीं से अनामिका का स्वर नहीं सुनायी दे रहा था। फिर उन्होंने अपने पास, पड़ोस, अनामिका की सहेलियों के घर जाकर, एक एक से पूछा पर अनामिका कहीं पता नहीं चला।  ढूंढते ढूंढते उन्हें एक घंटा से भी अधिक बीत गया, अनामिका का कहीं पता नहीं चल रहा था।  अब तो मन में तरह तरह की आशंका होने लगी, कहीं कोई अपहरण कर लिया या घर से कहीं बाहर निकली और रास्ता भूल  गयी। अभी दो महीने पहले ही उसका प्ले स्कूल में नाम लिखवाया था, वहां गए तो स्कूल बंद मिला। मुख्याध्यापिका को फ़ोन करके स्कूल खुलवाया गया, वहां भी नहीं मिली। 

श्रीमती भारद्वाज  का रो रो कर बुरा हाल था। बहुत इलाज कराकर और देवी देवताओं से मन्नतें मांग कर उन्हें अनामिका मिली थी। पास पड़ोस जुट चुका था, सभी उन्हें दिलासा दिला रहे थे। अब पुलिस में गुमशुदगी की रिपोर्ट लिखवाने की तैयारी हो रही थी। तभी अनामिका के जोर जोर से चिल्लाने की आवाज सुनायी दी। वह अकस्मात् हो रहे हो हल्ला सुनकर जाग गयी और बुरी तरह डर गयी। दरअसल, उसे न जाने क्या सूझी, पलंग के नीचे जाकर लेट गयी। उनके उस कमरे में प्रकाश कम था, उसे वहां गर्मी से कुछ राहत की अनुभूति हुई और गहरी निद्रा में सो गयी। भारद्वाज जी और उनकी पत्नी इधर उधर ढूंढते रहे, पलंग के नीचे होने का तनिक भी अंदाज़ा नहीं था और नीचे झांक कर नहीं देखा। 

खैर, पति पत्नी की जान में जान आई और पड़ोस अपनी एक जुटता दिखाकर, ठहाके मारते बिखर कर, अपने अपने घर।   


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