कन्यादान
स्वाती बहुत ही सुशील और शालीन लड़की थी। वह अपने घर परिवार का बहुत ख्याल रखती और अपनी माँ की हर संभव मदद करती। स्वाती के ग्रेजुएशन पूरा होते ही माँ ने सोचा, उसके हाथ पीले कर जिम्मेदारी से मुक्त हो जांय। आयुष में तो अभी समय है, पढ़ लिख कर अपने पैरों पर खड़ा हो जायगा तब देखेंगे। मगर स्वाती अभी विवाह नहीं करना चाहती थी। उसके मन में था कि और पढ़ लिखकर, माँ की कुछ मदद करे, तब तक आयुष भी थोड़ा और बड़ा हो जायेगा तथा घर का कार्य भार पूरी तरह से सम्भाल लेगा। वह एम.ए. करके लेक्चरर बनना चाहती थी। अगर एम. ए. ना करे तो बी. एड. ही कर ले, कम से कम शिक्षिका तो बन जाएगी।पढ़ाई लिखाई के बिना पूरे जीवन भर दूसरों पर निर्भर रहो। माँ का ही देखो, पापा की मृत्यु के साथ, उसके सारे सपने भी मर चुके हैं। जो बीमा के पैसे मिले उसे ही सम्हाले हुए है, अगर ऊपर वाले दो कमरे किराये पर नहीं दिये होते तो ये हमें कैसे पाली होती। इसी घटना से हम लड़कियों की आंख खुल जानी चाहिए।
स्वाती के पिता के स्वर्गवास के कई वर्ष बीत चुके थे। उसकी मम्मी उसके व्याह को लेकर बहुत चिंतित रहती थी। देवर, देवरानी पहले ही अलग हो चुके थे, उनसे कोई खास मदद मिलने की उम्मीद कम ही थी। आजकल सभी अपने अपने में ही व्यस्त हैं। हाँ स्वाती के मामा, धन से तो नहीं, परन्तु तन मन से अवश्य डटे रहेंगे। एक दिन केसरी ने स्वाती से बोला, 'बेटा सोच रही हूँ, तेरा विवाह कर दूँ।'
'पर इतनी जल्दी क्या है, माँ। मैं अभी और पढ़ना चाहती हूँ।'
'तेरे मामा एक बार कोई लड़का बता रहे थे। कह रहे थे, लड़का बहुत योग्य है, वह इंजीनियर है और परिवार भी जान पहचान का है। फिर दुबारा ऐसा रिश्ता जाने कब मिले। तेरे मामा, तेरे विवाह की चर्चा करने, आज यहाँ आने वाले हैं।'
'क्या मम्मी! मैं तो सीधे मना कर दूंगी। मेरे भविष्य की किसी नहीं बस विवाह की पड़ी है।'
जगदीश ने, लड़के का जो व्यौरा केसर को दिया था, उसके हिसाब से उसे भी जँच रहा था। वह चाहती थी, स्वाती के पापा के मरने पर बीमा आदि का जो पैसा जमा कर रखा है, उससे वह स्वाती के विवाह के बोझ से निपट ले। धीरे धीरे मंहगाई बढाती जा रही है और पैसे का मूल्य कम होता जा रहा है। फिर, चिंटू की पढ़ाई का रह जायेगा, वो भी धीरे धीरे किसी तरह हो जायेगा। ये पैसे कहीं अन्यत्र खर्च हो गए तो फिर विवाह में परेशानी उठानी पड़ेगी। अभी तो जगदीश ने लड़का भी देख रखा रखा है, आगे विवाह की इतनी बड़ी जिम्मेदारी, फिर कौन लेगा!
'पर इतनी जल्दी क्या है, माँ। मैं अभी और पढ़ना चाहती हूँ।'
'तेरे मामा एक बार कोई लड़का बता रहे थे। कह रहे थे, लड़का बहुत योग्य है, वह इंजीनियर है और परिवार भी जान पहचान का है। फिर दुबारा ऐसा रिश्ता जाने कब मिले। तेरे मामा, तेरे विवाह की चर्चा करने, आज यहाँ आने वाले हैं।'
'क्या मम्मी! मैं तो सीधे मना कर दूंगी। मेरे भविष्य की किसी नहीं बस विवाह की पड़ी है।'
जगदीश ने, लड़के का जो व्यौरा केसर को दिया था, उसके हिसाब से उसे भी जँच रहा था। वह चाहती थी, स्वाती के पापा के मरने पर बीमा आदि का जो पैसा जमा कर रखा है, उससे वह स्वाती के विवाह के बोझ से निपट ले। धीरे धीरे मंहगाई बढाती जा रही है और पैसे का मूल्य कम होता जा रहा है। फिर, चिंटू की पढ़ाई का रह जायेगा, वो भी धीरे धीरे किसी तरह हो जायेगा। ये पैसे कहीं अन्यत्र खर्च हो गए तो फिर विवाह में परेशानी उठानी पड़ेगी। अभी तो जगदीश ने लड़का भी देख रखा रखा है, आगे विवाह की इतनी बड़ी जिम्मेदारी, फिर कौन लेगा!
इन्हीं सब सोच विचार के बीच जगदीश भी आ गया।
'स्वाती देख मामा आ गया, झटपट चाय बना ला।'
स्वाती जैसे चाय लेकर आयी और जगदीश के पैर छुई, वह बोल पड़ा, 'स्वाती! तुझे इस घर से भगाने का रास्ता बना रहा हूँ।'
'लेकिन मैं इस घर से कहीं नहीं जाने वाली। मामा! अभी मुझे पढ़ना है, मैं माँ की मदद करना चाहती हूँ।'
'तू विवाह कर लेगी, ये भी तो उसकी मदद ही होगी। वरना तेरे विवाह की सोच का बोझ ही ढोती रहेगी। और पढ़ाई तो शादी के बाद भी कर लेगी। कितनी लड़कियां विवाह के बाद पढ़ लिख कर अच्छे अच्छे पद पर हैं। वो लोग बहुत अच्छे हैं, तेरी पढ़ाई में पूरा सहयोग देंगे।'
'स्वाती देख मामा आ गया, झटपट चाय बना ला।'
स्वाती जैसे चाय लेकर आयी और जगदीश के पैर छुई, वह बोल पड़ा, 'स्वाती! तुझे इस घर से भगाने का रास्ता बना रहा हूँ।'
'लेकिन मैं इस घर से कहीं नहीं जाने वाली। मामा! अभी मुझे पढ़ना है, मैं माँ की मदद करना चाहती हूँ।'
'तू विवाह कर लेगी, ये भी तो उसकी मदद ही होगी। वरना तेरे विवाह की सोच का बोझ ही ढोती रहेगी। और पढ़ाई तो शादी के बाद भी कर लेगी। कितनी लड़कियां विवाह के बाद पढ़ लिख कर अच्छे अच्छे पद पर हैं। वो लोग बहुत अच्छे हैं, तेरी पढ़ाई में पूरा सहयोग देंगे।'
केसर ने भी उसे समझाया, 'हां बेटा, मामा ठीक ही तो कह रहा है, तू ससुराल जाकर भी तो पढ़ सकती है।' स्वाती के मन में भविष्य को लेकर बहुत सी आशंकाएं थीं। शादी के बाद, अचानक ही एक अंजान दुनिया में धकेल दिया जायेगा। ससुराल में उसके साथ कैसा वर्ताव होगा? कन्यादान क्यों होता है? क्या कन्या कोई दान की वस्तु है? कन्या का पिता इतने बारातियों के खिलाने-पिलाने का खर्च क्यों उठाता है? ऊपर से दान दहेज़ का भी खर्च। क्या कन्या को जन्म देकर, माँ बाप कोई अपराध करते हैं? कन्या ही वर के घर क्यों जाती है ? इत्यादि इत्यादि।
कई बार, वह ये प्रश्न मां से पूछती और मां मात्र दो शब्दों में सभी प्रश्नों का उत्तर दे देती - 'समाज' और 'परंपरा' ।
'क्या माँ ! एक ओर तो समाज नारी के समान अधिकार की बात करता है, और दूसरी ओर, उस नारी को किसी पुरुष को दान में दे दिया जाता है। ये परंपरा जब थी तब थी अब तो समय बहुत बदल गया है। लड़कियां हर क्षेत्र में लड़कों के कन्धा से कन्धा मिलाकर चल रही हैं।'
'क्या माँ ! एक ओर तो समाज नारी के समान अधिकार की बात करता है, और दूसरी ओर, उस नारी को किसी पुरुष को दान में दे दिया जाता है। ये परंपरा जब थी तब थी अब तो समय बहुत बदल गया है। लड़कियां हर क्षेत्र में लड़कों के कन्धा से कन्धा मिलाकर चल रही हैं।'
जगदीश और केसर के समझाने बुझाने पर स्वाती विवाह के लिए तैयार हो गयी। सभी तैयारियां पूरी हो गयीं। अब विवाह के कुछ दिन ही रह गए थे, विवाह के रस्म रिवाज प्रारम्भ हो चुके थे। इसी बीच प्रश्न आया कि कन्यादान कौन करेगा?
कुछ लोग कहने लगे चाचा तो हैं ही, कुछ लोग बोले मामा भी कर सकते हैं। यह सब मंथन चल रहा ही था कि स्वाती के कानों तक यह खबर पहुंची। वह अपनी मां के पास गयी और पूछी, 'मां कन्यादान कौन कर कर रहा है?'
मां ने उत्तर दिया, 'देखते हैं ! तेरे चाचा कर देंगे। '
'पर तुम क्यों नहीं? मां !' स्वाती ने एक और प्रश्न रख दिया। और फिर वही उत्तर 'समाज और परंपरा'।
स्वाती बोली, 'मां! मैं क्या तुम्हारी बेटी नहीं हूँ ?'
'क्यों नहीं, बेटी! यह क्यों कह रही है!`
'तो फिर कन्यादान का तो तुम्हारा ही अधिकार होना चाहिए न। एक तो मैं कोई दान की वास्तु नहीं और जिसने मुझे जन्म ही नहीं दिया वह मेरा दान कैसे कर देगा? नहीं मां! तुम्हीं मेरा कन्यादान करोगी।' स्वाती ने जोर देकर कहा।
माँ ने एक बार फिर समझाया, 'नहीं बेटी, सामाजिक संबंधों का भी अपना महत्त्व है। तू उनकी जन्मायी नहीं तो क्या, वे तेरे पिता के सगे भाई हैं। चाचा भी तो पिता के ही समान होता है।'
'रहने दे माँ, ये सब कहने की बातें हैं। क्या वे जितना अपने बच्चों से प्यार करते हैं और उनकी देखभाल करते हैं, हमारी भी करते हैं! हाँ, धौंस ज़माने के लिए पूरा अधिकार जताते हैं।'
माँ ने एक बार फिर समझाया, 'नहीं बेटी, सामाजिक संबंधों का भी अपना महत्त्व है। तू उनकी जन्मायी नहीं तो क्या, वे तेरे पिता के सगे भाई हैं। चाचा भी तो पिता के ही समान होता है।'
'रहने दे माँ, ये सब कहने की बातें हैं। क्या वे जितना अपने बच्चों से प्यार करते हैं और उनकी देखभाल करते हैं, हमारी भी करते हैं! हाँ, धौंस ज़माने के लिए पूरा अधिकार जताते हैं।'
यह बात, सम्बन्धियों और मित्रों में चर्चा का विषय बन गयी। सबने स्वाती को बहुत समझाया बुझाया, मगर वह अपनी बात पर अड़ गयी। इसी बीच स्वाती के मामा आ गए। उन्होंने भी स्वाती को समझाया, 'बेटी पिता ही कन्यादान करता है, यही हमारी परंपरा है। और यदि पिता नहीं हो तो घर का कोई बड़ा, जैसे चाचा, ताऊ, मामा, दादा आदि।'
'मगर मामा, परम्पराएं समय के साथ बदलती भी तो हैं। हमारे यहाँ तो औचित्य और सुविधा के अनुसार कितनी ही परम्पराएं बदल चुकी हैं। यहाँ कोई फतवा का डर तो है नहीं! अब नारी पुरुष से कहीं भी कम नहीं है। पहले समाज उसे दबाकर रखता था और उन्हें उनके अधिकारों से वंचित रखता था। परन्तु अब वो बात नहीं है। स्त्रियां अपने अधिकार को जानती हैं। अब तक माता पिता के देहांत पर केवल पुत्र ही दाह संस्कार करता चला आ रहा था; पर पता है, पुत्र नहीं होने की दशा में कई बहादुर लड़कियां भी दाह संस्कार कर रही हैं। अब लड़कियां भी साहसी और निडर हैं, तथा समय के साथ चलना जानती हैं।'
मामा बोले, 'हम तो समझा ही सकते हैं बेटी, मानना न मानना तू जाने।'
विवाह का दिन आ गया, बारात आयी, द्वारपूजा व जयमाल का कार्यक्रम विधि पूर्वक संपन्न हुआ। अब फेरों का समय आ गया था। विवाह मंडप में दूल्हा, दुल्हन, पंडित जी और सगे सम्बन्धी विराजमान थे। पंडित जी ने पूछा, 'कन्यादान कौन करेगा?' जब स्वाती की मां कन्यादान की रस्म पूरी करने सामने आई तो सभी अचंभित हो उसे देखने लगे। हतप्रभ हुए पंडित जी ने यह कहकर विरोध किया कि यह परंपरा के अनुकूल नहीं है, कोई स्त्री कन्यादान नहीं करती। हां, पिता नहीं तो चाचा, मामा आदि में से कोई भी कन्यादान कर सकता हैं, क्योंकि वे भी पिता तुल्य हैं, स्त्री उसकी सहभागिनी हो सकतीं है।
स्वाती ने पंडित पर भी अपने प्रश्न बाण छोड़ दिए -
'मगर मामा, परम्पराएं समय के साथ बदलती भी तो हैं। हमारे यहाँ तो औचित्य और सुविधा के अनुसार कितनी ही परम्पराएं बदल चुकी हैं। यहाँ कोई फतवा का डर तो है नहीं! अब नारी पुरुष से कहीं भी कम नहीं है। पहले समाज उसे दबाकर रखता था और उन्हें उनके अधिकारों से वंचित रखता था। परन्तु अब वो बात नहीं है। स्त्रियां अपने अधिकार को जानती हैं। अब तक माता पिता के देहांत पर केवल पुत्र ही दाह संस्कार करता चला आ रहा था; पर पता है, पुत्र नहीं होने की दशा में कई बहादुर लड़कियां भी दाह संस्कार कर रही हैं। अब लड़कियां भी साहसी और निडर हैं, तथा समय के साथ चलना जानती हैं।'
मामा बोले, 'हम तो समझा ही सकते हैं बेटी, मानना न मानना तू जाने।'
विवाह का दिन आ गया, बारात आयी, द्वारपूजा व जयमाल का कार्यक्रम विधि पूर्वक संपन्न हुआ। अब फेरों का समय आ गया था। विवाह मंडप में दूल्हा, दुल्हन, पंडित जी और सगे सम्बन्धी विराजमान थे। पंडित जी ने पूछा, 'कन्यादान कौन करेगा?' जब स्वाती की मां कन्यादान की रस्म पूरी करने सामने आई तो सभी अचंभित हो उसे देखने लगे। हतप्रभ हुए पंडित जी ने यह कहकर विरोध किया कि यह परंपरा के अनुकूल नहीं है, कोई स्त्री कन्यादान नहीं करती। हां, पिता नहीं तो चाचा, मामा आदि में से कोई भी कन्यादान कर सकता हैं, क्योंकि वे भी पिता तुल्य हैं, स्त्री उसकी सहभागिनी हो सकतीं है।
स्वाती ने पंडित पर भी अपने प्रश्न बाण छोड़ दिए -
'पंडित जी! मैं क्या कोई दान की वस्तु हूँ? विवाह तो सम्बन्धों का बंधन है, न! यह मान भी लें कि रीति रिवाज के अनुसार यदि कन्यादान होना ही है, तो मैं अपने मां बाप दोनों की ही संतान हूँ; अब पिता जी को तो लाने से रहे, फिर मां को इस अधिकार से कैसे वंचित कर सकते हैं? अब तो मैं केवल अपनी मां की ही बेटी हूं, न ! जिसकी माँ नहीं होती पिता बिना गठबंधन के अकेले कन्यादान कर सकता है! और आज मेरे पिता नहीं तो माँ क्यों नहीं कर सकती?'
पंडित जी के पास भी वही रटा रटाया उत्तर था, शदियों से ऐसी परंपरा चली आ रही है। फिर भी स्वाती को समझाने का प्रयास किया, जिस प्रकार पार्वती जी को सिंदूर पहनाने हेतु किसी स्त्री को ही ढूंढा जाता है और हनुमान जी को वस्त्र आदि पहनाने के लिए किसी पुरुष की आवश्यकता होती है, उसी प्रकार कन्यादान के लिए माता पिता दोनों का होना अच्छा है। दोनों में से कोई एक अथवा दोनों न हों तो सगा संबंधी जो उस पद के समकक्ष हो, कन्यादानकर सकता है।
'किन्तु पंडित जी! यदि माँ नहीं होती है तो उसका विकल्प तो नहीं ढूंढा जाता।'
पंडित जी बुद्धिमान व्यक्ति थे, वे कई बार यजमान के मन की इच्छा को भांप कर कोई बीच का रास्ता निकाल लेते थे। वे समझ चुके थे कि इस बहस में पड़ने से काम ख़राब ही होगा। उन्होंने तुरंत बोला, 'कोई बात नहीं, जैसा कन्या चाहती है, वही होगा। मां को ही कन्यादान करने दो, चाचा या मामा में से कोई इस कार्य में सहयोग देने के लिए, उसके साथ में रहें।
और मुस्कराते हुए विवाह करा दिया।
'किन्तु पंडित जी! यदि माँ नहीं होती है तो उसका विकल्प तो नहीं ढूंढा जाता।'
पंडित जी बुद्धिमान व्यक्ति थे, वे कई बार यजमान के मन की इच्छा को भांप कर कोई बीच का रास्ता निकाल लेते थे। वे समझ चुके थे कि इस बहस में पड़ने से काम ख़राब ही होगा। उन्होंने तुरंत बोला, 'कोई बात नहीं, जैसा कन्या चाहती है, वही होगा। मां को ही कन्यादान करने दो, चाचा या मामा में से कोई इस कार्य में सहयोग देने के लिए, उसके साथ में रहें।
और मुस्कराते हुए विवाह करा दिया।
एस० डी० तिवारी
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