हेर फेर
आशीष, पिंकी और उनकी मम्मी, दिवाली में मिले गिफ्ट के पैकेट खोल खोल कर बड़े खुश हो रहे थे। मम्मी ये देखो पड़ोस वाली ऑन्टी का, ये जो पांच नंबर गली में रहती हैं, ये तैतीस बी वाली का इत्यादि। किसी में चॉकलेट, किसी में मिठाई, किसी में बिस्कुट, किसी में सजावट का सामान तो किसी में क्राकरी।
'मम्मी ये देखो बेड-शीट' पिंकी बोली।
'हाँ अच्छा है, इसे अपने लिए रख लेते हैं। बाकी सब चीजें तो घर में हैं ही, इनमे से कुछ आगे बढ़ा देंगे। सबका नाम का कार्ड हटा देना नहीं तो पता चल जायेगा, किसी और का दिया बढ़ाया है।' यह सब चल ही रहा था कि श्रीमती कौशिक एक पैकेट लिए घर में दाखिल हुईं।'आईये बहन जी! और कैसी रही दिवाली ? अरे, पिंकी ट्रे में मिठाई रखी है ले आ, कौशिक ऑन्टी आई हैं, और वहीँ ड्राई फ्रूट भी रखा होगा। ये हाथ में पैकेट कैसा? अभी कहीं देना रह गया है, क्या ?' पिंकी की मम्मी ने पूछा।
'बहन जी, क्या गलती हो गयी? हमने तो अपनी तरफ से अच्छा समझ के ही दिया था। अपनी सामर्थ्य के अनुसार ही तो कोई देगा न। नहीं पसंद था, तो भी रख ली होतीं। यह कौशिक साहब खास आपके लिए खरीद कर लाये थे। पहले पता होता कि आपको पसंद नहीं आएगा तो कुछ और ले लिए होते।'
श्रीमती राणा को कुछ समझ नहीं आ रहा था, श्रीमती कौशिक क्या कह रही हैं। 'अरे बहन जी! क्या हुआ, मिठाई तो खाईये। और दिवाली कैसी रही? 'श्रीमती कौशिक बोलीं, 'नाराज न होइए, इसको रख लीजिए। इसके अलावा कुछ और भी ले आयेंगे। कोई पसंद की चीज हो बता दीजिये।' अब श्रीमती राणा को मामला, कुछ कुछ स्पष्ट होने लगा था। दरअसल दिवाली पर मिले गिफ्ट को उन पर लगे कार्ड हटा हटा, इनके यहाँ का उनके यहाँ आगे बढ़ायी थीं । कौशिक जी के यहाँ से जो सामान आया था उस पर उन्होंने कार्ड कही भीतर की और लगाया था जो श्रीमती राणा को दिखा नहीं और यह याद भी नहीं रहा कि यह गिफ्ट किसके यहाँ से आया था। उन्हीं का दिया गिफ्ट वापस उनके यहाँ पहुँच गया। श्रीमती राणा ने खुद को बहुत शर्मिंदा महसूस किया। और उनको सफाई देनी बड़ी। श्रीमती कौशिक ने भी बात को अधिक तूल नहीं दी।
एस० डी० तिवारी
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