दहेज़ में शौचालय
विवाह के अब चार दिन ही बचे हैं। मेहमान आने लगे हैं, घर में गीत गाना शुरू हो चुका है। सब लोग शादी की तैयारी में जुटे है, मगर बिरजू शौचालय बनवाने में लगा है। दुखंती बार बार कोसता है, मोबाइल क्या हो गया कि शादी से पहले ही लडके-लड़की दिन रात उसी पर लगे रहते हैं। मैंने इसे मना किया था ज्यादा मत बात कर, आखिर वो घर ही तो आएगी। पर ये साहब हैं कि क्यों मानते! बनवाओ अब, सब लोग बारात की तैयारी में लगे हैं, इनके अभी कपडे तक बने नहीं और ये शौचालय बनवा रहे हैं।
बिरजू पलट कर बोलता है, 'बस पापा शादी से पहले तैयार हो जायेगा। और आप भी तो इसी में जाओगे न। '
दुखंती ने बिरजू की शादी में फुलवा के पापा से कुछ नकद के अलावा मोटर साइकिल की मांग रख दी थी। फुलवा को जब दहेज़ की बात का पता चला तो अपने पापा से पूछ लिया, उनके घर में शौचालय है कि नहीं? जब उत्तर नहीं में मिला तो उसने स्पष्ट कह दिया, पापा किस मुंह से वे दहेज़ मांग रहे हैं, उनके यहाँ शौचालय तक नहीं है। फुलवा के पापा ने उसकी बात अनसुनी कर दी। वे ज्यादा झंझट मोल लेना नहीं चाहते थे , सोचते थे कि ज्यादा पंगा लिया तो ससुराल वाले फुलवा के साथ न जाने कैसा बर्ताव करेंगे। फुलवा की शादी पक्की हो गयी और सगाई भी हो गयी। सगाई के बाद एक दिन अचानक बिरजू का फ़ोन आ गया। फुलवा की ख़ुशी का तो ठिकाना नहीं रहा। उसकी बात चीत पर फुलवा मोह गयी। फिर तो उनका बातचीत का सिलसिला चलता रहा। बातचीत से फुलवा ने निष्कर्ष निकल लिया था कि उसके पापा ने गलत निर्णय नहीं लिया है। एक दिन फुलवा ने बिरजू की मनोदशा भांप कर उससे कह दिया - 'सुना है कि आपके घर में शौचालय नहीं है, मुझे बाहर जाने की आदत नहीं है, एक शौचालय तो बनवा लो। '
'पर पापा इसके लिए पैसे कहां देंगे, मैंने भी अपनी कमाई घर में ही दे दी है। ' बिरजू बोला।
'तो मैं पापा से कह देती हूँ मोटर साइकिल के बदले शौचालय बनवाने के पैसे दे दें। वैसे भी मोटर साइकिल पर तो हम्हीं दोनों बैठेंगे और शौचालय पूरे परिवार के काम आएगा। तुम कमा कर पैसे जोड़ लेना तो मोटर साइकिल खरीद लेना। '
फिर तो बिरजू शौचालय के लिए रकम जुटाने में लग गया।
एस० डी० तिवारी
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