वीसा नहीं मिला
उत्तर मिला, 'पहले कंपनी को तीस लोगों की जरूरत थी, बाद में उसने यह संख्या घटाकर आठ कर दी, तुम्हारा वीसा रिजेक्ट हो गया है। '
अब तो अमन के पैरों तले से जमीन खिसक गयी। वह फोन पर चिल्लाने लगा, 'तो हमारे पैसे वापस कर दो। '
'वो तो हमारी फीस आदि के थे। इसमें हमारी क्या गलती है। हमने तुम्हारे फॉर्म वगैरह में कोई कमी थोड़े ही छोड़ी है। वीसा तो दूतावास को देना था, जितने लोगों का कंपनी ने लिख के दिया, मिल गया। तुम्हारा रिजेक्ट कर दिया तो हम क्या करें।'
यह दो टूक जबाब सुनकर अमन के पास आंसू बहाने के सिवा कोई चारा नहीं था।
निजी कारखाने में काम करके अमन को जो वेतन मिलता, महंगाई के ज़माने में बड़ी मुश्किल से गुजर हो पाता। भारत में इतने श्रम कानून होने के बावजूद भी, असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों के शोषण से सभी परिचित हैं। अमन भी कारखाने की कार्यदशा से संतुष्ट नहीं था। उससे निर्धारित सीमा से अधिक समय तक काम लिया जाता और पूरा वेतन भी नहीं दिया जाता। और तो और अधिक राशि पर हस्ताक्षर करवा के उसे कम पैसा दिया जाता था ।उसके मन में कई बार हुआ कि वह शिकायत करे पर यह भी आशंका बनी हुई थी कि इन उद्योगपतियों का कुछ बिगड़ेगा नहीं, और नौकरी चली जाएगी। दुबारा इतनी आसानी से नौकरी कहाँ मिलेगी।
एक दिन मध्यावकाश के समय अमन कैंटीन में खाना खा रहा था, उसी की मेज पर उसक सहकर्मी विनोद भी बैठा था. विनोद ने पूछा, 'और अमन, कैसा चल रहा है?'
'सब ठीक है।'
'और आजकल ओवरटाइम भी कर रहा है ?'
'काम तो अधिक समय तक करते ही हैं, पर उसका फालतू पैसा कहां मिलता है!'
'हां यार, ये सेठ लोग खुद खा खाकर मोटे हो जाते हैं और काम करने वालों को पूरा पैसा भी नहीं देते। तुझे पता है? एक कंपनी विदेश भेजने के लिये कर्मचारियों की भर्ती कर रही है। मेरठ में एक एजेंसी है, उसी के द्वारा सब काम हो रहा है। चलते हैं हम भी कोशिश करते हैं। विदेश में एकाध साल काम कर लेंगे तो हाथ में कुछ पैसा हो जायेगा, फिर आकर ऐश करेंगे, यहाँ की पगार में तो दाल रोटी चल जाय, वही बहुत है।'
अमन को सहकर्मी की बात अच्छी तो लगी पर उसे अपनी किस्मत पर भरोसा नहीं था। वह बोला, 'अपनी, इतनी कहाँ किस्मत है कि विदेश जाएं। वहां जाने में भी तो खर्च होगा, वो कहां से आएगा।'
'अरे खर्च तो बस उस एजेंट की फीस और वीसा का ही होगा, बाकी किराया वगैरह तो कंपनी ही देगी। चल पता तो करते हैं। '
अमन के मन में विदेश जाने जिज्ञासा जग गयी । एक दिन अमन और विनोद उक्त एजेंट के यहाँ गए। वहां पर विदेश जाने के इच्छुक लोगों की काफी भीड़ लगी थी। बातचीत हुई, एजेंट ने बताया कि हां कोरिया में एक प्रोजेक्ट के लिए कुछ मजदूरों की आवश्यकता है। उसके लिए सारी व्यवस्था वही करवा रहा है। यह काम करवाने के लिए पांच हजार वीसा शुल्क, दस हजार मेडिकल के और पंद्रह हजार एजेंट की फीस, लगेगी। जाने का किराया और वहां रहने आदि का खर्च कंपनी देगी।
बात तो कुछ जमी, पर अमन के पास तीस हजार रुपये का जुगाड़ नहीं था। खाने पीने से जो बचा पाता, वह गांव अपने पिता के पास भेज देता। उसके माता पिता और छोटा भाई उसी पर आश्रित थे। खेत का एक छोटा सा टुकड़ा था, उससे थोड़ा बहुत अनाज हो जाता था। घर की परिस्थिति सोचकर, वह इस काम में पैसा नहीं खर्च करना चाहता था और साथ यह भी सोचता कि इस प्रकार का अवसर बार बार कहाँ मिलेगा। आखिरकार, उसने घर फोन करके अपने पिता जी को बताया और तीस हजार की मांग कर दी।
कुबेर के पास भी इतनी राशि कहां से होती। खेती बारी से जो कमाया था और अमन का भेजा हुआ पैसा, सब जोड़ जाड कर, पिछली साल ही बेटी की शादी की थी। बल्कि अभी सिर पर कुछ पैसा उधार भी था।
कुबेर ने अमन को बता दिया, 'इतने पैसे कहाँ से लाएं, अभी पहले का उधार ही नहीं चुकता हुआ।'
'पापा एक बार विदेश चला जाऊंगा तो एक महीने की कमाई में ये सारा उधार चुक जायेगा। बस आप रुपयों का इंतजाम करवा दो।'
उसके बहुत आग्रह पर कुबेर ने मांग मुंग कर पैसे का प्रबंध तो कर दिया, पर वह आशंक भी था। कुबेर ने विदेश भेजने के नाम पर धोखा धड़ी के किस्से भी सुन रखे थे। कुछ समय पहले ही अख़बार में छपे इस समाचार का हवाला भी दिया -
'एक एजेंसी अरब ले जाने के नाम पर सैकड़ों लोगों से पैसे ऐंठे। विश्वास ज़माने के लिए कई औपचारिकताएं पूरा करवाकर उन्हें सऊदी अरब जाने के लिए पासपोर्ट के साथ मुम्बई बुलाया गया। पानी के जहाज में यह कहकर कि सऊदी अरब जा रहा है बिठा दिया गया। अगले दिन उन सबको देश के ही एक अनजान बंदरगाह पर उतार दिया गया। सब के सब ठगे गए। '
कुबेर ने यह कहानी बताकर उसे रोकने का प्रयत्न किया। पर अमन ने इसके विपरीत, विदेश में अधिक कमाई की कहानियां सुन रखी थीं। उसे लग रहा था कि एक बार विदेश चला गया तो थोड़ा कम खा पीकर, पैसे बचा लाएगा। वहां उसका खाना पीना कौन देखेगा। खैर, एजेंट को पैसा दिया गया। एजेंट ने उनका पासपोर्ट जमा करवा लिया, उनसे वीसा फॉर्म भरवाकर हस्ताक्षर करवाया, मेडिकल करवाया और सूचित करने के लिए बोल दिया। एजेंट से मिलने के बाद अमन विदेश जाने के लिए आस्वस्त हो गया था। यह सोच कर कि विदेश जाना है, फिर काफी समय बाद लौटेगा, अतः कुछ समय गांव में बिता ले, अमन नौकरी छोड़ कर गांव चला गया।
गांव जाकर, अमन एजेंट की सूचना की प्रतीक्षा करने लगा। महीना बीता, दो महीने बीते, अभी तक कोई सूचना नहीं। अमन एजेंट के नंबर पर फोन करता तो कोई उत्तर ही नहीं मिलता। कई दिनों तक प्रयास करने के बाद एक बार एजेंट ने फ़ोन उठा लिया। अमन खुश हुआ, चलो फ़ोन तो उठाया। बोला, 'मैं अमन बोल रहा हूँ, हमारे वीसा का क्या हुआ ?''सब ठीक है।'
'और आजकल ओवरटाइम भी कर रहा है ?'
'काम तो अधिक समय तक करते ही हैं, पर उसका फालतू पैसा कहां मिलता है!'
'हां यार, ये सेठ लोग खुद खा खाकर मोटे हो जाते हैं और काम करने वालों को पूरा पैसा भी नहीं देते। तुझे पता है? एक कंपनी विदेश भेजने के लिये कर्मचारियों की भर्ती कर रही है। मेरठ में एक एजेंसी है, उसी के द्वारा सब काम हो रहा है। चलते हैं हम भी कोशिश करते हैं। विदेश में एकाध साल काम कर लेंगे तो हाथ में कुछ पैसा हो जायेगा, फिर आकर ऐश करेंगे, यहाँ की पगार में तो दाल रोटी चल जाय, वही बहुत है।'
अमन को सहकर्मी की बात अच्छी तो लगी पर उसे अपनी किस्मत पर भरोसा नहीं था। वह बोला, 'अपनी, इतनी कहाँ किस्मत है कि विदेश जाएं। वहां जाने में भी तो खर्च होगा, वो कहां से आएगा।'
'अरे खर्च तो बस उस एजेंट की फीस और वीसा का ही होगा, बाकी किराया वगैरह तो कंपनी ही देगी। चल पता तो करते हैं। '
अमन के मन में विदेश जाने जिज्ञासा जग गयी । एक दिन अमन और विनोद उक्त एजेंट के यहाँ गए। वहां पर विदेश जाने के इच्छुक लोगों की काफी भीड़ लगी थी। बातचीत हुई, एजेंट ने बताया कि हां कोरिया में एक प्रोजेक्ट के लिए कुछ मजदूरों की आवश्यकता है। उसके लिए सारी व्यवस्था वही करवा रहा है। यह काम करवाने के लिए पांच हजार वीसा शुल्क, दस हजार मेडिकल के और पंद्रह हजार एजेंट की फीस, लगेगी। जाने का किराया और वहां रहने आदि का खर्च कंपनी देगी।
बात तो कुछ जमी, पर अमन के पास तीस हजार रुपये का जुगाड़ नहीं था। खाने पीने से जो बचा पाता, वह गांव अपने पिता के पास भेज देता। उसके माता पिता और छोटा भाई उसी पर आश्रित थे। खेत का एक छोटा सा टुकड़ा था, उससे थोड़ा बहुत अनाज हो जाता था। घर की परिस्थिति सोचकर, वह इस काम में पैसा नहीं खर्च करना चाहता था और साथ यह भी सोचता कि इस प्रकार का अवसर बार बार कहाँ मिलेगा। आखिरकार, उसने घर फोन करके अपने पिता जी को बताया और तीस हजार की मांग कर दी।
कुबेर के पास भी इतनी राशि कहां से होती। खेती बारी से जो कमाया था और अमन का भेजा हुआ पैसा, सब जोड़ जाड कर, पिछली साल ही बेटी की शादी की थी। बल्कि अभी सिर पर कुछ पैसा उधार भी था।
कुबेर ने अमन को बता दिया, 'इतने पैसे कहाँ से लाएं, अभी पहले का उधार ही नहीं चुकता हुआ।'
'पापा एक बार विदेश चला जाऊंगा तो एक महीने की कमाई में ये सारा उधार चुक जायेगा। बस आप रुपयों का इंतजाम करवा दो।'
उसके बहुत आग्रह पर कुबेर ने मांग मुंग कर पैसे का प्रबंध तो कर दिया, पर वह आशंक भी था। कुबेर ने विदेश भेजने के नाम पर धोखा धड़ी के किस्से भी सुन रखे थे। कुछ समय पहले ही अख़बार में छपे इस समाचार का हवाला भी दिया -
'एक एजेंसी अरब ले जाने के नाम पर सैकड़ों लोगों से पैसे ऐंठे। विश्वास ज़माने के लिए कई औपचारिकताएं पूरा करवाकर उन्हें सऊदी अरब जाने के लिए पासपोर्ट के साथ मुम्बई बुलाया गया। पानी के जहाज में यह कहकर कि सऊदी अरब जा रहा है बिठा दिया गया। अगले दिन उन सबको देश के ही एक अनजान बंदरगाह पर उतार दिया गया। सब के सब ठगे गए। '
कुबेर ने यह कहानी बताकर उसे रोकने का प्रयत्न किया। पर अमन ने इसके विपरीत, विदेश में अधिक कमाई की कहानियां सुन रखी थीं। उसे लग रहा था कि एक बार विदेश चला गया तो थोड़ा कम खा पीकर, पैसे बचा लाएगा। वहां उसका खाना पीना कौन देखेगा। खैर, एजेंट को पैसा दिया गया। एजेंट ने उनका पासपोर्ट जमा करवा लिया, उनसे वीसा फॉर्म भरवाकर हस्ताक्षर करवाया, मेडिकल करवाया और सूचित करने के लिए बोल दिया। एजेंट से मिलने के बाद अमन विदेश जाने के लिए आस्वस्त हो गया था। यह सोच कर कि विदेश जाना है, फिर काफी समय बाद लौटेगा, अतः कुछ समय गांव में बिता ले, अमन नौकरी छोड़ कर गांव चला गया।
उत्तर मिला, 'पहले कंपनी को तीस लोगों की जरूरत थी, बाद में उसने यह संख्या घटाकर आठ कर दी, तुम्हारा वीसा रिजेक्ट हो गया है। '
अब तो अमन के पैरों तले से जमीन खिसक गयी। वह फोन पर चिल्लाने लगा, 'तो हमारे पैसे वापस कर दो। '
'वो तो हमारी फीस आदि के थे। इसमें हमारी क्या गलती है। हमने तुम्हारे फॉर्म वगैरह में कोई कमी थोड़े ही छोड़ी है। वीसा तो दूतावास को देना था, जितने लोगों का कंपनी ने लिख के दिया, मिल गया। तुम्हारा रिजेक्ट कर दिया तो हम क्या करें।'
यह दो टूक जबाब सुनकर अमन के पास आंसू बहाने के सिवा कोई चारा नहीं था।
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