Thursday, 14 April 2016

Bachche ki dekh bhal


सार्थक और सव्या बड़ी हंसी ख़ुशी जिंदगी बिता रहे थे। स्विट्ज़रलैंड में सुन्दर सी जगह पर बढ़िया मकान। घर की खिड़की खोलते ही दूर तक प्रकृति का खूबसूरत नजारा। कोई भी यहां एक बार आये तो यहाँ से जाने का मन नहीं करेगा। सव्या गर्भवती थी, वह दम्पति बहुत ही प्रसन्न था। उन्होंने अल्ट्रासाउंड से यह पता कर लिया था उनके पुत्र ही होने वाला है। स्विट्ज़रलैंड में यह पता करने पर कोई प्रतिबन्ध नहीं है। आखिरी महीने में देख भाल के लिये सव्या ने इंडिया से अपनी माँ को बुलवा लिया था।
समय पूरा हुआ, सव्या की कोख से सुन्दर सा पुत्र जन्मा। सार्थक और सव्या के ख़ुशी का कोई ठिकाना नहीं रहा।सव्या की माँ आ ही गयी थीं उनके अनुभव का पूरा लाभ मिला।  सव्या और सार्थक को उसके पालन पोषण में कोई परेशानी नहीं थी।  बल्कि तीन महीने बाद ही सव्या ड्यूटी भी ज्वाइन कर ली।  दोनों पति पत्नी दिन में ड्यूटी चले जाते, और सव्या की माँ बच्चे को लेकर मगन रहतीं।  कभी दूध पिलाती, कभी तेल मालिश कर देतीं कभी वैसे ही उछाल उछाल कर खिलातीं। एक दिन सव्या ने उन्हें उछालते हुए देख लिया तो बोली यहाँ ऐसा करना मना है।  क्योंकि इससे बच्चे डर जाते हैं।
एक बार बच्चे को उलटी होने लगी और वह रोने लगा। सव्या की माँ ने पूरी कोशिश कर ली मगर वह चुप नहीं हो रहा था। हार मानकर उन्होंने सव्या को फोन कर दिया, वह जल्दी छुट्टी लेकर आ गयी।  पता चला तो सार्थक भी आ गया। वे बच्चे को लेकर अस्पताल चले गए। वे अपना नंबर आने के लिए प्रतीक्षा हाल में बैठे थे कि बच्चा फिर से अचानक रोने लग पड़ा। सार्थक उसे हिलाकर कराना चाहा तो बच्चा शरीर ऐंठ कर उछल पड़ा और
सार्थक के हाथ से छूट गया। हालांकि उसे कोई चोट नहीं लगी, वह सार्थक के पैर पर ही गिरा था और गिरते समय उसका हाथ पकड़ में आ गया था।
पर उसी समय वहां से गुजर रही नर्स ने उसे गिरते देख लिया। फिर क्या था इनको दो सुनायी और पुलिस को फोन कर दिया। पुलिस आयी और बच्चे को यह कहकर ले गयी, तुम दोनों को बच्चे का केयर करना नहीं आता।
अब तो सार्थक सव्या हाल बेहाल। वे गिड़गिड़ाने लगे, कोई जान बूझ कर तो गिराया नहीं फिर उसे चोट भी नहीं   लगी है।  आखिरकार हमारा ही तो बच्चा है, क्या उसे दर्द होगा तो हमें नहीं होगा पर वहां उनकी सुनने वाला कोई नहीं था।  ऐसा लग रहा था वे किसी इंसान के सामने नहीं बल्कि मशीन या पत्थर के सामने गिड़गिड़ा रहे हैं। 
वे चिल्लाते रहे, क्या यहाँ कोई दुर्घटना नहीं होती, सरकार को तो नहीं हटाते हो कि तुम्हे चलाने नहीं आता। मगर सब व्यर्थ।  वे रोते चिल्लाते घर आये। सव्या की मां भी बिलखने लगी।  उन्हें कार्तिक से बड़ा लगाव हो गया था।  तीन महीने का अभी तो हंसने मुस्कराने लगा था। ये कैसा जुल्म ? यहाँ के ये कैसे नियम हैं ? कुछ समझ नहीं आ रहा था।  
धीरे धीरे बात सार्थक के मित्रों को पता लगी।  इस मुसीबत की घडी में वे सब जुट गए। उनको ख्याल आया कि इस मामले में भारत सरकार से गुहार लगाई जाय। वे भारतीय दूतावास गए और अपनी बात बताई। मामले की रिपोर्ट दिल्ली में विदेश मंत्रालय को भेजी गयी।  विदेश मंत्रालय ने हस्तक्षेप किया और वहां की सरकार से अनुरोध किया। बड़ी मुश्किल से कई दिनों पश्चात् यहां वहां चक्कर काटने के बाद उन्हें बच्चा मिला। अब तो सार्थक का यही जी हो रहा था वापस कब इन्डिया चला जाय। वहां तो सही रास्ता सिखाने के लिए बच्चों को मार पीट भी  लो तो कोई कुछ नहीं कहता, यहां अपना बच्चा भी अपना नहीं लगता। कैसा देश है ये। 
    

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