Thursday, 28 April 2016

Holi ki thitholi

होली की ठिठोली

ससुराल करने का वास्तविक मजा तो अधेड़ उम्र में होता है। और ससुराल अगर गांव में हो तो क्या कहने। सबसे दुआ सलाम; साली, सरहज से खुलकर चिकारी, मजाक;  किसी भी ससुराल वाले को छेड़ देना और साथ ही मजाकिया प्रतिक्रिया पाना; दो चार लोग एकत्र हो जायं तो कहकहों की गूंज; कभी चाय पकौड़ी तो कभी शरबत, लस्सी, केवल और केवल खुशनुमा माहौल। ससुराल में जाकर, हर मौसम बसंत सा लगता है। आपस की गुदगुदाने वाली बातें चमन में खिले फूल की भांति वातावरण को महका देती हैं।

सुमेर जी अधेड़ हो चुके थे। वे जब भी ससुराल जाते तो दो तीन दिन का समय लेकर ही जाते। उनकी ससुराल भरी पूरी थी, ससुर जी तीन भाई; साले, सालियों का कोई अभाव नहीं था ।  एक बार वे होली पर ससुराल पहुँच गए। सरहजों ने जमकर रंग डाला।  सुमेर जी भी कौन सा पीछे हटने वाले, उन्होंने भी खूब साथ निभाया। बड़ी वाली सरहज ने बाल्टी में रंग घोल कर रखा था। सुमेर जी के आँगन में आते ही उन पर डालने को बाल्टी  उठायी तो सुमेर जी ने बाल्टी पकड़ ली।  छीना झपटी में कुछ रंग उन पर गिर कुछ सरहज पर थोड़ा बहुत बाल्टी में बचा रहा। सुमेर जी ने बाल्टी छीन लिया तो सरहज कमरे के भीतर भाग चली, सुमेर जी ने दूर से ही बाल्टी का रंग उनपर फेंक दिया।  सरहज तो बगल होकर बच गयी, वह रंग उधर से आ रही सास पर पड़ा। सास बेचारी भौचक्की रह गयी और सुमेर जी 'अरे माता  जी, अरे माता जी' करने लगे। वो तो शुक्र था कि सुमेर जी की पत्नी वहां मौजूद नहीं थीं।

होली खेलने के बाद ठंडई छनी तो सुमेर जी ने अपने बड़े साले रमाकांत की ठंडई में थोड़ी ज्यादा भांग मिला दी। फिर तो रमाकांत की भांग रंग दिखाने लगी। वे दो तीन घंटे तक हँसते ही रहा।  बिना हंसी की बात पर भी हंसी आ जाती। द्वार पर कोई आ जाता, कभी उसे पकड़कर हंसने लगता तो कभी ठंडई का गिलास पकड़ाकर। उसे वहां से जल्दी जाने भी नहीं देता । घर के अंदर से सभी, रमाकांत की पत्नी को उनका तमाशा दिखाने लगे तो वह बेचारी स्वयं को लज्जित महसूस करने लगी।   

अब रमाकांत की पत्नी ने भी सुमेर जी को सबक सिखाने की सोची। जब सुमेर जी ने शौच जाने के लिए पानी मंगवाया तो रमाकांत की पत्नी ने थोड़ी चीनी घोल कर पानी का लोटा पकड़ा दिया। सुमेर जी को जोर की लगी थी, लोटा थामे और तेजी से खेत की ओर भागे। जब वापस आये तो उनके पीछे धोती पर मक्खियां भिनभिना रही थीं। रमाकांत और ससुराल के अन्य लोग मक्खियों को देख हंसने लगे और सुमेर जी को चिढ़ाने लगे। क्यों भाई साहब! धोती में चीनी विनी लगा कर चले हैं क्या ? या कि ठीक से धोया नहीं ? आपका पिछवाड़ा मक्खियों का आकर्षण बना हुआ है। सुमेर जी ने थोड़ा गुस्सा दिखाया और रमाकांत की धोती खोलने लगे । 
'अरे यह क्या?'
'अब मैं इसे ही पहनूंगा और तुम मेरी पहनो।' सुमेर जी कहने लगे ।
'अरे जीजा जी, मैं आपके लिए दूसरी धोती देता हूँ, चलिए स्नान कर लीजिए, मैं आपकी धोती धो भी देता हूँ।'

रमाकांत, सुमेर जी को नलकूप पर स्नान करवाकर उनकी धोती कचार कर पसार दिया। माहौल फिर से स्नेहिल हो उठा।

एस० डी० तिवारी


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