Sunday, 10 April 2016

Begani shaadi me

बेगानी शादी में

बजाज साहब के बेटे की शादी का कार्ड आया था। वे काफी घनिष्ठ थे इसलिए जाना आवश्यक था। बारात दिल्ली के ही एक बैंक्वेट हॉल में जानी थी, हम पति पत्नी समय से तैयार होकर सीधे विवाह स्थल पर पहुँच गए। वहां पहुंचे तो भीड़ देख कर दंग रह गए। गाड़ी खड़ी करने की कहीं जगह ही नहीं मिल रही थी। गाड़ी की गति धीमी करके देखने लगे, शायद कोई गाड़ी निकले तो हमें जगह मिल जाएगी।  भाग्य ने साथ दिया, पार्किंग में लगी हमारे एकदम आगे वाली कार की पीछे की लाल बात जली, हम प्रसन्न हो होकर गाड़ी थोड़ा और पीछे कर लिये कि वह गाड़ी सरलता से निकल जाय और हम अपनी गाड़ी वहीँ लगा लें। वह गाड़ी पार्किंग की पंक्ति से बाहर निकलकर बढ़ी ही थी और मैं वहां लगाने के लिए अपनी कार को गियर में डाल रहा था कि पीछे से आ रहे एक युवक ने झट से मेरे आगे से लेकर अपनी गाड़ी वहां घुसा दिया।
मैं तो देखता ही रह गया। वह गाड़ी लॉक करके निकला तो मैंने कहा, 'भाई यहाँ तो लगाने के लिए मैं खड़ा था। '
'अरे अंकल लेकिन वहां पहले तो मैं ही पहुंचा था न। ' कहकर मुस्कराता हुआ पंडालों की ओर बढ़ गया।

एस० डी० तिवारी

बड़ी मुश्किल से काफी दूर जाकर जगह मिली। लगभग एक किलोमीटर दूर गाड़ी खड़ी करके पैदल आना पड़ा। वहां बैंक्वेटों का मकड़जाल बना हुआ था । लगभग एक दर्जन मैरिज हॉल, सब एक दूसरे से सटे, किसी का मुंह, मुख्य सड़क की ओर, तो किसी का पीछे की ओर, कुछ एक के गेट, बगल वाली गली से। एक मैरिज हॉल के सामने पहुंचे तो देखा, गेट पर लिखा था, राहुल वेड्स मोनिका। हम बैंक्वेट हाल के नाम का ध्यान नहीं दिए, बजाज साहब के बेटे का नाम भी राहुल था हम पति-पत्नी उसमें घुस गए। घुसते ही बैरे ने दोनों के हाथ में दोने पकड़ा दिया और पनीर का टिक्का चटनी के साथ डाल दिया। पनीर टिक्का खाते ही गाड़ी चलाने की थकान और पार्किंग की टेंशन मिट गयी। टिक्का खाने के बाद हम इधर उधर नजर दौड़ाए, वहां जान पहचान का, कोई भी व्यक्ति नहीं दिख रहा था। बजाज साहब पहले मेरे साथ काम कर चुके थे, इसलिए ऑफिस के कुछ लोगों का मिलना अनिवार्य था।

जब कोई नहीं मिला तो मुझे शंका होने लगी और लगने लगा कि हम गलत हॉल में आ गए हैं। अब एक तरफ क्षुधा निवारण की संतुष्टि थी और दूसरी तरफ डर सताने लगा कि किसी दूसरे की शादी हुई और किसी ने पूछ दिया तो बड़ी बेइज्जती होगी। हम यही उचित समझे कि ठीक से पता कर लें, सही जगह हैं या नहीं। बाहर निकल कर गेट पर पता किये तो पता चला कि उस पंडाल में राहुल बजाज नहीं अपितु राहुल कपूर की शादी थी। अब तो पैर दबाकर, हम वहां से रफूचक्कर हुए।

इन सब प्रक्रिया में रात के दस बज चुके थे, जब कि कार्ड में पहुँचने का समय ८ बजे दिया गया था। हम अपना सही मंडप 'मधुर मिलन' ढूंढते आगे बढ़े। भीड़ के मारे कंधे से कंधे रगड़ रहे थे। मधुर मिलन' का पता बताने वाला कोई नहीं मिल रहा था। पूछने पर, सभी यही कहते हम भी बाहर से आये हैं। खैर किस्मत अच्छी थी, एक बैंक्वेट हॉल के गेट पर मेरे ऑफिस के कुछ लोग दिख गए। हम पति पत्नी पहुंचे तो बजाज साहब भी वहीँ खड़े थे, मैंने हाथ जोड़ा और उनसे बोला सॉरी देर हो गयी।  बगल में खड़े गोयल जी बोल पड़े,  'आप बिल्कुल समय से हैं, अभी तो बैंड वाले ही नहीं आये हैं।'

हमें थोड़ा संतोष हुआ। तुरंत ही बाद बैंड वाले आ गये।  बैंड बजना शुरू हुआ, बारात चल दी। देर तो हो ही चुकी थी, जल्दी से जल्दी थोड़ा नाच गा के बारात मंडप में प्रवेश करने लगी।  इतने में एक और बैंड आ गया। 'बजाज साहब की बारात यही है। '
'हाँ ' गोयल साहब बोले।
'हम बैंड वाले हैं। '
'वो तो बजा रहे हैं।'
 'नहीं जी, हमें बुक किया है, गलती से दूसरी बारात में चले गए थे। ' एक बैंड वाला बोला।
'बताओ, तो अब क्या करें? तुम लोग इतनी देर से आये हो।  जाओ, बजाज साहब से बात कर लो।'
नवागन्तुक बैंड मास्टर पहले वाले बैंड मास्टर के पास गया और पूछा 'तुम कैसे बजा रहे हो, यहाँ तो हमारी बुकिंग है। ' तो उस बैंड मास्टर ने बताया, राहुल की शादी में तो हमारा कांटेक्ट है। मैं भी उनकी बात सुन रहा था, उससे पूछ लिया कि राहुल का पूरा नाम क्या है तो उसने बताया, राहुल  कपूर।
'नहीं भइया, यह राहुल बजाज की बारात है। राहुल कपूर की बारात उस ओर है', मैंने बता  दिया। हम तो पहले ही राहुल कपूर का पनीर टिक्का खा चुके थे। अब बेचारे बैंड वाले उधर को चले।
'कुछ पैसे तो दिला दो, हमने तुम्हारी चढ़त करा दी। '  जब बैंड वाले ने बोला तो मैंने दूसरे बैंड मास्टर  से बात करने को कह दिया। फिर पैसे के भुगतान को लेकर दोनों में कुछ नोक झोंक होने लगी। बजाज साहब आकर झगड़ा निबटाये, हम तो बैंक्वेट में घुस कर खाने पीने में जुट गए।

- एस० डी० तिवारी



वह जीत गया

बजाज साहब के बेटे की शादी का कार्ड आया था। वे काफी घनिष्ठ थे इसलिए जाना आवश्यक था। बारात दिल्ली के ही एक बैंक्वेट हॉल में जानी थी, हम पति पत्नी समय से तैयार होकर सीधे विवाह स्थल पर पहुँच गए। वहां पहुंचे तो भीड़ देख कर दंग रह गए। गाड़ी खड़ी करने की कहीं जगह ही नहीं मिल रही थी। गाड़ी की गति धीमी करके देखने लगे, शायद कोई गाड़ी निकले तो हमें जगह मिल जाएगी।  भाग्य ने साथ दिया, पार्किंग में लगी हमारे एकदम आगे वाली कार की पीछे की लाल बात जली, हम प्रसन्न हो होकर गाड़ी थोड़ा और पीछे कर लिये कि वह गाड़ी सरलता से निकल जाय और हम अपनी गाड़ी वहीँ लगा लें। वह गाड़ी पार्किंग की पंक्ति से बाहर निकलकर बढ़ी ही थी और मैं वहां लगाने के लिए अपनी कार को गियर में डाल रहा था कि पीछे से आ रहे एक युवक ने झट से मेरे आगे से लेकर अपनी गाड़ी वहां घुसा दिया।
मैं तो देखता ही रह गया। वह गाड़ी लॉक करके निकला तो मैंने कहा, 'भाई यहाँ तो लगाने के लिए मैं खड़ा था। '
'अरे अंकल लेकिन वहां पहले तो मैं ही पहुंचा था न। ' कहकर मुस्कराता हुआ पंडालों की ओर बढ़ गया।

एस० डी० तिवारी

बड़ी मुश्किल से काफी दूर जाकर जगह मिली। लगभग एक किलोमीटर दूर गाड़ी खड़ी करके पैदल आना पड़ा। वहां बैंक्वेटों का मकड़जाल बना हुआ था । लगभग एक दर्जन मैरिज हॉल, सब एक दूसरे से सटे, किसी का मुंह, मुख्य सड़क की ओर, तो किसी का पीछे की ओर, कुछ एक के गेट, बगल वाली गली से। एक मैरिज हॉल के सामने पहुंचे तो देखा, गेट पर लिखा था, राहुल वेड्स मोनिका। हम बैंक्वेट हाल के नाम का ध्यान नहीं दिए, बजाज साहब के बेटे का नाम भी राहुल था हम पति-पत्नी उसमें घुस गए। घुसते ही बैरे ने दोनों के हाथ में दोने पकड़ा दिया और पनीर का टिक्का चटनी के साथ डाल दिया। पनीर टिक्का खाते ही गाड़ी चलाने की थकान और पार्किंग की टेंशन मिट गयी। टिक्का खाने के बाद हम इधर उधर नजर दौड़ाए, वहां जान पहचान का, कोई भी व्यक्ति नहीं दिख रहा था। बजाज साहब पहले मेरे साथ काम कर चुके थे, इसलिए ऑफिस के कुछ लोगों का मिलना अनिवार्य था।

जब कोई नहीं मिला तो मुझे शंका होने लगी और लगने लगा कि हम गलत हॉल में आ गए हैं। अब एक तरफ क्षुधा निवारण की संतुष्टि थी और दूसरी तरफ डर सताने लगा कि किसी दूसरे की शादी हुई और किसी ने पूछ दिया तो बड़ी बेइज्जती होगी। हम यही उचित समझे कि ठीक से पता कर लें, सही जगह हैं या नहीं। बाहर निकल कर गेट पर पता किये तो पता चला कि उस पंडाल में राहुल बजाज नहीं अपितु राहुल कपूर की शादी थी। अब तो पैर दबाकर, हम वहां से रफूचक्कर हुए।

- एस० डी० तिवारी

हमारी बुकिंग है

पार्किंग की जगह न मिलने से गाड़ी दूर खड़ी करके पैदल आना पड़ा। और पहले हम राहुल बजाज की जगह राहुल कपूर के पंडाल में घुस गए। इन सब प्रक्रिया में दस बज चुके थे, जब कि शादी में पहुँचने का समय ८ बजे दिया गया था। हम अपना सही पंडाल 'मधुर मिलन' ढूंढते आगे बढे।  भीड़ के मारे कंधे से कंधे रगड़ रहे थे, 'मधुर मिलन' का पता पूछा पर, सभी के बाहर से आने के कारण कोई नहीं बता पा रहा था। खैर किस्मत अच्छी थी, एक बैंक्वेट हॉल के गेट पर मेरे ऑफिस के कुछ लोग दिख गए। हम पति पत्नी पहुंचे, बजाज साहब भी वहीँ खड़े दिख गए, हमने हाथ जोड़ा और उनसे बोला सॉरी देर हो गयी।  बगल में खड़े गोयल जी बोल पड़े,  'आप बिल्कुल समय से हैं, अभी तो बैंड वाले ही नहीं आये हैं।'

हमें थोड़ा संतोष हुआ। तुरंत ही बाद बैंड वाले आ गये।  बैंड बजना शुरू हुआ, बारात चल दी। देर तो हो ही चुकी थी, जल्दी से जल्दी थोड़ा नाच, गा के बारात मंडप में प्रवेश करने लगी।  इतने में एक और बैंड आ गया। 'बजाज साहब की बारात यही है। '
'हाँ ' गोयल साहब बोले।
'हम बैंड वाले हैं। '
'वो तो बजा रहे हैं।'
 'नहीं जी, हमें बुक किया है, गलती से दूसरी बारात में चले गए थे। ' एक बैंड वाला बोला।
'बताओ, तो अब क्या करें? तुम लोग इतनी देर से आये हो।  जाओ, बजाज साहब से बात कर लो।'
नया वाला बैंड मास्टर पहले वाले बैंड मास्टर के पास गया और पूछा 'तुम कैसे बजा रहे हो, यहाँ तो हमारी बुकिंग है। ' तो उस बैंड मास्टर ने बताया, राहुल की शादी में तो हमारा कांटेक्ट है। मैं भी उनकी बात सुन रहा था, उससे पूछ लिया कि राहुल का पूरा नाम क्या है तो उसने बताया, राहुल  कपूर।
'नहीं भइया, यह राहुल बजाज की बारात है। राहुल कपूर की बारात उस ओर है ।' मैंने बता  दिया। हम तो पहले ही राहुल कपूर के पंडाल में घुस कर पनीर टिक्का खा चुके थे। अब बेचारे बैंड वाले उधर को रुख किये साथ ही बोले, 'कुछ पैसे तो दिला दो, हमने तुम्हारी चढ़त करा दी। '  मैंने दूसरे बैंड मास्टर  से बात करने को कह दिया। फिर पैसे के भुगतान को लेकर दोनों में नोक झोंक होने लगी। बजाज साहब ने आकर उनका झगड़ा निबटाने लगे। हम तो बैंक्वेट में घुस कर खाने पीने में जुट गए।

एस० डी० तिवारी

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