चाय वाला
स्टेशन पर गाड़ी रुकी। बहुत से यात्रियों को चाय की तलब थी, पर कोई चायवाला नहीं दिख रहा था। गाड़ी में बैठे कुछ यात्री बात कर रहे थे, इस स्टेशन की चाय बड़ी अच्छी होती है। सभी की आंखें खिड़की से बाहर झांक रही थीं, शायद चायवाला दिख जाय, जो अंदर की और बैठे थे उनके 'चायवाला' सुनने के लिए कान बेताब थे।
जीतू के गांव के पास ही एक छोटा स्टेशन था। यूँ तो वहां से दिन भर में कई गाड़ी गुजरती थीं पर बस दो ही एक्सप्रेस गाड़ी रुकती थीं। जीतू चाय की केतली भरके दो फेरा लगा लेता और डेढ़-दो सौ की कमाई कर लेता। आज जीतू की तबियत कुछ ख़राब लग रही थी। हरारत के मारे बदन टूट रहा था। जी कर रहा था कि छुट्टी कर ले, पर सोचा छुट्टी करके क्या मिलेगा, चले चलते हैं; जो ही कुछ कमाई हो जाएगी। घड़ी देखा तो गाड़ी आने का समय लगभग हो चुका था। उसने फटाफट चाय बनाई और केतली, गिलास लेकर चल दिया। जीतू की तो किस्मत ही ख़राब थी। जैसे ही घर से निकला, गाड़ी आती दिखाई दी। उसने दौड़ लगानी शुरू कर दी। वैसे तो वो अधिकतर ही दस पंद्रह मिनट देर से आती थी, पर आज बिलकुल सही समय पर आ गयी।
'चायवाला, चायवाला' चिल्लाते हुए वह दौड़ता आ रहा था। यात्रियों के बेताब कानों को कुछ राहत मिली। पर यह क्या, अभी वह दूर था और गाड़ी खिसकनी शुरू हो गयी । बड़ी मुश्किल से हांफते हुए वह गाड़ी के समीप पहुंचा। वह केतली नीचे रख कर, कागज के गिलास में चाय डालने लगा कि कई हाथ खिड़की से बाहर हो गये। समय इतना कम था कि वह बस एक ही यात्री को चाय पकड़ा पाया। उस यात्री ने दस रुपये का नोट दिया, जब तक जीतू लौटाने के लिए बाकी तीन रुपये निकालता, गाड़ी की गति तेज हो गयी थी। जीतू गाड़ी के पीछे कुछ दूर दौड़ा मगर यात्री को पैसे नहीं पकड़ा पाया। आज की उसकी सारी चाय तो बेकार हो गयी जिसका उसे बहुत पछतावा था मगर उससे अधिक पछतावा तीन रुपये नहीं लौटा पाने का। बार बार सोचता, जाने किसका तीन रुपये का कर्जदार हो गया। अब कर भी क्या सकता था।
बची चाय में से कुछ स्टेशन के कर्मचारियों को पिलाया, बाकी की घर में चाय पार्टी हुई।
बची चाय में से कुछ स्टेशन के कर्मचारियों को पिलाया, बाकी की घर में चाय पार्टी हुई।
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