बिस्कुट चोर
एस० डी० तिवारी
दिसंबर का महीना था, कड़कती ठण्ड में चार पांच लोग जामा-जोड़ा कसे, मौर्या की पान की दुकान पर खड़े अपनी बारी की प्रतीक्षा कर रहे थे। पान लगाते लगाते वह बीच में ही अचानक अपने ठीहा से उठा और दुकान के बाहर चला गया। कोई कुछ समझ पाता कि वह एक बच्चे को पीटने लगा। बस बारह तरह वर्ष का बच्चा, जो जांघिया व एक फटी सी कमीज पहने था। ठण्ड में भी उसके पास स्वेटर या कोई गरम कपड़ा नहीं था। मौर्या के चार पांच थप्पड़ खाकर वह नीचे गिर गया, फिर मौर्य ने तीन चार लात और जड़ दिए। ठण्ड से तो वह पहले ही कांप रहा था मार से वह कंपकंपी कई गुना बढ़ गयी थी। किसी को कुछ समझ नहीं आ रहा था, आखिर हुआ क्या है। उसके बगल के दुकानदार भी दुकान के अंदर से ही देखते रहे। बच्चे के कई जगह खरोंचे आ गयीं और खून निकल आया। फिर खड़े लोगों ने पूछा, क्या बात है? मौर्या !
मौर्या ने बताया, 'इसने काउंटर से चुपके से ये बिस्कुट उठा लिया, वो तो मेरी नजर पड़ गयी। ' कहते हुए उसकी कमीज की जेब से ग्लूकोज बिस्कुट का वह पैकेट निकाला। वह बच्चा तो बेचारा मार खाकर चलता बना।मौर्या बिस्कुट का पैकेट लोगों को दिखाने लगा। 'बताओ, यह टूटकर चूरा हो गया; अब फेकना ही पड़ेगा। आज इसने बिस्कुट चुराया, कल को ऐसे ही बड़ा चोर बनेगा। '
एक बाबू साहब जो वहीँ खड़े थे, चुप न रह सके, 'वह तो चोर कल को बनेगा, तुमने तो अपनी गुंडागर्दी आज ही दिखा दी। ढाई रुपये की चीज के लिए बेचारे का खून निकाल दिया। वह भूखा होगा। उसने तो गलती की ही, पर उससे और बड़ी गलती करके, छोटी गलती कैसे ठीक करोगे ? '
बाबू साहब की बात का जबाब देने की हिम्मत तो मौर्या को नहीं हुई, परन्तु बच्चे की चोरी और पिटाई, कई प्रश्नों के उत्तर ढूंढने को विवश कर गयी। कुछ यक्ष प्रश्न तो वहां उपस्थित लोगों को घेरे में ले चुके थे और थोड़ी देर चर्चा भी हुई, मगर अनेकों प्रश्न के उत्तर सम्भवतः वर्षों में भी न मिलें।
एस० डी० तिवारी
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