नहर का पानी
आज, कल करते इस वर्ष मेहराम ने खेत बोने में देरी कर दी थी। चन्द्रिका का बोया गेहूं कबका जमीन के ऊपर आ चुका था। अब, वह पहली सिंचाई की तैयारी भी करने लगा था। मेहराम की चन्द्रिका से तो पहले ही पटरी नहीं थी, उसका हरा खेत देख कर वह ईर्ष्या से भुन रहा था। नहर का पानी छूट चुका था, चन्द्रिका ने उसके खेत को जाने वाली नाली में पानी खोल दिया। मुख्य नहर से निकलने वाली, मेहराम और चन्द्रिका की एक ही नाली थी, आगे चलकर वह दो अलग दिशाओं में बंट जाती थी।
मेहराम के खेत के पास एक पोखरी थी, जो बरसात के बाद शीघ्र ही सूख जाती थी। मेहराम ने सोचा कि अभी उसके खेत की सिंचाई में तो समय है, चलो इसी को भर लेते हैं। बाद में जब नहर में पानी नहीं भी आएगा, तब भी पम्प लगाकर अपने खेत की सिंचाई कर लेगा। मगर यह उसकी कुटिल चाल थी, उसकी असली मन्सा तो कुछ और थी। वह नहीं चाहता था कि चन्द्रिका के खेत में पानी जाय और उसकी फसल अच्छी हो। उसका पानी तो वह नहीं बंद कर सकता था, इस बहाने पानी का प्रवाह कम करके उसके खेत की सिंचाई में व्यवधान उत्पन्न करना चाहता था। वह नाली को पोखरी में खोलकर किसी रिश्तेदारी में चला गया।
इधर चन्द्रिका के खेत को पूरा पानी तो नहीं मिला, पोखरी लबालब भर गयी और पानी बहकर मेहराम के खेत में भी भर गया। बेचारे का खेत का सारा बीज सड़ गया। और तो और कुछ समय बाद सिंचाई विभाग से पानी का बिल भी आ गया।
एस० डी० तिवारी
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