Friday, 29 April 2016

char chakka

चार चक्का

कार के पंजीकरण प्रमाणपत्र में कैलाश का जो पता लिखा था, उसमें कुछ त्रुटि रह गयी थी। उसे ठीक कराने, वह सड़क परिवहन कार्यालय पहुंचा। वह त्रुटि ठीक कराने के बारे में पूछ ताछ कर रहा था, बाबू ने उसे एक फॉर्म पकड़ा दिया और बोला कि उसे भरकर अंदर सड़क परिवहन अधिकारी से मिल ले। फॉर्म लेकर वह सड़क परिवहन अधिकारी के कक्ष में घुसा। फॉर्म पर नाम पता पढ़कर, अधिकारी ने पूछा -
'तुम्हारे पिताजी का क्या नाम है ?'
'अलोक नाथ उपाधयाय'
अधिकारी ने उसे बैठने के लिए कहा और चपरासी से उसके लिये चाय लाने के लिए कहकर, फिर से पूछा  -
'नयी खरीदी है ?'
'खरीदी नहीं, शादी में मिली है। ' कैलाश ने उत्तर दिया।
शालिनी मुस्कराते हुए बोली, 'मैं ठीक करा देती हूँ, अपना आरसी परसों ले जाना। हाथ से करना होता तो अभी हो जाता। पर इसके बदले कंप्यूटर से दूसरा कार्ड निकालना पड़ेगा, मैं कंप्यूटर विभाग को भेज देती हूँ। वैसे चाहो तो कूरियर से घर भिजवा दूँगी।'
'मैं स्वयं ही आकर ले लूंगा। ' कैलाश ने कहा। 
इतने में चाय आ गयी। आरटीओ के इस उदार चित्त और आव भगत से कैलाश अभिभूत भी था और आश्चर्य चकित भी। मन में सोचा, आखिर पिता जी का नाम पूछने के बाद चाय क्यों मंगा ली? कैलाश ने उससे पूछ लिया, 'क्या आप पिताजी को जानती हैं ?'
'बस यूँ ही पूछ लिया। ठीक है, परसों आरसी ले जाना, मैं नहीं भी रहूंगी तो काउंटर से मिल जायेगा। '

शालिनी पढ़ने में बहुत तेज थी। ग्रेजुएशन तक सभी कक्षा में प्रथम श्रेणी से पास हुई। उसके पिता जी अलोक नाथ के यहाँ उसकी शादी का प्रस्ताव लेकर गए थे। पर अलोक नाथ ने बड़े साफ शब्दों में सुना दिया था कि उनका बेटा बीटेक है, और वे पांच लाख नकद और एक चार चक्का लेंगे इसके अलावा उत्तम स्तर की शादी होनी चाहिए।  शालिनी के पापा को यह उनके बजट से बाहर की बात लगी, तो वे पीछे हट गए।  उन्होंने देख सुन कर, उसका विवाह दूसरी जगह कर दिया। शालिनी की इच्छा थी, वह एक बार प्रांतीय नागरिक सेवा (पी.सी.एस.) की परीक्षा में बैठे। ससुराल वालों ने भी उसका भरपूर सहयोग दिया। शालिनी ने तैयारी की और प्रथम प्रयास में ही सफल हो गयी। प्रशिक्षण के पश्चात, उसे सड़क परिवहन विभाग में नियुक्ति मिली। 

चार चक्का के चक्कर में कैलाश को चार वर्ष तक विवाह के लिए प्रतीक्षा करनी पड़ी और शालिनी के विवाह के चार वर्ष हो चुके थे, उसकी दो वर्ष की एक सुन्दर, प्यारी सी बेटी भी थी। 
 
एस० डी० तिवारी 

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