छत पर धुआं
यह बात लगभग पचास साल पहले की है, मैं अभी छोटा बच्चा था। हां, यही कोई दस साल का।
सुदामी बात को टालने लगी, 'नहीं बस ऐसे ही। '
'अरे ऐसे ही क्या? तबियत ठीक नहीं थी खबर भिजवा दी होती, मैं बना के भेज देती। '
'नहीं दीदी, तवियत ठीक है। '
'तो फिर बात क्या है?' अब देवकी पीछे ही पड़ गयी तो सुदामी को बतानी पड़ी।
'घर में आटा नहीं है, सारा गेहूं पिसने के लिये गया है, आज वो पिस नहीं पाया। दिन का थोड़ा चावल-दाल पड़ा था; सोची, बेला और लालचन्द थोड़ा थोड़ा खा लेंगे, हम दोनों का क्या, एक वक्त की तो बात है। '
'वाह भाई वाह, तुझे बताना नहीं चाहिए! चल जल्दी से जला चूल्हा, मैं आटा लेकर आती हूँ। बताओ, इस तरह संकोच करते हैं कहीं! तेरे यहां सब भूखे सोयेंगे तो क्या हमारे गले खाना उतरेगा? दुबारा ऐसा नहीं करना।' देवकी बरस पड़ी।
एस० डी० तिवारी
यह बात लगभग पचास साल पहले की है, मैं अभी छोटा बच्चा था। हां, यही कोई दस साल का।
शाम का समय हो गया था। पश्चिम में आकाश की लालिमा लुप्त होने लगी थी। ढोर चर के वापस अपने अपने खूंटे पर आ चुके थे। घरों में दीये जलाने की तैयारी हो रही थी। छप्पर फाड़ कर, धुआं छतों के ऊपर पहुंच चुका था। पूरे गांव पर धुएं के बादल छा चुके थे। देवकी भी चूल्हे पर दाल, चावल बैठा दी थी। रोटी के लिए आटा गूंदने के लिए वह आँगन में ही बैठ गयी। अचानक उसकी नजर पड़ोस में सुदामी की छत पर पड़ी तो चौंक गयी, उसके छत पर धुंआ नहीं। क्या बात है आज वह देर से रसोई बना रही है। रोज तो वह उससे पहले ही चूल्हा जला लेती थी ।
खैर, वह अपना आटा गूंदने में व्यस्त हो गयी। और कुछ समय में उसकी रोटी भी बन गयी। देवकी के मन में बार बार यह बात खटक रही थी कि सुदामी के छत पर धुआं नहीं उठा। उसका ध्यान उधर ही रहता। जब काफी देर हो गयी तो सोची चल कर देखें, आखिर बात क्या है? उसकी लड़की तो आग मांग के कभी ले गयी थी। उस समय माचिस कोई कोई ही रखता था, जो रखता भी था उसे खर्च करने में बड़ी कंजूसी रखता था। कारण, बाजार दूर और नकदी की कमी। घर में राख के ढेर में ढककर आग रख ली जाती थी और उसी से उपले और पत्ते रख कर फूंक मार कर जीवित कर ली जाती। कभी कभी जब रखी आग बुझ जाती तो पास पड़ोस से मांग कर लाई जाती।
देवकी को अब किसी अनहोनी का अंदेशा होने लगा था। वह बेचैन हो रही थी। अपनी रसोई तैयार होने के बाद वह तुरंत सुदामी के यहाँ गयी।
'अरे सुदामी क्या हो गया? चूल्हा क्यों नहीं जला ? बेला तो कभी आग ले आई थी। 'सुदामी बात को टालने लगी, 'नहीं बस ऐसे ही। '
'अरे ऐसे ही क्या? तबियत ठीक नहीं थी खबर भिजवा दी होती, मैं बना के भेज देती। '
'नहीं दीदी, तवियत ठीक है। '
'तो फिर बात क्या है?' अब देवकी पीछे ही पड़ गयी तो सुदामी को बतानी पड़ी।
'घर में आटा नहीं है, सारा गेहूं पिसने के लिये गया है, आज वो पिस नहीं पाया। दिन का थोड़ा चावल-दाल पड़ा था; सोची, बेला और लालचन्द थोड़ा थोड़ा खा लेंगे, हम दोनों का क्या, एक वक्त की तो बात है। '
'वाह भाई वाह, तुझे बताना नहीं चाहिए! चल जल्दी से जला चूल्हा, मैं आटा लेकर आती हूँ। बताओ, इस तरह संकोच करते हैं कहीं! तेरे यहां सब भूखे सोयेंगे तो क्या हमारे गले खाना उतरेगा? दुबारा ऐसा नहीं करना।' देवकी बरस पड़ी।
एस० डी० तिवारी
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