Saturday, 9 April 2016

Bihar ki gadi

बिहार की गाड़ी

'और भोला! कैसे हो, सब ठीक ठाक है न !' कमल ने पूछा।
'गांव जाना है यार, पंद्रह दिन से लगा हूँ, किसी भी ट्रैन में आरक्षण नहीं मिल रहा । पता नहीं मई, जून में क्या हो जाता है, मुंबई और दिल्ली से बिहार जाने वाली ट्रेनों में तो जिस दिन रिजर्वेशन खुलता है उसी दिन सभी सीटें फुल हो जाती हैं।'   भोला बोला।
'हां यार! तत्काल में भी खुलते ही सब सीटें भर जाती हैं। पता नहीं ये सब कैसे हो जाता है। लगता है अंदर ही अंदर, सब दलाल लोग बुक करा लेता है।'
 'अरे यार, एक बार तो इंटरनेट से तत्काल में ऑन लाइन टिकट कर रहा था, अस्सी सीटें बाकी  दिखा रहा था। जब तक भुगतान होकर टिकट हुआ तो पता चला की प्रतीक्षा सूची में चौसठ नंबर मिला। '
'सब धांधली है। तो अब नहीं जाओगे ?'

'हां, जा रहा हूँ न' भोला बोला।
'बिना रिजर्वेशन के कैसे जाओगे ?'
'अरे, मेरे गांव के पास के ही दो लोग जा रहे हैं, उनका रिजर्वेशन है। मुझे तो अकेले ही जाना है और वेटिंग का टिकट है ही। '

वहीँ खड़ा पंकज मजाकिया अंदाज में बोल पड़ा, 'ये तो बात है, बिहार जाने वाली गाड़ी में एक का भी रिजर्वेशन हो गया तो समझो, जान पहचान वालों का सबका हो गया।'
'करें भी क्या भाई, जब जाना जरूरी होता है तो जाना ही पड़ता है। वरना किसी और की सीट पर बैठ कर जाना किसे अच्छा लगता है। तकलीफ सहो भी और दूसरे को दो भी। और ये तो देखो ट्रैन में तो जगह नहीं होती फिर भी दिल में जगह होती है, वरना यूँ थोड़े ही कोई अपनी सीट पर बिठा लेगा।'

     - एस० डी० तिवारी 

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