गाड़ी का चालान
दरवाजे की घंटी बजते ही आवाज आई, 'स्पीड पोस्ट।' दीपा दौड़ी गयी, दरवाजा खोली।
'यहां दस्तखत कर दीजिये' पोस्ट मैन ने कहा और लिफाफा थमा दिया।
लिफाफे पर 'उ० प्र० ट्रैफिक पुलिस' पढ़कर, दीेपा चौंकी। उस पर अरविन्द का नाम था, वह तुरंत समझ गयी यह कोई चालान ही होगा।
'अरविन्द ये ले, तेरे लिए इनाम आया है' उसने लिफाफा अरविन्द को पकड़ा दिया।
अरविन्द आनन फानन में लिफाफा खोला तो उसमे चालान ही था। निश्चित तिथि तक मजिस्ट्रेट के कार्यालय में जाकर, दो सौ रुपये जमा कराने थे। अरविन्द को बड़ा गुस्सा आया, वह बड़बड़ाने लगा, 'देखो! डेढ़ साल पहले का चालान अब आया है। ट्रैफिक वाले कितनी फुर्ती से काम करते हैं, डेढ़ साल बाद चालान, और स्पीड पोस्ट से! अब भुगतना तो पड़ेगा ही। '
वह मजिस्ट्रेट कार्यालय गया। वहां जाकर कार्यालय में कर्मचारियों को सुनाने लगा, 'बताओ डेढ़-दो साल बाद किसे याद होगा कि क्या किया था। '
एक बाबू ने कहा, वो तो चालान में लिखा ही है, सर! आपने लाल बत्ती पार की थी। याद करिये। अरविन्द को अब याद आ चुका था। एक बार वह लाल बत्ती पर ही गाड़ी निकाल दिया, आगे पुलिस वाले ने रोक लिया। वह जुर्माना लगाने को जैसे ही चालान की किताब निकाला, अरविन्द ने मामा जी को फ़ोन मिला दिया, 'ये लो मेरे मामा हैं, पुलिस कमिश्नर; बात कर लो। ' पुलिस वाले ने फ़ोन नहीं पकड़ा, 'ठीक है, सर ! जब आप कमिश्नर साहब के भांजे हैं तो जाईये। ' अरविन्द छाती फुला के चला गया। वह पुलिस वाला उसकी गाड़ी का नंबर नोट कर रखा था। जब कमिश्नर साहब की लखनऊ से बदली हो गयी तो उसने अरविन्द को चालान भिजवा दिया।
दरवाजे की घंटी बजते ही आवाज आई, 'स्पीड पोस्ट।' दीपा दौड़ी गयी, दरवाजा खोली।
'यहां दस्तखत कर दीजिये' पोस्ट मैन ने कहा और लिफाफा थमा दिया।
लिफाफे पर 'उ० प्र० ट्रैफिक पुलिस' पढ़कर, दीेपा चौंकी। उस पर अरविन्द का नाम था, वह तुरंत समझ गयी यह कोई चालान ही होगा।
'अरविन्द ये ले, तेरे लिए इनाम आया है' उसने लिफाफा अरविन्द को पकड़ा दिया।
अरविन्द आनन फानन में लिफाफा खोला तो उसमे चालान ही था। निश्चित तिथि तक मजिस्ट्रेट के कार्यालय में जाकर, दो सौ रुपये जमा कराने थे। अरविन्द को बड़ा गुस्सा आया, वह बड़बड़ाने लगा, 'देखो! डेढ़ साल पहले का चालान अब आया है। ट्रैफिक वाले कितनी फुर्ती से काम करते हैं, डेढ़ साल बाद चालान, और स्पीड पोस्ट से! अब भुगतना तो पड़ेगा ही। '
वह मजिस्ट्रेट कार्यालय गया। वहां जाकर कार्यालय में कर्मचारियों को सुनाने लगा, 'बताओ डेढ़-दो साल बाद किसे याद होगा कि क्या किया था। '
एक बाबू ने कहा, वो तो चालान में लिखा ही है, सर! आपने लाल बत्ती पार की थी। याद करिये। अरविन्द को अब याद आ चुका था। एक बार वह लाल बत्ती पर ही गाड़ी निकाल दिया, आगे पुलिस वाले ने रोक लिया। वह जुर्माना लगाने को जैसे ही चालान की किताब निकाला, अरविन्द ने मामा जी को फ़ोन मिला दिया, 'ये लो मेरे मामा हैं, पुलिस कमिश्नर; बात कर लो। ' पुलिस वाले ने फ़ोन नहीं पकड़ा, 'ठीक है, सर ! जब आप कमिश्नर साहब के भांजे हैं तो जाईये। ' अरविन्द छाती फुला के चला गया। वह पुलिस वाला उसकी गाड़ी का नंबर नोट कर रखा था। जब कमिश्नर साहब की लखनऊ से बदली हो गयी तो उसने अरविन्द को चालान भिजवा दिया।
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